क्या उर्दू सचमुच अलग भाषा है?

भाषाविज्ञान के आधार पर उर्दू को अलग भाषा नहीं कहा जा सकता। इसकी लिपि फ़ारसी/नस्तालीक़ है, व्याकरण हिन्दी की है, और इसकी अपनी कोई स्वतन्त्र विकसित शब्दावली नहीं है। सभी शब्द या तो फ़ारसी हैं या हिन्दी/भारतीय बोलियों के। लोग अपरिचित लिपि देखकर इसे अलग भाषा मान लेते हैं।

कुछ फ़ारसी शब्द अधिक प्रयोग करने और फ़ारसी लिपि में लिखने से भाषा बदल जाती, तो आज अंग्रेज़ी शब्दों से भरी रोमन-लिपि वाली हिन्दी को भी अलग भाषा मान लेना चाहिए।

:one: भाषा और लिपि का अन्तर

भाषा वह है जो बोली और सुनी जाती है। एक अन्धा जो पढ़ नहीं सकता, वह भी भाषा बोलता और सुनता है। एक ही भाषा कई लिपियों में लिखी जा सकती है और ऐसा होता भी रहता है। अलग लिखावट को अलग भाषा मान लेना भ्रम है।

kya haal hain … meri back me pain ho gaya tha … → रोमन में हिन्दी।

क्या यह नई भाषा है?

کیا حال ہیں . بہت دنوں سے بات نہیں ہویی . میری بیک مے پین ہو رہا تھا → यही वाक्य नस्तालीक़(फ़ारसी लिपि) में।

क्या यह सिर्फ़ इसलिए अलग भाषा है क्योंकि आप इसे पढ़ नहीं पाते?

एक अन्धे को यह वाक्य सुनाया जाए, वह इसे कौन-सी भाषा बताएगा?

एप्पड़ी इरुकांगा → देवनागरी में लिखा, लेकिन यह तमिल है। लिपि बदलने से भाषा नहीं बदलती।

भारत में हिन्दी, मराठी, तमिल — सभी सोशल मीडिया पर रोमन लिपि में लिखी जाती हैं।
तो क्या ये सब नई भाषाएँ बन गईं? नहीं।
भाषा शब्दों और वाक्यों से बनती है, लिपि से नहीं।

:two: उर्दू कोई स्वतन्त्र भाषा नहीं है अपितु — फ़ारसी लिपि में लिखी हिन्दी है

उर्दू वही हिन्दी है जिसे कभी फ़ारसी लिपि में लिखने का चलन हुआ।
जैसे आज लोग हिन्दी को रोमन में लिख रहे हैं, उसी तरह एक समय हिन्दी को फ़ारसी में लिखा जाने लगा — और उसी को “उर्दू” नाम दे दिया गया।

:three: उर्दू की कोई स्वतन्त्र मौलिक शब्दावली नहीं है

हर भाषा में कुछ शब्द उधार के होते हैं और कुछ उसके अपने तद्भव/अपभ्रंश से विकसित।

हिन्दी में अपने हजारों शब्द हैं —
बारह, बाइस, सूरज, धीरज, पूरब —
ये न संस्कृत के हैं, न फ़ारसी के, न अंग्रेज़ी के।
ये हिन्दी की बोलियों से विकसित मौलिक हिन्दी शब्द हैं।

संस्कृत: धैर्य, सूर्य, पूर्व
हिन्दी: धीरज, सूरज, पूरब
यानी हिन्दी ने अपना शब्द-विकास तन्त्र विकसित किया।

लेकिन उर्दू में ऐसा एक भी शब्द नहीं मिलता जिसे “उर्दू का अपना विकसित शब्द” कहा जा सके।
फ़ारसी/अरबी शब्द ज्यों-के-त्यों लिए गए, उनमें कोई अपभ्रंश या स्थानीय विकास नहीं हुआ।

इसीलिए यदि फ़ारसी शब्द निकाल दिए जाएँ तो उर्दू की पहचान समाप्त हो जाती है,
जबकि संस्कृत/फ़ारसी शब्द हटाने पर भी हिन्दी एक मजबूत भाषा बनी रहती है।

:four: भाषाविज्ञान के औपचारिक मापदण्ड भी उर्दू को अलग भाषा नहीं मानते

ASJP lexical distance, LDND और Indo-Aryan phylogenetic tree —
इन सभी में हिन्दी–उर्दू की दूरी ०.०५ आती है।

तुलना के लिए:

  • हिन्दी–गुजराती: ०.२३
  • हिन्दी–मराठी: ०.२५
  • हिन्दी–पंजाबी: ०.१५
  • हिन्दी की बोलियाँ (अवधी, भोजपुरी, मारवाड़ी): ०.१०

हिन्दी–उर्दू की दूरी हिन्दी–अवधी से भी कम है।
दो स्वतन्त्र भाषाओं में इतनी कम दूरी सम्भव ही नहीं।

:five: उर्दू शब्द का इतिहास क्या कहता है?

“उर्दू” तुर्की शब्द है जिसका अर्थ है लश्कर या छावनी।
मुग़ल फ़ौज हिन्दी बोलती थी, लेकिन लिखती फ़ारसी में थी। इसी हिन्दी के फ़ारसी-लिपि रूप को “लश्करी ज़बान” या “उर्दू” कहा गया।

अकबर के समय तक भी सरकारी और व्यापारी कामकाज नागरी हिन्दी में ही चलते थे।

:six: ऐतिहासिक दस्तावेज़ : फ़ारसी लिपि जनता की लिपि कभी नहीं थी

१८६८ में राजा शिवप्रसाद ‘सितारे हिन्द’ ने स्पष्ट लिखा है कि साधारण जनता देवनागरी हिन्दी ही पढ़ती-पढ़ाती थी। फ़ारसी लिपि ऊपर-ऊपर के सरकारी प्रयोजनों में ही सीमित रही। बाजार से पटवारी तक सब देवनागरी हिन्दी का ही प्रयोग करते थे।

“हिन्दी की बोलियों में फ़ारसी शब्द हैं” — और इस मिश्रित रूप को ही उर्दू कहा गया।

:seven: भाषाई परिवर्तन = नई भाषा नहीं

हिन्दी में समय-समय पर परिवर्तन हुए —
कभी फ़ारसी प्रभाव से, आज अंग्रेज़ी से, फिल्मों से, मराठी या पूर्वी बोलियों से।

लेकिन क्या इससे हिन्दी नई भाषा बन जाती है? नहीं।

उसी तरह “हिंग्लिश और हिन्दी एक साथ विकसित हुईं” कहना जैसा भ्रम है, वैसा ही “हिन्दी और उर्दू हमउम्र हैं” कहना भी भ्रम है।

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यह भी ठीक है परन्तु जानकारी उथली-सी दी गयी है। यदि लेखक विस्तृत रूप से जानकारी दे दे और स्रोतों को भी जोड़ता चले , तो इस लेख को विकिपीडिया पर लगाने में सहायता होगी।