कश्मीर: किसकी हार?

“पोस्टमोर्टम में नीलोफर के शरीर से 5 लीटर वीर्य निकला था”, ये कहना है दक्षिणी कश्मीर के कुलगाम में रहने वाले 16 साल के एक लड़के का… इस लड़के के अनुसार उसे ये बातें हाल ही में गांव में हुई एक “सभा” में बताई गयी थीं। नीलोफर जान, उन दो महिलाओं में से एक थी जो मई, 2009 में दक्षिणी कश्मीर के शोपियां में एक छोटी नदी में मृत पायीं गयीं थीं। नीलोफर के बारे में फैले इन ‘हास्यास्पद’ दावों के बारे में यह (किशोर)लड़का पूरी तरह आश्वस्त है। गर्मी के उस मौसम में सुरक्षा बलों द्वारा दो महिलाओं के कथित बलात्कार और हत्या के आरोपों की ख़बर तेजी से चारों ओर फैलते ही पूरे राज्य में अशांति का माहौल पनप उठा था। इसे देखकर कहा जा सकता है कि अलगाववादियों द्वारा चलाये जा रहे ‘दीन’ में सच्चाई का कोई महत्व नहीं रह गया है। दोनों महिलाओं के नदी में डूबकर मर जाने की संभावना को पूरी तरह नकार दिया गया। इस तथ्य का कोई महत्व नहीं रह गया कि साल 1995 से 2009 के बीच में 10 लोगों की मौत इस छोटी नदी में डूबने की वजह से हो चुकी थी। 2010 से 2013 के बीच तीन लोग और डूबे। जब इंसानों की कोई कद्र न रहे तो ऐसे में इस बात का भी कोई महत्व नहीं रह गया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के आदेश पर कश्मीरी पुलिस अफसर ने एक घोड़े को ठीक उसी घटनास्थल से वह छोटी नदी पार कराने का प्रयास किया लेकिन वह असफल रहा क्योंकि घोड़ा ऐसा करने में काफी डर गया था और ना ही इस बात का कोई महत्व रह गया कि एम्स (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) की ओर से डॉक्टरों के एक स्वतंत्र टीम ने दोनों शवों की दोबारा जांच की और बलात्कार की संभावना को पूरी तरह खारिज कर दिया था। बाद में, सीबीआई (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो) ने 6 कश्मीरी डॉक्टरों और अन्य लोगों, जिनमें से एक मृतका का भाई भी था, के खिलाफ फर्जी सबूत गढ़ने के आरोप में चार्जशीट दाखिल की। सीबीआई ने एक डॉक्टर को महिला के गुप्तांग से लिए गए नमूनों में हेरफेर करने का दोषी पाया, जिससे बलात्कार की पुष्टि की जा सके।

 

आठ साल बाद, ना केवल अभी तक झूठ ज्यों का त्यों ‘अक्षय’ बना हुआ है, बल्कि आज ये बेशर्मी की हद तक पहुंच गया है। 5 लीटर वीर्य वाली बात पर कुलगाम के उस लड़के का तर्क है कि सुरक्षा बल के जवान नीलोफर के मरने के बाद भी उसका बलात्कार करते रहे।

