विरह वेदना की अभिव्यक्ति है सावन मास

ऋतुओं में सावन महीने का अपना एक विशिष्ट महत्व है। यह महीना बड़ा ही मनभावन होता है। इसकी फुहार प्रकृति को तृप्त कर देती है। सावन का आगमन होते ही चारों ओर हरियाली छा जाती है। नैसर्गिक वातावरण और पेड़-पौधे की हरियाली तो मन को प्रसन्न करते ही हैं साथ ही साथ धानी चुनर में लिपटी युवतियां और नर-नारी भी बरबस ही मन को मोहने लगते हैं।

सावन में धरा की प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है। चारों तरफ धरती शस्य-श्यामल नज़र आती है, नदी-नाले और तालाब सभी भरे-भरे नजर आते हैं। हरी चूड़ियों से भरी कलाई, हाथों में रची मेहंदी, उस पर हरे रंग के परिधान में सजी नारी के चंदा जैसे मुखड़े के ललाट पर हरी बिंदी एक अलग ही आभा बिखेर देती है। सचमुच सावन में मन खुशियों से सराबोर हो जाता है। गाँव की बगिया में पेड़ों की डाल पर फूल एवं बेल पत्रों से सजे झूले लग जाते हैं।

दूसरी ओर परदेश गए पिया तथा पिया के विरह की आग में जल रही विरहन को सावन की फुहार अच्छी नहीं लगती क्योंकि सावन की बरसती बूंदें परदेशी पिया की याद में बाट जोहती विरहन की वेदना को और तीव्र कर देती है। ऐसे में इस समय का प्राकृतिक वातावरण विरहन को सौतन के समान प्रतीत होता है। सावन का महीना कहीं किसी आगत पति के इंतज़ार में रत नायिका के लिए मिलन का परिचायक है तो कहीं किसी विरहन के लिए विरह के दग्ध बाण हैं। इस माह में कोयल की कूक और पपीहे की पिहू-पिहू में विरहन को मिठास की जगह कड़वाहट का अनुभव होता है। सावन की मनोहारी अदाओं से युक्त शीतल पवन भी विरहन को चुभती प्रतीत होती है। इस समय विरहन अपने को अभागन महसूस करती है।

सावन महीने में कजरी गायी जाती है जो विरहन की अनुभूति को परलक्षित करती है। कजरी के मधुर गायन और मदमाती प्रस्तुतीकरण शैली विरहन की विरह वेदना को और भी उद्वेलित कर देती है। परदेश में रहने वाले परदेशी के वियोगी मन को सावन में प्रेयसी का साथ न होना ज्यादा ही सालता है। अंग्रेजी के किसी रचनाकार ने कहा है कि शीतलहरी भी मनुष्य को उतना नहीं बरमाती जितना मनुष्य के प्रति मनुष्य की कृतघ्नता, लेकिन कहीं इससे भी अधिक प्रीतम को काटता है सावन में प्रियतमा का न होने का वियोग दंश।

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    Excellent topic written by my best friend Himanshu… Awesome

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