जयंती विशेष-14 साल में ‘राज’ की राइफ़लों से भरी बैलगाड़ी लूटने वाले ‘लम्बोदर मुखर्जी’

13895560_1216048118465189_1034135516421130503_nज़िंदगी में स्वतंत्रता सबसे महत्वपूर्ण होती है या यूँ कह लें, स्वाधीनता जीवन का मूल अर्थ है। मगर हमारे देश का इतिहास दो सौ सालों की पराधीन दासता को बयां करता है। साल 1947 में हमारा भारत देश दो सदियों की गुलामी की जंजीरों से आज़ाद हुआ। उस वर्ष 15 अगस्त वह दिन था जब करोड़ों हिंदुस्तानियों ने आज़ादी की सांस ली। इस आज़ादी के लिए लाखों भारतीयों ने अपना जीवन तक क़ुर्बान कर दिया। 200 सालों की गुलामी की दास्तां में से सौ सालों का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की घटनाओं से परिपूर्ण है। इस ऐतिहासिक क्रांति में योगदान करने वाले कई नाम आज इतिहास में प्रसिद्ध हैं, मगर हिंदुस्तान को आज़ादी दिलाने में लाखों ऐसे सेनानियों का भी हाथ है जिनका नाम इतिहास के पन्नो में कहीं गुम है। उन्हीं गुमनाम सेनानियों में से एक थे डॉक्टर लम्बोदर मुखर्जी!
                  114 साल पहले16 जनवरी के दिन मुर्शिदाबाद के तेलसूंधि नामक गाँव में लम्बोदर मुखर्जी का जन्म हुआ। अपने ननिहाल में पैदा होने वाले इस बालक की शायद बदकिस्मती ही थी जो उसे पिता का प्यार कभी नहीं मिला। उनके जन्म के कुछ महीनो पहले ही पिता शिवराम मुखर्जी का देहांत हो गया। लम्बोदर का बचपन यूँ तो कठिनाइयों से भरा हुआ था मगर वे आगे चल कर स्वतंत्रता-सेनानी बने, उन्हें तो बचपन से ही संघर्ष करने की आदत थी। उनकी बहादुरी इस घटना से समझी जा सकती है, जब उन्होंने केवल 14 वर्ष की आयु में अंग्रेजों की राइफ़ल से भरी एक बैलगाड़ी को लूट लिया।
                प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने के बाद लम्बोदर एक कोयला खदान में बतौर प्रशिक्षु काम करने लगे, लेकिन खदान में मज़दूरों के व्यापक शोषण को देखने के बाद इनका मन वहाँ से उचट गया। कुछ ही समय बाद सन 1920 में वे सब कुछ त्याग कर स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े। 1924 में वे चितरंजन दास के नेतृत्व में सत्याग्रह आंदोलन से आ जुड़े। उस वक़्त किसी ने सोचा भी नहीं था कि मुख्यधारा से कटे आदिवासियों की भी स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका हो सकती है। लम्बोदर मुखर्जी ने संथाल परगना को अपना कार्य क्षेत्र चुनते हुए लाल कुर्ता पार्टी का गठन किया। उनके नेतृत्व में इस पार्टी ने स्वाधीनता संग्राम के विभिन्न आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसी दौरान  वे गिरफ्तार भी हुए।