कश्मीर में भारत को ऐसे तमाम झूठों का सामना करना पड़ रहा है और भारत के पास, झूठ के इन पुलिंदों का निर्माण करने वाली फैक्ट्री से निपटने का कोई हल नहीं है। ऐसे झूठ युवाओं को कट्टर इस्लामी चरमपंथियों में बदल रहे हैं।
इसको अगर एक वरिष्ठ कश्मीरी पुलिस अफसर के शब्दों में कहा जाए तो- “यूरोप का सिर्फ एक दुश्मन है जबकि यहाँ हम चारों ओर से दुश्मनों से घिरे हुए हैं”
आतंकियों के कमांडर बुरहान वानी की मौत के नौ महीने बाद घाटी में उपजा संकट इस हद तक पहुंच गया है कि दक्षिणी कश्मीर के कई हिस्सों में लोक प्रशासन पूरी तरह से ख़त्म हो चुका है। ऐसी खबरें मिल रहीं हैं कि कुछ इलाकों में हथियारबंद आतंकवादी खुलेआम घूम रहे हैं। पिछले कुछ दिनों में उनके कई वीडियो मिले हैं। इन्हीं में से एक वीडियो में दो आतंकवादी एक गाना गाते दिख रहे हैं कि कैसे लालकिले पर ‘हरा’ झण्डा फहराएंगे और कैसे कश्मीर को मुस्लिम राष्ट्र बनाकर बांग्लादेश का बदला लेंगे। अन्य वीडियो में कुछ स्थानीय नेता और महत्वपूर्ण लोग, हाथों में बंदूकें लिए भारत विरोधी और इस्लामपरस्त नारे लगाते हुए दिख रहे हैं। इस भयावह स्थिति को देखते हुए राज्य के पुलिस प्रमुख को अपने कर्मचारियों को यह सलाह देनी पड़ी कि वे अगले कुछ महीने अपने घर ना जायें, खासकर वे लोग जिनके घर दक्षिणी कश्मीर में हैं।
16 अप्रैल को उत्तरी कश्मीर के बांदीपुरा में अब्दुल रशीद परराय (जो पहले एक अलगाववादी था और बाद में सरकार के लिए काम करने लगा था) की अलगाववादियों द्वारा उसके ही घर में गोली मार कर हत्या कर दी गयी। उसके लड़के फैयाज़ अहमद के अनुसार- “दो नकाबपोश अलगाववादी मेरे घर पर आए, उनके साथ मेरे पड़ोस के दो दोस्त भी थे। उनकी आवाज पहचानकर मेरे पिता ने दरवाजा खोल दिया और तब उन्हें पता चला कि उनके साथ धोखा हुआ है। वे उन्हें अंदर ले गए और उनकी गोली मारकर हत्या कर दी”
सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि हाल के दिनों में, कश्मीर के अंदर दरार पैदा करने के लिए बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से हिंसा हो रही है, जिसे रोकना दिल्ली के लिए बहुत मुश्किल हो जाएगा। नब्बे के दशक के अंत में भारत के सबसे उत्तरी राज्य में 10 सालों के खूनी संघर्ष के बाद यह तो साफ हो गया कि सशस्त्र विद्रोह असफल हो चुका है। 2000 के पहले दशक के मध्य में कश्मीर उस स्थिति में पहुंच गया था, जब अलगाववादी अप्रासंगिक हो चुके थे। लेकिन इस दशक के अंत में स्थिति फिर से अस्थिर हो गयी। इस बार अलगाववादियों ने अलग तरह से खेल खेलना शुरू किया है। वे अब कश्मीर में फलस्तीनियों की तरह जंग लड़ रहे हैं, जहाँ पत्थर फेंकने वाली हिंसक भीड़ को शांतिप्रिय प्रदर्शनकारियों के रूप में पेश किया जा रहा है। पिछले कुछ सालों में स्थानीय अराजकता और आक्रामकता के कारण इनके प्रयास दोगुने हो गए हैं। कश्मीर में इस अराजकता को गति उन बाहरी आतंकवादियों ने नहीं दी जिन्होंने एक समय आत्मघाती हमलों के नए-नए प्रयोग शुरू किए थे, बल्कि गति देने वालों में बुरहान वानी जैसे स्थानीय युवा कश्मीरी मुस्लिम हैं।

