पोस्ट ट्रुथ-सच हुआ बेमतलब!

–सत्येंद्र रंजन (@SRanjan19)

                      ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने Post-Truth को 2016 का वर्ड ऑफ द ईयर चुना है

हाल ही में ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने “post-truth” को 2016 का वर्ड ऑफ द ईयर यानी साल का सबसे प्रचलित शब्द घोषित किया। इस शब्दकोश के संपादकों के मुताबिक यह विशेषण उन परिस्थितियों को व्यक्त करता है, जब जनमत का निर्माण करने में वस्तुगत तथ्य, भावनात्मक अपील और निजी विश्वासों से कम प्रभावशाली हो जाएं। इस शब्द का उपयोग ब्रिटेन में ब्रेग्जिट और अमेरिका में डोनल्ड ट्रंप की बढ़ती लोकप्रियता के साथ तेजी से बढ़ा। पश्चिमी दुनिया की विकासशील देशों में ज्यादा रुचि नहीं रहती। वरना, ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के संपादकों की नजर भारत में नरेंद्र मोदी अथवा फिलीपीन्स में रोद्रिगो दुतेर्तो की जीत से जुड़ी परिस्थितियों पर भी गई होती। इन दोनों देशों की आम भाषा अंग्रेजी नहीं है, इसलिए मुमकिन है कि यहां उन परिस्थितियों को व्यक्त करने के लिए इस शब्द का इस्तेमाल नहीं हुआ हो। मगर यहां के हालात भी काफी कुछ ब्रेग्जिट या ट्रंप परिघटना जैसे ही थे।post-truth_b4bed3def1dc47d4b21c7d697f06cc91

बहरहाल, इन्हीं रूझानों को देखते हुए जानकारों ने इस युग को पोस्ट ट्रुथ राजनीति का दौर कहा है। इस शब्द का हिंदी में अनुवाद करने का प्रयास करें, तो उचित शब्द संभवतः “उत्तर सत्य” होगा। धारणा बनी है कि इस दौर में अपनी पसंद के आंकड़ों को चुनना, मनमाना निष्कर्ष निकलना और उन्हें आबादी के एक बड़े हिस्से में स्वीकृत बनवाना आसान हो गया है। तथ्यात्मक रूप से निराधार ऐसे निष्कर्षों को इस दौर में अक्सर उपयुक्त चुनौती नहीं मिली है या उन्हें चुनौती देने की कोशिशें नाकाम रही हैं। इसीलिए ऐसे निष्कर्षों से जनमत तथा चुनाव परिणामों को अपनी तरफ मोड़ने में जनोत्तेजक नेताओं (Demagogue) को स्पष्ट सफलताएं मिली हैं।

इस परिघटना को समझने के लिए आवश्यक है कि हम ‘वस्तुगत’ या ‘सत्य’ को समझने का प्रयास करें। इन दोनों शब्दों का संबंध आधुनिक विज्ञान से है। विज्ञान असल में वह प्रक्रिया है, जिसमें परिकल्पना को गढ़ने और उसे स्वरूप देने के बाद उसके सही या गलत होने का परीक्षण किया जाता है। समाज विज्ञान के क्षेत्र में ऐसे परीक्षण उपलब्ध तथ्यों, ऐतिहासिक दृष्टांतो और तर्कों के आधार पर किए जाते हैं। इस विश्लेषण से निकले नतीजों को समकक्ष विद्वानों की समीक्षा के लिए प्रस्तुत किया जाता है। अगर सभी या अधिकांश विद्वान उस तथ्य की पुष्टि करें, तो उसे वस्तुगत या सत्य कहा जाता है। दरअसल, तमाम मानवीय ज्ञान ऐसी ही बौद्धिक प्रक्रिया का परिणाम है। मानव सभ्यता का विकास-क्रम ऐसी ही प्रक्रियाओं और परिघटनाओं से आगे बढ़ा है।

इतिहास में कोई ऐसा दौर नहीं रहा, जिसे पूर्ण सत्य का युग कहा जाए। पोस्ट ट्रूथ शब्द से जिन स्थितियों की अभिव्यक्ति होती है, वे मानव इतिहास में हर जगह, हर समय मौजूद रही हैं

