“जिहाद और इस्लामी-फासीवाद से सख़्ती से निपटने की जरुरत”

–तारेक फ़तह (@TarekFateh)

देखिए साहब, धर्मों में सुधार की बातें तब होती हैं जब धर्म-प्रमुख देशों को चलाते हैं. अब यहां न तो संयुक्त राज्य अमेरिका को कोई पोप चला रहे हैं और न ही भारत को कोई पंडित. ये वो समय नहीं है जब किसी धर्म में सुधार किया जाए या हम सुधार के लिए इस प्रकार की बहसों में पड़े. मैं मानता हूँ कि ये पूरी बहस ही वाहियात है. आप क्या सोचते हैं कि घोड़े उड़ सकते हैं या बन्दर उड़ सकते हैं? तो ठीक है मानते रहिए… आपकी दादी माँ इस बात पर भरोसा कर सकती हैं लेकिन आप इस आधार पर सामाजिक नियम नहीं बना सकते. सुधारों की बात कह कर हम अपना समय जाया कर रहे हैं… ये बहस बेकार की है. मूल मुद्दा ये है कि हमें हर उस प्रयास को ऊखाड़ फेंकना चाहिए या ज़मीदोज़ कर देना चाहिए जो किसी (धार्मिक) पवित्र लेख के आधार पर दूसरों को विवश करता है. इसके सिवा कोई और विकल्प नहीं है. और न कोई धार्मिक सुधार हो सकता है.

“पाकिस्तान और पाकिस्तानी लोग पहचान का संकट झेल रहे हैं”

अगर आप इस्लाम में सुधार चाहते हैं तो आपको पाकिस्तान में जो इस्लामी राज्य है उसे विघटित करना होगा, जिसे भारत ने ही बनाया. आप अपने ही एक अंग को काट देते हैं और कहते हैं ‘उप्स’ और एक पाकिस्तानी कहता है ‘आऊ’… ‘हम तो भारतीय नहीं हैं!’ तो आप क्या सोचते हैं क्या आप अरब हैं? अरे… अपना चेहरा तो आईने में देखिए… आप सिन्धु के किनारे पैदा हुए और आप कहते हैं कि आप मिस्र से हैं. वास्तव में, यह पहचान का संकट है जो पाकिस्तान झेल रहा है, यह पहचान का संकट है जो पुरानी दिल्ली के लोग झेल रहे हैं, यही पहचान का संकट ‘कन्हैया’ झेल रहा है और यही पहचान का संकट ABVP (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) झेल रही है जिसने कन्हैया कुमार को एक नेता बना दिया. आपको यह समझने कि जरूरत है कि करना क्या है न कि धार्मिक सुधार की बातें करनी है. धर्म में सुधार नहीं किया जा सकता. इस्लाम को सुधारने के लिए कोई क्या कर सकता है? वो ये कहेगा कि घोड़े तो नहीं उड़ सकते ये तो एक हंस था या वो एक राकेट था जो येरुशलम जा पहुंचा. या फिर आप ये कहेंगे कि आप नहीं मानते कि एक बूटी के लिए किसी ने पर्वत उठा लिया था. आप सोचते हैं कि वो तो कोई F-16 रहा होगा.  आप किसी धर्म में क्या सुधार लाना चाहते हैं या ला सकते हैं? धर्म अतार्किक, जादुई-अंधविश्वासों को आँख मूंद (बंद करके) के मान लेना है. और अगर आप इन में भरोसा करते हैं तो कोई बात नहीं, अपनी सोच का आनंद उठाइए लेकिन यह न सोचिए कि आप लोकसभा में जा कर कोई ऐसा कानून बनाएंगे जो 5000 साल पुरानी भारतीय तकनीक पर आधारित होगा… जिसके हिसाब से हमारे पास विमान-वाहक पोत थे फिर मुस्लिम आए और उसके बाद अंग्रेज आए और हमारी तकनीक चुरा ली.  यही तो दक्षिणापंथी हिंदू दावा करते हैं. (बड़ी आजीब बात है कि)आप की टोंटी में वाटर प्यूरिफायर (जल साफ करने वाली मशीन) लगा होता था और आप कोई साइकिल का अविष्कार करना भूल गए!

“हिटलर और स्टालिन तो केवल इस दुनिया पर राज करना चाहते थे पर ये… ये (जिहादी) तो पूरी मानव सभ्यता को ख़त्म कर देना चाहते हैं”

आप आराम से बैठ कर सोचिए कि आप इस्लामिक फासीवाद का सामना कर रहे हैं. आप का जो दुश्मन है वो हिटलर से अलग है, हिटलर और स्टालिन तो केवल इस दुनिया पर राज करना चाहते थे पर ये… ये तो पूरी मानव सभ्यता को ख़त्म कर देना चाहते हैं क्योंकि हम मुस्लिम जब मरते हैं तो हमारे पास वापसी का कोई टिकट नहीं होता (इस्लाम में पुनर्जन्म का विचार नहीं है) हमारी तो इकतरफ़ा उड़ान है और ये धरती हमारे लिए एक Transit Launge है. जब हम जाएंगे तो आप सब इस्लाम में परिवर्तित हो चुके होंगे.