ये कहना कम होगा कि पत्थर फेंकने की सभी घटनाएं सिर्फ इसलिए होती हैं क्योंकि लोगों को इसके लिए पैसे दिए जाते हैं, जैसा कि हाल-फिलहाल के न्यूज़ स्टिंग चैनलों पर बताया जा रहा है। हाँ, ये बात सच है कि पैसा भी एक महत्वपूर्ण कारक है, लेकिन एक कारण यह भी है कि कुलगाम के युवाओं का चरमपंथीकरण हो चुका है। ये कट्टरपंथी लड़के मोबाइल में दाढ़ी वाले अलगाववादियों या आंतकवादियों की तस्वीरें देखते हैं और खुद भी दाढ़ी बढ़ाकर इस्लाम के लिए ‘मुज़ाहिद’ लड़ाके बनने के लिए तैयार हो जाते हैं।
कश्मीर में नए तरह का यह युद्ध गलियों के साथ-साथ स्मार्टफोन पर भी लड़ा जा रहा है। पाकिस्तान से सोशल मीडिया पर सैकड़ों फर्जी एकाउंट चलाए जा रहे हैं जिससे कश्मीर के बारे में गलत जानकारियां फैलाई जा सकें और युवाओं को कट्टरपंथ की ओर मोड़ा जा सके। एक दूसरे वरिष्ठ कश्मीरी पुलिस अधिकारी ने बताया कि वह पाकिस्तान में चलाए जा रहे ऐसे कई ठिकानों के बारे में जानते हैं। उनमें एक संगठन पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा के एक स्थानीय नेता ज़कीउर-रहमान-लख़वी द्वारा रावलपिंडी की अदियाला जेल के पास एक मैदान से संचालित किया जाता है। यह अधिकारी, और इसके अलावा अन्य लोग जो इस स्थिति से निपटने के लिए कोशिश में लगे हैं, उनका कहना है कि सरकार के पास इस कुप्रचार से निपटने के लिए कोई ठोस योजना नहीं है। इनके अनुसार “जरा सोचिए, कश्मीर में कितने सारे मोबाइल फ़ोन हैं, और कोई वीडियो सब जगह कितनी जल्दी पहुँच सकता है? और हमारी प्रतिक्रिया क्या रहती है? हम बस इंटरनेट बंद कर देते हैं”

ऐसे में प्रश्न उठता है कि आख़िर कश्मीर में स्थिति इतनी खराब क्यों है? जवाब उन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के पास है जो कश्मीर में इन हमलावरों से मुकाबला कर रहे हैं। उनका मानना है कि केंद्र इस मामले में बहुत जल्दी ‘अति आत्मविश्वासी’ हो गया। दूसरे शब्दों में, यह ठीक वैसे ही है जैसे टीवी का एक मरीज, जो दो साल की मल्टी ड्रग थैरेपी द्वारा इलाज ले रहा है, और वह डेढ़ साल में ही ये सोचकर दवाई लेना बंद कर देता है कि वह पूरी तरह स्वस्थ हो गया है। और फिर बीमारी दोबारा वापस आ जाती है” सभी अधिकारी इस बात पर एकमत हैं कि राज्य की जटिलता ने ही कश्मीर को अराजकता की कगार पर ला कर खड़ा कर दिया है।
केंद्र कश्मीर में युद्ध की उपयोगिता समझाने के लिए संघर्षरत है। ऐसे में ये स्वाभाविक है कि कुछ कठिन प्रश्न पूछे जाएं, कि कश्मीर में प्रतिरोध का स्वरूप क्या है? और हालात इतने भयानक स्थिति में क्यों आ पहुंचे हैं? ‘ओपन’ ने राज्य में हमलावरों से लड़ रहे कई लोगों से सीधे बात की… उन्होंने ये 5 बातें बताईं हैं, जो हमें दिमाग में बैठा लेनी चाहिए:-

