लोकतांत्रिक रंग/Democratic Colors

विलोम का विराट बन जाना

-सत्येंद्र रंजन  (@SRanjan19) ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो जयललिता जयराम द्रविड़ राजनीति का विलोम थीं। बीसवीं सदी के आरंभ के साथ आगे बढ़े द्रविड़ आंदोलन का मूल स्वर ब्राह्मणवाद विरोधी था। इसने हिंदी विरोधी तेवर अपनाया। तमिल भाषा और संस्कृति के गौरव पर जोर दिया। ई.वी. रामास्वामी नायकर पेरियार, सी.एन, अन्ना दुरै, एम करुणानिधि और
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समान नागरिक संहिता का ब्लू प्रिंट

—तुफैल अहमद (@TufailElif)) भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 सरकारों को निर्देश देता है “राज्य अपनी सीमा में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून बनाएगा” लेकिन संविधान लागू होने, यानि 26 जनवरी 1950 से लेकर आज तक किसी भी राजनैतिक पार्टी ने अल्पसंख्यकों खासकर मुस्लिम वोट छिटकने के डर से समान नागरिक संहिता
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रेल हादसों की तमाम जांच रिर्पोटों से क्या हासिल होगा?

– संजय मेहता (@JournalistMehta) हमारे देश की सबसे बड़ी सार्वजनिक परिवहन सेवा भारतीय रेलवे है। लाखों – करोड़ों लोग प्रत्येक दिन इससे सफर करते हैं। इतनी बड़ी जिम्मेवारी के बावजूद भी यात्रियों की सुरक्षा को लेकर भारतीय रेलवे गंभीर नहीं नजर आता। बार – बार हादसे हो रहे हैं। हम लगातार एक ही गलती की
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नोटबंदी के साथ कुछ और कदम उठाए सरकार

– शशांक पाठक (@_ShashankPathak) नोट बंदी के फैसले के बाद से अब तक जो भी ख़बरें आईं हैं वे सब दो तरह की तस्वीरें बयां कर रही हैं। हालांकि प्रधानमंत्री ने देशवासियों से पचास दिन का समय मांगा है, साथ मांगा है और जब देश के प्रधानमंत्री ऐसा कहें तो उनके फैसले पर भरोसा करना
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यूपी में जाति और मतों का चक्रव्यूह

–शिवांगिनी पाठक (@ShivanginiPatha) गुजरने वाला समय मानव के सही या गलत, अच्छे या बुरे विचारों में निरंतर परिवर्तन का साक्षी रहा है: चक्रवर्ती राजगोपालाचारी युद्ध की आधुनिक परिभाषा में अब कुरुक्षेत्र युद्ध जैसा कुछ भी शेष नहीं रह गया है जहां देवदूत धर्म की प्रतिष्ठा, रक्षा की ख़ातिर राक्षसों को ललकारते थे। जहां युद्ध की
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जेएनयू में उदारता का मुखौटा लगाए है वामपंथ

  विश्वविद्यालय के वर्तमान घटनाक्रम ने “लाल आतंक” के चेहरे को उजागर किया है योगेंद्र भारद्वाज आज जेएनयू  (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) का माहौल लगातार कुछ शरारती तत्त्वों के द्वारा बिगाडने की कोशिश की जा रही है और साथ ही बदनाम करने की भी कोशिश में कुछ लोग लगे हुये हैं, जो वास्तव में निन्दनीय है।14 अक्तूबर
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राज्यसभा चुनावों की अक्कड़-बक्कड़

–यशवंत देशमुख (@YRDeshmukh) हमने अपनी लोकतांत्रिक प्रणाली इंग्लैंड की ‘वेस्टमिंस्टर’ मॉडल पर चुनी है जिसमें निचले सदन यानी लोकसभा का चुनाव “फर्स्ट पास्ट द पोस्ट” की प्रक्रिया के तहत होता है. इस प्रणाली में जो सबसे ज्यादा वोट पाता है वही सिकंदर कहलाता है. अपने प्रतिनिधियों को चुनने को यह तरीका दुनिया में सबसे सरल
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जाति-उन्मूलनः अंबेडकर और सावरकर क्या पूरक हैं?

–श्रीप्रकाश सिंह बाबा साहब डॉ. भीम राव अंबेडकर और वीर सावरकर दोनों ही महान राष्ट्रवादी स्वतंत्रता सेनानी और इतिहास पुरुष हैं. ऐसे महापुरुष न तो किसी एक राजनैतिक पार्टी के हो सकते हैं और न ही किसी खास जाति विशेष के. उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्र के जीवन में जो भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है
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“जिहाद और इस्लामी-फासीवाद से सख़्ती से निपटने की जरुरत”

–तारेक फ़तह (@TarekFateh) देखिए साहब, धर्मों में सुधार की बातें तब होती हैं जब धर्म-प्रमुख देशों को चलाते हैं. अब यहां न तो संयुक्त राज्य अमेरिका को कोई पोप चला रहे हैं और न ही भारत को कोई पंडित. ये वो समय नहीं है जब किसी धर्म में सुधार किया जाए या हम सुधार के
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–डॉ. डेविड फ्रावली (@DavidFrawlyVed) “एक देश के रुप में भारत के लिए, ऐसे संगठनों और इनके वाहियात तर्कों को नज़रअंदाज़ कर अपनी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं को अंगीकार करना ही ठीक है. और उसे ऐसा करना भी चाहिए” अगर कोई व्यक्ति भारतीय प्रेस और मीडिया में फासीवाद के आरोप की पड़ताल करे तो वह पाएगा
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