जेएनयू: एक संस्थान का पथभ्रष्टता से कलंकित हो जाना

–संदीप महापात्रा (@SdeepMahapatra)

मेरे और मेरे जैसे तमाम लोगों के लिए 9 फरवरी की घटना कोई अनोखी नहीं है. जो इस विश्वविद्यालय से जुड़े रहे हैं वे अच्छी तरह जानते हैं कि कैंपस में ऐसे कार्य होते रहते हैं. The-poster-at-JNU-against-judicial-killing-of-terrorist
जरा याद कीजिए- 90 के मध्य का वह समय जब कैंपस में शहाबुद्दीन गौरी नाम का एक आतंकी पकड़ा गया, जिसके बाद हवाला कांड सामने आया.
-1996 में आइसा (सीपीआई-एमएल का छात्र संगठन) ने कैंपस में भाषण देने के लिए घाटी से आतंकियों का बुलाया था जिसे राष्ट्रवादी छात्रों ने नाकाम किया था.
-साल 2000 में दो सैनिकों को सिर्फ इसलिए बेरहमी से पीट दिया गया क्योंकि उन्होनें एक वामपंथी संगठन द्वारा आयोजित मेल-मिलाप वाले मुशायरा कार्यक्रम में राष्ट्रविरोधी नारों की खिलाफ़त की थी.
-साल 2009 में जब छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में हमारे अर्धसैनिक बलों के 70 से अधिक जवान मारे गए तो कैंपस में जश्न मनाया गया था. इतना ही नहीं आइसा और अन्य नक्सलवादी समर्थित संगठनों द्वारा इस जश्न में तिरंगे की होली भी जलाई गई थी.
-कुछ साल पहले ही जेएनयू के एक छात्र को नक्सलों से जुड़ा होने के कारण गिरफ्तार किया गया था.
ये महज़ कुछ उदहारण हैं उन तमाम राष्ट्रविरोधी घटनाओं के, जो मायने तो रखती थीं लेकिन दुर्भाग्यवश उन्हें उतनी अहमियत नहीं दी गई जिनकी ये हक़दार थीं.
इसको पढ़ने वाले इस बात को जानकर आश्चर्यचकित होंगे कि ऊपर बताई गई घटनाओं के लिए जिम्मेदार एक भी व्यक्ति पर कोई कार्यवाई नहीं हुई.
इसके पीछे कई कारण हैं… एक तो कैंपस में कुछ लोगों के अपने स्वार्थ हैं तो दूसरा, चूंकि मीडिया ने इन मुद्दों को कभी उठाना उचित नहीं समझा तो फिर भला किस बात पर कार्यवाई?

JNUइस बार भी कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो अपने आप में इतिहास ही दोहराया गया है. जिस स्तर पर इस पर बहस होनी चाहिए, वह नहीं दिखती. और तो और, अब तो बहस का रुख ही मोड़ने की कोशिश हो रही है. राष्ट्रद्रोह को दबाकर पूरा मसला छात्रों की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की तरफ ले जाया जा रहा है.

पुलिस कार्यवाई के बाद हर बार की तरह फिर से फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन की रट सुनाई दे रही है, और इसे जेएनयू की ऑटोनॉमी पर हमला बताया जा रहा है.
मौकापरस्त नेता एक बार फिर से मक्खिंयों के झुण्ड की तरह जेएनयू में पहुंच रहे हैं. विडंबना देखिए जो सीपीएम बंगाल या केरल में रत्तीभर फ्रीडम ऑफ एक्सप्रशेन की कद्र नहीं करती वह सीपीएम इस पर लंबे-लंबे भाषण दे रही है!

