लोगों के दिलों पर राज करती थीं जयललिता

-संजय मेहता (@JournalistMehta)
 
आज के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में राजनीतिक दलों एवं नेताओं पर लोगों का अविश्वास बढ़ा है। अविश्वास के इस दौर मेंjayalalitha ऐसे बहुत कम नेता हुए जिन्होंने लोगों के दिलो को जीता। जयललिता के समर्थक जान देने को तैयार रहते थे। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने तीन दशकों तक लोगों के दिलों पर राज किया। 
 
अस्पताल में जीवन और मौत के बीच झूलने के बाद दुनिया को छोड़ गयीं। पूरे तमिलनाडु राज्य में उनके समर्थक अब शोक में डूबे हैं। जयललिता के बीमार होने की खबर राष्ट्रीय खबर बनी।  जब तक वह बीमार रहीं तब से लगातार उनके गुजरने की आशंका के कारण से जयललिता के समर्थक रोते बिलखते रहे। प्रधानमंत्री समेत देश के प्रबुद्ध लोगों ने दुःख जताया।
 
नकारात्मक राजनीतिक वातावरण में यह सवाल बेहद विश्लेषणात्मक है कि आखिर अम्मा में ऐसा क्या खास था जिससे उनकी ख्यााति एक मसीहा के रूप में उभरी।  जीवन भर उनके समर्थक उनके साथ रहे । समर्थकों ने उनपर ईश्वर के समान आस्था व्यक्त किया। जय ललिता के राजनीतिक फैसलों एवं राजनीतिक तेवरों ने उन्हें अन्य राजनीतिज्ञों से अलग कतार में खड़ा किया। 
 
जयललिता ने राजनीति में आने के बाद काफी आक्रमक तेवर दिखाए। सरकार में आने पर 21 जून 2001 को जयललिता ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी करुणानिधि को रात दो बजे घसीट कर जेल में बंद करवा दिया था। उन्होंने इसे कैमरे के समक्ष करवाया था। इस मामले पर दे में काफी हंगामा भी हुआ था। 
 
इसी दौरान जयललिता कई और कड़े निर्णय लिए । तमिलनाडु में लॉटरी टिकट पर पाबंदी लगा दी एवं मंदिरों में जानवरों की बलि पर रोक लगा दिया। हालांकि अपने इस फैसले से उन्हें नुकसान सहना पड़ा। इस निर्णय के कारण 2004 के लोकसभा चुनाव में इन्हें करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। हार के कारण इन्होंने अपना यह फैसला वापस ले लिया।
 
अपने सख्त तेवरों के लिए जाने जानी वाली इस राजनेत्री ने 2001 में एक सख्त निर्णय लिया था हड़ताल पर जाने वाले दो लाख कर्मचारियों को उन्होंने एक साथ नौकरी से बाहर कर दिया था। मुल्क में कोई अन्य नेता होता तो ऐसे निर्णयों को लेने में कई बार सोचना पड़ता।  जयललिता यह जानती थी की कठोर निर्णयों से उनकी लोकप्रियता को नुकसान होगा लेकिन फिर भी उन्होंने निर्णय लिया। उन्हें जो फैसला लेना होता था अपने तेवर में लेती थी।
 
भारतीय राजनीति की इस  सशक्त महिला ने जनहित के कई फैसले लिए। तमिलनाडु में महिला थाना खुलवाने का इनका फैसला काफी प्रभावशाली रहा। महिला थानों में सिर्फ महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती की। लड़कियों की सुरक्षा के लिए उन्होंने 1992 में ‘‘क्रैडल बेबी स्कीम’’ शुरू की। इस योजना ने अनाथ और बेसहारा बच्चियों को खुशहाल जीवन प्रदान किया। 
 
2013 में उन्होंने गरीब लोगों को रियायती दर पर खाना उपलब्ध कराने के लिए अम्मा कैंटीन की शुरुआत की। जानकार लोगों ने इस योजना की खुब आलोचना की। इस योजना का गरीब लोगों पर काफी सकारात्मक प्रभाव पड़ा। अम्मा कैंटीन में एक रुपए में इडली, तीन रुपए में दो चपाती, पांच रुपए में एक प्लेट सांभर लेमन राइस या कर्ड राइस दिया जाता है। इस योजना ने गरीबों के जीविकोपार्जन में नया आयाम जोड़ा।
 
2016 में जयललिता ने चुनावों में शराबबंदी का वादा किया था। इस वादे को इन्होंने चुनाव जीतने के बाद पूरा किया और कार्रवाई के पहले चरण में राज्य में शराब की 500 रीटेल शॉप बंद करने का बड़ा फैसला लिया। जयललिता के इस फैसले पर काफी हंगामा किया। शराब कारोबारियों में हडकंप मच गया। राजनीतिक विश्लेषकों ने अपने अपने तरीके से उनके फैसले का विश्लेषण किया। 
 
उनके समर्थकों के बीच उनकी स्वीकार्यता ऐसी थी कि उनके निर्णयों को लोग दिल की गहराइयों से स्वीकार करते थे। समर्थक उनके तेवर और फैसलों के कारण ही उन्हें ‘‘अम्मा’’ कहते रहे। ’’अम्मा’’ का उनका दर्जा अपने तेवरों के कारण जीवन पर्यंत बना रहा। 
राजनीति में प्रवेश करने से पूर्व उनके जीवन का सफर संघर्षमय रहा। 24 फरवरी 1948 को इनका जन्म एक तमिल परिवार में  हुआ। इनके दादा एक सर्जन थे। 2 वर्ष की छोटी अवस्था में ही इनके पिता का निधन हो गया।
 
