हिंदुत्व की बहुरंगी छटाएं

—तुफैल अहमद (@Tufailelif)

ज्ञान का असीमित भंडार, जीवन जीने का एक अनूठा तरीका और तमाम दृष्टियों से देखा जाने वाला हिंदुत्व आज कई चुनौतियों का सामना कर रहा है. ये चुनौतियां अंदर से भी और बाहर से भी. भारत सरकार में शहरी विकास मंत्री ने 21 जनवरी को सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर एक एक संदेश में लिखा “भारत के महान पुरुष स्वामी विवेकानंद को देखकर अभीभूत हूँ, जिन्होनें हिंदुत्व के संदेश को Hiइस संपूर्ण धरा पर फैलाया” वैंकया नायडू ने यह टिप्पणी कन्याकुमारी में विवेकानंद चट्टान भ्रमण के दौरान की थी. इस मायने में हिंदुत्व एक सार्वभौमिक जीवन दर्शन है जिसकी उद्घोषणा स्वामी जी ने सितंबर 1893 की शिकागो धर्म सभा में की थी. उस सर्वधर्म सभा में स्वामी विवेकानंद ने कहा था… हम सिर्फ सार्वभौमिक सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते बल्कि हमार मानना हैं कि सभी धर्म सत्य हैं. इसी साल की 15 जनवरी को अपने आपको को पुराना/गुजरा हुआ मार्क्सवादी कहने वाले प्रसिद्ध भारतीय इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने ट्विटर पर लिखा “मैं हिंदू हूँ और इस(धर्म) के विभिन्न आयामों को स्वीकार करता हूँ…(लेकिन) मैं हिंदुत्व और हिंदू धर्मांधता. को अस्वीकार करता हूँ” उसी दिन गुहा को सुधांशु एस.सिंह के रूप में एक जवाब देने वाला मिल गया. सुधांशु मानवीय विकास के क्षेत्र में काम करते हैं. उनके अनुसार “हिंदुत्व और हिदुइज़्म की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है. प्रायः लोग हिंदुत्व के नाम पर हिंदुइज़्म को भी गाली देने लगते हैं” संक्षिप्त रूप से कहा जाए तो हिंदुत्व ने एक जीवन दर्शन के रूप में, संस्कृतियों के समुच्चय के रूप में, सभ्यता, धर्म और आध्यात्म के रूप में भारतीय समाज में कई आयाम और विवादास्पद अर्थ ग्रहण कर लिए हैं. वास्तव में अंग्रेजी शब्द ‘हिंदुइज़्म’ अपने ‘इज़्म’ के कारण एक विचारधारा का एहसास कराता है जिस कारण यह शब्द अपने आप में अधूरा है. ‘हिंदुत्व’ भी ‘हिंदुइज़्म’ का पूरा/वास्तविक अनुवाद नहीं है इस कारण इससे भी एक तरह की विचारधारात्मक ध्वनि ही निकलती है. उदाहरण के लिए भारतीय जनता पार्टी की वेबसाइट imagesपर हिंदुत्व को एक विचाराधारात्मक रूप से लिया गया है जिसके अनुसार “हिंदुत्व का यह आंदोलन पूरे विश्व में भारत और हिंदुओं के लिए नए आयाम गढ़ रहा है” अतः यह महत्वहीन है कि सैधांतिक अर्थों में हिंदुत्व का क्या अर्थ निकाला जाए. परिणाम स्वरूप ये परिस्थितियों पर निर्भर करता है कि इसे कैसे देखा जाए. इसी आधार पर यहाँ हिंदुत्व के विभिन्न रंगों के बारे में चर्चा की गई हैं—

