राजदीप जी, न तो मैं सांप्रदायिक हूँ और न ही आप राष्ट्रद्रोही हैं

 

–यशवंत देशमुख (@YRDeshmukh)

मैंने आपका यस, आई एम एंटी-नेशनल नामक दमदार ब्लॉग पढ़ा. बड़े कायदे से आपने अपनी बात रखी है. इसको पढ़ते हुए मैंने अपने-आप को हर उस बात का समर्थन करते पाया जिसका आपने इसमें जिक्र किया. चूंकि मैं भी अपने को राष्ट्रवादी मानता हूँ अतः मुझे लगता है कि आपने जिस भी बात का जिक्र अपने ब्लॉग में किया है, उससे मेरे जैसा शायद ही कोई राष्ट्रवादी असहमत हो पाए और फिर अपने को राष्ट्रविरोधी कहना तो आपका बड़प्पन है. क्रिकेट की भाषा में कहा जाए तो आपकी इस बात ने मुझे ‘स्टम्प’ कर दिया.

आपकी लिखी गई लगभग हर बात से मैं इत्तफ़ाक़ रखता हूँ. (अंतर बस एक (मैं) बनारसी और (आपका) मुंबईया होने का हो सकता है).

ठीक कहा आपने राजदीप, देश की राजनीति पंथनिरपेक्षता और दिखावटी/फर्जी पंथ निरपेक्षता के बीच बंट गई है. लेकिन जैसा आपने लिखा वैसा नहीं, ये 1990 के दशक में नहीं हुआ… ये विभाजन हमेशा से था. 1947 से ही. जब से स्वतंत्रता मिली तब से. चुनावी प्रक्रिया कुछ ऐसी थी कि यह ऊपर नहीं आ सका. आपने तर्क किया है कि 2014 आम चुनाव के बाद बहुत कुछ बदल गया है. ये लाइनें मैं आपकी किताब से लिख रहा हूँ… लेकिन मुझे लगता है भारत तो वही पहले वाला ही हैं लेकिन कुछ बदला है तो वो है कि 2014 ने बुद्धजीवियों के एक खास वर्ग को भारत के बारे में अपनी बनी बनाई ढर्रे वाली, घिसी-पिटी सोच बदले को मजबूर किया है.
हाँ, आपकी इस बात से सहमत हूँ कि वर्तमान में इस विभाजन को राष्ट्रवादी-राष्ट्रद्रोही की बहस ने और बढ़ाया है. अपने आपको राष्ट्रद्रोही कहने की आपकी व्यथा
को मैं समझ सकता हूँ. मुझे भी ऐसे ठप्पों से नवाज़ा गया था. ये 1970 के दशक का समय था. कुछ ‘सांप्रादयिक’ लोग इसे आपातकाल के नाम से पुकारते हैं. लेकिन मैं नाराज़ नहीं हुआ था. होता भी कैसे, दरअसल उस समय मैं सिर्फ 3 साल का था.

“जिन मीडिया वालों ने उस बनी बनाई (सोशलिस्ट) व्यवस्था को मानने से इंकार कर दिया उन सब को एक झटके में राष्ट्र/राज्य का दुश्मन करार दे दिया गया था. ऐसा करने वालों में मेरे पिता जी भी एक थे”

राष्ट्रद्रोही का तमगा आपको सोशल मीडिया से मिला. हमें (पूरे परिवार को) ये तमगा ‘सोशलिस्ट’ मीडिया ने दिया था. इस सोशलिस्ट शब्द को उस समय हमारे संविधान की उद्देशिका में जबरन ठूंसा गया था. और उस समय मीडिया वापपंथी झुकाव रखने वाली काग्रेंस की पैरोकार हुआ करती थी. ये स्वभाविक भी था. और जिन मीडिया वालों ने उस बनी बनाई व्यवस्था को मानने से इंकार कर दिया उन सब को एक झटके में राष्ट्र/राज्य का दुश्मन करार दे दिया गया था. ऐसा करने वालों में मेरे पिता जी भी एक थे. अतः उनके परिवार का हर सदस्य राष्ट्र/राज्य का दुश्मन हो गया. जिसमें 3 साल का मैं भी था. मेरे परिवार जैसे सैंकड़ों और हज़ारों की संख्या में थे जिन्हें एक झटके में राष्ट्र/राज्य का दुश्मन करार दिया गया था. लेकिन मैं नाराज़ नहीं हुआ था. लेकिन बाद के सालों में राजनीति के गलियारों में जो घटा उसने मुझे नाराज़ कर दिया. जैसा मैं आज नाराज़ हूँ. जिस प्रकार आज सेक्लुरिज़्म के सर्टिफिकेट बांटे जा रहे हैं, इसने मुझे “गर्व से कहो हम देश भक्त हैं” कहने के लिए बाध्य किया है.

