मीडिया: अब कितनी भरोसेमंद!

गुरुग्राम में हुए प्रद्युमन हत्याकांड ने पूरे देश को हिला कर रख दिया। आम मध्यम वर्गीय परिवार जीतोड़ मेहनत कर अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए क्या कुछ नहीं करते। अच्छे से अच्छे स्कूल में भेजना, बेहतर से बेहतर सुविधाएं देना परिवार और मां-बाप के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है।

वे सब अपने बच्चों को स्कूल भेज कर निश्चिंत हो जाते हैं। लेकिन स्कूलों से लगातार ऐसी ख़बरें आती रहती हैं, जो आम लोगों के भरोसे पर चोट करती है और हाल में ऐसी ख़बरों में भारी इजाफ़ा हुआ है। प्रद्युमन की हत्या के कुछ दिनों बाद ही दिल्ली में एक पांच साल की मासूम से बलात्कार का मामला सामने आया था। इसके अलावा शिक्षकों द्वारा बच्चों का सजा के तौर पर दी जाने वाली यातनाओं की खबरे तो आए दिन सामने आती हैं। और ये ख़बरें लगातार आ रही हैं। प्रद्युमन मामले में जांच अभी चल रही है और ये मामला और पेचीदा होता जा रहा है।

इस पूरे मामले में प्रद्युमन के माता-पिता की मानसिक अवस्था क्या होगी इसका अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है। समाज में जब इस तरह के अपराध होते हैं जिन पर विश्वास करना मुश्किल हो तब लोग उसके बारे में सब कुछ जानने के इच्छुक हो जाते हैं, शायद वे अपनी बारी के लिए सजग हो जाना चाहते हो।

लोगों तक पूरी ख़बर पहुंचाने और उन्हें सजग करने का ये काम आता है मीडिया के हवाले। अखबार, वेबसाइट या टीवी चैनल सब इन ख़बरों को फॉलो करते हैं या ये भी कह सकते हैं कि पीछे पड़ जाते हैं। फिर चाहे बात राम रहीम और हनाप्रीत मामले की हो या फिर प्रद्युमन हत्याकांड की मीडिया ऐसे मामलों को सनसनी और हैरतअंगेज तरह से पेश करती है। कई बार तो ये बहुत ही असंवेदनशील और फूहड़पन की हद तक पहुंच जाता है।

कुछ यही हुआ प्रद्युमन हत्याकांड में, बेटे की मौत के बाद मां-बाप की हालत को ना तो बयां किया जा सकता है और ना ही कोई महसूस ही कर सकता है। किसी के घर का चिराग बुझ जाना कैसे जिंदगी को खाली कर देता है ये प्रद्युमन के मां-बाप को देखकर कुछ-कुछ समझा जा सकता है। देश-दुनिया तक इस ख़बर को पहुंचाना और लोगों को बताना कि उनके बच्चों के साथ स्कूल में क्या-क्या हो सकता है। इसका जिम्मा हमेशा की तरह मीडिया पर ही था। लेकिन अफसोस कि मीडिया और खासकर टीवी मीडिया आगे जाने की होड़ और टीआरपी के चक्कर में ऐसा फंसा कि इंसानियत और संवेदनाएं भी भूल गया। बात किसी एक टीवी चैनल या किसी एक रिपोर्टर की नहीं है। लगभग सभी ने एक जैसा ही काम किया फिर चाहे वो नए बने रिपोर्टर हों या सालों से टीवी का चेहरा और भरोसा माने जाने वाले लोग। सबने प्रद्युमन के माता- पिता से ऐसे सवाल किए जो कतई पूछे नहीं जाने चाहिए थे। लेकिन इन सबके बीच दो अंग्रेजी टीवी चैनलों ने कुछ ऐसा किया जिसने मीडिया का सिर झुका दिया। एक रिपोर्टर की अपरिपक्वता और उस पर दवाब क्या कर सकता है ये पूरे देश ने देख लिया। हालांकि ये अच्छी बात है कि इस अंधी होड़ में मीडिया के ही कई लोगों ने इस घटना की निंदा की। इससे पता चलता है कि जो भी हुआ वो गलत था और उसे माना भी जा रहा है। सवाल उठता है कि…

