नोटबंदी-50 दिनों की उम्मीद

–यशवंत देशमुख (@YRDeshmukh)

                                         सी-वोटर का विस्तृत सर्वेक्षण

नोटबंदी पर आम नागरिकों को होने वाली परेशानियों के बीच सी-वोटर ट्रैकर के हिसाब से विमुद्रीकरण का समर्थन तीसरे हफ्ते भी जारी है। इसके समर्थन में 85.77 फीसदी लोगों का मानना है कि कालेधन के खिलाफ लड़ाई में ‘इतनी परेशानी’ तो झेली जा सकती है। लेकिन इसके साथ ही इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए कि हर चौथा भारतीय अपने रोजमर्रा के खर्चों के लिए परेशानी झेल रहा है रहा है। इसका मतलब है कि अगर हर चौथा भारतीय भारतीय विमुद्रीकरण से जरा सा भी नाराज हो जाए तो यह संदेश जाने में देर न लगेगी कि हर दूसरा भारतीय भारतीय विमुद्रीकरण से नाखुश है। अतः हम कह सकते हैं कि इस समय हम चौराहे पर खड़े हैं।ludhiana759
प्रधानमंत्री मोदी को इस मसले पर जनता का भरपूर समर्थन उस समय देखने को मिला जब विमुद्रीकरण के दूसरे हफ्ते में जनता ने विपक्ष द्वारा बुलाए गए भारत बंद को एक तरह से ठेंगा दिखाया। फिर प्रधानमंत्री द्वारा विपक्ष की नैतिकता पर सवालिया निशान लगाने की नीति भी कामयाब रही। सी-वोटर के सर्वे में 78 फीसदी ने इस बात पर सहमति जताई कि विपक्ष का विरोध सिर्फ इसलिए है क्योंकि उन्हें अपने कालेधन को सफेद करने का पर्याप्त वक्त नहीं मिला। 80 फीसदी से ज्यादा लोगों का कहना था कि विमुद्रीकरण के इस निर्णय के बाद प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता बहुत बढ़ गई है या उस पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा। इसका मतलब कि भारत धीरे-धीरे ही सही, नई नीतियों को आजमाकर ऩए-नए प्रयोग के लिए तैयार हो गया है।
विमुद्रीकरण एक ऐसी नीति है जो प्रधानमंत्री के लिए यह एक बड़ा अवसर भी बन सकता है और अगर कुछ गड़बड़ी हुई तो बैक-फायर भी कर सकता है। प्रधानमंत्री जी ने ऐसा करके भारत में अब तक सबसे बड़ा फैसला लिया है जहाँ थोक के भाव में राजनैतिक जोखिम है। इस कार्य की सफलता और असफलता के लिए सीधे वही जिम्मेदार होंगे।
इस सर्वे में पूछे गए कई सवालों में बड़े विरोधाभास होने के बाद भी 59 फीसदी लोगों का मत है कि इस योजना का निष्पादन ठीक तरीके से हुआ है। स्पष्ट है कि बैंकों और अन्य वित्तीय प्रतिष्ठानों में बहुत कुछ सही नहीं है ऐसा लगता है कि करेंसी वितरण की योजना बहुत जल्दबाजी में बनाई गई और उसका निष्पादन भी बहुत ख़राब तरीके से किया गया। संभव है कि जिससे कुछ लोगों को आर्थिक छल-कपट करने का मौका मिला। लगभग हर पांचवा भारतीय इस बात को मानता है कि इस योजना का कार्यान्वयन या तो बहुत कमजोर है या एकदम बदतर है और ऐसा मानने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है जो सरकार के लिए खतरे की घंटी है।
इस सर्वे में जैसे-जैसे हम शहरी इलाकों से ग्रामीण इलाकों की तरफ जाते हैं, हम पाते हैं कि नगदी-विहीन अर्थतंत्र (कैशलेश इकानॅामी) के बारे में लोगों का भरोसा कम से कमतर होता जाता है। शहरी क्षेत्र में इसे 52.6 फीसदी लोगों ने व्यवहारिक पाया जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 36.5 प्रतिशत लोगों ने इस पर भरोसा जताया। अतः नगदी-विहीन अर्थतंत्र की योजना को सफलतापूर्वक निष्पादित करने के लिए सरकार को भरोसे और बुनियादी ढांचे का पुल बनाना पड़ेगा और यह भी जानना होगा कि ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्थाओं के बीच कितना अंतर है। सरल शब्दों में कहें तो ग्रामीण क्षेत्र के अधिकतम लोग जो, आबादी के लगभग दो-तिहाई हैं, नगदी-विहीन अर्थतंत्र को व्यवहारिक नहीं मानते। इसलिए इसे व्यवहारिक बनाने के लिए एक लंबा रास्ता तय करना होगा।
जब लोगों से यह पूछा गया कि विमुद्रीकरण ने सबसे ज्यादा असर किस पर डाला है तो उनका जवाब था कि इसने गरीब और अमीर दोनों पर ही समान असर डाला है। 42.4 फीसदी लोग सोचते हैं कि विमुद्रीकरण से अमीरों पर ज्यादा असर पड़ा जबकि 40.25 फीसदी सोचते हैं इससे गरीब ज्यादा प्रभावित हुआ। राजनीतिक रुप से प्रधानमंत्री के लिए यह ज्यादा नुकसानदायक होगा अगर यही सोच बरकरार रहती है। सरकार के कड़े कदमों का असर गलत और भ्रष्ट तरीके से अर्जित की गई संपत्ति रखने वालों के ऊपर होना चाहिए न कि गरीबों के ऊपर। यहाँ आपको शहरी, अर्ध-शहरी और ग्रामीण लोगों के विचारों में एक साफ अंतर्विरोध नजर आएगा जब आप यह देखेंगे कि 47 फीसदी शहरी उत्तर देने वालों का मानना है कि विमुद्रीकरण से अमीरों के ऊपर असर पड़ेगा जबकि अर्ध-शहरी क्षेत्रों में ऐसा सोचने वाले केवल 40 फीसदी हैं और ग्रामीण क्षेत्रों ये गिरकर 29 फीसदी रह जाता है। साफ तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में अभी यह सोच घर कर रही है कि गरीब, अमीर की तुलना में ज्यादा मुश्किलों का सामना कर रहा है। सरकार ग्रामीण इलाकों में अपने उद्देश्य को सही तरीके से पहुंचाने में असफल हो रही है क्योंकि वहाँ लोग नगदी कमी की वजह से अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में परेशानियों का सामना कर रहे हैं।

