राज्यसभा चुनावों की अक्कड़-बक्कड़

–यशवंत देशमुख (@YRDeshmukh)

हमने अपनी लोकतांत्रिक प्रणाली इंग्लैंड की ‘वेस्टमिंस्टर’ मॉडल पर चुनी है जिसमें निचले सदन यानी लोकसभा का चुनाव “फर्स्ट पास्ट द पोस्ट” की प्रक्रिया के तहत होता है. इस प्रणाली में जो सबसे ज्यादा वोट पाता है वही सिकंदर कहलाता है. अपने प्रतिनिधियों को चुनने को यह तरीका दुनिया में सबसे सरल और स्वीकार्य तरीका है.

लेकिन यहाँ कहानी दूसरे मसले की करनी है जिसे हम ‘राज्यसभा’ कहते हैं. जिससे शायद अल्बर्ट आइंस्टीन भी नफ़रत करते रहे होंगे. इस नफ़रत के पीछे भी अपने कारण हैं. संक्षेप में कहा जाए तो इसके पीछे कारण हैं इसके लिए होने वाले अप्रत्यक्ष चुनाव (इनडायरेक्ट इलेक्शन).

इसे समझना अपने आप में टेढ़ी खीर है. इसमें मतदान करना जटिल है. मतों को गिनना जटिल है. और इस तरह विजेता घोषित करना अपने आप में भी जटिल है.

तो चलिए, इसके मूल को समझने का जिम्मा हम पीएचडी करने वालों पर छोड़ते हैं और मोटा-मोटी चीजों को समझने की कोशिश करते हैं. अगर आपने पीएचडी कर रखी है तो उसे एक किनारे रख दीजिए और इन 25 बिंदुओं से समझने की कोशिश कीजिए…