हाँ, मैं गर्व कहता हूँ कि मैं राष्ट्रवादी हूँ क्यों कि मैं अभिव्यक्ति की आज़ादी का संविधान के आर्टिकल 19 में दी गई परिभाषा से ज्यादा विश्वास करता हूँ. जिसमें विद्वेष और हिंसा के आधार पर सिर्फ दो नीतिगत निर्बंधन होने चाहिए. विद्वेष क्या हो… ये बहस का विषय हो सकता है. उदाहरण के लिए “भारत तेरे टुकड़े होंगे…इंशाअल्लाह-इंशाअल्लाह” जो सीधे-सीधे जिहाद को उकसा रहा है, उसे कानून के उल्लंघन की श्रेणी में रखा जाए या नहीं? क्या यह समुदायों के बीच शत्रुता की भावना नहीं फैलाता? और यहाँ पर यह भी बताता चलूं कि ” राज करेगा खालसा” खालिस्तानियों का नारा नहीं था. बल्कि ये एक ऐतिहासिक नारा है जिसका खालिस्तानियों ने दुरुपयोग किया था. यही कारण था जो सर्वोच्च न्यायालय में उन नारा लगाने वालों के खिलाफ राष्ट्रद्रोह का मुकदमा गिर गया था. ‘खालसा’ शब्द का प्रयोग गुरु द्वारा दिए जाने वाले अच्छे विचारों, अच्छी शिक्षा के लिए होता है. इसका प्रयोग महाराजा रणजीत सिंह के सुशासन के लिए भी किया जाता है. इस कारण एक स्वाभिमानी राष्ट्रवादी की तरह, खालसा शब्द के सही मायनों के साथ “राज करेगा खालसा” को दोहरा रहा हूँ. ऐसे खालसा के लिए गुरु अपनी जान दे देते हैं. जहाँ वे भारत की विविध और सबको समाहित करने वाली संस्कृति की आक्रमणकारी संस्कृतियों से रक्षा करते हैं.

हाँ, मैं गर्व कहता हूँ कि मैं राष्ट्रवादी हूँ क्योंकि पटियाला हाउस कोर्ट में हुई नारेबाजी और हिंसा से मैं अपने को असहज़ पाता हूँ. मैं ऐसे कार्यों को कतई राष्ट्रभक्ति वाला नहीं मानता और गर्व करने वाले मेरे जैसे तमाम भारतीयों ने सोशल मीडिया पर कहा भी है कि ऐसे वकीलों या उस भाजपा विधायक पर तुरंत कानून से हिसाब से कार्यवाई की जाए…ऐसे लोग देशभक्ति की आड़ में अपनी इन हरकतों पर पर्दा नहीं डाल सकते. और हाँ, मैं बिल्कुल भी उन लोगों के बचाव के में नहीं हूँ जो सत्तापक्ष से हैं और ऐसे कार्यों को जायज़ ठहराने की कोशिश करते हैं. मुझे खुशी है कि हमारे बीच ये एक ऐसा मसला हैं जहाँ हम दोनों एक जैसे विचार रखते हैं.

इसी तरह उन लोगों को भी कोर्ट में ले जाना चाहिए जो संसद पर हमले के दोषी अफ़ज़ल के समर्थन में नारे लगाते हैं. कोर्ट ही एकमात्र है जो इस पर फैसला कर सकती है…”अफ़ज़ल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल ज़िंदा है”.आखिर इस “तेरे क़ातिल ज़िंदा हैं” में क़ातिल तो सुप्रीम कोर्ट ही है! उसी ने अफ़ज़ल को फांसी के फंदे तक पहुंचाया है. इस नारे में अगर सर्वोच्च न्यायालय के ‘कातिल’ जजों के ज़िंदा होने पर शर्मिंदगी हो रही है तो जज जाने और शर्मिंदगी करने वाले लोग जाने. हम और आप क्या कर सकते हैं!

