जाति-उन्मूलनः अंबेडकर और सावरकर क्या पूरक हैं?

–श्रीप्रकाश सिंह

बाबा साहब डॉ. भीम राव अंबेडकर और वीर सावरकर दोनों ही महान राष्ट्रवादी स्वतंत्रता सेनानी और इतिहास पुरुष हैं. ऐसे महापुरुष न तो किसी एक राजनैतिक पार्टी के हो सकते हैं और न ही किसी खास जाति विशेष के. उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्र के जीवन में जो भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है वह सबके लिए अनुकरणीय होना चाहिए. वर्तमान में कोई किसी एक को अपना रहा है और दूसरे को ठुकरा रहा है, ये सोच गलत है. इतिहास से निकले महापुरुष सबके होते हैं और सभी को इनका सम्मान करना चाहिए.AK Savarkar

यह जरूरी नहीं कि इतिहास में खास जगह बनाए दो व्यक्ति एक दूसरे के एजेंडे पर ही चलें. दो व्यक्तियों की सोच-समझ अलग होती है, उनके कार्यक्रम अलग होते हैं और वे होने भी चाहिए क्योंकि समाज में केवल एक ही विषय महत्वपूरण नहीं होता. बाबा साहब भीम राव अंबेडकर का मुख्य उद्देश्य था शोषित और अस्पृश्य जन, वंचित वर्गों को अधिकार दिलाना, मुख्यघारा में शामिल करना, इन लोगों को न्याय और सम्माल मिल सके ऐसी व्यवस्था करना. लेकिन वीर सावरकर का प्रमुख उद्देश्य था भारत को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाना. लेकिन जाति-विभेद के मसले पर वीर सावरकर का बाबा साहब के साथ मतभेद था, ऐसा कहना सावरकर के साथ अन्याय है.

दोनों के उद्देश्यों में तत्कालीन परिस्थितियों में अंतर है. लेकिन इसके बावज़ूद उनमें कोई मतभेद नहीं था. डॉ. अंबेडकर, महात्मा गांधी, भगत सिंह या सावरकर की तरह स्वतंत्रता आंदोलन में सीधे-सीधे भाग नहीं ले रहे थे लेकिन वे भी आज़ादी चाहते थे. साथ ही साथ वे अपने लोगों की बराबरी के लिए भी लड़ रहे थे. वीक सावरकर स्वतंत्रता आंदोलन में सीधे भाग ले रहे थे. साथ ही उनका भी मानना था कि जातीय भेदभाव हिंदू समाज से ख़त्म होना चाहिए. अतः बाबा साहब या वीर सावरकर के बीच जाति-भेद के मसले पर कोई गतिरोध नहीं था लेकिन साथ में ये कह देना की दोनों एक ही एजेंडे पर चल रहे थे, सही नहीं होगा.

BR Ambedkar2इतिहास में ऐसे बहुत से दृष्टांत मिलते हैं जहाँ हम कह सकते हैं कि सावरकर और अंबेडकर जाति के बारे में एक जैसी सोच रखते थे और दोनों इस व्यवस्था की समाप्ति चाहते थे. उदाहरण के लिए जब बाबा साहब ने महाण के एक चाबदार तलाब के पानी पर सबकी पहुंच हो और सभी लोग उसका समान रुप से सदुपयोग कर सकें, इसके लिए सत्याग्रह किया था. इस सत्याग्रह का सावरकर ने समर्थन किया था. सावरकर के अनुसार “वास्तविक धर्म जिसमें जाति-विभेद के लिए स्थान नहीं है, न्याय को स्थापित करता है और मानवता की सेवा करता है. इस नाते आप जो सत्याग्रह कर रहे हैं वह उचित है”. सावरकर के अनुसार “सबको समानता औऱ सम्मान के लिए किया जा रहा आंदोलन पवित्र कार्यों की श्रेणी में आता है और हिंदुओं का धर्म बनता है कि वे मानवता की सेवा की ख़ातिर अपने इन भाइयों को समान मानकर उनके साथ समान व्यवहार करें”.

दूसरा उदाहरण हमें रत्नागिरी (जहाँ सावरकर रहते थे) का देखने को मिलता है. साल 1929 में जब बाबा साहब एक केस की पैरवी के सिलसिले में वहाँ गए और जब इस बात का पता सावरकर को लगा तो उन्होने डॉ. अंबेडकर को 100 लोगों द्वारा हस्ताक्षरित एक आमंत्रण पत्र दिया और रत्नागिरी के प्रसिद्ध वैथवा मंदिर (जो सभी जातियों के लिए खुला था) में अंबेडकर को आमंत्रित किया. लेकिन शायद इस बात की ख़बर ब्रिटेन सरकार को लग गई तो उन्होंने टेलीग्राम करके बाबा साहब को बंबई (वर्तमान मुंबई) एक परिषदीय बैठक के लिए बुला लिया.

इस सबके बाद साल 1935 जब बाबा साहब ने ऐवला में धर्म परिवर्तन का बहुत महत्वपूर्ण विचार दिया और कहा कि वे सनातनी के रुप में मरेंगे नहीं तो स्पस्ट था कि वे धर्म परिवर्तन करेंगे. उस समय वीर सावरकर ने बाबा साहब से दो निवेदन किए थे…

एक, आप किसी जल्दबाजी में धर्म परिवर्तन न करें. समाज सुधार, परिवर्तन का कार्य चल रहा है, इस नाते धर्म-परिवर्तन के अपने विचार पर पुनर्विचार करें. दूसरा, ईसाईयत या इस्लाम में समानता की बात नहीं सोच सकते. इसके लिए उन्होंने त्रावणकोर में सर्वण-ईसाई और अछूत-ईसाईयों के बीच जारी संघर्ष का उदाहरण दिया और यह भी बताया कि इसका राष्ट्रीय चरित्र क्या है. सावरकर के अनुसार “ऐसी स्थिति में उस धर्म को स्वीकार करना चाहिए जिसमें सैद्धांतिक समता हो और वह धर्म तर्क पर आधारित हो”.

