विजय दिवस और बांग्लादेश का आगमन

-शान कश्यप (@Shaan_Kashyapp)

इस 16 दिसम्बर को हम 1971 के युद्ध की 45वीं जयंती मना रहे हैं. इसे विजय दिवस कहने का अभिप्राय मात्र एक युद्ध विजय से नहीं है, बल्कि यह इस युद्ध के ऐतिहासिक महत्व को इंगित करता है।

मानव इतिहास एक तरह से युद्धों का इतिहास भी रहा है- वर्चस्व, विस्तार, साम्राज्य से होते हुए उपनिवेशवाद तक यह सभी प्रक्रियाएं हमारी नियति रही हैं। लेकिन बांग्लादेश युद्ध के परिपेक्ष में जब तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में संघर्श्रत्त “मुक्ति बाहिनी” के साथ भारतीय सेना के जवानों ने मिलकर “मित्रो बाहिनी” का निर्माण किया, तो एक नया इतिहास बना।download-2 दक्षिण एशिया में एक नया राष्ट्र आया, और एक पुराने राष्ट्र (पाकिस्तान) का मानचित्र बदल गया। यह ऐतिहासिक घटना आज के परिपेक्ष से कई मायनों में महत्वपूर्ण है। मसलन हम राष्ट्रवाद पर बहस करते रहते हैं, राष्ट्र की प्रकृति और राज्य के अधिकारों पर नए सिद्धांत गढ़ते हैं और साथ ही सेना और युद्ध की आवशयकता पर बहस होती रहती है। इन सभी प्रश्नों पर विजय दिवस के सन्दर्भ में कुछ बेहतर उत्तर तलाशे जा सकते है।

बांग्लादेश की कहानी कम से कम आधुनिक सन्दर्भ में पलासी की लड़ाई (1757) से शुरू की जा सकती है। 1765 में बंगाल प्रेसीडेंसी की स्थापना से लेकर 1905 का विभाजन, 1911 में विभाजन को निरस्त करना और बाद में बंगाल मुस्लिम लीग की प्रांतीय चुनावों में विजय से होते हुए पूर्वी बंगाल भारत विभाजन के उपरांत पूर्वी पाकिस्तान बन चुका था। 1947 में पूर्वी पाकिस्तान सबसे अधिक जनसंख्या और बहुलतावाद को संजोए मुस्लिम बहुसंख्य आधारित नए राष्ट्र पाकिस्तान का एक अनमना अंग बन कर उभरा। 1950 में स्थायी बंदोबस्त (बंग्ला- चिरोस्थायी बंदोबस्तो) और सामंती ज़मींदारी प्रथा का उन्मूलन करके भूमि सुधार लाया गया लेकिन अपने अनमने प्रारूप को प्रकट करते हुए 1952 के बंगला भाषा आन्दोलन ने अंतर्विरोध का पहला संकेत दे दिया।

यह उल्लेखित करना चाहिए कि पाकिस्तान का निर्माण यूरोपीय राष्ट्रवाद की परिकल्पना को साकार करते हुए हुआ था। एक भाषा-उर्दू, एक धर्मं-इस्लाम और एक संगठित संघ की रूप-रेखा में बंगला बहुल पूर्वी पाकिस्तान एक प्रतिवाद का रूप था। डेविड रिक (2002) की स्टेटहुड एंड लॉ ऑफ़ सेल्फ-डीटरमिनेशन से यह ज्ञात होता है कि पूर्वी पाकिस्तान की भागीदारी चाहे वो पब्लिक सेवाओं में हो, या आर्मी में, हमेशा बहुत कम रही। यहाँ तक कि बिना उनकी भावनाओं की कोई फिक्र किये बंगला साहित्य, संगीत, और यहाँ तक कि रबिन्द्रनाथ टैगोर जैसे बड़े नाम की रचनाओं पर प्रतिबन्ध लगाया गया। पाकिस्तान का विचार और पूर्वी पाकिस्तान का बंगला और अपनी सांस्कृतिक विरासत से प्रेम के मध्य अंतर्विरोध सामने आ चूका था और फलतः सामने आया आधुनिक विश्व के सबसे दमनकारी राज्यों में से एक का चेहरा।

download-1दिसम्बर 1970 में हुए चुनावों में शेख मुजीबुर रहमान की आवामी लीग ने पूर्वी पाकिस्तान की कुल 162 सीटों में 160 जीतकर भी स्वतंत्रता की मांग को सामने रख पाने में हिचकिचाती रही। इसका कारण था कि रहमान यह देख पा रहे थे कि ऐसी कोई भी मांग याह्या खान वाली मिलट्री जून्टा सरकार की ओर से अत्याचार का पैगाम ले आएगी। दुर्भाग्य से बिलकुल ऐसा ही हुआ। 25 मार्च, 1971 को ऑपरेशन सर्चलाइट के जरिये पूर्वी पाकिस्तान पर एक निर्मम और दमनकारी नीति अपनाई गयी। सभी राजनीतिक विरोधियों को कारागार में डाल दिया गया। बुद्धिजीवियों और विश्वविद्यालय कैंपस सम्बंधित आवाज़ों को चुप करवाया गया और सबसे अधिक मानवीय अत्याचार महिलाओं पर हुए।