हाँ, एक बार फिर मैं आपकी इस बात से सहमत हूँ कि ये भड़काऊ भाषण सरकार के खिलाफ थे लेकिन याद रखिए कि ये सरकार भारत सरकार है न कि भाजपा की सरकार. क्या हमें इन छात्रों को भविष्य के आतंकवादी या उनकी तरह नहीं लेना चाहिए जो (कश्मीर की ) आज़ादी चाहने वालों के प्रति सहानुभूति रखते हैं? खैर, ये तो निर्भर करता है. अगर आपने बीस साल पहले ही ऐसे नारे लगाने वाले अफ़ज़ल को पहचान लिया होता तो क्या होता. मुझे नहीं लगता कि इसका कोई सीधा जवाब हो सकता है. और क्या सिर्फ वैचारिक समर्थन किसी को जिहादी ठहराने और उस पर राष्ट्रद्रोह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं? फिर से ये आप पर निर्भर करता है. अब अगर आप “जो हिंदू हित की बात करेगा, वही देश पर राज करेगा” को सांप्रदायिक मानते हैं तो मुझे लगता है “भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह-इंशाअल्लाह” को भी इसी कैटेगरी में रखा जाना चाहिए? 

आप देखिए ऐसा लगता है कि सब कुछ एक दूसरे की ब्रांडिंग करने तक ही सीमित हो गया है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सिर्फ एक पक्ष पर लागू नहीं होती बल्कि दोनों पक्षों पर बराबरी से लागू होती है. मैं कन्हैया की गिरफ्तारी का विरोध करता हूँ क्योंकि मेरा मानना है कि कन्हैया का भाषण एक बेहतरीन राजनैतिक भाषण था और उसमें राष्ट्रद्रोह जैसा कुछ भी नहीं था. वास्तव में जो राष्ट्रद्रोह के असली दोषी हैं वे खुलेआम घूम रहे हैं. उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाना चाहिए न कि कन्हैया पर.

“हाँ, मैं गर्व से कहता हूँ कि मैं राष्ट्रवादी हूँ क्योंकि इस बहुलतावादी भारतीय लोकतंत्र पर मुझे विश्वास है और मेरा मानना है कि कश्मीरी अलगाववादियों से बात होनी चाहिए”

हाँ, मैं गर्व से कहता हूँ कि मैं राष्ट्रवादी हूँ क्योंकि इस बहुलतावादी भारतीय लोकतंत्र पर मुझे विश्वास है. मेरा मानना है कि कश्मीरी अलगाववादियों से बात होनी चाहिए उसी तरह स्वायत्ता की चाह रखने वाले उत्तर-पूर्व के लोगों से भी बात की जानी चाहिए. शायद मैं अकेला ही जनमत सर्वेक्षक हूँ जिसने संकटग्रस्त कश्मीर के सभी हिस्सों में जनमत संग्रह पर सर्वे करने के लिए उसकी यात्रा की हो. मुझे इस बात को एक साप्ताहिक पत्रिका के कवर पेज पर रखने में कोई हिचक नहीं थी कि ज्यादातर कश्मीरियों का मानना है कि ‘नई दिल्ली’ चुनाव में धांधली करती है और न वे मानते हैं कि भारत के संविधान से इसके लिए कोई समाधान निकल सकता है. सर्वे करने वाली ये एजेंसी सी-वोटर और उसे अपने कवर पेज पर छापने वाली ‘वीक’ पत्रिका भी भारतीय थी.

और मैं ही एक ऐसा पत्रकार हूँ जिसने अनुभव के आधार पर घाटी के उन कश्मीरियों के सांख्यकीय आंकड़े प्रस्तुत किए जो भारत का हिस्सा नहीं बनना चाहते. हमने उनकी भावनाओं के आधार पर ठोस आंकड़े प्रस्तुत करने की कोशिश की है और यह बताने का प्रयास किया कि यदि जनमत हो तो क्या होगा?