1-हिंदुत्व सार्वभौमिक जीवन दर्शन के रुप में– हिंदुत्व शब्द अब आरएसएस का पर्याय बन गया है. आरएसएस के लिए हिंदुत्व का वही अर्थ है जो विवेकानंद के अनुसार था यानि सार्वभौमिक जीवन दर्शन के रूप में. यह भारतीय शिक्षा, ज्ञान और यहाँ की संस्कृति को अपने आप में अनूठा मानता है. ऐसे में आरएसएस अपने को प्राचीन भारतीय मूल्यों का प्रतिनिधि, और उनको स्थापित करने वाला मानता है. दूसरे शब्दों में आरएसएस अपने आपको भारतीय विरासत का रक्षक मानता है. इस हिसाब से आरएसएस का अपना कोई एजेण्डा नहीं है बल्कि विविधता से परिपूर्ण भारतीय विरासत ही उसका एजेण्डा है. images (4)एकतरफ जहाँ आरएसएस हिंदुत्व को सार्वभौमिक जीवन दर्शन के रूप में लेता है तो वहीं इसके विरोधी इसे विभाजनकारी मानते हैं. ऐसा मानने वालों में मुख्यतया बाहरी देशों के वे मुस्लिम और ईसाई लोग शामिल हैं जो अपने आप को इससे असुरक्षित महसूस करते हैं. साथ में एक समस्या तभ भी होती है जब आरएसएस को इतने विशाल और विविध भारत का प्रतिनिधित्वकर्ता मान लिया जाता है. हालांकि आरएसएस के हिंदुत्ववादी दृष्टिकोण पूरे भारत की विविधता को अपने में समाहित करता है. परिणाम स्वरूप आरएसएस से सीधे न जुड़े होने पर भी अन्य संगठन अपने आप को इससे जुड़ा पाते हैं.

2-हिंदुत्व-पंथनिरपेक्ष जीवन के रुप में –हिंदुत्व का दूसरा अर्थ अपने आप में उस पहले दृष्टिकोण से ही जुड़ा है. यह जीवन को पंथनिरपेक्ष मानता है. इस परिप्रेक्ष्य में हिंदु संस्कृति को उसके धर्म से अलग करना संभव नहीं है. और हिंदुओं में धर्म का आशय जटिल धार्मिक बंधन न होकर है आध्यात्म से है. और इस आध्यात्म को आप प्रकृति से अलग नहीं कर सकते. उदाहरण के लिए हिंदू पेड़ों, नदियों, सांप, गाय और उन सभी को पूजते हैं जिनमें जीवन है. ऐतिहासिक रूप में, हिंदुत्व ऐसा है जिसमें आध्यात्म, संस्कृति और प्रकृति आदि को अलग नहीं किया जा सकता. images (3)घटनाओं के आधार पर इतिहास अपने आप का प्रतिनिधित्व करता है. अतः जैसे किसी मुल्क़ का इतिहास पंथनिरपेक्ष रहा है ठीक उसी प्रकार हिंदुत्व भी पंथनिरपेक्ष है. विख्यात वकील और राज्यसभा सांसद रामजेठमलानी ने अभी हाल ही में अपने एक लेख में 1995 में दिए गए सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी का उल्लेख किया है जिसमें हिंदुत्व को कुछ यूं परिभाषित किया गया है. “साधारणतया हिंदुत्व को जीवन दर्शन के रूप में अथवा स्टेट ऑफ माइंड के रूप में लिया है लेकिन इसे किसी भी रूप में धर्म या या इसके रुढ़िवादी स्वरुप से या किसी भी धार्मिक संस्थाओं से जोड़कर नहीं देखना चाहिए” ऐसा मानना बड़ी भारी भूल होगी… हिंदुत्व या हिंदुइज़्म शब्द का प्रयोग ऐसा दर्शाया जाता है कि मानो यह अन्य सभी धर्मों का दुश्मन हो” जेठमलानी के अनुसार “पूरे प्राचीन भारत में हिंदू शब्द का प्रयोग कभी भी धर्म के संदर्भ में नहीं हुआ. ‘हिंदु’ बाहरी शब्द है जिसे ब्रिटिशर्स ने धर्म के साथ जोड़ा” ये 1871 में पहली बार जनगणना में प्रयुक्त हुआ जिसमें मुस्लिम, ईसाई, बुद्ध और जैन के अलावा सभी को हिंदू माना गया.