हम असलियत से भटक चुके हैं:
अब तक ऐसे कई लेख छप चुके हैं, जिनमें कश्मीरी मुस्लिमों के अलगाव के बारे में लिखा और ये तर्क गया दिया कि घाटी में फैले इस राजनैतिक असंतोष से निबटने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। ये सुझाव चाहे जितने गंभीर हों, लेकिन ये इस लक्ष्य को पाने के लिए कोई सही रास्ता नहीं दिखा पाए। इस बात में कोई संदेह नहीं कि अटल विहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी, दोनों ने इस बात पर जोर दिया है कि कश्मीर का मसला कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत (लोकतंत्र) के दायरे में हल होना चाहिए। लेकिन उस स्थिति में क्या किया जाए, जब किसी आतंकी संगठन का कोई कमांडर सुरक्षा बलों द्वारा मार दिया जाता है और इसके विरोध में घाटी में सर्वव्यापी प्रदर्शन शुरू हो जाते हैं? जब सेना आतंकवादियों के रुप में मौत से समाना कर रही हो, और उसी समय आम नागरिक घात लगाकर सेना पर पत्थर बरसाएं, और आतंकवादियों की भागने में मदद करें, तो ऐसी स्थिति में सेना से क्या उम्मीद की जा सकती है? या जब ये लड़ाके चिल्ला-चिल्ला कर, इस्लामिक सत्ता (इस्लामिक स्टेट) लाने करने की बात कर रहे हों, तो क्या तब भी इस अशांति को सिर्फ एक स्वतंत्र राज्य की मांग करने वाला ‘स्वतंत्रता आंदोलन’ कहा जा सकता है?

एक हालिया वीडियो में हिजबुल कमांडर ज़ाकिर मूसा ने पत्थर फेंकने वालों को संबोधित किया और उनसे अपने संघर्ष के प्रति स्पष्ट रहने की गुहार लगाई- “मेरे भाई किसी स्वतंत्र राष्ट्र की लड़ाई के चक्कर में ना पड़ें। इस्लाम में राष्ट्रवाद और लोकतंत्र हराम हैं। इसलिए हमारी लड़ाई कश्मीर के लिए नहीं, बल्कि इस्लाम की सरपरस्ती के लिए होनी चाहिए, ताकि हम यहाँ शरिया स्थापित कर सकें, अल्लाह का कानून स्थापित कर सकें”
एक क्षण के लिए लेख लिखने वालों, फ़िल्म-निर्माताओं और बुद्धिजीवियों को भूल जाइए, आज आप कश्मीर में किसी भी युवा से बात करिए, वो आपको बताएगा कि वो अपने विश्वास के वर्चस्व के लिए लड़ रहा है। एक कश्मीरी पुलिस अफसर अनुसार, “हमारी चुनौती वे 1000 युवा नहीं हैं, जो शहीद होना चाहते हैं, हमारी असली चुनौती तो उन्हें शहीद होने से रोकना है”