हाँ, मैं समझ सकता हूँ कि यह समाज संघर्ष और परिवर्तन के बीच जूझ रहा है और राष्ट्रद्रोही नारों को हवा देना, विरोध जताने का एक अच्छा और सस्ता तरीका है. लेकिन मैं यह भी समझता हूँ कि जिहादी आदर्शों द्वारा “कश्मीरियत” का मुद्दा बड़ी ही चतुराई से ‘विश्व शांति’ के नाम पर ‘हाईजैक’ कर लिया गया है. यहाँ तक कि हुर्रियत नेताओं ने भी इसे दुख प्रकट करते हुए इसे स्वीकारा है.

हाँ, मैं गर्व से कहता हूँ कि मैं राष्ट्रवादी हूँ जिसने शांति के मुद्दे पर कश्मीरियत के विचारों को सुनने के लिए 20 साल तक सांख्यकीय आंकड़े प्रस्तुत करने का काम किया. श्रीनगर हो या दिल्ली या फिर उस मामले में चाहे वाशिंगटन… लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में जिहादी विचारों को हवा देना गलत है. हर व्यक्ति के पास अभिव्यक्ति की आज़ादी होनी चाहिए लेकिन जिहाद के नाम पर आतंकवाद फ़ैलाने की आज़ादी कतई नहीं होनी चाहिए.

“वैकल्पिक विचारों को दबाना, चाहे ये टीवी स्टूडियो में हो या गली-चौराहे पर…ये सब मेरे आइडिया ऑफ इंडिया में नहीं है”

हाँ, मैं आपकी इस बात से सहमत हूँ कि जो कानून तोड़ते हैं, हिंसा फैलाते हैं, आतंक का राज चाहते हैं उनको दंडित किया जाना चाहिए इस बीच उन लोगों से बातचीत करने की प्रक्रिया समाप्त नहीं होनी चाहिेए जो आपसे असहमति रखते हैं. लेकिन यह तभी तक संभव है जब तक असहमति रखने वाले संसद पर हमला करने वालों का समर्थन नहीं करते. हाँ, असहमती का अधिकार भी बोलने की आज़ादी जितना ही महत्वपूर्ण है. वैकल्पिक विचारों को दबाना, चाहे ये टीवी स्टूडियो में हो या गली-चौराहे पर…ये सब मेरे आइडिया ऑफ इंडिया में नहीं आता. लेकिन किन वैकल्पिक मतों को सुना जाना जरूरी है? “भारत की बर्बादी तक जंग जारी रहेगी, जंग जारी रहेगी”? मुझे नहीं लगता कि ऐसे विचारों पर कोई चर्चा हो सकती है.

हाँ, मैं आपकी इस बात से भी सहमत हूँ कि अगर अफ़ज़ल को समर्थन देना राष्ट्रद्रोह है तो जम्मू-कश्मीर मंत्रिमंडल में पीडीपी के कोटे से आने वाले आधे से ज्यादा मंत्री देशद्रोही हैं… मेरे पत्रकार मित्र, मैं यहाँ बताना चाहता हूँ कि पीडीपी अफ़ज़ल की फांसी को “अदालत की गलती” करार देती है. लेकिन क्या वे भारत की बर्बादी के नारे लगाते हैं?

न्याय को “travesty of justice” कहना एक बात है लेकिन “भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह” बिल्कुल दूसरी बात.

हाँ, मैं गर्व से कहता हूँ कि मैं राष्ट्रवादी हूँ और मामता हूँ कि महात्मा गांधी के कातिलों का महिमामंडन करने वाली हिंदू महासभा ने आपराधिक काम किया है. जब वह 26 जनवरी को काला दिवस मनाती है तो मैं उसे भी राष्ट्रद्रोही संगठन मानता हूँ. राजदीप जी, आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि तमाम राष्ट्रवादी मानते हैं कि साध्वी प्रज्ञा, साक्षी महाराज या प्रवीण तोगड़िया जैसे लोग अपने विभाजनकारी वाहियात बयानों से अपने आपको राष्ट्रद्रोही ही सिद्ध करते हैं.

