विविध/Miscellaneous

छूटे लोगों को साथ लेने का संकल्प ही राष्ट्र निर्माण है

आज पूरे देश को विश्वास हो रहा है कि हम तरक्की की राह में बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं। यह बात सच भी है कि हमारा देश ज्ञान-विज्ञान तथा तकनीक के मामले में अन्य देशों के साथ प्रतिस्पर्धा में है लेकिन क्या हम सचमुच तरक्की की दौड़ में आगे चल रहे राष्ट्रों की
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जयंती विशेष-14 साल में 'राज' की राइफ़लों से भरी बैलगाड़ी लूटने वाले 'लम्बोदर मुखर्जी'

ज़िंदगी में स्वतंत्रता सबसे महत्वपूर्ण होती है या यूँ कह लें, स्वाधीनता जीवन का मूल अर्थ है। मगर हमारे देश का इतिहास दो सौ सालों की पराधीन दासता को बयां करता है। साल 1947 में हमारा भारत देश दो सदियों की गुलामी की जंजीरों से आज़ाद हुआ। उस वर्ष 15 अगस्त वह दिन था जब
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गांधी का आज का चंपारण

–विश्वजीत मुखर्जी इस साल गणतंत्र दिवस की परेड में राजपथ पर बिहार की झांकी काफी अलग और आकर्षक दिख रही थी। झांकी में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का वह अध्याय दर्शाया गया जिसने मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा बना दिया। मैं बात कर रहा हूं चंपारण सत्याग्रह की। अंग्रेज़ों द्वारा नील किसानों पर जबरन
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न्यायालयों में लंबित मामलेः न्यायपालिका को आत्मावलोकन की जरूरत

–ब्रजकिशोर शर्मा मुख्यमंत्री और न्यायाधीशों के सम्मेलन में मुख्य न्यायमूर्ति ने जिस तरह काम के दवाब की चर्चा की और न्यायाधीशों की कम संख्या पर प्रधानमंत्री से इसके लिए भावनात्मक अपील की, उससे लगता है कि न्यायपालिका में इस समय सबसे बड़ी समस्या न्यायाधीशों की कम संख्या को लेकर ही है. न्यायाधीशों की संख्या कम
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–डॉ. आद्य प्रसाद पाण्डेय (@APPandey13) आर्थिक सर्वेक्षण ने साफ किया कि असमानता के मामले में भारत और अमेरिका लगभग एक ही स्तर पर हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी कहते हैं कि “असमानता कम करने का एक जरिया यह है कि अमीरों के उपभोग के सामानों  को बढ़ावा न दिया जाए” शायद बजट में इस बार
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क्या नेताजी की मौत पर प्रणब मुखर्जी ने उनकी पत्नी को गुमराह किया?

–अनुज धर (@AnujDhar) पिछले महीने की 23 तारीख़ को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सार्वजनिक की गईं नेताजी से जुडी 100 फाइलें कुछ ऐसा ही कहती हैं. नेताजी की मृत्यु से जुड़ी  सार्वजनिक की गई इन 100 फाइलें में एक ऐसा “अति गोपनीय मेमोरेण्डम” भी  है जो तत्कालीन विदेश मंत्री और वर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा लिखा
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