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हालांकि एक बड़ा तबका अभी भी सरकार के इस अचानक लिए कदम का समर्थन कर रहा है क्योंकि इससे टैक्स चोरी और नगदी की जमाखोरी करने वालों के लिए मुसीबत खड़ी हो गई है लेकिन आम आदमी में से हर तीसरा व्यक्ति (या फिर 33%) अपने आप को ठगा महसूस कर रहा है और विमुद्रीकरण की वजह से होने वाली परेशानियों से दुखी है। हालांकि सरकार के लिए यह सांत्वना देने वाली बात हो सकती है कि 62 फीसदी लोग अभी भी ऐसा नहीं सोचते हैं और कालेधन के खिलाफ लड़ाई में अभी भी मोदी सरकार के साथ खड़े हैं। पर जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि केवल एक-तिहाई लोग ही अपने गुस्से से इस विवरण को को उलट देते हैं। लोग इस बात का भी इंतजार कर रहे हैं कि कुछ बड़े अपराधी इस मामले में जेल जाएंगे।
विमुद्रीकरण को केवल एक आर्थिक या वित्तीय कसरत के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। भारत का गरीब बहुत मजबूती से सामाजिक न्याय के लिए उठाए गए कदमों के साथ जुड़ा हुआ है। समाज के बहुत बड़े तबके का यह सपना था और है कि वह अपने क्षेत्र के धन्ना सेठों की दुर्गति-भरी छटपटाहट को देख सकें। प्रधानमंत्री के इस फैसले के साथ लोग जिस ईमानदारी और पवित्रता से जुड़े हैं, इसी में प्रधानमंत्री मोदी के लिए राजनैतिक मौका और चुनौती दोनों हैं। लेकिन क्या होगा अगर यह रोजमर्रा के खर्चों में नगदी की समस्या 50 दिन के बाद भी बरकरार रहती है? यह सरकार के लिए सबसे बड़ा सवाल और चिंता का विषय है। हालांकि 52 फीसदी भारतीय विमुद्रीकरण के इस कदम का समर्थन 50 दिन के बाद होने वाली परेशानी के बाद करने के लिए तैयार हैं। साथ ही 48 फीसदी इस बारे में पक्के तौर पर अपनी राय नहीं बना पाए हैं। इस 52 फीसदी की तुलना जब हम अभी के 86 फीसदी के समर्थन से करते हैं तब हम यह समझ पाते हैं कि हम कैसे और किस दोराहे पर खड़े हैं। दूसरे शब्दों में कहें 50 दिन के अंदर नहीं सुलझाया गया तो विमुद्रीकरण का समर्थन जो अभी 86 फीसदी है, वह घटकर केवल 52 फीसदी पर आ जाएगा। इस बात को आप एक दूसरे तरीके से भी समझ सकते हैं। सरकार के इस कदम से असंतुष्ट लोग, जो अभी लगभग 14 फीसदी हैं, वह बढ़कर 48 फीसदी तक हो सकते हैं और वह भी सिर्फ अगले 3 हफ्तों में!
विमुद्रीकरण को बड़ा समर्थन इसलिए मिला क्योंकि सड़कों पर मौजूद लोग मोदी का समर्थन करते हैं। यह तथ्य है कि प्रधानमंत्री की सोच विमुद्रीकरण के मामले में सही लगती है और इस मामले में बड़े स्तर पर बहस की कोई गुंजाइश नहीं दिखती है। अब ये सरकार और भाजपा का काम है कि इस इज्जत और सम्मान को बनाए रखने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए। लगभग 88 फीसदी लोगों ने इस कदम से पीछे हटने का का विरोध किया। इससे इसके भारी समर्थन का पता चलता है।