सभ्य समाजों में बौद्धिक वर्ग की उपस्थिति को इसीलिए महत्त्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि उन्हें सत्य और वस्तुगत जीवन मूल्यों का पहरेदार समझा जाता है। वैसे इतिहास में कोई ऐसा दौर नहीं रहा, जिसे पूर्ण सत्य का युग कहा जाए। पोस्ट ट्रूथ शब्द से जिन स्थितियों की अभिव्यक्ति होती है, वे मानव इतिहास में हर जगह, हर समय मौजूद रही हैं। सुदूर अतीत में तो तथ्यों के वैज्ञानिक विश्लेषण की प्रभावी परंपरा की तलाश कर पाना कठिन है। वैसी परंपरा होती, तो लोकतंत्र एवं सार्वभौम मानव अधिकारों की अवधारणा के उदय लिए मानवता को आधुनिक काल का इतंजार नहीं करना पड़ता। जिसे आज ट्रुथ या सत्य कह रहे हैं, वह असल में आधुनिक समय में लोकतंत्र एवं संवैधानिक व्यवस्थाओं के अस्तित्व में आने के बाद ही प्रभावी हुआ। वह भी पूर्ण रूप से हुआ, यह कहने का कोई ठोस आधार नहीं है। फिर भी यह कम महत्त्वपूर्ण बात नहीं थी कि इस काल में ज्ञान महज अनुभव-जन्य नहीं रहा। बल्कि उसे रूप देने में तथ्य, तर्क और समकक्ष समीक्षा की निर्णायक भूमिका हो गई। यह चलन स्थापित होने से पहले के समय को हम चाहें तो प्री-ट्रुथ (सत्य-पूर्व) कह सकते हैं। वह स्थिति संवाद एवं संचार के उस समय उपलब्ध माध्यमों के अनुरूप थी। दरअसल, सार्वजनिक बहस, प्रतिवाद और समकक्ष समीक्षा के क्रम में ऐसे माध्यम बेहद अहम हैं। ऐसे नए माध्यमों के उदय के साथ हमेशा ही तत्कालीन स्थितियों में परिवर्तन आया है। प्रिटिंग प्रेस, रेडियो या टीवी इसके उदाहरण हैं। वर्तमान में इंटरनेट और सोशल मीडिया के उदय एवं प्रसार ने एक बार फिर चीजों को व्यापक रूप से प्रभावित किया है।

सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का मंच दिया है, इससे सार्वजनिक बौद्धिकों (public intellectuals)  का समाज पर प्रभाव घटा है

सोशल मीडिया ने न सिर्फ हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का मंच दिया है, बल्कि अपनी मनपसंद चर्चा में शामिल होने, अपने अनुरूप तथ्यों या आंकड़ों को चुनने और मनमाफिक नतीजे निकालने में भी इसने उन्हें सक्षम बना दिया है। इससे सार्वजनिक बौद्धिकों (public intellectuals)  का समाज पर प्रभाव घटा है, क्योंकि अब सिर्फ वे ही संदेशों का संप्रेषण नहीं करते। ऐसा करने की सुविधा हर व्यक्ति के पास है। इस अवस्था ने जनमत निर्माण की अब तक जानी-पहचानी प्रक्रिया को बदल दिया है।

वह जानी-मानी प्रक्रिया तब स्थापित हुई, जब जन संचार के माध्यम पढ़े-लिखे यानी ज्ञान मार्ग पर एक खास दूरी तय कर चुके लोगों तक सीमित थे। रेडियो-टीवी का दौर आने के साथ मौखिक जन संचार व्यापक हो गया। इस दौर में भी कही या संप्रेषित की जाने वाली बातों के परीक्षण का तकाजा घटा। लेकिन तब भी जन संचार एकतरफा था। अतः जन संचार में सक्षम व्यक्तियों पर तथ्य, तर्क या सभ्यता के स्वीकृत मानदंडों को लागू करना संभव था। उनसे अपेक्षा रहती थी कि वे इन सबका पालन करें। लेकिन सोशल मीडिया ने यह स्थिति बदल दी है। अब हर वो व्यक्ति जन-संचार करने में सक्षम है, जो इंटरनेट, कंप्यूटर या स्मार्ट फोन रखने और संचालित करने की स्थिति में है। trumpbrexit3ऐसे में संदेश की सच्चाई और उसमें परोसे जाने वाले तथ्यों को परखना कठिनतर होता गया है। तर्क और कुतर्क के बीच फर्क करना मुश्किल हो गया है। यह स्थिति उन जनोत्तेजक नेताओं के अनुकूल है, जो लोगों के पूर्वाग्रह, भय और वैमनस्य के भाव को भड़काते हुए राजनीति में सफल होना चाहते हैं। लेकिन इस स्थिति के लिए अकेले इन दक्षिणपंथी या चरमपंथी जनोत्तेजक नेताओं को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। यह स्थिति पैदा हुई है तो इसलिए भी कि निराधार धारणाओं को लोगों के मन में बैठाने में उन शक्तियों ने भी भूमिका निभाई है, जो खुद को प्रगतिशील बताती हैं। मसलन, अमेरिका में अनेक प्रगतिशील शक्तियों ने हिलेरी क्लिंटन के पक्ष में सकारात्मक ढंग से और उत्साह के साथ खड़े होने में हिचक दिखाई। उन्हें भी एक बुराई के रूप में पेश किया। उनका समर्थन किया भी तो इसलिए कि ट्रंप उन्हें हिलेरी क्लिंटन से बड़ा खतरा नजर आते थे। इस क्रम में वो प्रगतिशील एजेंडा चर्चा से गायब हो गया, जो डेमोक्रेटिक पार्टी में उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया में क्लिंटन और बर्नी सैंडर्स के बीच चली बहस से सामने आया था।

