समान नागरिक संहिता का ब्लू प्रिंट

तुफैल अहमद (@TufailElif))

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 सरकारों को निर्देश देता है “राज्य अपनी सीमा में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून बनाएगा”
लेकिन संविधान लागू होने, यानि 26 जनवरी 1950 से लेकर आज तक किसी भी राजनैतिक पार्टी ने अल्पसंख्यकों खासकर मुस्लिम वोट छिटकने के डर से समान नागरिक संहिता को लागू करना तो दूर, इस पर चर्चा करना भी उचित नहीं समझा।
यहाँ तक की नागरिक समूहों और मानवाधिकारों की बात करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं/संगठनों ने भी समान नागरिक संहिता पर चुप्पी साधना ही बेहतर समझा है। और ये सब इसलिए हुआ है क्योंकि अभी तक समान नागरिक संहिता को सिर्फ और सिर्फ मुसलमानों के पर्सनल लॉ को सीमित करने वाला माना जाता रहा है। शायद अभी भी ये मसला इतना चर्चा में न आता। वो तो भला हो कुछ मुस्लिम महिलाओं का जिन्होंने संविधान में मिले स्वतंत्रता-समानता के अपने अधिकारों के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। ये महिलाएं (मुस्लिम) पर्सनल लॉ से पीड़ित हैं।preamble-hindi
इसीलिए ये शायद पहली बार है कि ज़मीनी हक़ीक़त समान नागरिक संहिता की मांग को मज़बूती दे रही है।
समान नागरिक संहिता की इस बहस में अभी तक कोई ड्राफ्ट सामने नहीं है जो आम नागरिक को ये बता सके कि समान नागरिक संहिता में आख़िर क्या-क्या शामिल किया जा सकता है. इसलिए मैंने ये कोशिश की है जिसमें मेरा साथ दिया है मेरे सहपाठी रहे, मेरे अज़ीज़ मित्र और सत्य प्रकाश और सिद्धार्थ सिंह ने.
इसको ड्राफ्ट करते समय हमने भारतीय नागरिकों के लिए सार्वभौम मानवाधिकारों के व्यापक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखा है। इसका उद्देश्य जनता के सामने उन बिंदुओं को सामने लाना है जो समान नागरिक संहिता में व्यापक चर्चा के हो सकते हैं।
इससे पहले कि आगे बढ़ा जाए, एक चीज स्पष्ट होनी चाहिए वह कि समान नागरिक संहिता में ‘समान’शब्द से यह आशय कतई नहीं लगाया जाना चाहिए कि हर चीज में ‘एकरूपता’ थोप दी जाएगी। बल्कि यह तो समानता-स्वतंत्रता जैसे मूलभूत अधिकारों से संबंधित है।
हम यहाँ जिस मसले की ड्राफ्टिंग करने बैठे हैं वो सिर्फ पर्सनल लॉ तक सीमित नहीं है बल्कि यह जनमानस में एक व्यापक वाद-विवाद का विषय बनकर उभरा है।
इस बहस में राजनैतिक दलों में पारदर्शिता की कमी, मुस्लिम महिलाओं की समानता की चाह, समलैंगिकों के अधिकार, सरकारी मशीनरी द्वारा भेदभावपूर्ण व्यवहार, जिसमें कमलेश तिवारी का उदाहरण लिया जा सकता है, ये सब ऐसे मसले हैं जो भारतीयों के बीच खाई पैदा कर रहे हैं और भारत की एकता को चुनौती दे रहे हैं।
इसीलिए इसको ड्राफ्ट करते वक़्त इसे भारतीय नागरिकों के लिए सार्वभौमिक अधिकारों के विधेयक के रूप में रखा है। हम उम्मीद करते हैं कि 12 बिंदुओं वाले इस ड्राफ्ट से जनमानस में इसकी चर्चा और व्यापक होगी।
uccहमें इस बात पर जोर देना चाहिए कि वर्तमान भारत एकदम नया है, युवा है। जहाँ सवा-करोड़ लोगों में 55 फीसदी 25 साल से कम के हैं। ये वो आबादी है जो जाति-धर्म की जकड़न से अपने आप को आज़ाद कराना चाहती है। भारतीय सीमा में रहने वाली इस युवा पीढ़ी की इच्छा-अभिलाषाएं संविधान के आदर्शों से तय होने वाली हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ये भारतीयों की “संवैधानिक पीढ़ी” है जो जाति-धर्म की पहचान से परे, समान अधिकारों के लिए समान नागरिक संहिता की वक़ालत कर रही है।
भारतीय नागरिकों को सार्वभौम अधिकारों के लिए विधेयक (बिल)
हम भारत के लोग, जिनकी इच्छा-अपेक्षाएं भारतीय संविधान द्वारा निर्धारित होती हैं, वर्तमान कानून की कमियों को स्वीकार करते हुए, “भारतीय नागरिकों के लिए एकसमान अधिकारों के इस बिल को स्वीकार करते हैं”, जो अग्रलिखित है…

