यूपी में जाति और मतों का चक्रव्यूह

–शिवांगिनी पाठक (@ShivanginiPatha)

गुजरने वाला समय मानव के सही या गलत, अच्छे या बुरे विचारों में निरंतर परिवर्तन का साक्षी रहा है: चक्रवर्ती राजगोपालाचारी

युद्ध की आधुनिक परिभाषा में अब कुरुक्षेत्र युद्ध जैसा कुछ भी शेष नहीं रह गया है जहां देवदूत धर्म की प्रतिष्ठा, रक्षा की ख़ातिर राक्षसों को ललकारते थे। जहां युद्ध की रणभेरियों के बीच धर्म-पताका की रक्षा ही एकमात्र लक्ष्य हुआ करता था। वर्तमान में इस युद्ध का एकमात्र उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ राज/शासन करना रह गया है। यहां कोई धर्म के लिए नहीं लड़ रहा, बल्कि यहां तो जाति-धन-बाहुबल और विकास की मृगमरीचिका (झूठा प्रतिबिंब) दिखाकर अधिक से अधिक सत्ता सुख पाना ही अंतिम लक्ष्य है।

देश के सबसे बड़े सूबे उत्तरप्रदेश की स्थिति इसी संदर्भ में देखने लायक हैं जहां परिवार और उसके सदस्यों की सत्ता की छटपटाहट अपने बदतर रूप को प्रदर्शित कर रही है। जहां मुलायम सिंह मुग़लिया सल्तनत के आख़िरी बादशाह बहादुरशाह जैसे लाचार-बेबस दिख रहे हैं। जहां अखिलेश किसी के लिए औरंगज़ेब है तो ‘चाचा जी’ पार्टी को पिछड़ेपन की अनंत गहराइयों में ले जाने में लगे हैं। सत्ता के लिए कभी न ख़त्म होने वाली इस भूख ने प्रदेश के इस पहले परिवार को पूरी एक पार्टी में बदल दिया है जो अपनी गुंडई और बाहुबल से सत्ता हथियाने के लिए कुख्यात रही है।

 

c1अपने आप को लोहियावादी कहने वाली इस पार्टी में लोहियावाद तो दुर्गा शक्ति नागपाल (प्रकरण) और मुज़फ्फरनगर दंगों के दौरान ही काफ़ूर हो चुका है। अब पूरा झगड़ा सिर्फ और सिर्फ इस बात का है कि कैसे पूरी सत्ता एक परिवार तक रखी जाए। यह झगड़ा अब परिवार में आंतरिक कलह पर टिका है। यादव और मुस्लिम वोटों के बल पर सत्तासीन पार्टी की सरकार में मुसलमान मुज़फ्फ़रनगर के बाद परेशान हैं और इस जातीय-सांप्रदायिक राजनीति से सत्ता की मलाई खाने वालों ने अपने को राजाजी मार्ग में सीमित किए बैठे हैं। ओबीसी में महज़ 9 फीसदी के हिस्सेदारी रखने वालों के लिए मानो सत्ता की कुर्सी नेता जी के लिए ही बनी है। लेकिन यहां पूछा जाना चाहिए कि जो इस परिवार से इतर यादव जाति के लोग हैं वे इस सत्ता में कितनी भागीदारी कर पा रहे हैं?

ये कहानी सिर्फ सपा तक सीमित हो, ऐसा भी नहीं है। बात चाहे भाजपा की हो, बसपा की हो या कांग्रेस की… हर कोई ओबीसी, ब्राह्मण और मुस्लिमों से बने बरमुडा ट्रायंगल के इर्द-गिर्द ही घूमता दिखाई देता है। अभी तक के चुनाव अभियानों पर अगर आप नज़र डालें तो हर पार्टी, हर नेता “हम तो आपके लिए ही हैं” रटता दिखाई देता है। और फिर 5 सालों बाद… “विपक्ष कुछ करने नहीं देता… हमें सेंटर में भी पहुंचाओ… सेंटर में हैं तो इन्हें स्टेट में पहुंचाओ! “तभी विकास होगा…”विडंबना देखिए कि लोग भी राजनीतिक दलों के झांसे में आकर अपने कल्याण का भरोसा अपनी ही जाति तक सीमित कर देते हैं। नतीजा वही… जाति के नाम पर जीता हुए सिकंदर अपना पेट भरते हैं और आम मतदाता हर बार की तरह ठग लिया जाता है।

आज भी जातीय समीकरण ही उत्तरप्रदेश की राजनीति में सर्वप्रमुख निर्धारक हैं। आज भी उत्तरप्रदेश अगर सुर्ख़ियों में रहता है तो या तो सांप्रदायिक दंगों के कारण या गुंडई की घटनाओं के कारण जिनको अंजाम देने वालों का उद्देश्य कभी मंत्री जी या नेता जी के लिए चंदा इकठ्ठा करना होता है तो कभी ध्रुवीकरण कराना। 21वीं सदी में देश के सबसे बड़े सूबे के मुद्दे ये हैं। जहां प्राथमिकताओं में जाति, प्रशासकीय पैमानों पर हमेशा हावी रहती है।लेकिन क्या इस जातिवादी राजनीति से जनसामान्य को कोई फायदा हुआ है? दरअसल जातीय कार्ड ने चुनावी रणक्षेत्र में नई परिभाषाओं को गढ़ा है। इसने नेताओं को तो लाभ पहुंचाया है लेकिन आम मतदाता जाति और अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के पाटों के बीच पिस रहा है।

c2जातीय समीकरणों ने सिर्फ और सिर्फ लोगों को गुटों में बांटने का काम किया है। यहां जाति या धर्म के नाम पर लोगों को गोलबंद करने का एकऔर लाभ है। इस भावनात्मक गोलबंदी के बाद इंसान विकास की दूसरी बहसों को भूलकर अपनी जाति या धर्म के पीछे चल पड़ता है। इसी की बानगी थी जब इमरान मसूद (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की) बोटी-बोटी करने की बात कहते हैं। ऐसे बयान देने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि जनता को देने के लिए उनके पंडोरा बॉक्स में भले ही कुछ न हो लेकिन जाति और संप्रदाय के ज़हर में घुले ऐसे बयान जरूर हैं जिन्हें सुनकर उनके समर्थक कुछ और पूछेंगे ही नहीं!