  1. राज्यसभा में 245 सांसद होते हैं.
  2. 245 में 233 का चुनाव राज्यों के विधानमंडलों में बैठे विधायक करते हैं, शेष 12 को राष्ट्रपति महोदय मनोनीत करते हैं.
  3. 233 सीटों का बंटवारा, राज्यों के बीच उनकी जनसंख्या के अनुसार किया गया है.
  4. उदाहरण के लिए उत्तरप्रदेश के खाते में 31 सीटें आईं तो त्रिपुरा के पास सिर्फ एक सीट है.
  5. लोकसभा में हर 5 सालों में एक बार चुनाव होता है और सभी सीटों के लिए नए सिरे से चुनाव होता है लेकिन राज्यसभा के साथ ऐसा नहीं है. ये स्थाई सदन है इसके 1/3 (एक तिहाई) सदस्य हर दूसरे वर्ष चुने जाते है. इस प्रकार एक तिहाई सीटों के लिए हर दो साल बाद चुनाव होते हैं.
  6. यहाँ हम मसले को समझने के लिए उत्तरप्रदेश का उदहारण लेंगे. जैसा बताया गया है, उत्तरप्रदेश के हिस्से में 31 राज्यसभा सीटें आती हैं जिसमें हर दो सालों में 1/3 (एक तिहाई) का चुनाव होता है. इस प्रकार क्रम कुछ ऐसा चलता है-> 10+10+11
  7. इस तरह साल 2012 में उत्तरप्रदेश ने राज्यसभा के लिए 10 सदस्य चुने फिर 2014 में 10 का चुनाव किया. अब 2016 में इसे 11 सदस्यों का चुनाव करना है. आगे 2018 में ये फिर 10 चुनेगी और इस तरह ये क्रम चलता रहेगा.
  8. उत्तरप्रदेश विधानसभा 403 सदस्यी है, दूसरे शब्दों में इसके 403 विधायकों को 11 राज्यसभा सदस्यों का चुनाव करना है. इसमें जीतने के लिए हर उम्मीदवार को कुछ जरुरी न्यूनतम वोट चाहिए. इस न्यूनतम संख्या को हम इस फॉर्मूले से निकाल सकते हैं.                            विधानसभा की कुल सदस्य (मतदाता) संख्या/(11+1)
  9. इस तरह उत्तरप्रदेश से एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए आपको (403/(11+1)= 34 मत चाहिए.
  10. इससे पहले की हम गणित के जोड़-घटाव-गुणा-भाग शुरू करें, यह जानना जरुरी है कि सामान्यतः हर पार्टी जानती है कि उसकी (विधायक) संख्या के अनुसार वह कितने उम्मीदवारों को जिता कर राज्यसभा पहुंचा सकती है. उदाहरण के लिए बिहार की 5 सीटों के लिए इस साल चुनाव हैं जिसमें JDU-RJD मिलकर 4 सीटें जीत सकते थे जबकि भाजपा को एक सीट मिलने की संभावना थी. इस प्रकार दोनों ने क्रमशः 4 और 1 सीट पर अपने प्रत्याशी खड़े किए. चूंकि वहाँ 5 सीटें पर केवल 5 ही उम्मीदवार हैं तो इस तरह वहाँ मतदान की कोई जरुरत नहीं पड़ी और वे लगभग निर्विरोध चुन लिए गए. ऐसी स्थिति में कोई समस्या नहीं आती.
  11. लेकिन समस्या तब आती है जब इन 5 सीटों के 6 या अधिक उम्मीदवार मैदान में हों. फिर मतदान की जरुरत पड़ती है और यहीँ समस्या आती है.
  12. एक बार फिर उत्तरप्रदेश का रुख़ करते हैं. यहाँ 11 सीटों के लिए चुनाव होना है जिसके लिए जमीनी हक़ीक़त को देखते हुए पार्टियां 11 उम्मीदवार उतारें तो कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए. लेकिन अंतिम समय में भाजपा ने एक स्वतंत्र (निर्दलीय) उम्मीदवार को उतार कर इस गणित को जटिल बना दिया है जिसके बाद मतदान करवाना जरुरी हो गया है.
  13. जैसा ऊपर बताया गया है कि 403 सदस्यीय उत्तरप्रदेश विधानसभा में 11 सीटें हैं जिनमें जीतने के लिए जादुई अंक 34 (मत) है.
  14. अब जरा ध्यान दीजिए. राज्यसभा चुनाव में हर विधायक, हर सीट के लिए मतदान नहीं करता… अगर ऐसा हो तो सभी सीटें सत्ताधारी पार्टी ही जीत लेगी. इसके स्थान पर मतदाता (विधायक) हर उम्मीदवार को वरीयता देते हैं (जैसे 1, 2, 3, 4, 5…). वर्तमान चरण में यदि 34 विधायक किसी एक उम्मीदवार को प्रथम वरीयता देते हैं तो वो चुन लिया जाता है.
  15. आइए, आगे बढ़ने से पहले अब उत्तरप्रदेश विधानसभा में पार्टियों की स्थिति देखें…rs-1.jpg.jpeg
  16. इस तरह आप देख सकते हैं कि सिर्फ मायावती ने अपनी पार्टी की संख्या अनुसार (कोटे से) 2 उम्मीदवार उतारे हैं. इसके बाद उनके पास 12 वोट अतिरिक्त (सरप्लस) हैं. इसी तरह समाजवादी पार्टी के 6 उम्मीदवार बड़े आराम से जीत जाएंगे जबकि 7वें उम्मीदवार को जीतने के लिए 9 वोट कम पड़ेंगे. इसमें अगर उन्हें रालोद के 8 और एक निर्दलीय का वोट मिल जाए तो उनका 7वां उम्मीदवार भी जीत जाएगा.
  17. अब भाजपा को देखिए. इसकी संख्या 41 हैं जिसके हिसाब से इसका सिर्फ एक उम्मीदवार ही राज्यसभा जा पाएगा और 7 का ‘सरप्लस’ रहेगा. यही ‘सरप्लस’ कांग्रेस के कपिल सिब्बल के लिए समस्या खड़ी करेगा.