बिना ड’ कोस्टा, एक बंगलादेशी स्कॉलर ने उस ऑस्ट्रलियाई डॉक्टर जिओफेर्री डेविस को ढूंड निकाला जिन्हें संयुक्त राष्ट्र की ओर से बांग्लादेश में गर्भवती महिलाओं का सुरक्षित गर्भात कराने के लिए भेजा गया था। यह महिलाएं पाकिस्तानी आर्मी द्वारा किये गए निरंतर बलात्कार की शिकार थीं और इसी वजह से गर्भवती भी हुई थीं। इस प्रकाशित साक्षात्कार में कई भयावह सच सामने आये। अमेरिका की फोर्ब्स पत्रिका में लिखते हुए अनुशय होस्सनी (21 मई, 2012) यह बताती हैं कि “डॉक्टर डेविस के अनुसार बलात्कार पीडितो की बताई गयी संख्या 2-4 लाख बहुत कम हैय़ उनका यह कहना है कि बच्चों के अलावा सारी महिलाओं को अलग करके एक कंपाउंड में बंद कर दिया जाता था और फिर उन्हें ट्रूप्स के हवाले करते थे। यह शहर दर शहर किया गया। कुछ महिलाओं के साथ बलात्कार इतनी बार हुए कि उनकी मृत्यु हो गयी।” डॉ डेविस यह भी बताते हैं कि कैसे बांग्लादेश स्वतंत्रता के बाद इन बलात्कार पीड़ितों को मुजीबुर रहमान ने “युद्ध नायिका” कहकर समाज में जगह दिलानी चाही लेकिन कई बार ऐसा हो नहीं पाया। इन महिलाओं को इनका सम्मान वापस नहीं मिला।

भारतीय हस्तक्षेप

पूर्वी पाकिस्तान में हो रहे मानवाधिकार हनन की घटना पर विश्व में चर्चा तो थी लेकिन इसकी भर्त्सना नहीं की गयी। तत्कालीन शीत युद्ध की राजनीति में इस पर भी राजनीति ही खेली गयी। अपनी किताब 1971: अ ग्लोबल हिस्ट्री ऑफ़ द क्रिएशन ऑफ़ बांग्लादेश में श्रीनाथ राघवन ऐसे कुछ प्रतितथ्यात्मक प्रश्न उठाते हैं। मसलन, अगर अमेरिका याह्या खान की सरकार को आर्थिक और सामरिक सहायता न प्रदान कर रही होती तो ऑपरेशन सर्चलाइट कदाचित न हुआ होता। अगर भारत ने पहले ही हस्तक्षेप किया होता तो इतनी बड़ी मानवीय त्रासदी को टाला जा सकता था… और अंततः अगर घटनाएँ जैसे की घटी, अगर न भी हुई होती तो कैसे एक प्रान्त जो भाषाई और सांस्कृतिक आधार पर स्वतंत्रता चाहता था, अपने दमनकारी मेनलैंड राष्ट्र से लगभग 1000 मील की दुरी पर कब तक शांत बैठा दमन सहता रहता? भारतीय पूर्वी सीमा में पूर्वी पाकिस्तान से हो रहे बड़े पलायन का यही कारण था।1971-surrendar-800x445

राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय राजनीति के बन्धनों को समझती हुई तत्कालीन इंदिरा गाँधी सरकार ने अंततः यह निश्चय किया कि भारत को मानवीय आधार पर हसतक्षेप करना ही होगा। अमेरिका की ओर से निक्सन-किसिंजर के बनाये जा रहे दबाव के विरुद्ध सोवियत रूस के साथ 9 अगस्त, 1971 को “शांति, मैत्री, और सहयोग संधि” कर ली गयी थी। अपने सलाहकार पी.एन. हक्सर और पी.एन.धर से विचार कर श्रीमती गाँधी ने कई देशों का दौरा किया और पूर्वी पाकिस्तान में हो रहे मानवाधिकार हनन को प्रचारित किया। उन्होंने बड़ी समझदारी से भारत के रुख को अन्तराष्ट्रीय मंच पर रखा। शीत युद्ध की राजनीति का प्रतिउत्तर उन्होंने बखूबी दिया। जब यह सुझाव सामने आया कि संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनीधि पलायन कर आये शरणार्थियों को वापस भेजने को मनाएंगे तो श्रीमती गाँधी ने जवाब दिया कि “क्या लीग ऑफ़ नेशनस के प्रतिनिधि हिटलर की जर्मनी से पलायन कर चुके लोगों को वापस उसी आग में जलने को भेजने के लिए मना सकते थे?”