3-हिंदुत्व-धार्मिक रुढ़िवादिता के रुप में- हिंदुत्व में विविधता के दो ऐसे आयाम है जिसे अधिकतर हिंदू स्वीकार करते हैं वे हैं सार्वभौमिक जीवन दर्शन और जीवन जीने का पंथ निरपेक्ष तरीका–यद्पि वास्तविक अनुभव के स्तर पर हम पाते हैं कि कुछ समूह ऐसे भी हैं जो दावा करते हैं कि वे हिंदू हैं और सहिष्णुता या विविधता की मान्यताओं से परे हैं. उदाहरण के रूप में सार्वजनिक जगहों पर युवा जोड़ों को वैलेंटाइन डे मनाने से रोकना. ऐसा करने वालों में हिंदू महासभा, बजरंग दल, शिव सेना, विश्व हिंदू परिषद आदि शामिल हैं. images (6)वास्तव अर्थों में देखा जाए तो इन्हें पूरी तरह से धर्म के रंग में नहीं रंगा जा सकता. बल्कि इनका दृष्टिकोण ज्यादा व्यापक है जो धर्म और संस्कृति को अपने आप में समाहित करता है. हालांकि उन्होनें हिंदुत्व की सार्भौमिक आध्यात्म धारणा को भी एक धर्म तक सीमित कर दिया है. इन हिंदू संगठनों ने एक प्रकार की असुरक्षा की भावना को जन्म दिया है जो इस तथ्य पर आधारित है कि भारत पर कई बार आक्रमण हुए और बार-बार इसे लूटा गया लेकिन यहां के निवासी कभी भी किसी दूसरे देश को लूटने-खसोटने बाहर नहीं गए. पूर्व राष्ट्रपति और हमारे मिसाइल कार्यक्रम के जनक भारत रत्न डॉ. कलाम साहब के शब्दों में “तीन हज़ार साल के हमारे इतिहास में दुनिया भर से आए लोगों ने हम पर आक्रमण किए, हमें लूटा, हमारी मातृभूमि को हथियाया, हमारे मस्तिकों पर राज किया सिकंदर से लेकर ग्रीक, पुर्तगाली, अंग्रेज, फ्रांसिसी, डच… जो कुछ हमारा था उसे लूट कर अपना बनाया. लेकिन हमने किसी दूसरे देश के साथ ऐसा नहीं किया. हमने किसी को नहीं जीता. इस दृष्टि से देखें तो इन संगठनों की चिंता के पीछे ठोस कारण हैं. भले ही वे हिंदुत्व के संदेश से भटक गए हों.

4-हिंदुत्व-एक जिहाद के रुप में- पिछले कुछ समय से हिंदुओं के कुछ संगठन की हिंसात्मक गतिविधियों में लिप्तता पाई गई है. 24 जनवरी 2009 को मंगलौर के एक पब में श्रीराम सेना के प्रमोद मुतालिक ने कुछ लड़कियों महिलाओं पर ये कहते हुए हमला कर दिया कि “पब/नाईट पार्टियों में जाना हिंदू संस्कृति और इसकी मान्यताओं के खिलाफ है. मुतालिक के अनुसार पब में महिलाएं नशे का सेवन करती हैं, वे निर्लज्ता में लिप्त होती हैं. अगर हमारी बहनों ने भी ये सब किया होता, तब भी हम ऐसा ही करते. इस दौरान देश में कुछ आतंकी हमले भी हुए जिसमें मुस्लिमों को आरोपी बनाया गया लेकिन लगता नहीं कि हमले मुस्लिमों द्वारा किए गए थे लेकिन फिर भी आरोप मुस्लिमों पर ही लगे. images (5)इन सब हमलों में उस अभिनव भारत नामक संगठन की लिप्तता पाई गई जो अभिनव भारत हिंदु राष्ट्र को अपना आदर्श मानता है. ऐसे संगठनों के लिए हिंदुत्व ठीक उसी तरह शस्त्रागार सहिंता का प्रतिनिधित्व करता है जिस प्रकार इस्लामी दुनिया में जिहादी संगठन करते हैं. उदाहरण के लिए केंद्र और राज्य में भाजपा के साथ सत्ता की साझीदार शिवसेना तो इस हद तक चली गई कि वह हिंदुओं में भी आत्मघाती दस्ते की वक़ालत करने लगी. जून 2008 में अपने पार्टी मुखपत्र सामना में लिए एक संपादकीय के मुताबिक़ “हिंदुस्तान में इस्लामी आतंक तेजी से अपने पैर पसार रहा है. राष्ट्र की रक्षा के लिए ये जरूरी हो गया है कि हिंदुओं में भी उसी स्तर चरमपंथ हो अतः इससे निपटने के लिए हिंदुओं में भी आत्मघाती दस्ते होने चाहिए. 15 अगस्त 2015 को शिवसेना ने अपने इस रुख को फिर से दोहराया- हिंदुओं को इस देश में गर्व से रहने में सक्षम होना चाहिए. हिंदुओं की आवाज़ सिंह गर्जना के समान होनी चाहिए. अगर हमें पाक प्रायोजित आतंकवाद का जवाब देना है तो हिंदुओं को भी और अधिक धार्मिक बनना पड़ेगा. पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने के लिए हमें भी आत्मघाती दस्ते बनाने होंगे”