असामान्य गठबंधन:
भारतीय जनता पार्टी और पीडीपी के बीच गठबंधन एकदम असामान्य है। अपनी शुरुआत से ही पीडीपी उदार अलगाववाद (सॉफ्ट सेपेरेटिज़्म) की समर्थक रही है और इसे घाटी के अलगाववादियों के साथ पाला बदलते देखा गया है। यहाँ तक कि पूर्व रॉ (रिसर्च एंड एनालिलिस विंग) प्रमुख ए.एस. दुलत ने 2003 में लिखा था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी ने, जमात-ए-इस्लामी और हिजबुल मुजाहिदीन के साथ पीडीपी नेता महबूबा मुफ़्ती के संबंधों और 2002 के चुनाव में महबूबा को उनसे मिले सहयोग के कारण, एक पब्लिक रैली में महबूबा के साथ मंच साझा करने से मना कर दिया था। इतना ही नहीं, पीडीपी ने वही चुनाव चिह्न चुना (कलम और दवात), जिसका उपयोग 1987 में मुस्लिम मुत्ताहिदा महज़ (आज़ादी की मांग करने वाली पार्टियों का एक गुट, जिसमें जमात-ए-इस्लामी कश्मीर भी शामिल थी) ने उपयोग किया था। 2015 में भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने के ठीक बाद, पीडीपी नेता और तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने मसर्रत आलम की रिहाई के आदेश दे दिए, जो एक कट्टरपंथी मुसलमान है और साल 2010 से जेल में बंद था। उनकी मंशा क़ासिम फक्तू को भी आजाद करने की थी, जो कि हिजबुल मुजाहिदीन का एक लड़ाका है और अलगाववादी नेता आसिया अंद्राबी का पति है। अपनी रिहाई के कुछ ही दिन बाद, अप्रैल 2016 में मसर्रत आलम ने अपने परामर्शदाता और मुख्यधारा के अलगाववादी नेता, सैयद अली शाह गिलानी के लिए एक बड़े समारोह का आयोजन किया, जो कि दिल्ली से लौट रहे थे, जहाँ वह सर्दियों में रहते हैं। जब यह रैली श्रीनगर के डीजीपी कार्यालय के बाहर से गुजरी, तो भीड़ ने “पाकिस्तान से क्या पैगाम, कश्मीर बनेगा पाकिस्तान” और “जीवे-जीवे पाकिस्तान” के नारे लगाए। इस रैली ने उन युवाओं के दिलों में फिर से जान फूंक दी, जो दबे मन से ये स्वीकार कर चुके थे कि आजादी अब सिर्फ एक मृग-मरीचिका भर रह गयी है। यही वो समय है जब बुरहान वानी को ख्याति मिली और दिल्ली में पत्रकारों की रिपोर्टों ने उसे कश्मीर की लड़ाई का नया चेहरा बना दिया। बुरहान वानी की मौत से फैली अफरातफरी के बाद, संसद के कुछ सदस्य गिलानी के दरवाजे पर बातचीत की ‘भीख मांगने’ गए, जिसे ठुकरा दिया गया।

पुलिस सूत्रों का कहना है जब से पीडीपी सत्ता में आई है, तब से वह पुलिस वालों पर पत्थरबाजों के साथ नरमी से पेश आने का दबाव बना रही है। ऐसे कई उदाहरण हैं जब गंभीर अपराधों में गिरफ्तार किए गए लोगों को पीडीपी की दख़लंदाजी के बाद छोड़ दिया गया हो। दक्षिणी कश्मीर में तैनात एक पुलिस कर्मी के अनुसार- “हर रोज कोई न कोई मेरे पास आता है और मुझे किसी न किसी आदमी के ऊपर से लगे आरोप वापस लेने और उसे छोड़ देने के लिए कहता है”
ये वर्तमान संकट, अलग-अलग मुद्दों पर गठबंधन की असामान्यता को उजागर करता है। भाजपा सरकार मीडिया से उस वीडियो को कम महत्व देने के लिए कह रही है जिसमें पत्थरबाज एक सीआरपीएफ जवान को मार रहे हैं और उसे परेशान कर रहे हैं, जबकि भाजपा कार्यकर्ताओं ने ही इस वीडियो को सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया है। वहीं दूसरी ओर पीडीपी और इसके समर्थकों ने एक वह वीडियो वायरल करवा दिया जिसमें एक आदमी को सेना की जीप में बांधकर गांव-गांव घुमाते दिखाया गया है।