rahul-jnu-protest759 जिस कांग्रेस ने देश पर आपातकाल थोपा, विरोध और विरोधियों पर कहर ढहाया, 60 साल के कुशासन में जब भी मौका मिला तब विरोधियों की आवाज़ दबाने की कोशिश की, सैटेनिक वर्सेज को बैन किया, अन्ना और निर्भया आंदोलन में छात्रों की आवाज़ कुचलने की कोशिश की, वह कांग्रेस अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लेक्चर दे रही है!
कहा जाता है कि जेएनयू कम्युनिस्ट विचारचारधारा को समायोजित करने के लिए स्थापित किया गया था लेकिन शायद ही किसी ने सोचा होगा कि स्वतंत्र/स्वछंद पंछियों का यह झुंड एक दिन राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए संकट उत्पन्न कर देगा जहां मकबूल भट्ट या अफ़ज़ल गुरु जैसे आतंकी राजनैतिक दलों के लिए हीरो बन उनके लिए लाभ अर्जित करने वाले बन जाएंगे.
अब यह सफाई दी जा रही है कि 9 फरवरी  का यह आयोजन वामपंथियो के कुछ “शरारती तत्वों” की हरक़त थी.
images (2)लेकिन प्रश्न उठता है कि इनके पीछे आखिर है कौन? AISF या SFI जैसे संगठन अब इससे अपना पल्ला झाड़ रहे है. आखिर क्यों इन्होनें इसे रोकने की कोशिश नहीं की? क्या ये एक ऐसा मामला नही है जहां “वाम एकता” के नाम पर एक संगठन दूसरे संगठन के लिए मैदान छोड़ रहा है? जहाँ बुराई बहुत गहराई तक समा गई है जिसे हमारी आँखें नहीं देख पा रहीं हैं?

ये कुछ ऐसे प्रश्न जिनका जवाब खोजना जरुरी और यह सिर्फ गहन जाँच के माध्यम से ही हो सकता है. अगर ख़बरों पर यकीन किया जाए तो 9 फरवरी की घटना को जम्मू-कश्मीर के अलगाववादियों को और पाकिस्तान के आतंकी सरगना हफीज़ सईद का आशीर्वाद प्राप्त था. अगर इन ख़बरों में रत्तीभर भी सच्चाई है तो यह मसला सिर्फ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तक सीमित नही किया जा सकता बल्कि इसे राष्ट्रीय  सुरक्षा से जुड़े मसले के रूप में लेने की जरुरत है और इस जाँच प्रक्रिया में कतई राजनीति नहीं होनी चाहिए.
यहाँ पर एक और गंभीर प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि कैंपस में शिक्षक संगठनों को, जिनमें से कई का चुनाव उनकी राजनीतिक विचारधारा के कारण हुआ है, जो सीपीआई, सीपीएम जैसे संगठनों से है या जो अपने छात्र जीवन में इन संगठनों से जुड़े रहे, आखिर क्यों राष्ट्रविरोधी गतिविधियों संचालित करने के लिए कैंपस में एक सुरक्षित परिवेश मुहैया कराया जाता है?
ऐसी घटनाओ के बाद आखिर क्यों ये बार-बार दोहराया जाता है कि अन्य संस्थानों के विपरीत जेएनयू खुले विचारों का समर्थन करने वाला संस्थान है और यहाँ पर हर किसी को अपने मन-मुताबिक कुछ भी कहने की आज़ादी है. इस प्रकार की चीजें ना सिर्फ संस्थान बल्कि देश को भी नुकसान पहुंचा रही हैं. दीर्घ काल से चली आ रही इस सोच ने अराजक तत्वों के सामने कैंपस में “कार्टर ब्लांश” जैसी स्थिति पैदा कर दी है जिसमें वे मान बैठे है कि उनके हर कदम का समर्थन करने वाले दर्जनों और सैंकड़ों की संख्या में मौजूद है. यह एक ऐसी ‘ट्रिक’ है जो ना सिर्फ छात्रों बल्कि शिक्षको को भी उनके पीछे लामबंद करवा देती है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से वे मान बैठे है कि इसका किसी भी सीमा तक अथवा असीमित उपयोग किया जा सकता है. इस प्रकार के दृष्टिकोण छात्रों को कानून अपने हाथ में लेने के लिए उकसाते हैं और फिर इन सब के परिणाम स्वरुप चीजें अनियंत्रित और अराज़क हो जाती हैं.students-kanhaiya-hindustan-february-protest-president-teacher_aec208ca-d1b2-11e5-9215-0a2a26aeb03b
इस बहस में हम जेएनयू की बचाने की आवाजें भी सुन रहे हैं. हम सब मानते है कि यह नारा महत्वपूर्ण है. लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण ये है कि जेएनयू को आखिर को बचाना किससे है? उन लोगों से जिनका दुनिया देखना का नज़रिया एक खास किस्म का है. अपने नज़रिए के अलावा वे किसी दूसरे के विचारों को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं और ये लोग संस्थान में सालों से महत्वपूर्ण पदों से चिपके बैठे हैं. जेएनयू को उन लोगो से बचने की जरुरत है जो अपने ऐसे “आईडिया ऑफ़ इंडिया” का ‘प्रोपेगंडा’ फैलाने के लिए कैंपस का इस्तेमाल करते हैं जिसमें भारत एक राष्ट्र नहीं बल्कि विभिन्न का राष्ट्रीयताओं का समहू भर है. इसे उन स्वार्थी तत्वों से बचाने की जरूरत है जिन्होनें नियुक्ति प्रक्रिया को एक दूसरे को लाभ पहुंचाने वाली बना डाला है, इसे उन राष्ट्रविरोधी तत्वों से बचाने की जरूरत है जो मान बैठे हैं कि वे कभी भी विभाजनकारी या अलगाववादी राजनीति के लिए कैंपस को कंट्रोल या कमांड सेण्टर की तरह उपयोग कर सकते हैं.
जब तक हम जेएनयू को बचाने के वास्तविक मायने नहीं जानेंगे, यह नहीं जान लेते कि विश्वविद्यालय की छवि धूमिल करने वाले ऐसे आयोजनों के पीछे किसकी शह है? इन सबके बीच JNUTA को भी अपने आप को सही साबित करना होगा. 14 फरवरी को JNUTA ने प्रेस कांफ्रेंस कर एक ऐसा दोहरे मानदंड वाला स्टैंड लिया है जो दोषियों के कार्यों को ही अनुमोदित कर रहा है. इससे हम समझ सकते हैं कि जेएनयू बचाने से उनके क्या मायने हैं!