बाबा साहब ने 1956 में जब बौद्ध मत स्वीकार किया तो उस समय भी वीर सावरकर ने बहुत खुले मन से उनके इस फैसले को स्वीकार किया और बाबा साहब को वास्तविक हिंदू की संज्ञा दी.

कहने का आशय है कि दोनों को जाति से उत्पन्न समाजिक कुरीतियों को लेकर चिंता थी दोनों ही जाति उन्मूलन चाहते थे लेकिन कार्यपद्ति दोनों की अलग-अलग थी. यह सावरकर ही थे जिन्होंने छुआ-छूत के विरोध में “पतित पावन” नामक मंदिर का निर्माण कराया जिसके द्वार सभी जातियों के लिए खुले थे.

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वीर सावकर का मानना था कि जाति और इससे उत्तपन्न बुराईयां ऐतिहासिकता की देन हैं और इसे दूर किया जाना चाहिए लेकिन उनका यह मतलब कतई नहीं था कि हम अपने पूर्वजों को भूल जाएं, अपने इतिहास का उपहास करें. ऐतिहासिक समाजों में कोई एक समस्या, जो अपने आप में पूर्णतः का प्रतिनिधित्व नहीं करती, उसे लेकर आप पूरे इतिहास से मुंह नहीं मोड़ सकते.

मनुस्मृति को जातिवाद का आधार-ग्रंथ बताया जाता है लेकिन यह (मनुस्मृति) हिंदू धर्म का कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं है. क्या इसकी ईसाईयत में बाइबिल या इस्लाम में क़ुरान से तुलना की जा सकती है? कदापि नहीं. कोई ऐसा उदाहरण नहीं भी मिलता जिसमें किसी वेद-वेदांग या उपवेदों ने मनुस्मृति के आधार पर शासन व्यवस्था चलाने का सलाह दी हो. यह ग्रंथ कालवाह्य है और अब इसकी उपयोगिता भी नहीं बची है. इस ग्रंथ का उपयोग समाजिक विष-वमन और राजनैतिक स्वार्थों के लिए बार-बार किया जाता है, जिसे समाप्त किया जाना चाहिए. लेकिन समग्र प्राचीन ‘गौरवपूर्ण’ इतिहास की आलोचना भी न्याय संगत नही है.Savarkar2

साल 1936 में बाबा साहब ने अपने लेख एन्हिलिहेशन ऑफ़ कास्ट में प्राचीन परंपराओं और मान्यताओं पर प्रश्नचिन्ह लगाए है और उनकी ज़बर्दस्त आलोचना की है. वीर सावरकर इस लेख के उद्देश्य का समर्थन करते हैं लेकिन अपनी प्राचीन महान परंपराओं और विरासत को स्वीकार करने पर भी जोर देते हैं.

यहाँ एक और उदाहरण दिया जा सकता है. अंग्रेजी हुकूमत द्वारा 1941 में जब ”महार रेज़ीमेंट” बनाने की बात आई तब भी सावरकर ने इस प्रयास के लिए अंबेडकर का समर्थन किया. जहाँ अंबेडकर इसे महार समाज के सशक्तिकरण और अवसर के तौर पर देखते हैं तो सावरकर इसे विराट हिंदू समाज के सशक्तिकरण के तौर पर देखते हैं. इस आधार पर हम कह सकते है कि दोनों जाति की बुराईयों को दूर करना चाहते थे लेकिन उनकी कार्यपद्धियों में अंतर रहा है.

हमारा समाज वसुधैव कुटंबकम् और ‘अहं ब्रह्मांस्मि’ के सिद्धांत पर चलने वाला रहा है. यहाँ हर व्यक्ति में ईश्वर है फिर कैसे एक ईश्वर दूसरे से घृणा कर सकता है? जिस समाज में प्रकृति की पूजा होती हो, आदि शक्ति की पूजा होती हो स्त्रियों को पूजने की बात हो, उसको आप इस आधार पर खारिज़ कैसे कर सकते हैं कि कालांतर में उत्पन्न जाति और छाआछूत जैसी भयंकर महामारी ने उसे अपनी चपेट में ले लिया?  इसे तो अवश्य ही दूर किया जाना चाहिए.

इस प्रकार दोनों महापुरुष जाति व्यवस्था को दूर करना चाहते थे लेकिन उनका दृष्टिकोण अपनी विरासत, परंपराओं को लेकर अलग-अलग था.

अंत में इतना ही कहना चाहूंगा कि विचारक सबके होते हैं, इतिहास निर्माता सबके होते हैं. वर्तमान में जबर्दस्ती दूरी पैदा करना या उन्हें विरोधाभाषी दिखाना, सिर्फ राजनैतिक षणयंत्र है. हमारा उद्देश्य होना चाहिए कि महापुरुषों के कार्यों के बारे में समाज को बताया जाए, विचारों को अपनाया जाए. वर्तमान में कमियां हैं उनको सुलझाया जाए. ऐसा करके ही हम अपने महापुरुषों के साथ न्याय कर पाएंगे.

(लेखक श्रीप्रकाश सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग में प्रोफेसर हैं. यहाँ व्यक्त विचार निजी हैं)[sgmb id=”1″]

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