लोकतांत्रिक रंग/Democratic Colors

“जिहाद और इस्लामी-फासीवाद से सख़्ती से निपटने की जरुरत”

–तारेक फ़तह (@TarekFateh) देखिए साहब, धर्मों में सुधार की बातें तब होती हैं जब धर्म-प्रमुख देशों को चलाते हैं. अब यहां न तो संयुक्त राज्य अमेरिका को कोई पोप चला रहे हैं और न ही भारत को कोई पंडित. ये वो समय नहीं है जब किसी धर्म में सुधार किया जाए या हम सुधार के
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–डॉ. डेविड फ्रावली (@DavidFrawlyVed) “एक देश के रुप में भारत के लिए, ऐसे संगठनों और इनके वाहियात तर्कों को नज़रअंदाज़ कर अपनी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं को अंगीकार करना ही ठीक है. और उसे ऐसा करना भी चाहिए” अगर कोई व्यक्ति भारतीय प्रेस और मीडिया में फासीवाद के आरोप की पड़ताल करे तो वह पाएगा
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  –यशवंत देशमुख (@YRDeshmukh) मैंने आपका यस, आई एम एंटी-नेशनल नामक दमदार ब्लॉग पढ़ा. बड़े कायदे से आपने अपनी बात रखी है. इसको पढ़ते हुए मैंने अपने-आप को हर उस बात का समर्थन करते पाया जिसका आपने इसमें जिक्र किया. चूंकि मैं भी अपने को राष्ट्रवादी मानता हूँ अतः मुझे लगता है कि आपने जिस
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–मंजीत ठाकुर (@Manjit2007) रोहित वेमुला का किस्सा खत्म न होने पाया था कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में एक नया बवाल खड़ा हो गया. इस विवाद की ज्यादा जड़ में न जाते हुए बस इतना समझा जाए कि छात्रों के एक समूह ने वहां पर भारत विरोधी नारे लगाए और अफ़ज़ल गुरू की मौत का
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जेएनयू: एक संस्थान का पथभ्रष्टता से कलंकित हो जाना

–संदीप महापात्रा (@SdeepMahapatra) मेरे और मेरे जैसे तमाम लोगों के लिए 9 फरवरी की घटना कोई अनोखी नहीं है. जो इस विश्वविद्यालय से जुड़े रहे हैं वे अच्छी तरह जानते हैं कि कैंपस में ऐसे कार्य होते रहते हैं.  जरा याद कीजिए- 90 के मध्य का वह समय जब कैंपस में शहाबुद्दीन गौरी नाम का एक
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"जय और ज़िंदाबाद" के बीच का जेएनयू

जेएनयू में जारी राष्ट्रवादी और राष्ट्रद्रोही की बहस के बीच ऐसे भी हैं जिनकी आवाज़ सुनी जानी चाहिए … एक बार फिर मेरा फ़ोन बज उठा, पिछले कुछ दिनों से, हर बार की तरह इस बार भी यह किसी शुभचिंतक का फ़ोन मेरा हाल-चाल पूछने को नहीं आया बल्कि सवाल वही था जो शायद यहाँ
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