दारुल उलूम की यह चाबुक यानि इस्लाम पर भीतरघात

न्यूज वेबसाइट सत्याग्रह डीएनए की एक खबर के हवाले से लिखता है कि दारुल उलूम देवबंद ने कांग्रेस नेता और पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद को इस्लाम से बाहर कर दिया है। आरोप है कि उन्होंने यूपी के संभल में आयोजित कल्कि महोत्सव में हिंदुओं के आराध्य भगवान राम की आरती की थी। देवबंद के अनुसार, अल्लाह के अलावा किसी और की इबादत (पूजा) इस्लाम के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

दरअसल, देवबंद का फरमान खुर्शीद से ज्यादा हिंदू-मुस्लिम बंधुता की चाह रखने वालों के लिए परेशान करने वाला है। यह बात सही है कि इस्लाम के पांच बुनियादी सिद्धांतों में एक यह भी है कि आप ईश्वर के अलावा किसी और को मत पूजिए, मूर्ति पूजा भी प्रतिबंधित है लेकिन इसकी दो अलग और ज्यादा गहरी व्याख्या भी तो की जा सकती है।

पहली व्याख्या, बिना इस सिद्धांत का मर्म समझे बेहद सतही है जैसा कि दारुल उलूम ने किया, जबकि दूसरी व्याख्या के मुताबिक, आपकी इबादत या समर्पण ईश्वर के अलावा किसी दूसरे के प्रति नहीं होना चाहिए। न धन के प्रति, न लोभ, न पद, न ही किसी तरह की बुराइयों के प्रति और अगर कोई रिश्ता, मित्रता, प्रेम या लगाव आपको पथभ्रष्ट करे तो उसके प्रति भी नहीं।

खुर्शीद पर दूसरा आरोप है कि उन्होंने मूर्ति पूजा की। बेशक जो व्याख्या चलन में है उसके हिसाब से पूर्व विदेश मंत्री का कृत्य गैर इस्लामिक है। कुरान में एक ही बात कई-कई बार दोहराई गई है, लेकिन असल में वह दोहराव नहीं बल्कि इशारा है। इशारा है कि उसके मर्म को आप सही अर्थों में समझें क्योंकि हो सकता है कि पहली दफा में आपने जो समझा, वह गलत या भ्रमित करने वाला हो।

मूर्ति पूजा के जिस अपराध में खुर्शीद को इस्लाम से बहिष्कृत किया गया, वह फैसला भ्रमित करने वाला है। मोहम्मद साहब के वक्त बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) के कारण लोग बुरी तरह बंटे हुए थे। सबके अलग ईश्वर, सबकी अलग पूजा। नतीजा, भाईचारे का अभाव और हर व्यक्ति अपनी मुसीबत में अकेला।

ऐसे में बुतपरस्ती प्रतिबंधित कर दी गई। मकसद था, लोगों में एका हो और वे एक दूसरे के काम आएं। इस अर्थ में देखा जाए तो सलमान खुर्शीद की कृत्य फूट नहीं बल्कि दो ऐसे समुदाय में एका पैदा करने वाला है जिनके बीच विभाजनकारी ताकतें बंटवारे के बाद सबसे मजबूत स्थित में हैं।

प्रिय दारुल उलूम, इन हालातों में खुर्शीद के मामले में आपका कदम इस्लाम पर तो भीतरघात है ही, भीतरघात है बंधुत्व और समाजिक ताने बाने पर भी। ठीक वही भीतरघात जो तथाकथित गोरक्षकों और हिंदू कट्टरपंथियों का कृत्य हिंदू धर्म और उसकी उदारता के खिलाफ करता है।

(लेखक प्रियांशु स्वतंत्र पत्रकार हैं। व्यक्त विचार निजी हैं, चौपाल से कोई संबंध नहीं)

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