                   DSC04774जेल से रिहा होने के बाद भी लम्बोदर मुखर्जी का संघर्ष जारी रहा। 1930 के दशक में उन्होंने संथाल परगना में सफाहोड़ आंदोलन का भी नेतृत्व किया। इस वक़्त तक लम्बोदर संथालियों के मसीहा बन चुके थे। आगे चल कर देवघर व दुमका क्षेत्र के संथाल आदिवासियों के बीच वे प्रमुख रूप से सक्रिय रहे। संथालों के बीच इनकी लोकप्रियता इतनी अधिक थी की क्षेत्रीय ब्रिटिश अधिकारी भी इनके नाम से सतर्क रहते थे। यह वक़्त था जब गाँधी जी के स्वदेशी आग्रह को देश भर में फैलाने की कोशिश चल रही थी। इसी दौरान कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में स्वदेशी आंदोलन को संथालियों के बीच प्रचारित करने के लिए डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद का आगमन दुमका क्षेत्र में हुआ। उस वक़्त किसी ने सोचा भी नहीं था कि जो इंसान लम्बोदर मुखर्जी की मदद से संथाल परगना में कांग्रेस के स्वदेशी आंदोलन को घर घर पहुँचा रहा है वही आगे चल कर देश के प्रथम राष्ट्रपति बनेंगे।
            इसी दौरान लम्बोदर हिंदू मिशन से भी आ जुड़े। अंग्रेजों द्वारा संथालियों का जबरन धर्म परिवर्तन करवाया जाता था। वे लम्बोदर मुखर्जी ही थे जिन्होंने उन संथालियों के घर घर जाकर उन्हें वापस हिंदू बनाया। बिहार में आए साल 1934 के भीषण भूकंप से मची तबाही ने उन्हें झकझोर कर रख दिया। उस वक़्त वे भूकम्प पीड़ितों की मदद के लिए मुंगेर जा पहुँचे।
        इसके बाद लम्बोदर की सक्रियता स्वाधीनता संग्राम में और भी बढ़ गई जब वे कांग्रेस से आ जुड़े। साल 1935 में इनका विवाह एक स्वतंत्रता सेनानी परिवार की कन्या उषा रानी से हुआ, लेकिन विवाह के बाद भी इनकी सक्रियता में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं आई, बल्कि इन्हें अपनी धर्मपत्नी का भरपूर सहयोग मिलने लगा। मुखर्जी के राजनीतिक गुरु रहे भवभूसन मित्र ने ही इनकी शादी करवाई।
                DSC04123     1938 का वह साल था जब नेता जी सुभाष चन्द्र बोस अपने फॉर्वर्ड ब्लाक के प्रचार प्रसार के लिए संथाल परगना आ पहुँचे। उस वर्ष की गर्मियों की एक मध्य रात्रि में अंग्रेज़ी पुलिस की नज़रों से बचते हुए सुभाष चंद्र बोस दुमका में लम्बोदर के घर आ पहुँचे।  मुखर्जी दंपत्ति के सहयोग और मित्रता से सुभाष इतने प्रभावित हुए की लम्बोदर की पत्नी को अपनी बहन बना डाला और इसी तरह उषारानी मुखर्जी संथाल परगना में फॉर्वर्ड ब्लाक की प्रथम सभा नेत्रि बनी।
        आंदोलन के दौरान मुखर्जी और उनके साथियों को अंग्रेज़ी हुकूमत से बचने के किए विभिन्न जगहों पर भेष बदल कर रहना पड़ा। कभी देवघर दर्ज़ी बन कर रहे तो कभी दुमका में वे कसाई बन कर रहे। उस समय के प्रसिद्ध होम्योपैथिक चिकित्सक डॉक्टर परेश बनर्जी, (मिहिजाम) के यहाँ लम्बोदर कई महीनो तक काम्पाउंडर बन कर रहे। कह सकते हैं की यही वो वक़्त था जब उन्होंने होम्योपैथी की शिक्षा अंजाने में ही ग्रहण कर ली।