1987 का मिथक:
कश्मीर में अलगाववाद के बारे में फैले गलत विश्वासों को न सिर्फ तोड़ना बल्कि उन्हें ज़मीदोंज़ करना भी बहुत जरूरी है। चारों ओर ये बात फैली हुई है कि 1989-90 का सशस्त्र विद्रोह, 1987 के चुनावों का परिणाम था। हालांकि ये बात सही है कि इस घटना ने भी आग में घी का काम किया था, लेकिन इस चुनाव में भाग ले रहे उस राजनीतिक मोर्चे के स्वरूप को समझना भी बेहद जरूरी है, जो मुस्लिम मुत्ताहिदा महज़ (मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट) के बैनर तले चुनाव लड़ रहा था। मोर्चे ने यह स्पष्ट कर दिया था कि उसका उद्देश्य कश्मीर में निज़ाम-ए-मुस्तफा (पैगम्बर का कानून) लागू करना है। जमात के संस्थापक, मौलाना सईद मौदूदी (1903-1979) ने हमेशा अपने अनुयायियों को यह सीख दी कि वे इस्लाम को निज़ाम-ए-हयात (जीवन का सिद्धांत) मानें और इस्लामिक राज्य स्थापित करने के लिए संघर्ष करें। लोकतंत्र को गैर-इस्लामी या ‘हराम’ समझा जाता था। जमात ने भारत और पाकिस्तान के जनसमूह में अपनी पैठ बना ली और 1953 में एक स्वतंत्र निकाय बन गया। इसी साल, मौदूदी के भरोसेमंद अनुयायियों में से एक, सयैद अली शाह गिलानी जमात के पूर्णकालिक सदस्य बन गए। कश्मीरी जमात के भारत को अस्वीकार कर देने, और इस्लाम के प्रति इसके नजरिये ने कश्मीर में अलगाववाद का बीज बो दिया। जैसा कि योगिंदर सिकंद लिखते हैं कि 1980 के शुरुआत में, जमात ने कश्मीर में ठहरी भारतीय सेनाओं को “कब्जे वाली सेना” घोषित कर दिया, और कश्मीरी मुस्लिम युवाओं से इन भारतीय अतिक्रमणकारियों को कश्मीर से बाहर फेंकने और राज्य में इस्लामिक शासन स्थापित करने की अपील की। जिन नेताओं ने 1987 का चुनाव लड़ा, उनमें गिलानी और एक जमात शिक्षक यूसुफ शाह, जिसे हम सईद सलाहुद्दीन के नाम से भी जानते हैं और जो पाकिस्तान स्थित यूनाइटेड जिहाद काउंसिल का प्रमुख है, शामिल थे।

संयम की सीमा:
सुरक्षा बल, खासकर से सीआरपीएफ जैसे सुरक्षा बल, कश्मीर में बहुत तनाव में काम करते हैं। अब आप इस केस को ही ले लीजिए, जिसमें एक सीआरपीएफ जवान के शोषण की स्थिति में भी संयम बरतने का वीडियो वायरल हुआ था। सैनिक उत्तरप्रदेश और मणिपुर में चुनाव कराने में सरकार की मदद करते हुए पिछले 4 महीने से यात्रा कर रहे थे। 9 अप्रैल की सुबह उन्हें केंद्रीय कश्मीर के जिस मतदान केंद्र पर भेजा गया, उस पर एक भारी भीड़ ने हमला कर दिया। चूंकि प्रदर्शनकारियों ने एक ईवीएम तोड़ डाली दी, इसलिए मौजूद अधिकारी अपने आपको बचाने के लिए भाग गये। वहाँ मौजूद आठ सिपाहियों ने ईवीएम मशीने उठायीं और अगले पोलिंग स्टेशन की ओर बढ़ने लगे। भीड़ में से कुछ लोगों ने उनका पीछा करना शुरू कर दिया। इसी तरह एक और वीडियो ने बहुत बवाल खड़ा किया, जिसमें एक आर्मी अधिकारी द्वारा एक आदमी को जीप से बांधकर घुमाते हुए दिखाया गया है। अपने वाहन पर स्थानीय लोगों के हमले से बचने के लिए उसने एक कश्मीरी को गाड़ी के बोनट पर बांध दिया। हालांकि अधिकारी के इस कृत्य को कई सेवानिवृत्त सैनिको का भारी समर्थन मिला है, फिर भी उनमें से कुछ, जैसे लेफ्टिनेंट जनरल एच.एस. पनाग, उत्तरी कमान के पूर्व जीओसी-इन-सी ने इसकी यह कहकर निंदा की है कि इसने सेना की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया है। उनके ट्वीट के अनुसार, “सेना ने कश्मीर में हमेशा जमीनी नियमों का पालन किया है, और इस तरह का कृत्य हमारी सफलता की गाथाओं पर बट्टा लगाता है”
लेकिन कश्मीर में स्थित सुरक्षा कर्मचारियों का कहना है कि उनसे इस हिंसा में खुद का बचाव न करने की उम्मीद करना बेमानी है। एक पुलिस अधिकारी ने कहा, “मैं जानता हूँ कि इस तरह की चीजें कहना राजनीतिक रूप से सही नहीं है, लेकिन मुझे बताइये, पत्थरबाजी से कौन लोग घायल होते हैं? जो लोग सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकते हैं और उनसे उलझते हैं, उनको मारना ही एक विकल्प है। खैर… अब तो युवक को जीप से युवक को बांधने वाले मेजर गोगोई का मीडिया को सीधे इंटरव्यू देकर चीजें स्पष्ट करना और फिर थलसेना प्रमुख बिपिन रावत का पीटीआई को दिए गए इंटरव्यू से चीजें साफ हो जानीं चाहिए कि ‘अलगाववादियों, पत्थरबाजों से निबटने की रणनीति’ बदल चुकी है।