एक बात और जो मुझे हमेशा से परेशान करती रही है, जब मैं वहाँ का छात्र था और अब भी जब नहीं हूँ, वह यह कि आखिर जेएनयू समुदाय ऐसे लोगों को अलग-थलग क्यों नहीं करता? आखिर क्यों वहाँ के प्रोफ़ेसर इस सबके विरोध में नहीं आते? इसके उलट वे तर्क करने लगते हैं ऐसा करने वाले मुठ्ठीभर हैं!
आज भी न सिर्फ कश्मीर बल्कि नागालैंड, असम, केरल और मणिपुर की आज़ादी की मांग करते हुए पोस्टर आपको कैंपस की दीवारों पर दिख जाएंगे. मुख्य बिंदु यह है कि एक लंबे समय से विभाजनकारी और राष्ट्रविरोधी गतिविधियां कैंपस में होती आ रही हैं. अब इन्हें और बर्दास्त नहीं किया जा सकता. साथ ही इन छात्र संगठनों के राजनीतिक आकाओं सीपीआई, सीपीएम, सीपीआई (एमएल) या वहां के प्रोफेसरों को ऐसी हरकतों का दोष “अदृश्य शक्तियों” पर डालने की अपनी आदत छोडनी होगी.

JNUविश्वविद्यालय का एक छात्र होने के नाते मुझे अपने संस्थान पर पूरा गर्व है और अपेक्षा करता हूँ कि निश्चित रूप एक लक्षमणरेखा होनी चाहिए. वरना कहीं ऐसा न हो कि विश्वविद्यालय ऐसी राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए एक ‘लॉन्च पैड’ बन जाए.

(लेखक ‘संदीप महापात्रा‘ साल 2000-01 में जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष रहें हैं, यहाँ व्यक्त विचार उनके निजी हैं) [sgmb id=”1″]

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