  1. अनुच्छेद 1- शिक्षा का मूलभूत अधिकार 18 साल तक के सभी बच्चों के लिए अनिवार्य किया जाए। यहाँ ‘शिक्षा’ का आशय आधुनिक तकनीक से युक्त शिक्षा-प्रणाली से है न कि किसी तरह की धार्मिक शिक्षा। बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार जीवन जीने की स्वतंत्रता (अनु. 21) को छोड़कर अन्य सभी अधिकारों के ऊपर रहेगा।
  2. अनुच्छेद 2- विश्वास और धर्म संबंधी मूल अधिकार सिर्फ (एकल) नागरिकों के लिए होने चाहिए न कि समुदायों/समूहों या संस्थाओं के लिए। यदि किसी नागरिक के अधिकारों का हनन होता है तो राज्य या न्यायपालिका को चाहिए कि वो इन मामलों में समूह/संस्थाओं के हस्तक्षेप को स्वीकार न करे।
  3. अनुच्छेद 3- अपनी जातीय-सामुदायिक पहचान का सम्मान करते हुए नागरिकों को शादी-ब्याह का अधिकार तो हो लेकिन शादी के बाद तलाक़, समान-संपत्ति, संतान का लालन-पालन आदि मसलों के लिए एक कानून होना चाहिए जो पर्सनल लॉ को निष्क्रीय करे। किसी को भी तब तक दूसरी शादी करने कि छोट नहीं होनी चाहिए जब तक कि उसने न्यायिक प्रक्रिया से तलाक न लिया हो। इससे इतर जो भी समान्तर न्याय व्यवस्था है, उसे दंडनीय अपराध माना जाए।
  4. अनुच्छेद 4- संसद, राज्य विधान मंडल और न्यायापालिका को चाहिए कि वो संविधान की पंथनिरपेक्षता को ध्यान में रखते हुए किसी भी समुदाय के किसी भी धार्मिक ग्रंथ या पाण्डुलिपि के आधार पर कोई कानून या नियम न बनाए।
  5. अनुच्छेद 5- लिंग से परे, चाहे उनकी धार्मिक पहचान या यौन आकर्षण कुछ भी हो, वे-
    अ) अपने पूर्वजों या पैतृक संपप्ति के हक़दार होंगे
    ब) किसी बच्चे को एक समान कानून के अंतर्गत गोद ले सकेंगे, न कि अपने पर्सनल लॉ के अंतर्गत
    स) उत्तराधिकार के समान नियम-कानून का पालन करेंगे। और ये सभी एक समान कर-नियमावली के अंतर्गत रखे जाएंगे न कि अलग-२ सामुदायिक (पर्सनल लॉ) की मान्यताओं के अनुरूप। धार्मिक मान्यताओं के आधार पर किसी को कर में छूट न दी जाए।
  6. अनुच्छेद 6- सभी नागरिकों को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होगी और इस स्वतंत्रता पर उस समय तक कोई निर्बंधन न लगाया जाए जब तक राज्य की संप्रभुता या अखंडता के लिए कोई ख़तरा उत्पन्न हो। पत्र-पत्रिकाओं, किताबों, फिल्मों आदि पर राज्य कोई भी भूतलक्षी (पिछली तारीख़ जैसे 26 जनवरी 1950 से) निर्बंधन नहीं लगाएगा।