 

राज्य की जटिलता:
ऐसे कई लोग, जो इस विद्रोह से लड़ रहे हैं, उनका कहना है कि कभी-कभी तो ऐसा लगता है मानो घाटी में काम कर रहे सभी सरकारी संस्थान, राज्य के हितों के विरोध में काम कर रहे हैं। लेकिन फिर भी देखिए कि कैसे एक के बाद एक सभी सरकारों ने, भारत विरोधी और अलगाववाद समर्थक बातों का प्रचार कर रहे अखबारों और अन्य मीडिया का पालन-पोषण किया है। इस साल कश्मीर सरकार का विज्ञापन बजट 28 करोड़ से बढ़कर 45 करोड़ कर दिया गया है। इसमें राज्य का पर्यटन बजट शामिल नहीं हैं, वह पूरी तरह अलग है। कई पत्रकारों को राज्य द्वारा निवास और परिवहन का खर्चा दिया जाता है। एक कश्मीरी पुलिस अधिकारी, एक उर्दू दैनिक अखबार की ओर इशारा करते हुए कहते हैं,” यह लेख गुलाम रसूल शाह अलियास रफिआह रसूल का है, जो आतंकवादी संगठन जमियत-उल-मुजाहिदीन का पूर्व प्रमुख है और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में रहता है। इस अखबार के संपादक को सरकार ने जेड प्लस सुरक्षा दे रखी है। अब इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि राज्य खुद कश्मीर में जिहाद की जड़ों को मजबूती दे रहा है”
सूत्रों से यह भी पता चलता है कि पिछले 27 सालों में जमात के कई शिक्षकों और समर्थकों को सरकारी स्कूलों में शिक्षक नियुक्त किया गया है। आपातकाल के दौरान, कश्मीरी नेता शेख मुहम्मद अब्दुल्ला ने घाटी में जमात द्वारा संचालित 125 स्कूलों को बंद कर दिया था। 1977 में जमात में इन स्कूलों को चलाने के लिए, फलह-ए-आम नाम का एक पृथक संगठन बनाया। 1990 में जब विद्रोह अपने चरम पर था, तब इन स्कूलों को फिर से बंद कर दिया गया। लेकिन बाद में वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के हस्तक्षेप के कारण, इन शिक्षकों को सरकारी स्कूलों में शामिल कर लिया गया। सूत्रों के अनुसार, जमात समर्थकों को भर्ती करवाने के लिए कई फर्जी लिस्टें बनाई गईं। नियुक्ति पाने के लिए, जमात की स्थानीय इकाई से केवल एक प्रमाणपत्र बनवाना पड़ता था कि यह व्यक्ति पहले जमात के स्कूल में पढ़ा रहा था। ऐसा माना जाता है कि अब तक लगभग 2000 लोग इस तरीके से नौकरी पा चुके हैं, जबकि जमात शिक्षकों की वास्तविक संख्या लगभग 400 थी। साल 2009 में, मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद उमर अब्दुल्ला ने एक आदेश जारी कर जमात के 440 शिक्षकों की सरकारी स्कूल में भर्ती का रास्ता साफ कर दिया।
अब इसका क्या परिणाम होगा, एक उदाहरण देखिए… साल 2011 में कुछ बच्चों ने कक्षा एक की उर्दू की एक किताब में छपे एक चित्र के बारे में शिकायत की। इसमें एक उर्दू अक्षर ‘जोई’ का उपयोग किया गया था, और उसके साथ बने उदाहरण चित्र में ‘ज़ालिम’ शब्द को समझाने के लिए एक पुलिस वाले कि तस्वीर का प्रयोग किया गया था। पुलिस ने इस बारे में शिकायत दर्ज की, इसके बाद जांच में इस बात का खुलासा हुआ कि इस उदाहरण का चयन शिक्षा बोर्ड के उप निदेशक द्वारा किया गया था। इसी अधिकारी को बाद में राज्य की ‘संस्कृति अकादमी’ का निदेशक बनाया गया। एक कश्मीरी पत्रकार के अनुसार- “जब मैं कश्मीर विश्वविद्यालय में पढ़ रहा था, तब मुझे यह मालूम चला, कि कुछ विभाग विद्यार्थियों को ‘जमात’ और ‘मौदूदी की सोच’ जैसे विषयों पर पत्र और शोध निबंध लिखने के लिए प्रेरित करते हैं”
कश्मीर के पतन की इस भयावह स्थिति में भी, राजनेता सिर्फ इधर-उधर की बातें करते हैं और घाटी में इस्लामीकरण की गहरी जड़ें तलाशने की कोशिश नहीं करते। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को दिए अपने एक इंटरव्यू में अनंतनाग के पीडीपी उम्मीदवार तसादुक मुफ़्ती ने कहा कि ‘सीधे प्रश्न’ पूछे जाने की आवश्यकता है, कि क्यों इतने युवा गोलीबारी में मर रहे हैं या घायल हो रहे हैं? ठीक बात है, ‘सीधे प्रश्न’ पूंछे जाने चाहिए। लेकिन शायद इसकी शुरुआत मुफ़्ती को अपनी पार्टी से ही करनी चाहिए।