“हाँ, मैं आपकी इस बात से इत्तफाक़ रखता हूँ कि राष्ट्रवाद की परिभाषा राजनीतिक सत्ता की शक्ति से निर्धारित नहीं होनी चाहिए”

हाँ, मैं आपकी इस बात से इत्तफाक़ रखता हूँ कि राष्ट्रवाद की परिभाषा राजनीतिक सत्ता की शक्ति से निर्धारित नहीं होनी चाहिए. इसीलिए मैं मानता हूँ कि जेएनयू या अन्य यूनिवर्सिटियों में जो भी अफ़ज़ल से सहानुभूति रखने वाले हैं उनके विरोध में काग्रेंस की छात्र ईकाई एनएसयूआई, केजरीवाल जी के सीवाईएसएस या वाम दलों के छात्र संगठन आइसा जैसों को मोर्चा लेना  चाहिए. न कि अपने आप को राष्ट्रवाद का चैंपियन मानने वालों को उनसे भिड़ना. जिस दिन ये सभी छात्र संगठन अफ़ज़ल के समर्थकों से भिड़ेंगे, उस दिन राजनीतिक सत्ता के लिए कोई जगह नहीं रहेगी, उस दिन  राष्ट्रवाद की परिभाषा राजनीतिक सत्ता की शक्ति से निर्धारित नहीं होगी.

हालांकि मैं सुबह उठकर गायत्री मंत्र का जाप नहीं करता लेकिन फिर भी कुछ दूसरी चीजें करता हूँ जिससे मैं अपने आप को हिंदू और राष्ट्रवादी कह सकता हूँ. मसलन मैंने पूरी दुनिया घूमी है लेकिन कभी गौमांस या सुअर का मांस नहीं खाया. क्योंकि गौमांस मेरे घर में नहीं परोसा जाता और सुअर का मांस कभी किसी मित्र के घर में नहीं परोसा गया. अब ऐसी चीज को खाने की क्या जरूरत जो न तो मेरे परिवार में और न ही किसी मित्र के यहाँ खाई-खिलाई जाती हो? लेकिन फिर भी ये मेरी निजी पसंद का मामला है और मैं नहीं चाहूंगा कि कोई अन्य इसे जरूर अपनाए ही. फिर चाहे मुख़्तार अब्बास नक़वी ही क्यों न हों जिनके लिए भोजन राष्ट्रद्रोह का मामला बन सकता है.
हाँ, मैं  भी अपने देश की विविध विरासत को जीता हूँ, इसका सम्मान करता हूँ. मैं ये भी जानता हूँ कि यहाँ की बहुत बड़ी संख्या गौमांस से नफ़रत करती है तो दूसरी और सुअर के मांस से नफरत करने वाले भी बड़ी संख्या में हैं. ये सब टाइप करते हुए मैं एक पल के लिए भूल गया हूँ कि मैं बनारसी ब्राह्मण हूँ. जो अपने बंगाली पड़ोसियों के बीच रहा हो, डे परिवार से मैंने दोई-माछ का आनंद लेना सीखा और लखनऊ में पड़ोसी नानीजान जो अतहर परिवार रहता था, के यहाँ से मैंने सीखा कि कैसे शामी कबाब मुंह में डालते ही घुल जाते है.
मेरे लिए, मेरे परिवार के लिए, मेरे दोस्तों, मेरे साथियों के लिए खाने की आज़ादी निश्चित है लेकिन मैं विशुद्ध खाने की आज़ादी की जगह कुछ चीजों पर दूसरों की भावनाओं (आहत होने) का भी ख्याल रखता हूँ. मेरे लिए कुछ चीजो को न खाना दूसरों का सम्मान है. यह मेरे लिए भवनाओं का सम्मान करने की आज़ादी है. मैं इसी आज़ादी का सम्मान करते हुए कुछ चीजें कतई नहीं खाता हूँ. फिर चाहे गौमांस हो या सुअर का मांस. दूसरों का सम्मान करना मुझे एक गर्व करने वाला राष्ट्रवादी बनाता है.

“मैं कानून तोड़ने वाले उन वकीलों को भी दंडित कराना चाहता हूँ जो ‘भारत माता’ के नाम पर महिला पत्रकारों से अभद्रता करते हैं”