क्या मीडिया असंवेदनशील है?
बिल्कुल तो नहीं, ऐसा मान लेना ग़लत होगा। मीडिया के भीतर अभी भी संवेदनाएं हैं चाहे ऐसे रिपोर्टर और चेहरे कम हो पर वे हैं। और पूरी मुस्तैदी से अपना काम कर रहे हैं। ये घटनाएं गलत है पर मीडिया को इसे एक मौके के तौर पर लेना चाहिए। मीडिया के बड़े टीवी चैनलों को मिल कर इस पर विचार करना चाहिए और एक आदर्श स्थापित करने की कोशिश करनी चाहिए कि ऐसे मामलों में बार- बार पीड़ित परिवार की बाइट/बयान लेने के चक्कर में कहीं मीडिया उन्हें परेशान तो नहीं कर रहा। हर बार अलग-अलग माइक आईडी लगाकर वहीं सवाल बिल्कुल ऐसे लगते हैं जैसे घाव पर नमक लगाना। टीवी चैनल्स आगे आएं कि ऐसे मामलों में बिना माइक आईडी के सिर्फ एक माइक से सारे सवाल और बयान एक बार में पूछ लिए जाएं। इसके लिए न्यूज़ एजेंसी जैसे एएनआई पहले ही काम कर रही है। आपका रिपोर्टर बस घटना स्थल से रिपोर्टिंग करे तथ्यों को बताए और ख़बर को फॉलो करे। टीवी चैनल भी अपने शो में लाइव बात करने के चक्कर में पीड़ितों को परेशान ना करें और अपने रिपोर्टर पर बयान लेने का दवाब ना डालें। संवेदनशील मामलों में मंझे हुए और अनुभवी रिपोर्टर्स को ही कवर करने भेजना चाहिए। और ऐसी घटनाएं वैसे ही मार्मिक होती हैं तो इनमें और सनसनी पैदा करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। टीवी चैनल्स की कई बार आलोचना की जाती है कि वो भरोसे के काबिल नहीं है। लोग सलाह देते हैं कि न्यूज़ चैनल्स देखना बंद कर देना चाहिए, और ऐसा हो भी रहा है।

क्या अब मीडिया पर भरोसा नहीं रहा?
न्यूज़ चैनल्स की विश्वसनीयता पर बड़ा असर पड़ा है। और इसके लिए वे खुद जिम्मेदार हैं। बड़े-बड़े संपादक किसी घटना को ऐसे पेश करने का आदेश देते हैं कि सारी जनता उसकी चैनल पर टूट पड़े। और चैनलों की देखा-देखी से ये हरकत अपने चरम पर पहुंच जाती है। जिसका परिणाम ऐसे ही सामने आता है। लेकिन मीडिया मतलब सिर्फ टीवी नहीं है। आज अखबार, पत्रिकाओं के अलावा डिजिटल मीडिया भी है। न्यूज चैनल्स को इस ओर ध्यान देना चाहिए। हां, लेकिन न्यूज चैनल्स को बिल्कुल खारिज भी नहीं किया जा सकता। बल्कि इनका होना अभी भी बहुत जरूरी है। प्रद्युमन मामले में ही देखें तो प्रद्युमन के मां-बाप लगातार टीवी के सहारे सीबीआई जांच की मांग करते रहे। लोगों तक ये बात टीवी ने ही पहुंचाई और सरकार पर दवाब भी बना। आरोपी कंडक्टर के मामले में भी टीवी ने उसके रिश्तेदारों और साथ काम करने वालों से बात की जिससे ये बात सामने आ रही है कि ये मामला बिल्कुल वैसा भी नहीं है जैसा पुलिस बता रही है।

बात ये है कि मीडिया पर लोगों का भरोसा ख़त्म नहीं हुआ है लेकिन इसे बनाए रखने की जिम्मेदारी मीडिया पर ही है। टीवी चैनल्स पर सबसे ज्यादा क्योंकि इसके लिए उसे ही दोषी बताया जा रहा है और काफी हद तक वो हैं। तो ये समय है कि वे इस पर विचार करें और अपनी खोई और लगातार कम हो रही विश्वसनीयता को बनाए रखें क्योंकि एक सफल लोकतंत्र के लिए मीडिया पर लोगों का विश्वास होना बहुत जरूरी है।

(लेखक शशांक पाठक राज्यसभा टीवी में पत्रकार हैं। व्यक्त विचार निजी हैं, चौपाल से कोई संबंध नहीं)

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