TF Miceतमाम लोग जिहाद पर बहस करते हैं… “जिहाद ये है…” “जिहाद वो है…” हम मुस्लिम जानते हैं कि जिहाद क्या है. ‘जिहाद’ हिंदुओं के पिछवाड़े पर लात मारना है और हम ये पिछले 800 सालों से कर रहे हैं और तब भी आप के नेता कहते थे कि “ये असली जिहाद नहीं है… चलो असल जिहाद देखते हैं”. फिर इल्तुतमिश आया… यह भी जिहाद नहीं था. फिर तैमूर आया… आपने लोदी को आने दिया, फिर भी आपके नेता ये ही कहते रहे कि ये असल जिहाद नहीं है. आप कब तक लोगों को आमंत्रित करते रहे… अब आपने यहाँ के एक मुख्य रस्ते का नाम औरंगजेब मार्ग बुलाते हैं. बेशर्मी की इन्तहां हो गयी हिंदुस्तान में और वो अभी भी समझाने कि कोशिश कर रहे है कि “नहीं उसका दिल दुःख गया था… तो उस मुसलमान ने बम फोड़ दिया”. आप सोचते हैं कि वंचित होने की वजह से आतंकवाद हो रहा है? आप जानते भी हैं कि वंचित होना और मुसलमान होना, एक ही है. जहाँ पानी की एक बूंद न हो, वातानुकूलन नहीं, कोई काम न हो, कोई पेड़-पौधे न हों, नदी न हो, चन्दन के पेड़, कोई फूल नहीं, दो-मंजिला घर नहीं, कुछ भी नहीं… था तो बस बियाबान-रेगिस्तान… ऐसे थे मुसलमान…

(अब इसको देखते हुए) हमने आत्मघाती हमलावर इसलिए पैदा किए क्योंकि मुहम्मद के घर में पानी की टोंटी नहीं थी! और यहाँ  (इस कार्यक्रम में) कोई और मुस्लिम क्यों नहीं है? हाँ, बस एक मैं हूँ और तुफैल (अहमद) है. मुस्लिम करते क्या हैं? वो यहाँ मुझे सुनने के लिए नहीं आएंगे. वो कहाँ जाते हैं? वो जाएंगे किसी दाढ़ी वाले बदसूरत बंदे के पास. ये लोग कौन हैं. जमायत-ए-इस्लामी तो फिर भी पढ़े लिखे हैं लेकिन ये लोग वेबकूफ, अनपढ़ मुल्ले हैं जो कभी कुछ भी नहीं पढ़ते. ये बस टोपी लगाना जानते हैं और गैर-मुस्लिम उनको देख के कहते हैं कि देखो, वो कितने प्यारे लग रहे हैं!

ये वो हैं जो श्री-श्री के वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल में नाच भी नहीं सकते. जहाँ उन्हें होना भी चाहिए. किसी वामपंथी-नारीवादी ने भी ये सवाल नहीं उठाया कि इनमें मुस्लिम महिलाएं कहाँ हैं. एक भी महिला नहीं थी. और किसी भी भारतीय को ये अटपटा नहीं लगा और न ही उसने कहा कि वो किसी चीज की कमी महसूस कर रहा है. यह सब इसलिए क्योंकि इस्लाम में कोई सुधरा हो ही नहीं सकता. अगर सच कहूं तो हम अकेला ही मर जाएंगे. क्योंकि भारतीय तो नीद में चल रहे हैं. (बेटियां इस बात के लिए मुझे माफ़ करें) लेकिन हर एक भारतीय हिंदू युवा एक सीईओ बनना चाहता है और हर एक हिंदू लड़की एक सीईओ की पत्नी और हर पाकिस्तानी एक जिहादी बनना चाहता है. हर सिख एक खालिस्तानी ऐसे में आप इंडिया राइजिंग और इण्डिया शायनिंग (भारत उदय) की बातें कर रहे हैं. आप नष्ट हो जाएंगे क्योंकि यह हर पाकिस्तानी का अंतिम लक्ष्य है (यहाँ तक कि मौजूद हमारी बहिन भी इसके बारे में आपत्ति कर सकती है. पाकिस्तानी पत्रकार नालिया इनायत की तरफ इशारा करते हुए) गजवा-ए-हिन्द. मैं हर उदारपंथी (लिबरल) पाकिस्तानी को इस बात कि चुनौती देता हूँ कि वो द्विराष्ट्र सिद्धांत को ख़ारिज कर के दिखाए या फिर मोहम्मद अली जिन्ना को सही ठहरा कर दिखाए जो अपने मित्र की केवल सोलह साल की लड़की से संबंध रखता था और उस के साथ दो साल तक सोया. जिन्ना ने अपनी बेटी को केवल इस लिए बेदखल कर दिया क्योंकि उस ने एक पारसी से शादी कि थी जबकि उस की खुद की माँ एक पारसी थी. और पाकिस्तानी उस वेबकूफ को कायदे-आजम बुलाते हैं!  यह वहां पर एक गंभीर समस्या है.

