गांधी का आज का चंपारण

–विश्वजीत मुखर्जी

इस साल गणतंत्र दिवस की परेड में राजपथ पर बिहार की झांकी काफी अलग और आकर्षक दिख रही थी। DSC00513झांकी में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का वह अध्याय दर्शाया गया जिसने मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा बना दिया। मैं बात कर रहा हूं चंपारण सत्याग्रह की। अंग्रेज़ों द्वारा नील किसानों पर जबरन हो रहे तीनकठिया लगान के अत्याचार को खत्म कर गांधी जी ने 1917 में आज़ादी की शुरुआत की। चंपारण में सत्याग्रह आंदोलन के दौरान गांधी जी ने न केवल वहां के किसानों को लगान की गुलामी से आज़ादी दिलाई बल्कि कई मूलभूत विकास के कार्य भी किए। भारतीय भूमि पर बापू के तमाम आदर्शों की पहली प्रयोगशाला बनकर उभरा चंपारण सत्याग्रह आंदोलन अपने 100वें वर्ष में दाखिल हो रहा है। और बिहार सरकार ने इस आंदोलन के शताब्दी वर्ष को समारोह के रूप में मनाने का आरंभ भी कर दिया है। आज ही वह ऐतिहासिक दिन है जब सत्याग्रह की पहली जीत हुई थी। 1 मई, 1918 को गांधी जी के अथक प्रयासों ने अंग्रेज़ सरकार को चंपारण ऐगरेरियन ऐक्ट लागू करने पर मजबूर कर दिया। इसी के परिणाम स्वरूप तीनकठिया लगान हमेशा के लिए खत्म हो गया। इन दिनों

बिहार सरकार चंपारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह के जश्न में डूबी नज़र आ रही है। मगर जब समारोह का आयोजन करने वाले चंपारण के स्थानीय नेता कहे, “मोहनचंद करमचंद गांधी चंपारण में नमक सत्याग्रह आंदोलन के लिए आए थे” तब बापू के उन्हीं सिद्धांतों का सत्याग्रह के रखवालों के हाथों ही दम घुटते देखते हैं। मोतिहारी के ही डॉ. लंबोदर मुखर्जी zzz - Copyफाउंडेशन के सहयोग से पिछले ही वर्ष मैंने “गांधी का चंपारण” नाम की डॉक्यूमेंट्री फिल्म का निर्माण किया। इस फिल्म में गांधी जी के चंपारण सत्याग्रह आंदोलन से जुड़े तमाम ऐतिहासिक स्थलों की मौजूदा स्थिति के साथ ही वहां पर बापू के आदर्शों की अहमियत को भी दर्शाया गया है। फिल्म बहुत जल्द यू ट्यूब पर भी उप्लब्ध होगी।

चंपारण में गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन की स्मृतियों को जिस हालत में रखा गया है वह हमें सोचने पर मजबूर कर देती है। 15 अप्रैल, 1917 को गांधी जी मोतिहारी में जिस गोरख बाबू के घर ठहरे थें वह आज किसी खंडहर से कम नहीं है। हैरान करने वाली बात तो यह है कि जिस वार्ड कमिश्नर के क्षेत्र में यह ऐतिहासित इमारत है उन्हें गोरख बाबू का नाम तक याद नहीं। याद दिलाने पर उन्होंने कहा “लालू जी गोरख बाबू के घर ठहरे हुए थे”। फिर बाद में कमिश्नर साहिबा ने अपनी ग़लती सुधारते हुए गांधी जी का नाम लिया।

Screenshot_2016-02-24-23-06-43मोतिहारी के पास ही चंद्रईयां वह जगह है जहां पर अंग्रेज़ों द्वारा गांधी जी को पहला समन जारी किया गया था जिसमें उन्हें चंपारण छोड़ने के लिए कहा गया था। आज चंद्रईयां में बापू के स्मृति में तीन एकड़ में फैला स्मारक तो है मगर यहां के पौधों को पानी देने के लिए एक नलका तक नहीं, बिजली तो भूल ही जाईए। इसी गांव के बच्चों से जब पूछा गया कि “नरेंद्र मोदी कौन है?” तब जवाब में बच्चों ने कहा “सरकार”। मगर जब पूछा कि “महात्मा गांधी कौन थे” तब सारे बच्चे खामोश रहे। उन्होंने गांधी जी का नाम तक नहीं सुना था।

18 अप्रैल, 1917 को मोतिहारी के जिस अदालत में बापू की पेशी हुई थी आज वहां गांधी संग्रहालय है जिसमें महात्मा की पीली पड़ चुकी चंद तस्वीरें टंगी हैं। इन तस्वीरों में कोई कैप्शन तक नहीं है। संग्रहालय में गांधी जी का चरखा भी रखा है जिसके ठीक नीचे पान की थूक ने दीवार का रंग बदल दिया है। संग्रहालय में वह ऐतिहासित टेबल भी रखा है जिसपर गांधी जी की अंग्रेज़ों के साथ पहली बैठक हुई थी। आज उस मेज़ का उपयोग राजनीतिक संगोष्ठीयों में नेताओं को चाय समोसे खिलाने में होता है।