5-हिंदुत्व-गतिशील जीवन के रुप में- हिंदुत्व अदभुत रूप से विविध है. यहाँ नदियां, पेड़-पौधों, सांप, स्त्री-पुरुष, सूरज और हर उस चीज को पूजा जाता है जिसका उपयोग किया जा सकता है, जिसमें जीवन है. दिल्ली में एक मंदिर शनि (ग्रह) को समर्पित है. सही अर्थों में हिदुत्व इतना गतिशील है जो हर बदलाव को स्वीकार करने को तैयार रहता है. उदाहरण के लिए बिहार में क्रिकेटर सचिन तेदुलकर के नाम भी एक मंदिर बना दिया गया! ठीक ऐसे ही अमिताभ बच्चन के प्रशंसकों ने बंगाल में उनके नाम का मंदिर बना डाला! भारतीय पुनर्जागरण के अग्रज राजा राम मोहन राय ने जाति प्रथा की आलोचना की और इस संबंध में लिखी गई पवित्र माने जाने वाली मनुस्मृति को ही नकार दिया. ये कुछ ऐसे तथ्य हैं जिन्हें देखकर लगता है कि जल्द ही भारतीय समाज ट्रांसजेंडर समुदाय को भी स्वीकार कर लेगा. अमेरिकी मूल के विख्यात भारतविद् और पदमभूषण से सम्मानित डॉ. डेविड फ्रावली ने हाल ही में कहा है “हिंदुत्व बड़ी आसानी से अपने को विविधता में ढाल लेता है ठीक वैसे ही जैसे की आज की लोकतंत्रिक परंपराओं में देखा जाता है”. हिंदुओं द्वारा लोकतांत्रिक पद्ति को अपनाना अपने आप में अद्वितीय है. ऐसा इस्लामी दुनिया में नहीं दिखाई देता. इस (प्रक्रिया)ने बहुसंख्यकों के सशक्तिकरण में एक अहम भूमिका अदा की है. लोकतंत्र के प्रति हिंदुत्व की स्वीकार्यता के कारण ही अब लाखों की संख्या में पिछड़ी जातियों से आने वाले लोग बाराबर के हकदार हैं. यह सब हिंदुत्व द्वारा समय के साथ जीवन दर्शन में होने वाले परिवर्तनों को स्वीकार करने के कारण ही संभव हुआ है. इसी का परिणाम है कि आज लाखों महिलाएं पंचायती राज के माध्यम से सशक्तिकरण की नई कहानियां लिख रही हैं. भारतीय समाज में महिलाओं का यह उत्थान आने वाले समय में एक नई इबादत लिख सकता है.