आप वहां बैठे हैं, ये जानते हुए भी कि बलूचिस्तान आप के हाथों से निकल रहा है. 50 लाहौरी अगर मरते हैं तो आप कहने लगते हैं कि क्रिस्चियन (ईसाई) ज्यादा नहीं मरे मुस्लिम ज्यादा मरे हैं. वास्तव में ऐसा ही होगा और ऐसा क्यों न हो जब वहां की आबादी में ईसाई तो महज़ दो फीसदी ही हों… और बाकी बचे मार दिए जाएंगे तो फिर ये कम-ज्यादा क्या है? आपने (पाकिस्तानियों ने) लाहौर के उस शहर में एक भी हिंदू जिंदा नहीं छोड़ा जो मूल रुप से राम-संत का शहर है. एक भी लाहौरी मुस्लिम यह नहीं जनता कि ये राम-संत का शहर है तो फिर सुधार कहाँ से आएगा?

“अगर आप “भारत माता की जय” नहीं बोल सकते तो इसका मतलब है कि आप भारत को अपनी सगी नहीं बल्कि सौतेली माँ समझते हैं”

किसी को तो खड़े हो कर यह सवाल उठाना चाहिए कि अगर आप “भारत माता की जय” नहीं बोल सकते तो इसका मतलब है कि आप भारत को अपनी सगी नहीं बल्कि सौतेली माँ समझते हैं. और अगर ऐसा है तो सौतेली माँ को गले लगाने का ढोंग मत करो, मत कहो कि अम्मी कैसी हैं आप? क्योंकि मैं जनता हूँ कि आप अपनी सौतेली माँ से नफ़रत करते हैं. ठीक है आप ये (भारत माता की जय) न कहो लेकिन किसी को ललकारते हुए ये भी तो न कहो कि नहीं मैं ऐसा कभी नहीं बोलूंगा. मुझे पता है आप बिलकुल ऐसा कहेंगे… आपको अगर अमेरिका का वीज़ा लेना हो तब आप ऐसा कहेंगे. आप मुझे एक भी जिहादी दिखाइए जिसे अमेरिकी वीज़ा मिला हो और कहता हो मैं इसको फाड़ दूंगा… एक भी नहीं दिखा पाएंगे.

इसलिए महोदय, सुधार नहीं चाहिए… आपको इस्लामियत से ज्यादा महत्व जिहाद को देना होगा.

और जुम्मे के दिन हिंदुस्तान और पाकिस्तान की हर मस्जिद में और अगर जेएनयू में भी कोई मस्जिद है वहाँ भी, मुस्लिम ये दुआ मांगते हैं कि “या अल्लाह मुसलमानों को फ़तेह नसीब कर इस कौम-उल-काफ़रीन पर” फिर एक मुसलमान आपसे (हिंदुओं से) कहता है कि आप थोड़े ही काफ़िर हैं वो तो यहूदी काफ़िर हैं. यही बात यहूदियों से कहते हैं आप नहीं हिंदू काफ़िर हैं. और ऐसे ही सिखों को समझा देते हैं. ये दोहरापन तब से चल रहा है जब से मोहम्मद बिन क़ासिम भारत आया और उस देश का बलात्कार किया जिस देश में हिंदू राजाओं ने पैगंबर मोहम्मद के परिवार को शरण दी और आश्चर्य देखिए ये तथ्य किसी को नहीं पता. यहाँ (भारत में) लोगों का नाम है मौलाना क़ासमी. ये क़ासमी क्या है? क़ासमी मतलब हुआ-मोहम्मद बिन कासिम की औलाद. क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि इज़्रायल के किसी  टीवी स्टूडियों में बैठा कोई कहे कि मैं मौलाना ‘हिटलर’ हूँ? ऐसे यहाँ (भारत में) कई घूम रहे हैं. कई-सारे तो यहाँ अब्दुल हैं. किसी में तो ये कहने का दम होना चाहिए कि इस ज़मीं पर पैदा हुए हो तो इस ज़मीं के नाम तो रख लो दो-चार… दस नहीं, तो कम से कम एक तो अशोक नाम का मुसलमान हो. दिलीप कुमार ने तो इसलिए रख लिया था क्योंकि उसे फिल्मों में काम करना था. ये हैं मेरे विचार. और इसीलिए कह रहा था कि मुझे न बुलवाएं. (हंसी…)TF Namste

