समान नागरिक संहिता का ब्लू प्रिंट

—तुफैल अहमद (@TufailElif)) भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 सरकारों को निर्देश देता है “राज्य अपनी सीमा में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून बनाएगा” लेकिन संविधान लागू होने, यानि 26 जनवरी 1950 से लेकर आज तक किसी भी राजनैतिक पार्टी ने अल्पसंख्यकों खासकर मुस्लिम वोट छिटकने के डर से समान नागरिक संहिता
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रेल हादसों की तमाम जांच रिर्पोटों से क्या हासिल होगा?

– संजय मेहता (@JournalistMehta) हमारे देश की सबसे बड़ी सार्वजनिक परिवहन सेवा भारतीय रेलवे है। लाखों – करोड़ों लोग प्रत्येक दिन इससे सफर करते हैं। इतनी बड़ी जिम्मेवारी के बावजूद भी यात्रियों की सुरक्षा को लेकर भारतीय रेलवे गंभीर नहीं नजर आता। बार – बार हादसे हो रहे हैं। हम लगातार एक ही गलती की
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नोटबंदी के साथ कुछ और कदम उठाए सरकार

– शशांक पाठक (@_ShashankPathak) नोट बंदी के फैसले के बाद से अब तक जो भी ख़बरें आईं हैं वे सब दो तरह की तस्वीरें बयां कर रही हैं। हालांकि प्रधानमंत्री ने देशवासियों से पचास दिन का समय मांगा है, साथ मांगा है और जब देश के प्रधानमंत्री ऐसा कहें तो उनके फैसले पर भरोसा करना
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कृषि पर कर से किसानों की आय हो सकती है दोगुनी

–केदार सिरोही  (@KedarSirohi) “कार्पोरेट के किसान खेती से होने वाली आय की आड़ में कालेधन की फसल को सफ़ेद धन की उपज बना रहे हैं।” “आयकर 1961 के सेक्शन 10 (1) में कृषि आय को छूट दी गई है जिसके कारण कुछ लोग 10 नंबर की आय को 1 नंबर में कर रहे है” देश
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चर्चा के चबूतरे पर अन्ना हजारे

अन्ना जी आपके जीवन पर अब एक पूरी फिल्म आ चुकी है. कभी आपने (संघर्ष के आरंभिक दिनों में) सोचा था कि आपका जीवन एक दिन इतना महत्वपूर्ण और दूसरों के लिए प्रेरणादायी हो जाएगा जो पूरी फिल्म बन जाए? नहीं मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरे जीवन पर फिल्म बनेगी. एक
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किसान और कृषि के नज़रिए से 500 और 1000 के नोट

–केदार सिरोही  (@KedarSirohi) सैद्धांतिक रूप से यह बात सही लगती है कि पुराने नोट हटाकर आप नए नोट चलन में लाएं तो अर्थव्यवस्था से कालाधन निकाल सकते हैं लेकिन हिंदुस्तान एक जटिल अर्थव्यवस्था है जहां छोटे कारोबारी हैं, गांव में किसान और मजदूर लोग हैं, उनका क्या होगा. बैंकिंग व्यवस्था बेहद कमजोर है जिसके कारण 
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यूपी में जाति और मतों का चक्रव्यूह

–शिवांगिनी पाठक (@ShivanginiPatha) गुजरने वाला समय मानव के सही या गलत, अच्छे या बुरे विचारों में निरंतर परिवर्तन का साक्षी रहा है: चक्रवर्ती राजगोपालाचारी युद्ध की आधुनिक परिभाषा में अब कुरुक्षेत्र युद्ध जैसा कुछ भी शेष नहीं रह गया है जहां देवदूत धर्म की प्रतिष्ठा, रक्षा की ख़ातिर राक्षसों को ललकारते थे। जहां युद्ध की
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जेएनयू में उदारता का मुखौटा लगाए है वामपंथ

  विश्वविद्यालय के वर्तमान घटनाक्रम ने “लाल आतंक” के चेहरे को उजागर किया है योगेंद्र भारद्वाज आज जेएनयू  (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) का माहौल लगातार कुछ शरारती तत्त्वों के द्वारा बिगाडने की कोशिश की जा रही है और साथ ही बदनाम करने की भी कोशिश में कुछ लोग लगे हुये हैं, जो वास्तव में निन्दनीय है।14 अक्तूबर
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बलूचिस्तान के ऐतिहासिक संदर्भ और उसके संघर्ष के मायनों को समझिए: मज़दाक दिलशाद बलूच

एक लंबे अरसे से अपनी आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे बलूचिस्तान और इसके लोगों में उस समय एक नई ऊर्जा का संचार हो गया जब इस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बलूचिस्तान की जनता को धन्यवाद दिया. एक राष्ट्र के तौर पर बलूचिस्तान पाकिस्तान से अलग
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मेरी आपबीती: इस्लामिक स्टेट के चंगुल से निकलीं नादिया मुराद

‘नादिया मुराद बासी ताहा’ इराक़ के उत्तरी इलाके में बसे सिंजार की मूल निवासी हैं. नादिया मुराद की कहानी अपने आप में एक उदाहरण है उन लोगों के लिए जिन्होंने सब कुछ खोने के बाद भी संघर्ष करना नहीं छोड़ा. अगस्त 2014 में इस्लामिक स्टेट द्वारा बंधक बनाई गईं नादिया अदम्य साहस दिखाते हुए आज
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