  7. अनुच्छेद 7- कानून के नियम सभी पर समान रूप से लागू होंगे। ऐसे सरकारी अधिकारी जो राजनीतिक या अन्य किसी कारणवश चयनित रूप से कानूनों का उपयोग करते हों, उसी दिन से अपने पद से हटाए जाएं जिस दिन से उन्होंने यह क़दम उठाया हो।
  8. अनुच्छेद 8- किसी भी नागरिक को 24 घंटे से अधिक पुलिस हिरासत में नहीं रखा जाए जब तक उसके खिलाफ़ न्यायालय में आरोप पत्र दाख़िल न कर दिया जाए। यह अवधि आतंकवाद या राष्ट्रद्रोह जैसे जघन्य अपराधों में अधिकतम 90 दिनों तक हो सकती है।
  9. अनुच्छेद 9- चुनाव आयोग के माध्यम से राज्य यह सुनिश्चित करे कि सभी राजनैतिक दलों में सांस्थानिक और वित्तीय पारदर्शिता हो। राजनैतिक दल सिर्फ और सिर्फ कैशलेस, सत्यापित और रिकार्डेड हस्तांतरण के माध्यम से ही चंदा लेने के अधिकारी हों। राजनीतिक दलों का चुनाव भी चुनाव आयोग करेगा। किसी भी तरह का नियमुल्लंघन होने पर दलों को अमान्य घोषित कर दिया जाए।
  10. अनुच्छेद 10- भारत का हर नागरिक भारत की सीमा में कहीं भी भू-संपत्ति खरीदने, बेचने या हस्तांतरित करने का अधिकारी होगा। वर्तमान में इसको यदि कोई कानून/संवैधानिक अनुच्छेद रोकता है तो उसे निष्क्रिय माना जाएगा।
  11. अनुच्छेद 11- भारतीय सीमा में जन्मे सभी बच्चे, जिस सीमा में जम्मू-कश्मीर का गिलगित-बाल्टिस्तान भी शामिल है, को स्वाभाविक रूप से भारत की नागरिकता दी जाए।
  12. अनुच्छेद 12- किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूहों की मानवीय गरिमा को कम करने वाले अपमानजनक-भेदभावकारी शब्दों (जैसे भंगी, चमार, काफ़िर, मुनाफ़िक़ इत्यादि) के उपयोग को दंडनीय अपराध की श्रेणी में रखा जाए। ऐसे शब्द, वे चाहे किसी लिंग-जाति-संप्रदाय से संबंधित क्यों न हों, सब से एक समान कानून से निपटा जाए।

अंत में हम, संसद में बैठे गणमान्य सदस्यों से अपील करते हैं कि इस विधेयक (बिल) को पारित करें जिससे हमारे संविधान की उद्देश्यिका और खासकर अनुच्छेद 44 के शब्दों की भावना को हक़ीक़त में उतारा जा जा सके। जिसके अनुसार “राज्य अपनी सीमा में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता बनाएगा”

हस्ताक्षरित
सत्य प्रकाश, तुफैल अहमद, सिद्धार्थ सिंह

(लेखक तुफैल अहमद, वॉशिंगटन स्थित मध्य एशिया मीडिया शोध संस्थान, MEMRI के निदेशक हैं. यहाँ व्यक्त विचार उनके अपने हैं)

[sgmb id=”1″]

1 Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

75 − 66 =