57 फीसदी लोगों को मानना है कि विमुद्रीकरण की वजह से देश की अर्थव्यवस्था कुछ दिन के लिए लड़खड़ाएगी लेकिन अगर एक लंबे दौर की बात करें तो यह अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी होगा। 23 फीसदी सोचते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था को अभी भी फायदा हो रहा है और वक्त के साथ यह फायदा और बढ़ेगा… और आप यह पाएंगे कि लगभग 90 फीसदी भारतीय इस विषय में सकारात्मक राय रखते हैं। भविष्य के प्रति आशावाद की ये किरण उस समय और महत्वपूर्ण हो जाती है जब सर्वोच्च न्यायालय भी कह चुका है विमुद्रीकरण में जरा सी चूक दंगे भड़का सकती है। लोगों का यह असाधारण धैर्य दो चीजों पर आधारित है। पहला, भविष्य के लिए आशावाद और दूसरा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर यह भरोसा कि वह लोगों के अच्छे भविष्य के लिए निर्णय ले सकते हैं। यह न केवल प्रधानमंत्री मोदी के लिए लिए बल्कि सवा करोड़ भारतीयों के लिए भी करो या मरो की स्थिति है।
विमुद्रीकरण पर किसी अनहोनी की आशंका के बीच जो अच्छी खबर सरकार के लिए है वह यह कि पिछले तीन हफ्तों में बढ़ते समय के साथ कैश की कमी की खबरों में लगातार कमी आ रही है। 28 फीसदी का मानना है कि पिछले चार हफ्तों में विमुद्रीकरण पर उनकी समस्या यो तो जस की तस बनी हुई या बिगड़ी है। 57 फीसदी मानते हैं कि शुरुआती दिक्ततों में अब कमी आ रही है। ऐसा मानने वालों की संख्या ग्रामीण की तुलना में शहरी इलाकों में कम है। निश्चित रूप से सरकार को इस अंतर को पाटने के लिए कुछ ठोस करना होगा। जहाँ एक भारतीय मानता है कि विमुद्रीकरण से कुछ परेशानी नहीं है वहीं दो अन्य भारतीय इसे बहुत बड़ी समस्या के रुप में देख रहे हैं।
अंतिम रुप से कहा जाए तो कैश के लिए लोगों को कितना समय एटीएम की कतारों में गुजारना पड़ रहा है यही लोगों के गुस्से को बढ़ाने-घटाने वाला मुख्य कारक बनेगा। हम इस प्रश्न के उत्तर की खोज विमुद्रीकरण की घोषणा के बाद से ही शुरु कर दी थी और तीन-चार हफ्ते बाद भी कर रहे हैं। पहले हफ्ते में 9 फीसदी लोगों का कहना था कि उन्हें कैश के लिए आधा दिन कतार में रहना पड़ा, 11 फीसदी लोग पूरे दिन लगे रहे और 6 फीसदी लोगों के अनुसार एक दिन से ज्यादा का समय कैश लिकालने के लिए देना पड़ा। मतलब कुल मिलाकर 26 फीसदी लोगों का कहना था कि कैश के लिए उनका पूरा दिन बरबाद हो गया।images
अन्य 26 फीसदी का कहना है कि उन्होंने तो लाइन में लगकर कैश लेने का आईडिया ही छोड़ दिया है। पूरे दिन एटीएम की लाइन में लगकर कैश लेने वालों की संख्या दूसरे सफ्ताह में घटकर 9 फीसदी पर आ रही है लेकिन कैश के लिए लाइन में लगने वालों का आंकड़ा बढ़कर 47 फीसदी पर पहुँच रहा है। इस प्रकार देखें तो कैश के लिए तरसते लोगों की संख्या 55 फीसदी पर पहुँच रही है। ये वे लोग हैं जिन्होंने या तो पूरा दिन लाइन में खड़े-खड़े गुजार दिया या जो थक हारकर लाइन में लगे ही नहीं।