‘इस समस्या का हल क्या है?’ इस पर एक वरिष्ठ कश्मीरी पुलिस अधिकारी का कहना है, “हमें युद्ध पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और इसके बाद, हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम अलगाववादियों को रत्ती भर भी राजनीतिक छूट नहीं देंगे”

श्रीनगर के एक कैफे में, एक पत्रकार अपनी जेब से फ़ोन बाहर निकलता है… किसी ने उसे एक खाली कक्षा के 3 लाचार विद्यार्थियों की तस्वीर भेजी है। एक मेज पर एक टैग लगा हुआ है, जिस पर लिखा है ‘रोल नं-1, सीआरपीएफ की फायरिंग में मारा गया’, उसके पीछे एक और टैग पर लिखा है ‘रोल नं-7, जो पढ़ नहीं सकता क्योंकि उसकी आंखें चली गईं हैं”
कश्मीर में यह पाकिस्तान समर्थित प्रचार अब काबू से बाहर हो चुका है। कैफे में बैठा यह पत्रकार कहता है, “एक गाय के बारे में सोचिए, गाय क्या करती है? रंभाती है इसी प्रकार पाकिस्तान का काम ही कश्मीर में परेशानियों को बढ़ावा देना है। लेकिन, कम से कम भारत को तो अपने ही आंगन में गंदगी फैलाने से बचना चाहिए”

((साभारः ओपन पत्रिका))

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