संविधान

संविधान और 'मैं' से 'हम'

राजनीति एक दिलचस्प चीज है। ये सब में है, सबकी है और सबसे है। इसके बावजूद अक्सर ये ताने सुनती है। गुनाह हम बुनते हैं, इल्जाम राजनीति पर आ चिपटता है। जैसे ही ‘मैं’, ‘हम’ में तब्दील होता है, राजनीति का क्षेत्र शुरू हो जाता है। यूपी-बिहार में ‘मैं’ कम ‘हम’ ज्यादा बोला जाता है,
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विक्रम-बेताल: अनिवार्य मतदान एक कर्त्तव्य हो या नहीं?

विक्रम और बेताल की कहानियां हम सबने सुनी हैं। इस कथा के अनुसार राजा विक्रमादित्य एक तांत्रिक की इच्छा पूर्ण करने के लिए एक पेड़ पर लटके हुए बेताल को पकड़ने की जिम्मेदारी लेते हैं। बेताल राजा के सामने एक शर्त रखता है। वह राजा से एक सवाल पूछेगा। अगर राजा उसका जवाब जानते हुए
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समान नागरिक संहिता का ब्लू प्रिंट

—तुफैल अहमद (@TufailElif)) भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 सरकारों को निर्देश देता है “राज्य अपनी सीमा में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून बनाएगा” लेकिन संविधान लागू होने, यानि 26 जनवरी 1950 से लेकर आज तक किसी भी राजनैतिक पार्टी ने अल्पसंख्यकों खासकर मुस्लिम वोट छिटकने के डर से समान नागरिक संहिता
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