  18. भाजपा को एक और उम्मीदवार को जिताने के लिए 27 वोट चाहिए जबकि कपिल सिब्बल को मात्र 5. यहाँ से देखने में लगता है कि कपिल सिब्बल के लिए 5 वोट पाना आसान है. और वास्तव में होना भी चाहिए लेकिन क्या हक़ीक़त में ऐसा होता है? या होगा? कपिल सिब्बल अगर किसी पर भरोसा कर सकते हैं तो वो बस मायावती हैं जिनके पास 12 का ‘सरप्लस’ है. लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि बसपा ने अभी तक ऐसी कोई घोषणा नहीं की है.
  19. अब अगर बसपा, कांग्रेस के कपिल सिब्बल को इन 12 ‘सरप्लस’ वोट देने की घोषणा भी कर दे तो कोई गारंटी नहीं है कि सभी के सभी सिब्बल को मिलेंगे ही! इसका कारण है कि खुला मतदान (मतदाता को ये दिखाना पड़ता है कि उसने किसे, किस वरीयता क्रम में रखा है) होने के बावजूद दल-बदल का कानून राज्यसभा चुनाव पर लागू नहीं होता. अतः कोई एक विधायक भी अगर पार्टी व्हिप का उल्लंघन करे तो उसे पार्टी से बाहर नहीं किया जा सकता.
  20. अब ऐसी परिस्थितियां ही ‘इधर-उधर’ (क्रॉस वोटिंग) के लिए मैदान तैयार करती हैं. खैर… आगे बढ़ने से पहले चलो ये देखा जाए कि कांग्रेस का प्रत्याशी, भाजपा के उस अतिरिक्त प्रत्याशी के सामने कहाँ खड़ा है? तकनीकि रूप से देखा जाए तो भाजपा का अतिरिक्त निर्दलीय उम्मीदवार अपने लक्ष्य से 27 वोट पीछे है जबकि कांग्रेस के कपिल सिब्बल लक्ष्य से मात्र 5 वोट पीछे हैं. अब अगर हम टेबल देखें तो पाएंगे कि ‘सरप्लस’ वोटों की संख्या 27 (रालोद के 8 और 1 निर्दलीय सपा में जाने के बाद) ही बैठती है. इनमें से अगर 5 भी कपिल सिब्बल को मिलें तो वो आसानी से जीत जाएंगे.rs-2.jpg.jpeg
  21. लेकिन ऐसा नहीं है! आखिर क्या कारण है कि 5 वोटों की जरुरत वाले कपिल सिब्बल तो चिंतित दिख रहे हैं जबकि 27 की आस लगाए भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार अपनी जीत के लिए पूरी तरह आशांवित दिखता है? क्या कहीं कुछ गड़बड़ है? आखिर गड़बड़ी क्या है जिसे हम चाहकर भी नहीं देख पा रहे हैं??
  22. इसका जवाब हमें मिलता है 19वें बिंदु में. चूंकि कपिल सिब्बल आपने 5 वोटों के लिए मायावती या अन्य की ओर देख रहे हैं और उनकी ये आशा का आधार है कि कांग्रेस के अपने ‘पक्के’ 29 वोट को कहीं जाएंगे नहीं. लेकिन क्या यही हक़ीक़त है? वास्तविकता है कि कांग्रेस, सपा, बसपा के तमाम वर्तमान विधायक अगले विधानसभा चुनावों में भाजपा के टिकट पर ताल ठोकने की फ़िराक़ में हैं फिर अगर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने उनको आश्वासन दे रखा हो तो भला क्यों न वे अपनी-अपनी पार्टियों को छोड़कर ‘क्रॉस-वोटिंग’ करेंगे!
  23. अब इसी भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए कपिल सिब्बल को 5 वोट की जुगाड़ करना मुश्किल होता जा रहा है. इस प्रकार कांग्रेस के 29 वोटों को अगर हम ‘सरप्लस’ मान लें तो ‘सरप्लस’ की खाता संख्या बढ़कर 60 हो जाती है. अब भाजपा को तो 27 वोट ही चाहिए न! फिर आगे आने वाले चुनावों में टिकट की लॉलीपॉप भी है तो भला क्यों कोई भाजपा के साथ न जाए!
  24. फिर भी कोई आशंका रह गई हो तो भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार प्रीति महापात्रा का नामांकन पत्र देखिए. उनके पत्र में सिर्फ 16 भाजपा के ही नहीं बल्कि सपा, बसपा, राक्रांपा आदि विधायकों के दस्तख़त हैं. इंडियन एक्सप्रेस ने एक दिन पहले ही ख़बर दी है कि भाजपा नेतृत्व इसी बहाने 2017 के लिए टिकट चाहने वालों का लॉयल्टी टेस्ट भी कर ले रहा है. एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने तो खुल के कह दिया है कि “अगर इन्होंने भाजपा समर्थित उम्मीदवार को वोट नहीं दिया तो इन्हें आगे कोई आशा नहीं रखनी चाहिए”
  25. अब ये तो तब की बात हुई जब इनको प्रथम वरीयता मत मिलें लेकिन उस स्थिति का क्या जब न तो कपिल सिब्बल को और न ही प्रीति महापात्रा को प्रथम वरीयता मत मिलें? फिर क्या होगा? क्या होगा जब कपिल सिब्बल को 4 वोट मिलें और एक से पीछे रह जाएं या प्रीति को 23 वोट मिलें और वो 4 से पीछे रह जाएं? इस स्थिति में जटिलता और बढ़ जाती है. फिर निर्णय दूसरे वरीयता के मतों के अनुसार होता है.