आप आग से खेल रहे हैं लेकिन आप को इसकी जानकारी नहीं. ये वो कम्युनिस्ट हैं जो तब तक मार्क्सिस्ट(मार्क्सवादी) हो ही नहीं सकते जब तक करोड़पति न हों. ये कैफ़ी आज़मी की तरह सौ रूपए महीने में गुजरा करने वाले नहीं हैं. ये मार्क्सिस्ट एतागिनिया से आए हैं, जिनकी पूर्णकालिक प्रोफेसर्शिप है. इनको कोई हटा नहीं सकता. ये हमें कम्युनिज्म पढ़ा रहे हैं. इन्होंने पढ़ा ही नहीं कि गूगल पैसे कैसे बनता है तो गुस्से में आकर मुसलमानों के साथ मिल जाते हैं.

आज के दौर में इस्लाम क्या है? इस्लाम (का मतलब) आज केवल अमेरिका से घृणा करना है और कुछ नहीं. भारतीय मुसलमानों के लिए आज इस्लाम अमेरिका से घृणा करने के आलावा कुछ नहीं है. आप चाहो तो किसी मुल्ले की बात करो या फिर जावेद अख़्तर की… ये सब अमेरिका से घृणा करते हैं पर ये छुट्टियों में घूमने जाते कहाँ हैं? अमेरिका!

पैसे वाले मुसलमान डेस्टिनेशन वेडिंग (शादियां) कहाँ कर रहे हैं? नियाग्रा फाल्स, न्यूयॉर्क में!

तो साहब, माफ कीजिए अगर आप हिंदुओं के अधिकारों की बात नहीं कर सकते और CPI-CPM को नहीं सुधार सकते…

ये लोग आपको ख़त्म कर देंगे. ये वे लोग हैं जो गजवा-ए-हिन्द के तहत आप को ख़त्म कर देना चाहते हैं. क्या है गज़वा-ए-हिंद… इसको पढ़ लीजिए. जब सभी मुस्लिम बना दिए जाएंगे या मार दिया जाएंगे… तो मसीहा आएगा और जब मसीहा आएगा तो सारी मानवता को हवाई जहाज का इकतरफा टिकट मिलेगा… जन्नत जाने के लिए. और जब आप लोग दोज़ख की आग में जल रहे होंगे तब मैं और मेरी बहन जन्नत जा रहे होंगे. ये है गज़वा-ए-हिंद, जो लिखा गया है.

तो ये अकादमिक मामला नहीं रहा. ये मानव सभ्यता के बचे रहने की जंग है. इनके पास एटॉमिक बम (परमाणु हथियार) हैं जो आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ) के पास नहीं हैं. इनके पास टैक्टिकल न्यूक्लियर बम हैं जो किसी नाव से भारत के किसी भी शहर पर दागे जा सकते हैं. यह सब आपको तो पता भी नहीं हैं.

ये तो चाहते ही हैं मरना. क्योंकि इनके हिसाब से जिंदगी मरने के बाद ही शुरू होती है. जो आपके लिए पैदा होने के बाद शुरू होती है. जब तक आप यह नहीं समझेंगे, जब तक आप मुसलमानों को बातचीत में शामिल नहीं करेंगे, आप मानवता के खिलाफ इस युद्ध में हार जाएंगे. और ये लड़ाई आपके सुशांत (सरीन) नहीं लड़ सकते. ये सिर्फ हम या तुफ़ैल (अहमद) ही लड़ सकते हैं… लेकिन ख़ुदा के वास्ते हमे लड़ने के लिए जगह तो दे दो… जो बुलाता है उन्हीं को बुलाता है… चाहे सीपीएम (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी) का हो या जनता दल का या कहीं और का… हर जगह मुसलमान बदसूरत ही होता है… और जिसकी शक्ल अच्छी होती है उसे कोई नहीं बुलाता…कहता है अरे इसकी तो शक्ल अच्छी है, ये तो मुसलमान हो ही नहीं सकता.

(लेखक और टिप्पणीकार तारेक फ़तह अविभाजित भारतीय मूल (वर्तमान पाकिस्तान) के कनाडाई नागरिक हैं. 4 अप्रैल, 2016 को जवाहर लाल नेहरू विवि. (JNU) तुफ़ैल अहमद की किताब Jihadist Threat to India पर चर्चा के दौरान दिए गए उनके इस अंग्रेजी व्याख्यान का लिपिबद्धिकरण और अनुवाद (Transcribed and translated) दीपक मिश्र ने किया है. लेखक/वक्ता द्वारा यहाँ व्यक्त विचार निजी हैं)[sgmb id=”1″]

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