नोटबंदी के साथ कुछ और कदम उठाए सरकार

– शशांक पाठक (@_ShashankPathak)

नोट बंदी के फैसले के बाद से अब तक जो भी ख़बरें आईं हैं वे सब दो तरह की तस्वीरें बयां कर रही हैं। हालांकि प्रधानमंत्री ने देशवासियों से banपचास दिन का समय मांगा है, साथ मांगा है और जब देश के प्रधानमंत्री ऐसा कहें तो उनके फैसले पर भरोसा करना भी चाहिए। लेकिन सवाल ये है कि क्या पुराने बड़े नोट बंद करने से काले धन पर लगाम लगाई जा सकेगी क्या इस तरह के कदम काले धन पर लगाम लगाने के लिए काफ़ी हैं। इस फैसले के असर के लिए कुछ महीनों तक इंतजार करना ही होगा। उसके बाद ही इसके नतीजे और नुकसान की बात सही तरह से की जा सकेगी।कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ये कदम काफी नहीं है। आंकड़े भी बताते हैं कि काले धन में नकदी यानि नोटों का कुल 6 फीसदी हिस्सा ही है। लेकिन सरकार ने इस फैसले से काले धन के अलावा नक्सवादियों और आतंकियों को हो रही फंडिंग के साथ ही जाली नोटों पर लगाम लग जाने की बात भी कही, जिसे नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार के इस फैसले पर राजनीतिक हलकों से भी मिलीजुली प्रतिक्रिया मिल रही है। हालांकि फैसले के बाद हो रही बदइंतज़ामी का सभी ने विरोध किया है।

प्रधानमंत्री के इस फैसले के बाद आम जनता को ऐसे लगता है कि अब सरकार काले धन के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए तैयार है और कर भी रही है और उसे इस मुहिम में देश का साथ भी मिल रहा है तो क्यों ना इसके साथ ही राजनीतिक चंदे का सवाल भी उठाया जाए और ये सवाल लाजिमी भी है। सब जानते हैं कि चुनाव हो या कोई आम रैली… राजनीतिक दल इन पर कितना खर्चा करते हैं और ये पैसा कहां से आता है? आप किसी राजनीतिक दल से चंदे की जानकारी सूचना के अधिकार यानि आरटीआई के तहत नहीं मांग सकते। ये बात अब किसी से छिपी कि राजनीतिक दलों को कॉरपोरेट घरानों से मोटा चंदा मिलता है। ये चंदा अपने फायदे को ध्यान में रख कर ही दिया जाता है। कॉरपोरेट सुविधा के बदले लाभ की नीति पर काम करता है। वो राजनीतिक दलों को फंड के रूप में सुविधा देता है और जीत जाने के बाद सरकार से कई तरह की छूट और कई तरह से लाभ लेता है। सरकार और कॉरपोरेट की इसी दोस्ती के लिए अर्थशास्त्र में “क्रोनी कैपिटलिज्म” शब्द का प्रयोग किया जाता है। चुनाव में होने वाले खर्चे की बात को प्रधानमंत्री ने भी कई बार दोहराई है और विधानसभा-लोकसभा चुनाव साथ-साथ कराने का प्रस्ताव भी कई मंचों से दे चुके हैं।

black-moneyकाले धन के खिलाफ असली लड़ाई के लिए ये बहुत जरूरी है कि चंदे के लिए राजनीतिक दलों की कॉरपोरेट से मिलने वाले चंदे पर निर्भरता को कम किया जाए क्योंकि तभी सरकारें काला धन जैसी बुराइयों के खिलाफ सख्त कदम उठा सकने में सक्षम होंगी औऱ बिना किसी बाहरी दवाब के काम कर सकेंगी। फिलहाल राजनीतिक दल अपने रोजमर्रा के खर्च और खासकर चुनावी खर्च के लिए ऐसे ही स्रोतों पर निर्भर हैं।

