लोकतांत्रिक रंग/Democratic Colors

जेएनयू: एक संस्थान का पथभ्रष्टता से कलंकित हो जाना

–संदीप महापात्रा (@SdeepMahapatra) मेरे और मेरे जैसे तमाम लोगों के लिए 9 फरवरी की घटना कोई अनोखी नहीं है. जो इस विश्वविद्यालय से जुड़े रहे हैं वे अच्छी तरह जानते हैं कि कैंपस में ऐसे कार्य होते रहते हैं.  जरा याद कीजिए- 90 के मध्य का वह समय जब कैंपस में शहाबुद्दीन गौरी नाम का एक
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"जय और ज़िंदाबाद" के बीच का जेएनयू

जेएनयू में जारी राष्ट्रवादी और राष्ट्रद्रोही की बहस के बीच ऐसे भी हैं जिनकी आवाज़ सुनी जानी चाहिए … एक बार फिर मेरा फ़ोन बज उठा, पिछले कुछ दिनों से, हर बार की तरह इस बार भी यह किसी शुभचिंतक का फ़ोन मेरा हाल-चाल पूछने को नहीं आया बल्कि सवाल वही था जो शायद यहाँ
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