गिरवी इतिहास का परिणाम है कोरेगांव हिंसा

कुछ सौ एक साल पहले की घटना है। एक गाँव में राम और श्याम नाम के दो लोग रहते थे। उनके घर-बार साथ ही साथ थे। उनका घर परिवार बहुत संपन्न तो नहीं लेकिन सुखी था। एक दिन उस गाँव में एक अंग्रेज आया और उसने राम से कहा की श्याम के दादाजी के दादाजी, के दादाजी ने तुम्हारे दादाजी के दादाजी, के दादाजी की हत्या की थी। ठीक यही बात वह अंग्रेज श्याम को भी कहता है की तुम्हारे दादा के दादा के दादा की हत्या राम के दादा के दादा के दादा ने की थी। यह बात सुनते ही राम और श्याम एक दूसरे के जानी दुश्मन हो गए। इस दुश्मनी ने एक दूसरे के परिवार को उजाड़ कर रख दिया। और अंत में उस अंग्रेज ने दोनों के घरों पर अधिकार कर लिया।

समय बदला, परिस्थिति बदल गयी लेकिन समस्या वहीं की वहीं है। ऊपर की कहानी में राम और श्याम भारत की जातियां हो सकती है, जो सामान्य तौर पर एक दूसरे के साथ आराम से रहती हैं। लेकिन वह अंग्रेज कोई भी हो सकता है। आज की मौजूदा स्थिति में वह अंग्रेज कुछ नेता हैं, जो जान बूझकर अपने राजनीतिक फायदे के लिए दो जातियों को आपस में लड़ाते हैं।

भारत में जातीय संघर्ष समय-समय पर होता रहता है। देश की आजादी से पहले भी, और आज भी लगभग भारत के हर राज्य में हो रहे हैं। लेकिन अब इनका रूप समाजिक ना होकर राजनीतिक हो गया है, जैसा कि कोरेगांव में हुआ।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार हर साल की तरह कोरेगांव में कुछ दलित संगठन अपना शौर्य दिवस मानाने के लिए जमा हुए थे। वहां कुछ तथाकथित दलित नेताओं ने अन्य जातियों के खिलाफ अभद्र टिप्पणियां कीं, जिससे लोग भड़क गए। वहां पर दिए जाने वाले भड़काऊ भाषण की परिणिति अगले दो दिनों में पूरे महाराष्ट्र में देखने को मिली। जगह-जगह चक्का जाम, पथराव, हिंसा, आगजनी, ट्रेनों की आवाजाही बाधित और हत्या।

हर बार की तरह भारत में प्रत्येक घटना के बाद बुद्धिजीवी, मीडिया और अन्य लोग इस हिंसा की अलग अलग व्याख्या कर रहे हैं। कुछ के अनुसार यह नव पेशवाओं के खिलाफ दलितों का आन्दोलन है और अन्य इसे भारत में दलितों की कम भागीदारी को कारण मान रहे हैं। लेकिन यहां कुछ विशेष छूटता जा रहा है और वह है, एक जाति का दूसरी जाति के प्रति घृणा की भावना का घर कर जाना। ऐसा बहुत समय से हुआ है, देश की आज़ादी के पहले से।

भारत की आज़ादी से पहले का इतिहास भारत में एक दूसरे को लड़ाने के लिए ही पढ़ाया जाता है। बच्चा प्राचीन इतिहास में यह पढ़ता है की आर्य भारत के बाहर से आये थे, उन्होंने अन्य जातियों को मार पीटकर भगा दिया। जो सवर्ण है वह आर्यों के वंशज हैं और जो दलित हैं वह अनार्य हैं और भारत के मूल निवासी। जब कोई बच्चा यह पढ़ता है तो उसके मन में सवर्णों के प्रति घृणा उत्पन्न होती है। समय के साथ साथ वो घृणा और बलवती होती जाती है, जो कुछ अवसरवादी नेताओं के उकसावे पर फूट पड़ती है। उसके बाद क्रिया प्रतिक्रिया का दौर प्रारंभ होता है।

हमारा इतिहास का पाठ्यक्रम आज भी वही है जो अंग्रेजों के समय था, कुछ तारीखें और नाम जरुर बढ़ गए हैं लेकिन मूलतः विषय सूची वही है। और यही समस्या का कारण है।

हम सबको यह हमेशा याद रखना चाहिए की राजतंत्र हो या प्रजातंत्र सत्ता सिर्फ मुट्ठी भर लोगों के पास ही होती है। अन्य सभी लोग सामान्य होते है। भले ही हम आज राजनैतिक रूप से आज़ाद है, किन्तु हमारा इतिहास आज भी अंग्रेजों के पास गिरवी है। हम आज भी अपने बच्चों को अंग्रेजों द्वारा लिखे गए इतिहास को पढ़ाते है, जिसका मूल उद्देश्य यही है की फूट डालो और राज करो। जब तक हम अपने इतिहास के विषय सूचि का सुधार न कर लें, और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने योग्य इतिहास ना पढ़ायें तब तक भारत में ऐसे ही जातीय हिंसा होती रहेगी। राजनेता जातीय हिंसा की आग पर वोटों की रोटियां सकते रहेंगे। जब तक इतिहास की लगाई आग हम इतिहास के द्वारा शांत नहीं करते, कुछ नहीं बदलेगा। तत्कालीन कारण बदल सकते हैं लेकिन मूल कारण यही होगा।

प्रसिध्द दार्शनिक हीगल ने ठीक ही कहा है कि हम इतिहास से यह सीखते है कि हम इतिहास से कुछ नहीं सीखते। भारत पर यह बात पूरी तो नहीं पर कुछ मामलों में ठीक बैठती है।

(लेखक अनूप झा अर्थशास्त्र  के छात्र हैं साथ ही राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं। व्यक्त विचार निजी हैं, चौपाल से कोई संबंध नहीं)

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