ऐसी मिसाल अपने देश में भी है। नरेंद्र मोदी की सफलता के पीछे सिर्फ उनकी हिंदू हृदय सम्राट या मजबूत नेता की छवि का ही योगदान नहीं है। इसकी वजह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ/भाजपा खेमे से अलग अनेक समूहों की वो भूमिका भी थी, जिसका समाज में Nihilism (नकारवाद) और Cynicism (निराशावाद) फैलाने में योगदान रहा। उन समूहों ने यूपीए के कार्यकाल में बने प्रगतिशील कानूनों के बचाव में खड़ा होने में अनिच्छा दिखाई बल्कि इन कानूनों और तत्कालीन सत्ताधारियों की साख खत्म करने में वे सहायक बने। ‘कांग्रेस और भाजपा में कोई फर्क नहीं है’ अथवा ‘सभी दल एक ही थैले के चट्टे-बट्टे हैं’– जैसे जुमले आम बना दिए गए। बिना उचित विकल्प ऐसा करना हमेशा ही उन शक्तियों के अनुकूल होता है, जो नकारवाद, निराशा और लोगों की व्यग्रता का लाभ उठाने में सक्षम होती हैं। राजनीतिक ताकतों के बीच मौजूद बारीक या विचारधारात्मक फर्क को ना समझना हमेशा विवेकहीनता फैलाने वाली शक्तियों के पक्ष में जाता है।

आज नोटबंदी के सिलसिले में भी इस प्रवृत्ति को देखा जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नोटबंदी की घोषणा पर आम प्रतिक्रिया रही कि यह अच्छा कदम है। इसके लागू होने की प्रक्रिया में दिक्कतें सामने आने पर भी यह धारणा नहीं टूटी है। जबकि हकीकत यह है कि यह कदम गलत समझ पर आधारित है। इसलिए कि इससे ना तो भ्रष्टाचार रुकेगा, ना ही अवैध धन पर रोक लगेगी। अवैध धन बोरियों में भर कर रखे गए नोट हैं, यह समझ ही गलत है। अवैध धन कैसे बनता है, भारतीय अर्थव्यवस्था में इसका कितना हिस्सा है और इससे कैसे निपटा जा सकता है, इन तमाम बिंदुओं पर बना जनमत सही सूचना के अभाव से ग्रस्त नजर आता है। फिर भी कुछ अपवादों को छोड़ कर किसी पार्टी में यह कहने की हिम्मत नहीं है कि सरकार का यह कदम ही गलत है। इसके मकसद को सही और अमल के तरीके को गलत बताने का फल होता है कि असली बात कहीं खो जाती है और सारी चर्चा मोटे तौर पर सरकार के पक्ष में चली जाती है। ऐसा क्यों हुआ? नरेंद्र मोदी के कदम को इतना समर्थन कैसे मिला? इसकी पड़ताल करें तो हम सहज ही कम से कम पांच साल पीछे चले जाएंगे। अन्ना आंदोलन के दौरान निहित स्वार्थी तत्वों ने इन धारणाओं को प्रचारित किया, जिसमें मुख्यधारा मीडिया सहायक बना और सोशल मीडिया उसका सहज वाहक बना। इसे किसी ने प्रभावी ढंग से चुनौती नहीं दी। यह बात चर्चा में नहीं लाई गई कि भ्रष्टाचार हो या अवैध धन- उसका एक संदर्भ है। इससे आम जन के मानस में यह बात उतर गई कि अवैध धन और भ्रष्टाचार भारत की सबसे बड़ी समस्या हैं। इसी धारणा की अभिव्यक्ति अभी हम होते देख रहे हैं।