बाद में जयललिता की मां उन्हें बेंगलुरु लेकर चली गईं। बेंगलुरु में  जयललिता ने तमिल सिनेमा में काम करना शुरू कर दिया। ‘‘एपिसोल’’ नाम की अंग्रेजी फिल्म में काम करने के बाद 15 साल की उम्र में जयललिता कन्नड़ फिल्मों में मुख्य हीरोइन की भूमिकाएं करने लगी।
अभिनेता शिवाजी गणेशन के साथ उन्होंने खूब नाम भी कमाया। इसी कड़ी में तमिल, तेलुगू ,कन्नड़ फिल्मों के अलावा एक हिंदी फिल्म में भी जयललिता ने काम किया और सिनेमा के बाद राजनीतिक सफर किस तरह उन्हें लोकप्रियता के मुकाम तक ले आया यह हम सभी जानते हैं।
 
एमजी रामचंद्रन  ने जयललिता को राजनीति में लाया। एमजी रामचंद्रन  की मौत के बाद उनकी विरासत पर जयललिता ने कब्ज़ा जमा लिया। 1983 में एमजीआर ने जयललिता को पार्टी के सचिव का दायित्व दिया। बाद में उन्हें राज्यसभा के लिए भी मनोनीत किया गया। 
जयललिता 1991 में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनीं और फिर यह सिलसिला लगातार चलता रहा। आय से अधिक संपत्ति के मामले में उन्हें अदालत द्वारा सजा भी दी गई। अदालत के इस निर्णय से जनता के बीच में इनकी लोकप्रियता को कोई खास फर्क नहीं पड़ा। बचपन में जयललिता एक वकील बनना चाहती थीं , लेकिन किस्मत उन्हें फिल्मों में ले आयी। लगभग 140 फिल्में करने के बाद राजनीति में 8 बार विधानसभा का चुनाव उन्होंने लड़ा और लोकप्रियता का परचम लहराया।
 
 25 मार्च 1989 को तमिलनाडु विधानसभा में घटित घटना देष का ध्यान खींचा। डीएमके और अन्नाद्रमुक के सदस्यों के बीच हाथापाई हुई और जयललिता के साथ जोर जबरदस्ती की गई। वह फटी हुई साड़ी के साथ विधानसभा से बाहर आयी। इस घटना ने जयललिता के प्रति जनता में व्यापक सहानुभूति पैदा की। तब उन्होनेे कहा था कि अब मुख्यमंत्री बनकर ही विधानसभा में प्रवेश करूंगी। इस घटना को राजनीतिज्ञों ने शर्मनाक बताया था। उनके इस उद्घोष को 1991 में मंजाम मिला। राजीव गांधी की हत्या के बाद जयललिता ने कांग्रेस के साथ चुनावी समझौता किया और 234 में से 225 सीटें जीत लीं। इस चुनाव ने उन्हें व्यापक लोकप्रियता दी।
 
उनके राजनीतिक गुरू एमजीआर की मृत्यु के बाद इन्हें उनके शव तक नहीं जाने दिया गया। संकट की घड़ी में उन्होंने धैर्य के साथ उन्होंने अपना राजनीतिक सफर जारी रखा। उनके पार्टी के विधायक ,सांसद उन्हें ‘‘अम्मा’’ और ‘‘पुराची तलाई’’ अर्थात का्रंतिकारी नेता के नाम से पुकारते थे।
 
तमिलनाडु की राजनीति में जयललिता ने अपनी छवि बेहद व्यापक बना ली थीं। वह अपने गुरू और मार्गदर्शक से भी आगे निकल चुकी थी।  प्रशासनिक तौर पर जयललिता के फैसलों को लोगों ने सराहा। पसंद किया । सुनामी  के समय प्राकृतिक आपदा की स्थिति में उनके प्रशासनिक कौशल आज भी मिसाल है। 
 
विश्लेषको ने उनके उपर जिद्दी और अक्खड़ होने का आरोप लगाया। इन सबके बावजूद वह एक जननेता के तौर पर जनता के बीच खड़ी रही। हर परिस्थिति में उनके समर्थकों ने उन्हे प्यार किया। अब वह हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी यादें , उनकी छवि और उनका इतिहास हमारे समक्ष है। 
 
यह भविष्य में देखने का विषय होगा कि उनकी पार्टी  आगे जाती है या लड़खड़ा जाती है। अम्मा का स्थान भारतीय राजनीति के इतिहास और तमिलनाडु के लोगों के जेहन में लंबे समय तक सुरक्षित रहेगा। उन्होंने अपने राजनीतिक कौशल से पूरे देश में एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। इतिहास उन्हें जननेता के रूप में याद करेगा।
( संजय मेहता स्वतंत्र पत्रकार हैं फिलहाल कानून की पढ़ाई कर रहे हैं। व्यक्त विचार निजी हैं, चौपाल से कोई संबंध नहीं है )

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