हाँ, मैं गर्व से कहता हूँ कि मैं राष्ट्रवादी हूँ और मैं कानून तोड़ने वाले उन वकीलों को भी दंडित कराना चाहता हूँ जो ‘भारत माता’ के नाम पर महिला पत्रकारों से अभद्रता करते हैं, इसलिए मैं गर्व ये कह सकता हूँ कि मैं राष्ट्रवादी हूँ. इस सब के बीच मैं कश्मीर की आज़ादी चाहने वाले उन लोगों को भी नहीं छोड़ना चाहता जिनके कारण कश्मीरी पंडितों की महिलाओं को सब कुछ सहना पड़ा है. मैं गर्व से कहता हूँ कि आप ही की तरह मैं भी राष्ट्रवादी हूँ जो तिरंगे की आन-बान-शान के खातिर कुर्बान हो जाने वाले वीर जवानों का सम्मान करता है. इसीलिए मैं हर उस आइडिया का समर्थन करता हूँ जिसमें हर यूनिवर्सिटी में तिरंगा फहराने की बात कही जाती है. लेकिन जब आप जवान के लिए सम्मानित उस तिरंगे को सम्मान को स्वीकार करने को तैयार नहीं जिसकी आन-बान-शान के लिए जवान शहीद होता है, तो फिर उन जवानों को सम्मान देने के क्या मायने रह जाते हैं?
हाँ, मैं गर्व से कहता हूँ कि मैं राष्ट्रवादी हूँ इसीलिए मैं समलैंकिता के अधिकारों का समर्थन करता हूँ. मैं मृत्युदंड के खिलाफ हो सकता हूँ लेकिन मैं चयनित रूप से विरोध करने की प्रक्रिया में कतई शामिल नहीं हूँ. और खसकर तब तो बिल्कुल नहीं जब आरोपी आतंकी गतिविधियां में लिप्त हो और आज़ादी की मांग करें. अगर कोई मृत्युदंड के खिलाफ है तो उसे उस वक़्त भी विरोध करना चाहिए जब किसी बलात्कारी या हत्यारे को फांसी के फंदे पर ले जाया जा रहा होता है. लेकिन दुर्भाग्यवश जेएनयू में मुझे कोई ऐसा नहीं दिखाई देता जिसने धनन्जय चटर्जी या आतो शंकर की फांसी का विरोध किया हो. सैद्धांतिक रूप से फांसी का विरोध करने वाली ये आवाज़ें आखिर क्यों सिर्फ उसी वक़्त सुनाई देती हैं जब कोई अफ़ज़ल, कसाब या याकूब मेमन फांसी के फंदे की और ले जाया जा रहा होता है?

एक राष्ट्रवादी के तौर पर मैं जाति, लिंग या धर्म के नाम पर होने वाली हर तरह की हिंसा का विरोध करता हूँ. यही कारण है कि जब ब्राह्मण वोटों की एकता को (शोषणकारी) जातीय राजनीति कहा जाता है लेकिन यादव वोटों को महज़ सामुदायिक एकता का नाम देकर छोड़ दिया जाता है तो मुझे ये बड़ा हास्यपद लगता है. मैं उस समय भी अपने आपको लाचार महसूस करता हूँ जब हमारी बौद्धिक जमात द्वारा हिंदुओं के ध्रुवीकरण को सांप्रदायिक कहा जाता है लेकिन मुसलमानों के ध्रुवीकरण को धर्मनिरपेक्ष रणनीति की संज्ञा दी जाती है. इसीलिए मैं जातीय या धर्म के मामलों में ऐसे किसी चयनित पैमाने का विरोध करता हूँ और मैं इस कड़वे सत्य को समाज के सामने लाने को, लाने वाले को पसंद करता हूँ.

लेकिन इस सबके बावज़ूद मैं अपने को राष्ट्रवादी मानता हूँ क्योंकि मैं अंबेडकर के उस संविधान को मानता हूँ जिसमें सभी नागरिकों को समान मानकर उन्हें एक जैसे कानून के अधीन रखा गया है और जिसके मूल में समान नागरिक संहिता का सिद्धांत है. मैं मानता हूँ कि भारत जैसे बहुरंगी देश में किसी को भी सांस्कृतिक एकरूपता थोपने की इजाजत नहीं होनी चाहि्ए जो एक राष्ट्र एक धर्म की बात पर आधारित हो. लेकिन हाँ, इसी के साथ इस बात का खयाल रखा जाए कि भारत एक राष्ट्र है. इस पर मैं कतई कोई समझौता नहीं करूंगा. इस देश के कानून लिंग, जाति या धर्म की परवाह किए बिना सब पर एक समान लागू होने चाहिए. इस अवसर पर शीहबानो के मामले को याद करना सार्थक रहेगा. जब हमें अपने संविधान  में बताए गए कर्तव्यों का पालन करना चाहिए था तो उस समय कैसे हमने एक महिला को वोट बैंक की खातिर हमने उसके धर्म के भरोसे छोड़ दिया?