गुजरे वर्षों में बहुचर्चित रहे अनेक विषय या मुद्दे संदर्भ-हीन एवं सही समझ से परे बनी धारणाओं की श्रेणी में आते हैँ।

गुजरे वर्षों में बहुचर्चित रहे अनेक विषय या मुद्दे संदर्भ-हीन एवं सही समझ से परे बनी धारणाओं की श्रेणी में आते हैं। एक उदाहरण हम गुजरात मॉडल का ले सकते हैं। गुजरात मॉडल विकास से जुड़े हर सवाल और समस्या का समाधान है- इस प्रचार को 2013-14 में भारतीय जनमत के बड़े हिस्से ने सहज स्वीकार कर लिया। कई विद्वानों ने उस समय भी तथ्य, तर्क, ग्राफ, सारणी आदि के साथ यह दिखाया था कि ना तो यह कोई अलग मॉडल है, ना ही इसकी कोई अपेक्षित उपलब्धियां हैं। मगर प्रचार, मीडिया के सहयोग और सोशल मीडिया के उपयोग से नरेंद्र मोदी और उनके समर्थक हकीकत के उलट जन- जन तक यह संदेश पहुंचाने और उसे विश्वसनीय रूप में पेश करने में सफल रहे।

ऐसा ही हाल में अमेरिका में हुआ है। डोनल्ड ट्रंप ने बराक ओबामा के अमेरिकन होने पर सवाल उठाया। ओबामा को इस्लामिक स्टेट (आईएस) का संस्थापक और हिलेरी क्लिंटन को सह-संस्थापक बताया, अमेरिका को पतन की अवस्था में बताया। वहां के जानकार यह देखकर आश्चर्यचकित हैं कि इन बातों पर बड़ी संख्या में लोगों ने यकीन किया। इसी तरह ब्रिटेन में आव्रजकों को खतरा बताने और यूरोपीय संघ में शामिल रहने से देश को नुकसान होने की बात ब्रेग्जिट समर्थकों ने फैलाई। तथ्य इसके उलट हैं। post-truth-300x170मगर ब्रेग्जिट समर्थक आधे से अधिक जनमत को अपनी तरफ करने में सफल रहे। ऐसे रुझान अनेक दूसरे देशों में भी दिखे हैं। इन्हीं परिस्थितियों में पोस्ट ट्रुथ शब्द की प्रासंगिकता पर लोगों का ध्यान गया। अब कहा जाने लगा है कि हम पोस्ट ट्रुथ राजनीति के दौर में पहुंच गए हैं।

ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के मुताबिक पोस्ट ट्रुथ शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल 1992 में सर्बियाई-अमेरिकी नाटककार स्टीव तेसिच ने अपने एक लेख किया था। यह लेख नेशन नामक पत्रिका में छपा। ईरान-कोंट्रा घोटाले और साल भर पहले हुए खाड़ी युद्ध का जिक्र करते हुए तेसिच ने लिखा- “हम स्वतंत्र लोगों ने अपनी इच्छा से तय किया है कि हम एक तरह के पोस्ट ट्रुथ दुनिया में जीना चाहते हैं।” ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में कहा गया है- इस बात के प्रमाण हैं कि पोस्ट ट्रुथ शब्द का इस्तेमाल तेसिच के लेख में पहले भी हुआ। लेकिन पहले इसका “सत्य जाहिर होने के बाद” के अर्थ में उपयोग हुआ, ना कि इस अर्थ में कि सत्य ही अप्रासंगिक हो गया है। शब्दकोश ने ध्यान दिलाया कि वर्तमान समय में सत्य (truth) के साथ उपसर्ग “post-” का उपयोग post-war or post-match जैसे रूपों में नहीं हुआ है। उन स्थितियों में इस उपसर्ग के लगने का सीधा मतलब युद्ध या मैच के बाद की स्थितियों से होता है। वर्तमान प्रसंग में इसका अर्थ उस युग या समय से है, जब शब्द विशेष से जुड़ी धारणा महत्त्वहीन या अप्रासंगिक हो गई हो।

राजनीति में सत्य के संदर्भ में ऐसा क्यों हुआ है? इसे संभवतः तीन और शब्दों के साथ बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। ये शब्द हैं- Social Hegemony (सामाजिक आधिपत्य), Traditional Impunity (परंपरागत दंड-मुक्ति का भाव) और Prejudice (पूर्वाग्रह).

