लोकतांत्रिक रंग/Democratic Colors

यह पन्ना राजनीतिक दलों के लिए है. वे आएं और अपने विचार लिखें.

विक्रम-बेताल: भाजपा यशस्वी क्यों है?

पिछली कड़ी में अनिवार्य मतदान एक कर्त्तव्य हो या नहीं, इस बात का राजा विक्रम सही जवाब दे देते हैं और शर्त के अनुसार बेताल पुन: पेड़ पर लटक जाता है। हर बार की तरह राजा ने भी हार नहीं मानी, और उसे पेड़ से उतार कर अपने कंधों पर लाद कर मंदिर की तरफ
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चुनाव: बहिष्कार से विकास की आस

__अमित (AmitBharteey) अगर आपकी राजनीति में रुचि हैं और इससे संबंधित ठीक-ठाक सामग्री पढ़ते रहते हैं तो आपने कई विद्वानों को ये कहते पाया होगा कि गरीबों का, अंतिम-जन का सबसे आख़िरी और कारगर उपाय उसका अपना मत होता है। जब चुनी गईं सरकारें और प्रतिनिधि पाँच साल (या निर्धारित कार्यकाल) में उसकी अपेक्षाओं के
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विक्रम-बेताल: अनिवार्य मतदान एक कर्त्तव्य हो या नहीं?

विक्रम और बेताल की कहानियां हम सबने सुनी हैं। इस कथा के अनुसार राजा विक्रमादित्य एक तांत्रिक की इच्छा पूर्ण करने के लिए एक पेड़ पर लटके हुए बेताल को पकड़ने की जिम्मेदारी लेते हैं। बेताल राजा के सामने एक शर्त रखता है। वह राजा से एक सवाल पूछेगा। अगर राजा उसका जवाब जानते हुए
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केरल का लाल आतंक

भारत के सर्वाधिक साक्षर राज्य का दर्जा केरल को प्राप्त है। भारत की साक्षरता दर जहाँ 74 के आसपास है, वहीं केरल में यही 92 तक जाती है। गर्व होता है भारत को अपना ऐसे साक्षर राज्य पर। साथ ही केरल की नर्सें, जो कि विश्वविख्यात हैं और संंभवतः भारत में लगभग प्रत्येक राज्य में
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प्रशांत किशोर और भारतीय राजनीति

– संजय मेहता (@JournalistMehta) भारतीय राजनीति के बदलते दौर में प्रशांत किशोर एक जाना पहचाना नाम है। उन्होंने भारतीय राजनीति को नए अर्थों में गढ़ा है। कहा जाता है कि राजनीति में न कोई स्थायी दोस्त है और न स्थायी दुश्मन। राजनीति की पहली और आखिरी शर्त है कि किसी पर विश्वास मत करो क्योंकि राजनीति
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कांग्रेस: जो हौद से गयी सो बूंद से नहीं आती

– अनिरुद्ध जोशी बचपन में मेरी चाची ने एक कहानी सुनायी थी। अकबर और बीरबल की कहानी। एक बार बादशाह अकबर एक कीमती अरबी इत्र की खुशबू ले रहे थे। अचानक उस इत्र की कुछ बूंदें कालीन पर छलक कर गिर गयी। बादशाह ने तुरंत झुक कर उस गिरे  इत्र को  उँगलियों से चुन कर सूंघने
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नोटबंदी-50 दिनों की उम्मीद

–यशवंत देशमुख (@YRDeshmukh)                                          सी-वोटर का विस्तृत सर्वेक्षण नोटबंदी पर आम नागरिकों को होने वाली परेशानियों के बीच सी-वोटर ट्रैकर के हिसाब से विमुद्रीकरण का समर्थन तीसरे हफ्ते भी जारी है। इसके समर्थन में 85.77 फीसदी
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लोगों के दिलों पर राज करती थीं जयललिता

-संजय मेहता (@JournalistMehta)   आज के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में राजनीतिक दलों एवं नेताओं पर लोगों का अविश्वास बढ़ा है। अविश्वास के इस दौर में ऐसे बहुत कम नेता हुए जिन्होंने लोगों के दिलो को जीता। जयललिता के समर्थक जान देने को तैयार रहते थे। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि
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विलोम का विराट बन जाना

-सत्येंद्र रंजन  (@SRanjan19) ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो जयललिता जयराम द्रविड़ राजनीति का विलोम थीं। बीसवीं सदी के आरंभ के साथ आगे बढ़े द्रविड़ आंदोलन का मूल स्वर ब्राह्मणवाद विरोधी था। इसने हिंदी विरोधी तेवर अपनाया। तमिल भाषा और संस्कृति के गौरव पर जोर दिया। ई.वी. रामास्वामी नायकर पेरियार, सी.एन, अन्ना दुरै, एम करुणानिधि और
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समान नागरिक संहिता का ब्लू प्रिंट

—तुफैल अहमद (@TufailElif)) भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 सरकारों को निर्देश देता है “राज्य अपनी सीमा में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून बनाएगा” लेकिन संविधान लागू होने, यानि 26 जनवरी 1950 से लेकर आज तक किसी भी राजनैतिक पार्टी ने अल्पसंख्यकों खासकर मुस्लिम वोट छिटकने के डर से समान नागरिक संहिता
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