कुल मिलाकर 7 फीसदी लोगों का मानना है कि उन्हें करीब पूरा एक दिन कैश के लिए लाइन में गुजारना पड़ा, पहले हफ्ते ये आंकड़ा 26 फीसदी का था

लेकिन ताजा आंकड़े सरकार के लिए कुछ राहत देने वाले हो सकते हैं। दरअसल महज़ 2 फीसदी लोगों का मानना है कि कैश के लिए उन्होंने अपना आधा दिन खपाया, 3 फीसदी लोग मानते हैं कि पूरा दिन और 2 फीसदी का एक दिन से अधिक कैश के लिए लाइन में लगे-लगे गुजर गया। कुल मिलाकर ये संख्या 7 फीसदी पर पहुँचती है। याद कीजिए… पहले सप्ताह में ये संख्या 26 फीसदी थी। दूसरे शब्दों में तीयान हफ्ते पहले सिर्फ एक घंटा बैंक में गुजारने वालों का प्रतिशत जहाँ 11 था वहीं आज ही ये बढ़कर 37 फीसदी पर पहुँच गया है। ये आंकड़ा उस समय बढ़कर 48 हो गया जब हमने पूछा कि एक महीने बाद स्थिति क्या होगी?
इन सबके बीच सिर्फ 3 फीसदी लोगों को अभी भी डर है कि कैश निकालने के लिए उन्हें अब भी पूरा दिन खपाना पड़ता है।
इस प्रकार हम देखें तो पाएंगे कि प्रधानमंत्री द्वारा 50 दिनों के वादे की निर्भरता बहुत हद तक एटीएम के बाहर लगने वाली लाइनों पर रहती है। भारत की आम जनता लाख परेशानियों के बाबज़ूद प्रधानमंत्री के शब्दों पर भरोसा कर रही है। आशावाद हर बुराई पर हावी है। लेकिन अगर वादे टूटे तो… इंतजार है!

(लेखक यशवंत देशमुख पत्रकार हैं और सर्वेक्षण कराने वाली संस्था सी-वोटर के प्रमुख हैं। व्यक्त विचार निजी हैं, चौपाल से संबंध नहीं)[sgmb id=”1″]

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