 

संक्षेप में कहा जाए तो जातीय विभाजन ने एक चुनावी अस्त्र बनकर दुर्योधन की तरह सत्ता पाने की लालसा को तीव्र किया है। भाजपा को भी भगवान राम हर चुनाव के समय याद आते हैं। अगर इमरान मसूद अपने ज़हरीले बयानों से हिंसा भड़काने की क्षमता रखते हैं तो भाजपा राम-नाम से 13 फीसदी ब्राह्मण और करीब साढ़े सात फीसदी क्षत्रिय मतों से अपनी चुनावी नैया को पार लगाने की कोशिश करती है।और हर चुनावी वादे के अनुरूप रामलला भी कभी न पूरे किए जाने वाले वादों के गट्ठर में खो जाते हैं।

1990 से लेकर धार्मिकता और राष्ट्रवाद आपस में इस कदर भिड़ा दिया गया है जिसकी बहस के बाद विकास के अन्य सारे मुद्दे ही गौण हो गए हैं। सूबे की कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए रामायण संग्रहालय की कोई जरूरत है? यहां महिलाओं को सुरक्षा की जरूरत है, पुलिस को नागरिकों के प्रति अधिक व्यवहार कुशल, अधिक संवेदनशील बनाने की जरूरत है, बढ़ते भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की जरूरत है।

तुलसीदास की रामायण तो लोगों के दिलों में बसती है। रामायण संग्रहालय महिलाओं को सुरक्षा तो नहीं दे देगा? क्या ये सुनिश्चित कर सकता है कि मुज़फ्फ़रनगर या कैराना की दुःखद घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं होगी?क्या यह आम लोगों की जरूरतों और सरकार की लचर कार्यप्रणाली के बीच बढ़ती हुई खाई को पाट सकता है? फिर इन सब समस्यायों से जनता का ध्यान हटाने के लिए आख़िर क्यों कोई पार्टी जातीय कार्ड न खेले?

c3उत्तरप्रदेश की कुल जनसंख्या में ओबीसी वर्ग करीब 45 फीसदी है जिसमें से 1.5 फीसदी कहार, 3.4 फीसदी कुर्मी और 2 फीसदी मल्लाह सरकार में अपने अनुभव को देखते हुए सपा से लगभग पूरी तरह किनारा करेंगे।फिर चाचा-भतीजे ड्रामे का मंचासीन झगड़ा सपा समर्थकों को बांटेगा। हालांकि औद्योगिक और पर्यटन के विकास के लिए अखिलेश यादव ने कुछ प्रयास किए हैं उनसे इनकी छवि एक विकासवादी नेता के रूप में उभरी है। परिणामस्वरूप इस आपसी पारिवारिक कलह के बाद भी काफी हद तक अखिलेश ही आगे रहेंगे।

ट्रिपल तलाक़ के मसले ने मुस्लिम मतदाताओं खासकर देवबंद और नदवा का रुख एक बार फिर सपा की ओर किया है जो शायद उसे एससी और ओबीसी जातियों के नुकसान की कुछ भरपाई कर सके। वहीं भाजपा को निश्चित रूप से पाकिस्तान में की गई सर्जिकल स्ट्राइक का लाभ मिलता हुआ दिख रहा है। इस मसले पर जो सवर्ण छिटककर पिछले बार बसपा में चले गए थे, वे इस बार फिर से भाजपा के साथ जुड़ेंगे। राष्ट्रवाद के रथ पर सवार भाजपा के चाणक्य अमित शाह भी इसका लाभ लेना चाहेंगे।

इन सबके बीच जो लाख टके का सवाल है कि आख़िर 18.5 फीसदी जनसंख्या भागीदारी वाले मुस्लिमों का क्या रुख होगा? सरकारों के निकम्मेपन से इस समुदाय के लोग पिछड़ेपन और गरीबी के एकांतवास में जीने के लिए मजबूर हैं।इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न है कि
शासन-प्रशासन और विकास के मुख्य मसलों को एक किनारे रखकर आख़िर कब तक उत्तरप्रदेश इस जहरीली जातिवादी राजनीति को झेलेगा? क्या उत्तरप्रदेश जाति युद्ध का कुरुक्षेत्र बना रहेगा जहां मतदाता अभिमन्यु की तरह इसके चक्रब्यूह में फंसे हुए हैं? क्या जाति के फेर में फंसी इस जनता को अपनी वास्तिविक शक्तियों का ज्ञान होगा या ये भी कर्ण की तरह जाति के फेर में फंसकर अपनी मौत को दावत देगी?

(जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से मास्टर्स करने के बाद लेखक शिवांगिनी पाठक शोध कर रही हैं। इसके साथ फिल्मों में पटकथा लेखन और सहायक निदेशक का कार्य, समकालीन मसलों पर लेखन। व्यक्त विचार निजी हैं, चौपाल से कोई संबंध नहीं।)

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