“सदियों से इस देश में निचली जातियों पर अत्याचार हुए हैं, उन्हें जो घाव दिए गए हैं, उनको देखते हुए मैं आरक्षण का समर्थक हूँ इसीलिए मैं अपने आप को गर्व करने वाला राष्ट्रवादी मानता हूँ”


सदियों से इस देश में निचली जातियों पर अत्याचार हुए हैं, उन्हें जो घाव दिए गए हैं, उनको देखते हुए मैं आरक्षण का समर्थक हूँ इसीलिए मैं अपने आप को गर्व करने वाला राष्ट्रवादी मानता हूँ. मैं उस स्थिति से नफरत करता हूँ जब किसी मासिक चक्र के कारण महिला को
अशुद्ध करार देकर उसे मंदिर या किसी पूजा स्थल में नहीं जाने दिया जाता. मेरे ट्विटर में जो सबसे ऊपर ट्विट है उसमें मैंने लिखा है कि “अगर महिलाएं सैनेटरी नैपकिन पहनकर हवाई जाहज उड़ा सकतीं हैं, सैनेटरी नैपकिन पहनकर ओपन हार्ट सर्जरी कर सकती हैं, सैनेटरी नैपकिन पहनने के बावजूद सीमा पर दुश्मनों को ढेर कर सकती हैं तो फिर सैनेटरी नैपकिन पहनकर मंदिर में जाकर पूजा क्यों नहीं कर सकतीं?” हाँ, मेरा मानना है कि ये सब करना, एक गर्व करने वाला राष्ट्रवादी बनाता है.

मैं आपके आइकन मोहम्मद अली से भी कुछ ग्रहण करना चाहूंगा. मुझे खुशी हुई जो आपने इतिहास के उस वाकये का जिक्र किया. लेकिन मुझे लगता आप इस बात का जिक्र करना भूल गए कि मोहम्मद अली ने अपना गोल्ड मेडल “अमेरिका तेरे तुकड़े होंगे इंशाअल्लाह-इंशाअल्लाह” कहते हुिए नदी में नहीं फेंका था. उन्होनें ऐसा किया था तो इसके पीछे बड़ी वजहें थीं. अमेरिकी राष्ट्रध्वज के तले वे अपने नागरिकों को बराबरी का दर्जा दिलाना चाहते थे. जो वहाँ का संविधान नहीं दे पा रहा था. लेकिन मैं ऐसे संवैधानिक या संस्थानिक असमानता के उदाहरण भारत में नहीं देखता. अब अगर आप मुझसे इसकी तुलना करते हुए भारत की बर्बादी को फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन का नाम देने का जोर देंगे तो माफ कीजिए सर, मुझसे न हो पाएगा.
इतना सबके बाद मुझे अब और कुछ शेष नहीं दिखाई देता जो एक राष्ट्रवादी होने के लि्ए जरूरी होना चाहिए. राष्ट्रवाद को आपने भारत में होने वाली सभी समस्याओं के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया है. और अब आप को उन्हीं अच्छाईयां से सुसज्जित होने के बाद भी राष्ट्रवादियों पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं. ऐसा करके आप मेरे जैसें राष्ट्रवादियों को हतोत्साहित करने की कोशिश कर रहे हैं.
बावज़ूद इसके कि मैं आपके द्वारा बताई गई उन सभी अच्छाइयों को स्वीकार कर रहा हूँ.

मुझे लगता है राष्ट्रवादी होने पर आप जो शर्मिंदगी पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं एक दिन आप इस पर खेद प्रकट करेंगे.
और हाँ, न तो मैं सांप्रदायिक हूँ और न ही आप राष्ट्रद्रोही हैं.
स्नेह और सम्मान के साथ
आपका
यशवंत

(लेखक यशवंत देशमुख पत्रकार हैं और सर्वेक्षण कराने वाली संस्था सी-वोटर के प्रमुख हैं. यह लेख मूल रुप से अंग्रेजी में HuffingtonPost.in पर प्रकाशित हुआ था)[sgmb id=”1″]

1 Comment


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