भारतीय नेतृत्व ने अपनी मंशा साफ़ कर दी थी। अमेरिका के विरुद्ध अब दूसरी महाशक्ति सोवियत रूस का भी साथ था। एक युद्ध राजनयिक मुनाफ़े के अतिरिक्त मानवीय मूल्यों के लिए लड़ना लाजमी हो चला था। मेजर के. सि. प्रवल द्वारा लिखी इंडियन आर्मी आफ्टर इंडिपेंडेंस में यह जानकारी दी गयी है कि अप्रैल 1971 में ही जनरल मानिक शॉ को “पूर्वी पाकिस्तान में जाने का” निर्देश दिया गया था। जनरल ने इंगित किया कि इसका तात्पर्य युद्ध होगा। सरकार की तरफ से हामी भरी गयी लेकिन जनरल मानिकशॉ ने सूचित किया कि सेना अभी युद्ध के लिए तैयार नहीं और योजना बनाने का समय दिया जाना चाहिए। ज्ञात हो कि उसके बाद अनौपचारिक रूप से भारतीय सेना और ख़ुफ़िया एजेंसी मुक्ति बाहनी के लड़ाको की ट्रेनिंग करती रही और जैसे ही जनरल मानिक शॉ ने तैयारी पूरी होने के संकेत दिए, युद्ध निश्चित हो गया।

16 दिसम्बर, 1971 को लेफ्टिनेंट जनरल ए.ए.के. नियाजी जो पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के कमांडर ऑफिसर थे, ने 93,000 से अधिक सैनिको के साथ आत्मसमर्पण कर दिया। पश्चिमी फ्रंट पर पाकिस्तान द्वारा 3 दिसम्बर, 1971 को शुरू किये गए ऑपरेशन चेंगिज़ खान जिसमे भारतीय वायु सेना को अपंग बनाने की योजना थी, के बाद औपचारिक युद्ध घोषणा के महज 13 दिनों में पाकिस्तानी आर्मी ने घुटने टेक दिए। यह कदाचित विश्व का सबसे छोटा और निर्णायक युद्ध था। इसके साथ ही नव-निर्मित बांग्लादेश में विजोय दिवस के साथ नए राष्ट्र को भारतीय सरकार ने सबसे पहले मान्यता भी दी।

कुछ सवाल

बांग्लादेश का उदाहरण राष्ट्रवाद के सन्दर्भ में भाषाई और सांस्कृतिक आयामों को केंद्र में ले आता है। आत्मा-निर्णय के अधिकार पर बहस अक्सर राष्ट्रवाद की बड़ी परिकल्पित विचारधारा से अंतर्विरोध ले लेती है। कई बार ऐसे अधिकारों को राज्य अपनी वैधानिकता को सुरक्षित करने के क्रम में मान्यता नहीं दे पाते हैं लेकिन जब इन अधिकारों का दमन होने लगे, और मानवाधिकार को निरंतर कुचला जाये तो हिंसा के कदम को इतिहास सहानुभूति से देखता है। बांग्लादेश के उदय का इतिहास भी इस रूप में देखा गया है। यह स्पष्ट होता है कि कई बार शांति स्थापना के लिए युद्ध का प्रयोग एक वर्चस्ववादी अतिरेक नहीं है।

इस उदाहरण को सामने रख कर कई एक्टिविस्ट दक्षिण एशिया की और समस्याएं- मुख्यतः कश्मीर का उदाहरण सामने लातें हैं। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि भारतीय लोकतंत्र हर विरोध पर विचारशील रहता है और संवाद के अवसर कभी बंद नहीं करता। राष्ट्रवाद की विशाल परिकल्पना ने कभी भी विविधता और अंतर्विरोध को पाटने का प्रयास नहीं किया है, बल्कि उसका उत्सव मनाया है। कई भाषाएँ, कई सांस्कृतिक प्रक्रियाएं, और संस्थागत संवाद का निरंतर प्रयास किसी भी अलगाववादी प्रवृत्ति को भारत में इसीलिए पांव फ़ैलाने से रोक पता है क्योंकि राष्ट्रवाद की परिकल्पना विवधता के आयामों की सुरक्षा को लेकर सजग है। इसीलिए विजय दिवस का महत्व मात्र एक युद्ध विजय से कहीं अधिक भारतीय राष्ट्रवाद की परिकल्पना, भारत के विचार की सजगता का परिचायक है जिसे स्वतंत्रता संघर्ष में निर्मित किया गया था।

(लेखक शान कश्यप नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (JNU) में इतिहास के छात्र हैं. व्यक्त विचार निजी हैं, चौपाल से संबंध नहीं)[sgmb id=”1″]

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