अमेरिकी चुनाव की अक्कड़-बक्कड़

–यशवंत देशमुख (@YRDeshmukh) तो इस प्रकार डोनाल्ड ने अपना ‘प्राइमरी’ चुनाव जीत लिया है. क्या कहा? हिलेरी क्लिंटन भी चुनाव जीत गई हैं? ठीक है. समझ गया. दोनों चुनाव जीत गए हैं. लेकिन कैसे? दोनों चुनाव जीत जाएं, ये कैसे संभव है? अरे भैया… चुनाव तो कोई एक ही जीत सकता है न? अगर दोनों
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राज्यसभा चुनावों की अक्कड़-बक्कड़

–यशवंत देशमुख (@YRDeshmukh) हमने अपनी लोकतांत्रिक प्रणाली इंग्लैंड की ‘वेस्टमिंस्टर’ मॉडल पर चुनी है जिसमें निचले सदन यानी लोकसभा का चुनाव “फर्स्ट पास्ट द पोस्ट” की प्रक्रिया के तहत होता है. इस प्रणाली में जो सबसे ज्यादा वोट पाता है वही सिकंदर कहलाता है. अपने प्रतिनिधियों को चुनने को यह तरीका दुनिया में सबसे सरल
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जलता उत्तराखण्ड

–डॉ. अनिल प्रकाश जोशी एक बार फिर जंगल की आग ने उत्तराखण्ड को बड़ी मार कर दी। जंगल तो खाक हुए ही हुए हैं पर अबकी बार आग बुझाने में कई स्थानीय लोगो की भी बलि चढ़ गयी। इस बार की आग मात्र जगलों के लिए ही भारी नहीं पड़ी बल्कि अबकी बार दावानल (जंगल
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गांधी का आज का चंपारण

–विश्वजीत मुखर्जी इस साल गणतंत्र दिवस की परेड में राजपथ पर बिहार की झांकी काफी अलग और आकर्षक दिख रही थी। झांकी में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का वह अध्याय दर्शाया गया जिसने मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा बना दिया। मैं बात कर रहा हूं चंपारण सत्याग्रह की। अंग्रेज़ों द्वारा नील किसानों पर जबरन
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न्यायालयों में लंबित मामलेः न्यायपालिका को आत्मावलोकन की जरूरत

–ब्रजकिशोर शर्मा मुख्यमंत्री और न्यायाधीशों के सम्मेलन में मुख्य न्यायमूर्ति ने जिस तरह काम के दवाब की चर्चा की और न्यायाधीशों की कम संख्या पर प्रधानमंत्री से इसके लिए भावनात्मक अपील की, उससे लगता है कि न्यायपालिका में इस समय सबसे बड़ी समस्या न्यायाधीशों की कम संख्या को लेकर ही है. न्यायाधीशों की संख्या कम
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जाति-उन्मूलनः अंबेडकर और सावरकर क्या पूरक हैं?

–श्रीप्रकाश सिंह बाबा साहब डॉ. भीम राव अंबेडकर और वीर सावरकर दोनों ही महान राष्ट्रवादी स्वतंत्रता सेनानी और इतिहास पुरुष हैं. ऐसे महापुरुष न तो किसी एक राजनैतिक पार्टी के हो सकते हैं और न ही किसी खास जाति विशेष के. उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्र के जीवन में जो भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है
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“जिहाद और इस्लामी-फासीवाद से सख़्ती से निपटने की जरुरत”

–तारेक फ़तह (@TarekFateh) देखिए साहब, धर्मों में सुधार की बातें तब होती हैं जब धर्म-प्रमुख देशों को चलाते हैं. अब यहां न तो संयुक्त राज्य अमेरिका को कोई पोप चला रहे हैं और न ही भारत को कोई पंडित. ये वो समय नहीं है जब किसी धर्म में सुधार किया जाए या हम सुधार के
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–डॉ. आद्य प्रसाद पाण्डेय (@APPandey13) आर्थिक सर्वेक्षण ने साफ किया कि असमानता के मामले में भारत और अमेरिका लगभग एक ही स्तर पर हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी कहते हैं कि “असमानता कम करने का एक जरिया यह है कि अमीरों के उपभोग के सामानों  को बढ़ावा न दिया जाए” शायद बजट में इस बार
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–डॉ. डेविड फ्रावली (@DavidFrawlyVed) “एक देश के रुप में भारत के लिए, ऐसे संगठनों और इनके वाहियात तर्कों को नज़रअंदाज़ कर अपनी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं को अंगीकार करना ही ठीक है. और उसे ऐसा करना भी चाहिए” अगर कोई व्यक्ति भारतीय प्रेस और मीडिया में फासीवाद के आरोप की पड़ताल करे तो वह पाएगा
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लक्ष्मण रेखा त्रेता में जाकर कहना है लक्ष्मण से तुम्हारी खींची रेखा आज भी जीवित है. उसका जीवन अनंत है वो खिंचती चली आ रही है सदियों से. लेकिन जब भी उसे देखा है अपनी धूरी में पाया है. वो जीवित है. सांस लेती है मेरे साथ… कभी माथे की भरी मांग की तरह तो कभी
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