हर समाज में कुछ वर्गों/समुदायों का दूसरों पर आधिपत्य रहा है। आधुनिकता, संवैधानिक व्यवस्थाओं, लोकतंत्र और मानव अधिकारों की अवधारणा के प्रचलन में आने से इन वर्चस्वों को चुनौती मिली। धीरे-धीरे इनका शिकंजा कमजोर हुआ। भारत में सवर्ण जातियों, धनी वर्गों और पुरुषों के वर्चस्व पर यह बात लागू होती है। अमेरिका में श्वेत समुदाय और पुरुषों के आधिपत्य पर यह लागू होता है। जिनकी पकड़ कमजोर हुई, उनके लिए आज भी इसे सहज स्वीकार करना कठिन है। ऐसे तत्व पुराने दौर को वापस लाना चाहते हैं। लेकिन तर्क एवं विवेक पर आधारित आधुनिक लोकतंत्र के वातावरण में ऐसा करना कठिन रहा है। इसलिए ऐसे तत्व स्वाभाविक रूप से तर्क और विवेक को निशाना बनाते हैं।

पुराने आधिपत्य के साथ पारंपरिक दंड-मुक्ति का भाव था। मसलन, दलित जातियों के साथ अपमानजनक व्यवहार करना सवर्ण अपना अधिकार समझते थे। स्त्रियों की पहचान एवं इच्छा का उल्लंघन करना मर्द अपना हक मानते थे। गरीबों से मनमाना सलूक धनी वर्ग के लोग उचित समझते थे। आधुनिकता के प्रसार के साथ सिद्धांततः ऐसे व्यवहार अमान्य हो गए, हालांकि व्यवहार में ऐसा होना जारी रहा। मगर वंचित समूहों में आई जागरूकता के साथ ऐसा करना लगातार मुश्किल होता गया। वर्चस्वशाली समूह इसे अपने अधिकार पर चोट मानते हैं। इसलिए वे ऐसे तमाम वैधानिक उपायों को खत्म कराना चाहते हैं, जिनसे उनके लिए मनमाना व्यवहार करने में दिक्कत आने लगी। मराठा आंदोलन के दौरान अनुसूचित जाति- जन जाति उत्पीड़न विरोधी कानून को रद्द करने की मांग के पीछे यही भावना काम करती दिखी है। यही बात दहेज उत्पीड़न विरोधी कानून (भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए) के खिलाफ बनाए गए माहौल पर भी लागू होती है। ऐसे कानूनों के कथित दुरुपयोग का हल्ला खड़ा कर असली मंशा को छिपाया जाता है। ध्यानार्थ है कि डोनल्ड ट्रंप ने अमेरिका को फिर से महान बनाने की घोषणाएं कीं। भारत में संघ परिवार स्वर्ण युग वापस लाने की बात करता है। ऐसी बातें पारंपरिक आधिपत्य और दंड मुक्ति भाव से लाभान्वित रहे समूहों के मन को स्पर्श करती है। वे स्वाभाविक रूप से ऐसा सपना दिखाने वाले नेताओं के पीछे गोलबंद हो जाते हैं।

विभिन्न जातियों, समुदायों, क्षेत्रीय समूहों आदि के बारे में ऐसे पूर्वाग्रह हर समाज में थोक भाव में फैले रहते हैँ जिनके तथ्यों की रोशनी में सही या गलत होने का कभी परीक्षण नहीं किया गया हो

आधिपत्य और दंड मुक्ति का भाव अनेक पूर्वाग्रहों का जन्मदाता है। पूर्वाग्रह से मतलब वैसी भावना या भाव से है, जिनके तथ्यों की रोशनी में सही या गलत होने का कभी परीक्षण नहीं किया गया हो। यानी सुने-सुनाए आधार पर जो मान्यताएं बनी और प्रचलित हुई हों। विभिन्न जातियों, समुदायों, क्षेत्रीय समूहों आदि के बारे में ऐसे पूर्वाग्रह हर समाज में थोक भाव में फैले रहते हैं। लंबे समय में ये सामुदायिक विभाजन और एक सीमा के बाद सामुदायिक नफरत का कारण बनते हैं। लोगों के मन में बैठी इन्हीं भावनाओं का लाभ जनोत्तेजक नेता उठाते हैं। वे एक दूसरे के प्रति घृणा को बढ़ावा देते हैं। एक समुदाय में दूसरे समुदाय को लेकर भय खड़ा करते हैं। एक समुदाय की वास्तविक या काल्पनिक समस्याओं के लिए दूसरे समुदाय को जिम्मेदार ठहराते हैं। मसलन, अमेरिका में डोनल्ड ट्रंप ने मेक्सिकन आव्रजकों को “मूल” अमेरिकियों की आर्थिक मुसीबतों और मुसलमानों को उनकी सुरक्षा के लिए खतरे के रूप में पेश किया। ब्रेग्जिट समर्थक नेताओं ने भी आव्रजकों और मुसलमानों को लेकर भय खड़ा किया। भारत में मुसलमानों को निशाने पर रख कर ऐसी राजनीति आगे बढ़ाई गई है।