DSC00173गांधी जी बेतिया के जिस हज़ारीमल धर्मशाला में अपनी पत्नी कस्तूरबा के साथ कई दिनों तक रहे, आज वहां सांप और बिच्छुओं ने अपना घर बना लिया है। बेतिया के पास ही वृंदावन आश्रम है जहां 1939 में गांधी जी एक हफ्ते के लिए ठहरे हुए थे। आज वहां लगी बापू की मूर्ति लोगों के कपड़े सुखाने के काम आ रही है। चंपारण में सत्याग्रह आंदोलन के दौरान गांधी जी ने कई विद्यालयों की भी स्थापना की थी। उनमें से ज़्यादातर बंद पड़े हैं। जितने चल रहे हैं उनमें पढने और पढाने वालों का हाल जानकर आप सोच में पड़ जाएंगे। मोतिहारी के पास ही बड़हरवा लखनसेन में गांधी जी द्वारा शुरु की गई पहली पाठशाल आज तक चल रही है मगर इसमें पढने वाले आठवीं कक्षा के छात्रों को गांधी जी का पूरा नाम तक नहीं पता। हालांकि छात्रों को इसके लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता जब उस पाठशाला के हेडमास्टर को खुद ही नहीं पता कि सरदार पटेल कौन थे। उसी पाठशाला में बापू ने चरखा चलाने की परंपरा शुरु की थी। मगर आज उनके चरखे के अवशेष एक कमरे में पड़े धूल खा रहे हैं। चंपारण में गांधी जी ने अपने हाथों से खादी ग्रामोद्योगों की स्थापना की थी जिसने गांव की हज़ारो औरतों को रोजगार दिया था। आज वे सभी सालों से बंद पड़े हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो चंपारण में बापू और उनके सत्याग्रह की स्मृतियों को जिस तरह
से संरक्षित किया गया है वह काफी दुखद है।

महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा “सत्य के प्रयोग” में लिखा है कि उन्होंने चंपारण के किसानों की आंखों में भगवान का दर्शन किया। Screenshot_2016-02-25-17-10-19मगर आज सौ साल बाद भी वहां के किसानों की गरीबी दूर करने वाला कोई नहीं। शिक्षा के साथ ही चंपारण में स्वच्छता कायम करने और छूअछूत जैसी समस्याओं को मिटाने में गांधी जी काफी सफल रहे। गांधी जी ने चंपारण के लोगों को स्वच्छता के लिए प्रेरित किया था जिससे तब साफ और स्वस्थ वातारण बना। मगर आज चंपारण में गंदगी एक बड़ी समस्या है। लोग वहां शहर का सारा कूड़ा सड़कों पर ही फैंकते हैं। बापू स्वच्छता पसंद करते थे। गौरतलब है कि साल 2014 में गांधी जयंती के दिन ही माननीय प्रधानमंत्री जी ने स्वच्छ भारत अभियान की भी शुरुआत की थी। प्रधानमंत्री जी का मानना है कि बापू की 150 वीं जयंती तक पूरा भारत स्वच्छ हो जाएगा। मगर गांधी जी ने चंपारण के जिन गांवों में स्वच्छता का पाठ पढाया था, वहां के लोग आज भी खुले में शौच करने पर मजबूर हैं।

छूअछूत हमारे समाज की एक बहुत बड़ी समस्या रही है। गांधी जी इसके कट्टर विरोधी थे। सत्याग्रह आंदोलन के दौरान उनके सभी सहयोगी Screenshot_2016-02-25-17-09-57अपनी अपनी अलग रसोई में खाना पकाते थें। तब गांधी जी ने सभी के लिए सामूहिक रसोई की शुरुआत की जहां पर हर धर्म और जात के लोग एक साथ बैठ कर भोजन करते थें। बापू के इस प्रयोग को सौ वर्ष हो गए मगर आज भी जब मोतिहारी का एक दलित बच्चा कहता है “मुझे होटल में अंदर नहीं आने देते, बाहर ही अख़बार पर खाना देते हैं” तब गांधी के सत्याग्रह की धरती शर्मसार हो जाती है।

साल 2013 में बिहार सरकार को केंद्र सरकार ने सौ करोड़ रुपए का अनुदान दिया था। यह राशी चंपारण में गांधी स्मृतियों के विकास के लिए थी। मगर बापू से जुड़े तमाम स्थलों की हालत एक अलग ही तस्वीर पेश करती है। हालांकि हाल ही में एक बार फिर सरकार द्वारा चंपारण में गांधी स्मारकों के विकास की बात कही गई है। मगर गांधी के सिद्धांतों की मरम्मत पर कोई चर्चा तक नहीं करता। सत्याग्रह की भूमि चंपारण में ही बापू ने अपना काठियावाडी वस्त्र का त्याग किया था। मगर आज जब चंपारण सत्याग्रह की शताब्दी जयंती मनाई जा रही है तब ऐसा क्यों लग रहा है कि गुज़रते वक्त के साथ हमने भी अपने बापू और उनके आदर्शों को त्याग दिया।

लेखक विश्वजीत मुखर्जी, एक बेबाक स्वतंत्र पत्रकार और डॉक्युमेंट्री फिल्म निर्माता हैं. गांधी का चंपारण से पहले बिश्वजीत द्वारा वहुचर्चित डॉक्युमेंट्री ऑरवेल, बट वाय?, अस्सी, द लॉस्ट रिवर और सेंट मेरीज़, द हेरीटेज़ इन रूइन्स बनाई गईं जिनको अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काफी सराहा गया है.
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1 Comment


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    Bahut acchi documentary. Badhai Vishvajeet.

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