फिलहाल उम्मीदवारों के खर्च की सीमा तो तय है, मगर राजनीतिक दलों के चुनाव खर्च की कोई हद नहीं है। हालांकि उम्मीदवार भी तय सीमा से कई गुना ज्यादा खर्च करते हैं।

सवाल ये भी है कि अगल राजनीतिक दल कॉरपोरेट से चंदा ना ले तो फ़िर क्या करें, एक विचार है कि चुनाव लड़ने के लिए राजनीतिक दलों को सरकार से पैसा मिले, यानि “स्टेट फंडिंग” हो। कई देशों में होती भी है, दुनिया में 70 से ज्यादा मुल्कों में पूरी तरह या आंशिक रूप से ये व्यवस्था कायम है। 2011 के अन्ना आंदोलन के दौरान भी राजनीतिक दलों के लिए स्टेट फंडिंग का मुद्दा उठा था । इसके अलावा चुनाव सुधार के लिए बनी कई समितियों-आयोगों ने भी समय-समय पर इसकी वकालत की मुख्यता राजनीतिक सुधारों पर सुझाव देने के लिए बनी इंद्रजीत गुप्त समिति ने 1998 में स्टेट फंडिंग का समर्थन किया था। 1999 में विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि राजनीतिक दलों को पूरा खर्च सरकारी कोष से देना वांछित है। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने 2008 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में राजनीतिक दलों को सरकार से आंशिक चंदा देने का पक्ष लिया । और भी कई आयोगों ने इस पर अपनी राय दी।

ये सवाल भी है कि स्टेट फंडिंग की बात मान भी ली जाए तो इतना धन कहां से आएगा ? अगर इस सिद्धांत पर सहमति बन जाए, तो धन जुटाने और बांटने के फॉर्मूले तैयार किया जा सकते हैँ। एक राष्ट्रीय चुनाव कोष बनाने का भी सुझाव दिया गया है, जिसमें कॉरपोरेट घराने चंदा दें। उसके बही-खातों का ऑडिट निर्वाचन आयोग द्वारा तय स्वतंत्र ऑडिटर करे अथवा ये काम सीएजी को सौंपा जाए।

हालांकि अभी तक ऐसे परिणाम सामने नहीं आए हैं जिससे ये पता चले कि स्टेट फंडिंग काले धन पर रोक लगाने के लिए कितना कारगर सिद्ध होगा । हालांकि स्टेट फंडिंग से क्या लाभ होंगे ये बहस का मुद्दा है पर यही एक मात्र विकल्प नहीं है सबसे पहले तो राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे को सार्वजनिक करना जरूरी है। फिर इसे आरटीआई के दायरे में लाना। लेकिन स्टेट फंडिंग ये उम्मीद तो की ही जा सकती है कि इससे स्वच्छ और ईमानदार राजनीति को बल मिलेगा। राजनीतिक दलों की कॉरपोरेट पर निर्भरता कर होगी और पीछे के दरवाजे से सरकार और नीतियों को प्रभावित करने के चलन पर भी अंकुश लगेगा।

इसके अलावा जो सबसे जरूरी कदम है वो है राजनीतिक दलों के चंदे को पारदर्शी करना जिसकी उम्मीद अब हर देशवासी कर रहा है और करे भी क्यों ना। काले धन के खिलाफ इस जंग में प्रधानमंत्री को ही इसकी शुरुआत करनी चाहिए और राजनीतिक दलों के चंदे को पारदर्शी बनाने और उसे आरटीआई के दायरे में लाने के लिए देशव्यापी चर्चा करनी चाहिए। क्योंकि बिना राजनीतिक दलों के चंदे पर लगाम लगाए काले धन के खिलाफ लड़ाई अधूरी और बेईमानी ही साबित होगी।

(लेखक शशांक पाठक राज्यसभा टीवी में पत्रकार हैं। व्यक्त विचार निजी हैं, चौपाल से कोई संबंध नहीं)

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