अब अगर आप दूसरे वरीयता के गणित को समझना चाहें तो… तो मानकर चलिए आपको पीएचडी करनी पड़ेगी. अब अगर कोई इसमें पीएचडी करना चाहे तो यहाँ क्लिक कर सकते हैं.

चलते-चलते, संक्षेप में मैं आपको दूसरी वरीयता के मतों की गिनती के बारे में बताता हूँ…

चूंकि यहाँ कपिल सिब्बल की स्थिति मजबूत है तो बसपा/सपा अपने विधायकों से दूसरे वरीयता वाले खाने में उनका नाम लिखने को कह सकती है.  लेकिन भाजपा को सिब्बल के इरादों पर पानी फेरने के लिए एकमात्र सीधा रास्ता सभी 27 मतों को प्रथम वरीयता में ही डलवाना पड़ेगा.

जिसमें अगर भाजपा के गणित से चला जाए तो उन्हें केवल 18 की जरुरत है.

लेकिन फिर यहाँ लाख टके का सवाल है कि क्या उन्हें ये सब वोट प्रथम वरीयता में मिलेंगे? मिलेंगे तो कहाँ से मिलेंगे? कांग्रेस से? सपा से? या बसपा से? कोई नहीं जनता. या मायावती सिब्बल को समर्थन देकर सब कुछ ख़त्म कर देंगी? फ़िलहाल तो ऐसा होता नहीं दिखाई दे रहा है लेकिन ऐसा हो भी सकता है.

सुना है दिल्ली में एक ‘पिंजरे का तोता’ भी है. क्या पता उसका जादू चल जाए तो गणित ही बदल जाए!

और हाँ… ये कथा तब तक समाप्त नहीं होगी जब तक सब कुछ निपट न जाए… तब तक तो “अंतरात्मा की आवाज़” है ही! जो–होनी को अनहोनी कर दे, अनहोनी को होनी…!!!

(लेखक यशवंत देशमुख पत्रकार हैं और सर्वेक्षण कराने वाली संस्था सी-वोटर के प्रमुख हैं)[sgmb id=”1″]

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