निष्कर्ष-शांति पसंद और उग्र संगठन, दोनों ही हिंदुत्व को एक जीवन दर्शन और ज्ञान के भंडार के रूप में स्वीकार करते हैं. उनके लिए हिंदुत्व विचारों का एक तंत्र जिसमें आध्यात्म, प्रकृति, संस्कृति को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता. ऊपर किए गए विश्लेषण से स्पष्ट है कि हिंदुत्व को लोग भिन्न-भिन्न प्रकार से लेते हैं. जीवन दर्शन के रूप में कुछ लोग इसे आक्रमणकारी के रूप में लेते हैं और जो इसमें विश्वास नहीं करते वे इसका विरोध करते हैं. कुछ हिंदु संगठनों के अनुसार हिंदुत्व को तीन चीजों से खतरा है-ईसाईयत, इस्लाम और उदार हिंदूओं से. आने वाले वर्षों में उग्रपंथी हिंदुत्व संगठन अधिक सक्रीय होने के लिए मजबूर हो सकते हैं इसके पीछे कारण भी हैं. इस्लामी और ईसाइयत विचारधारा ने हिंदुत्व के जीवन दर्शन को दबाने की कोशिशें की हैं. उदाहरण के लिए ये देखा गया कि अंतर-धार्मिक विवाहों में अधिकतर हिंदू लड़कियां इस्लाम में परिवर्तित हो जाती हैं जिसे लव-जिहाद नाम दिया जाता है. वहीं हिंदुओं में ऐसा नहीं दिखता. इस्लाम की अपेक्षा यहाँ बिना धर्म परिवर्तन के भी लड़कियां स्वीकार कर ली जाती हैं. आप उन जिलों को देखिए जहाँ मुसलमानों की आबादी अच्छी खासी हो… आप पाएंगे कि वे अपनी धार्मिक मान्यताओं को इस प्रकार मानते हैं जो हिंदुत्व के लिए खतरा बन जाती हैं. उदाहरण के लिए पंश्चिम बंगाल में बीरभूम जिले के नालहटी गांव में हिंदू संप्रदाय साल 2012 से दुर्गा पूजा का उत्सव नहीं मना रहा है क्योंकि स्थानीय प्रशासन मुस्लिम भावनाओं को आहत होते हुए नहीं देख सकता! और यह सब भारतीय लेखकों के लिए बौद्धिक दिखने के लिए जरूरी माना जाता है! इसी प्रक्रिया ने बौद्धिक निर्वात की स्थिति पैदा कर दी है जिसकी परिणति अंतत: हिंदुत्व के उग्रपंथी उभार की तरफ हो रही है और यह सब हिंदुत्व के मूल संदेश, इसकी मूल भावना को नुकसान पहुंचा रहा है. यही वो निर्वात है जिसे सोशल मीडिया पर सिकुलरिज़्म कहा जाता है. सिकुलरिज़्म-एक ऐसा कॉकटेल जिसमें राजनीति, उदारवाद और इस्लामवाद के साथ घुल-मिल जाती है और फिर भारतीय एकता के लिए असली खतरा बन जाती है. ऐसी स्थिति में सिर्फ एक ही मार्ग बचता है जिसका हमें अनुसरण करना चाहिए… वह मार्ग है संविधान का बताया हुआ मार्ग. दैनिक अंग्रेजी हिंदुस्तान टाइम्स में विधिक मामलों के संपादक (लीगल एडीटर) सत्य प्रकाश का मानना है कि वर्तमान में हिंदुत्व के उग्रपंथी पक्ष के उभार को महज़ अस्थाई मानसिकता की उपज ही मानना चाहिए…जीवन दर्शन के रूप में हिंदुत्व सभी धर्मों से ऊपर (पहले का) है. सवा करोड़ के इस देश में अगर कुछ हज़ार लोग मूल हिंदुत्व की भावना से भटकते हैं तो इसका मतलब यह नहीं हिंदुत्व की सभ्यता की पूरा कोष ही चौपट हो गया है. हम अपने गौरवपूर्ण इतिहास को देखें जिसमें हमने किसी दूसरे पर कोई आक्रमण नहीं किया बल्कि हिंदुत्व अपने आप को बचाने के लिए पहले इस्लामी और फिर यूरोपीय लुटेरों/आक्रमण कारियों के सामने डटकर खड़ा रहा. एक जीवन दर्शन के रूप में हिंदुत्व पतित पावन गंगा के समान है जिसकी नियति हमेशा बहते, आगे बढ़ते जाना है.

(लेखक तुफैल अहमद, वॉशिंगटन स्थित मध्य एशिया मीडिया शोध संस्थान, MEMRI के निदेशक हैं. यहाँ व्यक्त विचार उनके अपने हैं)[sgmb id=”1″]

6 Comments


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    Very nice article. If you see videos of sadhguru jaggi vasudev, you may find more information on hindu.


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    I wish to read the text in english or bengali…i m not fine with hindi


  3. // Reply

    Nothing left in this great historical artile on the subect analysing the facts most precisely homestly like a great Hindu scholar.He deserves thanks fm nation for his such article to be guiding guide&beacon light for all of us in need from it.Whatever writen abt pub love jihad are corrective&protective measures for Hindu culture. RSS is right in its reqd job for nation.But its excess zealous for temple etc & casual anti minority overtures & hate speeches render us in apprehension.Hindu suffers distrust fm minority for its aggressive gathering like Maldah over any blasphemous act of insane Hindu supporter.Dirty minority caste based reservation politics & caste tension from feudal castes’ injustice ag dalit weak castes cause apprehension much &problems for nation always.


  4. // Reply

    Tuffail ji you arerealy great.Many many NAMANS to you for becoming the true brave son of Bharat.I love your spirit.You apear to be some old rishi reborn to give guidance to Indians.May traitors learn something from U. I prey for your long life.

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