उपरोक्त सामाजिक परिस्थितियां अतीत में भी थीं। लेकिन दो वजहों से लोकतांत्रिक देशों में वे राजनीति पर हावी नहीं हुईं। एक तो विमर्श के सूत्र तब उदात्त वर्गों के हाथ में थे। दूसरा कारण विज्ञान एवं तकनीक का उपयोग बढ़ना, उससे नई समृद्धि आना, सबकी बेहतरी के सपने का कायम रहना रहा और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अस्तित्व में आई नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था थे। पहले नव-उदारवादी नीतियों के कारण विषमता बढ़ने और फिर आर्थिक ठहराव/मंदी तथा सोशल मीडिया के आगमन ने उपरोक्त दोनों हालात बदल दिए। मंदी के लंबा खिंचने से आम लोगों की आर्थिक स्थिति एवं जीवन स्तर में हर जगह गिरावट आई है। इससे जारी व्यवस्था में बड़ी संख्या में लोगों का यकीन घटा है।

दूसरी तरफ सोशल मीडिया विकसित समाजों में मुख्य जन-माध्यम बन गया है। भारत जैसे देशों में भी इसका प्रभाव तेजी से बढ़ा है। इसका असर क्या है, इस बारे में कैथरीन वाइनर ने ब्रिटिश अखबार द गार्जियन में लिखाडिजिटल युग में गलत सूचना को प्रकाशित करना पहले के किसी दौर की तुलना में आसान हो गया है। ऐसी सूचनाओं को तेजी से शेयर किया जाता है और इन्हें सच के रूप में लिया जाता है। खास कर ऐसा हम आपातकालीन स्थितियों में होता देखते हैं, जब सूचनाएं उसी समय उभर रही होती हैं… मकसद चाहे जो हो, लेकिन आज झूठ और तथ्यो का प्रसार एक ही रास्ते से होता है। इस परिघटना को शिक्षाशास्त्रियों ने “सूचना का झरना” कहा है। ऑनलाइन उत्पीड़न विशेषज्ञ डेनिल सिट्रोन के मुताबिक लोग दूसरे लोगों की सोच को फॉरवर्ड करते हैं, भले वह गलत, गुमराह करने वाली या अपूर्ण हो। वे ऐसा इसलिए करते हैं, क्योंकि उन्हें महसूस होता है कि उन्हें कोई बहुमूल्य जानकारी मिली है। यह चक्र खुद को दोहराते चला जाता है और इसके पहले कि आपको इसके बारे में मालूम हो, यह झरना उस हाल में पहुंच जाता है, जिसे रोकना संभव नहीं रह जाता।

इस नई स्थिति का तमाम जनोत्तेजक नेताओं ने खूब फायदा उठाया है। इससे उन्हें सफलता मिली है। लेकिन इस परिघटना का शिकार सच हुआ है। परखी हुई, गंभीर विश्लेषण में टिकने वाली और समकक्ष विद्वानों की समीक्षा से स्वीकृत सूचनाओं तथा निराधार प्रचार के बीच फर्क मिट गया है। चूंकि निराधार प्रचार लोगों के पूर्वाग्रहों के अनुरूप और उसे और भड़काते हुए किया जाता है, इसलिए आज यह अधिक सफल हो रहा है। राजनीति में यह निर्णायक परिघटना बन गया है। इसीलिए आज ये धारणा बनी है कि हम पोस्ट ट्रूथ राजनीति के दौर में पहुंच गए हैं।

(लेखक सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटी में रिसर्च में फेलो रह चुके हैं। वर्तमान में  नई दिल्ली स्थित जामिया  मिल्मिया इस्लामिया के  MCRC के डेवलपमेंट कम्युनिकेशन कोर्स में गेस्ट फैकल्टी के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। यहां व्यक्त विचार निजी हैं, चौपाल से संबंध नहीं )

[sgmb id=”1″]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

9 + 1 =