                उन दिनों जब रेडियो-टेलिविज़न की किसी ने कल्पना भी नहीं की थी, मुखर्जी दंपत्ति साइकल पर बाइस्कोप लगा कर गाँव-गाँव आज़ादी के का प्रचार प्रसार करते थे। इससे इनकी लोकप्रियता पूरे क्षेत्र में दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। उस वक़्त की सीआईडी रिपोर्ट के अनुसार लम्बोदर मुखर्जी की लोकप्रियता डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद से भी कहीं अधिक थी। इस वक़्त तक पूरे संथाल परगना में वे मारंग बाबा के नाम से मशहूर हो गए थे। वहीं उनकी पत्नी उषा रानी को संथाल माता का दर्जा मिला।

            लम्बोदर मुखर्जी की गतिविधियों से तंग आकर इनके ख़िलाफ़ दुमका में मुक़दमा चलाया गया और इन्हें इस मुक़दमे में सजा हुई। साल 1939 के बीच में लम्बोदर मुखर्जी को नज़रबन्द कर मोतिहारी जेल भेज दिया गया। यहाँ एक ऐतिहासिक घटना हुई जिसने लम्बोदर मुखर्जी को डॉक्टर लम्बोदर मुखर्जी बना दिया। जिस शाम वो मोतिहारी जेल पहुँचे थे उस वक़्त दरोग़ा के घर पर मातम का माहौल था। उन दिनों मोतिहारी में कोलेरा एक जानलेवा बीमारी थी और दरोग़ा की बेटी भी इसी बीमारी का शिकार बन चुकी थी। तब लम्बोदर मुखर्जी ने होम्योपैथ चिकित्सा से उस बच्ची की जान बचाई।

             इसके बाद उन्हें पुलिस द्वारा नगर के पैरडायस होटल में होमीओपैथ चिकित्सा करने की अनुमति मिल गई, मगर प्रतिदिन उन्हें थाने में हाजरी देने जाना पड़ता था। इस दौरान उनकी पार्टी अपने क्षेत्र में काफ़ी घटनाओं को अंजाम देती रही। नज़रबन्द होते हुए भी डॉ मुखर्जी मोतिहारी से ही अंग्रेजों के ख़िलाफ़ गुप्त रूप से आंदोलन करते रहे।

            इस दौरान लम्बोदर मुखर्जी का नाम राष्ट्रीय स्तर के स्वतंत्रता सेनानियों की सूची में शामिल हो चुका था। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की तैयरियां ज़ोरों पर थीं और नेता जी से क़रीबी ने आज़ाद हिंद फ़ौज में लम्बोदर मुखर्जी की अहम भूमिका तय कर दी थी।

         भारत छोड़ो आंदोलन से ठीक पहले जिन स्वतंत्रता सेनानियों पर शूट एट साईट का ऑर्डर दिया गया था उनके से एक नाम लम्बोदर मुखर्जी का भी था। मगर आंदोलन शुरू होने से ठीक पहले हीं मुखर्जी दंपत्ति को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया। हज़ारीबाग़ सेंट्रल जेल में जहाँ लम्बोदर मुखर्जी को जयप्रकाश नारायण का साथ मिला वहीं जयप्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती देवी भागलपुर सेंट्रल जेल में उषा रानी मुखर्जी की सहेली बनीं। ये वह वक़्त था जब भागलपुर सेंट्रल जेल में हीं उषा रानी ने एक बच्ची को जन्म दिया जो आगे चल कर भारतीय सेना की पहली महिला पैराट्रूपर बनीं। बाद में इन्होने ही साल 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में दुश्मनों के दांत खट्टे किए।

