गडिया लोहर… इतिहास को संजोए जिंदगी काटता समुदाय

राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर ये लोग कौन हैं, इनकी क्या जाति है, कहां रहते हैं, क्या करते हैं, क्या पहचान है? कुछ दिन पहले ही दिल्ली में कुछ ऐसे लोगों ने प्रदर्शन किया, जिनसे अगर ये सवाल किए जाएं, तो उनके पास जवाब तो होंगे पर सिद्ध करने के लिए प्रमाण नहीं। वैसे तो हम और आप इन्हें बखूबी जानते हैं। रोज ही कहीं-ना-कहीं वे दिख जाते हैं, हर शहर, गांव या कस्बे में। ये गडिया समुदाय के लोग हैं…देश की घुमंतु जनजाति, खानाबदोश जनजाति। ये सब इकठ्ठा हुए अपने हक़ के लिए, एक नागरिक के तौर पर मूलभूत अधिकार के लिए जो इन्हें अब तक नसीब नहीं हुए। ये मांग कर रहे है कि इन्हें अनुसूचित जनजाति में शामिल किया जाए। इनके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और मकान जैसी सुविधाएं मुहैया कराई जाएं।

सालों से हाशिए पर पड़े इस समाज में अब असुरक्षा की भावना बढ़ने लगी है। जिसका ताजा उदाहरण जंतर-मंतर पर हुआ इनका प्रदर्शन है। ऐसा नहीं है कि इनके लिए कुछ हुआ नहीं। आजादी के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने चित्तौड़गढ़ में इनकी एक सभा बुलवाई थी, जिसमें माणिकलाल वर्मा ने इनकी बेहतरी के लिए कुछ सुझाव दिये थे। लेकिन सरकारी उदासीनता के चलते वे ठंडे बस्ते में चले गए। हालांकि राजस्थान और इक्का दुक्का राज्यों में कागजी तौर पर गडिया समुदाय के लिए कुछ योजनाएं जरूर चल रही हैं।

वैसे तो लोहे को घरेलू सामान और औजार बनाकर इस समुदाय की कई पीढ़ियों ने अपना जीवन काट दिया, पर अब ये काम आने वाली पीढियों के लिए आसान नहीं रह गया है। बाजार के उदारीकरण और मशीनीकरण के आगे अब इनका पीढ़ियों से चला आ रहा व्यापार दम तोड़ रहा है।दूसरी तरफ मौजूदा और आने वाली पीढ़ियां ना तो अपने पूर्वजों की तरह खानाबदोश जीवन जीना चाहती है और ना ही पूर्वजों की कसम को आगे बढ़ाना चाहती है। अब वे भी अपने बच्चों के लिए सुनहरे सपने संजोते हैं। दरअसल बाजार के बढ़ते प्रभाव से इस समुदाय की रोजी-रोटी पर गहरी चोट लगी है। पहले जिस काम से इनका गुजारा चल जाता था अब वो दो जून की रोटी के लिए भी नाकाफी साबित हो रहा है। इसके अलावा सरकारी और सामाजिक अनदेखी भी इस समुदाय में असुरक्षा की भावना को बढ़ा रही है। कभी अपनी घरेलू जरूरतों के लिए इस समुदाय पर निर्भर रहने वाला हमारा समाज अब इनसे कटता जा रहा है।

देश के हर कोने में पाया जाने वाला ये समुदाय सभी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। इनके पास ना घर है, ना नौकरी, ना व्यापार, ना स्वास्थ्य और ना शिक्षा। ये इतिहास को संजोए जिंदगी काटता समुदाय है। दरअसल यहां जिस इतिहास का जिक़्र किया जा रहा है वो बेहद दिलचस्प है। गडिया लोहार मूलरूप से राजस्थान के निवासी हैं। माना जाता है कि मेवाड़ में अकबर की सेना के ख़िलाफ़ युद्ध में गडिया लोहार समुदाय ने महाराणा प्रताप का साथ दिया था। उनके साथ युद्ध किया और हथियार भी बनाए। मेवाड़ को मुगलों ने जीत लिया, तो इस समुदाय ने ये प्रण लिया कि वे मेवाड़ तभी लौटेंगे जब वो आज़ाद हो जाएगा। तब तक ना तो वे स्थाई घर बनाएंगे और ना एक जगह रुकेंगे। बस तब से ही ये समुदाय घुमंतु जीवन जी रहा है। ये ऐसे ही गांव दर गांव भटकते रहे और चलते रहे। इनकी कई पीढ़ियां बैलगाड़ियों में सिमट कर खत्म हो गईं। इन्हें लोहे का काम आता था इसलिए इन्होंने गृहस्थी के सामान और औजार बनाना शुरु कर दिया। उस दौर में तो इनके बनाए औजारों की खूब मांग थी सो इनका जीवन कट जाता था, लेकिन अब हालात विपरीत हैं। अपने पूर्वजों के प्रण का मान और उनकी कला के सहारे इनकी कई पीढ़ियां खत गईं। एक समय अपने समाज के लिए लड़ने और उसके लिए इतना बड़ा त्याग करने वाले इस समुदाय को बदले में समाज से कुछ भी नहीं मिला। अब बाजार में ना तो इनकी कोई जगह है और इनके बनाए सामानों की। ये समुदाय में अब इस बात को बखूबी समझ रहा है, इसलिए अब ये अपने पूर्वजों के प्रण से आने वाली पीढ़ी को आज़ाद देखाने चाहता है।

(लेखक शशांक पाठक राज्यसभा टीवी में पत्रकार हैं। व्यक्त विचार निजी हैं, चौपाल से कोई संबंध नहीं)

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