प्रशांत किशोर और भारतीय राजनीति

– संजय मेहता (@JournalistMehta)
भारतीय राजनीति के बदलते दौर में प्रशांत किशोर एक जाना पहचाना नाम है। उन्होंने भारतीय राजनीति को नए अर्थों में गढ़ा है। कहा जाता हैprashant-kishor कि राजनीति में न कोई स्थायी दोस्त है और न स्थायी दुश्मन। राजनीति की पहली और आखिरी शर्त है कि किसी पर विश्वास मत करो क्योंकि राजनीति में प्रवेश करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की अपनी – अपनी महत्वाकांक्षा होती है। हो सकता है आप जिस पर भरोसा कर रहे हैं वह कल आपको दगा देकर कुर्सी पर कब्ज़ा जमाने का प्रयास शुरू कर दे।

बदलते दौर में आप नए समय की राजनीति में सभी पहलुओं को बारीकी से समझ पा रहे हैं या नहीं? आप खुद को कैसे स्वीकार्य बनाए रखेंगे? इन्हीं सब सवालों के जवाब के लिए पारंपरिक राजनीति के ढलते दौर में पॉलिटिकल कंसल्टेंट अपनी पैठ बना रहे हैं। प्रशांत किशोर पारंपरिक और आधुनिक राजनीतिक परिस्थितियों से उत्पन्न स्थिति की उपज हैं।

राजनीति के इस नए दौर में नेताओं का विश्वास ऐसे लोगों पर काफी हद तक बढ़ा है। बात चाहे रजत सेठी की हो या प्रशांत किशोर की दोनों ने अपने – अपने स्थान पर खुद को साबित किया है। प्रशांत किशोर कोई नेता नहीं हैं। देश उन्हें एक चुनावी रणनीतिकार के तौर पर जानता है। वे पार्टियों को चुनाव लड़ने का तरीका बताते हैं। प्रचार अभियान की रूपरेखा तैयार करने के पीछे इनका बौद्धिक कौशल काम करता है। चुनावी अभियानों से राजनीतिक दलों को ज्यादा से ज्यादा फायदा कैसे पहुंचाया जाए यही काम प्रशांत किशोर करते हैं। पूर्व में भी यह काम किया जाता था। लेकिन प्रशांत किशोर ने उसी काम को आधुनिक तरीके से अंजाम दिया है। वे अपने रणनीति से सफल हुए हैं। आज उनकी ख्याति उसी बेहतर रणनीति का परिणाम है।

पिछले कुछ सालों में राजनीतिक दलों के समक्ष सोशल मीडिया बड़ी चुनौती बन कर उभरी है। कई राजनीतिक दल इसे समझ पाने में असफल रहे। परंपरागत आंकड़ों एवं राजनीतिक तरीकों को टेक्नोलॉ़जी के माध्यम से प्रशांत किशोर ने सजाया है और उसे व्यवस्थित किया है।
सोशल मीडिया के असर से आज दुनिया वाकिफ है। देश में कई नेता इसमें फिसड्डी साबित होने लगे। सोशल मीडिया के पटल पर नेताओं के सामने खुद को साबित करने की चुनौती खड़ी हो गयी। ऐसे समय में प्रशांत किशोर ने मौका तलाशा। उन्होंने खुद को साबित कर यह जवाब दे दिया कि इस चुनौती का हल उनके पास है। आज मुल्क की राजनीति में वह एक यूथ आइकॉन बनकर उभरे हैं। हम यह कह सकते हैं कि प्रशांत किशोर के पास भारतीय राजनीति को देखने का एक नया नजरिया है। लेकिन उनका यह नजरिया पारंपरिक राजनीति के उसी जात-पात और धर्म के आंकड़ों पर निर्भर है।

नीतीश कुमार की बिहार में जीत ने उनके ब्रांड में चार चांद लगा दिए। आज वह कांग्रेस के साथ हैं। अभी उत्तर प्रदेश और पंजाब में उनकी टीम काम कर रही है। हालांकि यूपी में उनकी भागीदारी को कम कर दिया गया है। फिलहाल उनकी टीम का पूरा ध्यान पंजाब पर केंद्रित है। यूपी में प्रशांत किशोर का हस्तक्षेप कम होने से व्यक्तिगत तौर पर उन्हें कोई नुकसान नहीं होने वाला है। कांग्रेस के इस फैसले से कुछ हद तक प्रशांत किशोर को ही फायदा होगा क्योंकि कांग्रेस यूपी में हारती तो इसका ठीकरा इनके सिर पर ही फोड़ा जाता। ऐसे में प्रशांत किशोर का अपना ब्रांड सुरक्षित रहेगा।

प्रशांत किशोर नीतीश से पहले नरेंद्र मोदी के साथ 2014 के आम चुनाव में जुड़े थे किन्तु चुनाव समाप्त होने के बाद वह चर्चा से गायब थे। आज देश में उनकी फिर से चर्चा है। इन दोनों चुनावों ने इन्हें शिखर पर पहुंचाया है। प्रशांत किशोर आज जो भारत में कर रहे हैं यह पश्चिम के देशों में पुराना कांसेप्ट रहा है। डोनाल्ड ट्रम्प, हिलेरी क्लिंटन, बराक ओबामा से लेकर, ब्लादिमीर पुतिन तक तमाम बड़े नेता पॉलिटिकल कंसल्टेंट्स की सेवाएं अनिवार्य रूप में लेते रहे हैं।

हालांकि यह बात जरूर है कि इस मोर्चे पर भारतीय राजनीति के परिदृश्य में सबसे पहला नाम प्रशांत किशोर का ही सामने आता है। मोदी का प्रचार अभियान हो या बिहार में महागठबंधन का प्रचार अभियान यह काफी सजा हुआ नज़र आया। इसके पीछे प्रशांत किशोर की दिमागी मेहनत ही थी। प्रशांत किशोर के बारे में हम यह नहीं कह सकते की उन्होंने एक एजेंसी के तौर पर सिर्फ पेमेंट के आधार पर काम किया। उन्होंने पार्टियों के राजनीतिक मुद्दों पर निर्णायक सलाह दी और वे निर्णय कारगर भी साबित हुए। बिहार में मांझी को हटाकर नीतीश को फिर से सीएम बनाया जाना उन्हीं का फैसला माना जाता है। बाद में उन्होंने नीतीश कुमार के चेहरे को सुशासन के चेहरे के तौर पर प्रचारित किया जिसका व्यापक परिणाम देखने को मिला।

आज के समय में प्रशांत किशोर के बहाने देश में एक नई सोच उभरी है। यह उन युवाओं को संदेश देती है जो सीधे तौर पर चुनावी राजनीति में नहीं आना चाहते, लेकिन राजनीति में रूचि रखते हैं। देश की राजनीति में परंपरागत चुनावी आंकड़ों का बेहतरीन इस्तेमाल करने का हुनर दो बार दिखा चुके प्रशांत किशोर में रणनीति बनाने का गुण तो है लेकिन इस बार उनके तरकश के तीर पंजाब में कितने कारगर होते हैं यह वक्त बताएगा। फिलहाल वे एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहां से सफल हुए तो उनका कोई तोड़ नहीं होगा और असफल हुए तो उनका रथ थोड़ा थम जाएगा। पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह का चुनावी अभियान प्रशांत किशोर की चुनावी रणनीति क्षेत्र में भविष्य की दिशा को तय करेगा।

( संजय मेहता स्वतंत्र पत्रकार हैं फिलहाल कानून की पढ़ाई कर रहे हैं। व्यक्त विचार निजी हैं, चौपाल से कोई संबंध नहीं है )

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