      03  सन 1946 में जब देश में पहली बार अंतरिम सरकार का गठन किया गया तब कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में इन्हें दुमका से निर्विरोध विधानसभा सदस्य चुना गया । आज़ादी के बाद के आम चुनावों में भी लम्बोदर मुखर्जी की सता कायम रही। उन दिनों देश भर के कई प्रमुख राजनेताओं से लम्बोदर मुखर्जी के अच्छे सम्पर्क रहे। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के लिए दुमका में लम्बोदर मुखर्जी का घर आम पड़ाव था।
मगर लम्बोदर मुखर्जी को राजनीति का भविष्य समझने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगा और उन्होंने उसी दौरान राजनीति में अपनी सक्रियता को त्याग दिया। ये उस समय की बात है जब मुखर्जी वापस मोतिहारी आकर बस गये जहाँ गुलामी के दौरान ही वे होम्योपैथिक चिकित्सक के रूप में काफी प्रसिद्ध हो चुके थे। राजनीति में सक्रियता उनकी भले ही कम हो चुकी हो मगर समाज सेवा में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। वे आजीवन एक होम्योपैथिक चिकित्सक एवं समाज सेवी के रूप में ग़रीबों की मदद करते रहे।
राजनीति में उनकी पहचान कुछ ऐसी थी की बिहार के लगभग सभी मुख्यमंत्रियों का उनके घर पर आना आम हो चुका था। एक समय में वे देश भर के करीब सौ संस्थाओं के शीर्ष पदों पर रहें। एक लम्बे समय तक वे बिहार होम्योपैथिक एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहें। होम्योपैथ चिकित्सा पद्धति को बिहार में स्थापित करने का श्रेय काफी हद तक इन्हीं को जाता है। इन्हीं के प्रयासों से बिहार में न केवल होम्योपैथ बोर्ड का गठन हुआ बल्कि होम्योपैथ के चिकित्सकों को भी डॉक्टर की आधिकारिक उपाधि दी जाने लगी।
1970 के दशक में देश की आयरन लेडी कही जाने वाली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भी मुखर्जी दम्पति के अच्छे सम्पर्क रहे। इसी दौरान इंदिरा गांधी ने मोतिहारी में उषा रानी मुखर्जी को उनकी स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका के लिए ताम्र पत्र से पुरस्कृत किया। उन दिनों जे पी आंदोलन के बाद जयप्रकाश नारायण जब भी मोतिहारी आते तो लम्बोदर मुखर्जी से मिले बिना वापस नहीं जाते। उनके इसी निवास पर बिहार के मुख्यमंत्री रहे जगन्नाथ मिश्र व करपुरी ठाकुर की कई बैठकें भी हुईं। डॉक्टर लम्बोदर मुखर्जी ने आजीवन अपनी पेन्शन  की राशि गरीबों में ही बाँट दीं । जब तक वे होम्योपैथिक चिकित्सक के रूप में सक्रिय थे, उन्होंने गरीबों का मुफ़्त में इलाज किया । जहाँ साल 1987 में कैन्सर से पीड़ित उनकी पत्नी ने देह त्याग दिया वहीं २६ दिसम्बर 1994 को इस महान व्यक्ति ने भी संसार को अलविदा कह दिया। मगर उनकी समाज सेवा की परम्परा डॉक्टर लम्बोदर मुखर्जी के फ़ाउंडेशन के बैनर तले आज भी जीवित है।
डॉ लम्बोदर मुखर्जी फ़ाउंडेशन की स्थापना 16 जनवरी, सन 2000 में मोतिहारी, बिहार में की गई थी। यह फ़ाउंडेशन मोतिहारी में अपनी सामाजिक भूमिका के लिए पहचाना जाता है। फ़ाउंडेशन की ओर से समय-समय पर समाज हित से जुड़ी गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं। बाढ़ व आपदाओं के समय राहत व बचाव तथा निःशुल्क चिकित्सा सेवाएं आदि के रूप में यह संस्था मोतिहारी में सदा से सक्रिय व तत्पर रही है। इसके अलावा इस फ़ाउंडेशन ने मोतिहारी के इतिहास व संस्कृति से जुड़े स्मारकों व स्थलों की दुर्दशा की ओर न केवल लोगों का ध्यान आकर्षित किया है बल्कि उन्हें जागरूक करते हुए इस दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम भी उठाए हैं। आज यह फ़ाउंडेशन न केवल मोतिहारी बल्कि आसपास के जिलों में भी बुद्धिजीवियों के बीच एक साझा मंच की तरह स्थापित हो रहा है।
इसी फाउंडेशन के अंतर्गत गांधी का चंपारण फिल्म बनी जिसे हाल ही में दरंभंगा फिल्म पुरस्कारों के लिए चुना गया है।
(लेखक विश्वजीत मुखर्जी, एक बेबाक स्वतंत्र पत्रकार और डॉक्युमेंट्री फिल्म निर्माता हैं. गांधी का चंपारण से पहले बिश्वजीत द्वारा वहुचर्चितडॉक्युमेंट्री ऑरवेल, बट वाय?, अस्सी, द लॉस्ट रिवर और सेंट मेरीज़, द हेरीटेज़ इन रूइन्स बनाई गईं जिनको अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काफी सराहा गया है)
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1 Comment


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    Very enriching article and very well articulated.

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