मोदी विरोध की अंतर्कथा

“मोदी से कुछ लोग इस हद तक घृणा करते हैं कि इस असंगत घृणा की वजह से कई सारे राजनैतिक विश्लेषक अपनी निष्पक्षता/वस्तुनिस्ठता खो रहे हैं। उनको (मोदी को) घुटनों पर देखने के उतावलेपन में वे अर्थहीन शब्दों में अर्थ खोजते हैं”


मेरे एक पत्रकार मित्र, जिन्हें मैं बहत लंबे समय से जनता हूँ, ने बताया कि जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो वह इतना अवसाद ग्रस्त हो गए कि एक हफ्ते तक अपने हॉस्टल के कमरे से बाहर नहीं निकले। ये मित्र, जो भारत में हर उपराष्ट्रवादी आंदोलन का समर्थन करते हैं, लेकिन कभी किसी भी चुनावी नतीजों का सही अनुमान नहीं लगा पाए। मेरे यह मित्र काफी दर्द सहकर भी खूब यात्राएं करते हैं, खास तौर पर सुदूर क्षेत्रों की भी… उत्तर प्रदेश विधान सभा के चुनावी नतीजों से ठीक पहले, हम दोनों एक अन्य मित्र के घर पर मिले। मैंने पूछा कि इस बार उत्तर प्रदेश चुनाव का विजेता कौन होगा? उन्होंने उत्तर देने से पहले ही कहा, “पहले तुम बताओ, तुम भी तो थोड़ा-बहुत घूमे हो”। मैंने कहा, मुझे लगता है कि भारतीय जनता पार्टी जीतेगी; इसके साथ ही मैंने यह भी जोड़ा कि मायावती का भी मौका बन सकता है, अगर उनके पारंपरिक ‘खामोश’ मतदाता वास्तव में पूरी ताकत से उनको वोट कर दें, जैसा कि कई दलित बुद्धिजीवियों ने मुझसे दावा किया। अपने चेहरे पर एक समझदारी भरी मुस्कुराहट के साथ, मेरे मित्र मेरी तरफ झुके और बोले, “नहीं, समाजवादी पार्टी-कांग्रेस पार्टी का गठबंधन जीतेगा” फिर उन्होंने आंकड़ों की एक ऐसी बौछार कर दी जिसकी मैं समझ नहीं कर सकता था, उसके बाद उन्होंने जोर से घोषणा की कि: “मोदी धुल जाएगा”

मेरी मित्र से, फिर मार्च के बाद से मुलाकात नहीं हुई। लेकिन हाल ही में, बंगलुरु में गौरी लंकेश की हत्या के बाद प्रेस क्लब, दिल्ली में जो विरोध प्रदर्शन हुआ था, उसमें मेरी एक युवा मित्र से इस बात पर चर्चा हुई कि क्यों वरिष्ठ राजनैतिक पत्रकार भी उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजों का सही-सही अनुमान लगाने में चूक गए। हालाँकि भारत जैसे विविधता भरे देश में चुनावी नतीजों की सही-सही भविष्यवाणी करना बहुत मुश्किल है लेकिन इस मामले में कहूँ तो तुलनात्मक रूप से युवा पत्रकार तो उत्तर प्रदेश की नब्ज़ को सही से टटोल पाए लेकिन मेरे मित्र की तरह मंझे हुए पत्रकार अपने अनुमानों में बुरी तरह धराशाई हो गए। मेरे इस युवा मित्र ने एक कारण सुझाया जो मुझे एकदम सही लगा। वामपंथ की तरफ झुकाव रखने वाले मेरे उसी व्यवसायिक सहकर्मी की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि क्रांति में भरोसा करना उनके जैसे कईयों की मूलभूत आवश्कता है। और ऐसे समय में जब नरेंद्र मोदी अपनी शक्तियों के चरम पर हैं, संघ परिवार को एक ही चीज हराने में सक्षम है और वह है उनके क्रांति के सपने…! उसने ताना मारते हुए कहा, “आपके वामपंथी मित्रों का जीवन उस दिन निशारा से भर जाएगा जिस दिन वे क्रांति में भरोसा करना छोड़ देंगे।
पत्रकार अपने कर्म से चीजों को बदलने का लक्ष्य रखते हैं, जो एक तरह की क्रांति ही है। मेरे वामपंथी मित्र संघ परिवार को एक शत्रु की तरह देखते हैं और इसे उखड़ते हुए देखना चाहते हैं एक न्यूनतम लोकतांत्रिक तरीके से… लेकिन जब ये सपने मीडिया व्यवसायी होते हुए किसी के निर्णयों पर हावी होने लगते हैं, तो समस्या पैदा होती है। यह एक ऐसे व्यक्ति के प्रति घनघोर नफ़रत है, जो आज प्रधानमंत्री हैं और कई राजनैतिक विश्लेषकों को अपनी निष्पक्षता और तुलनात्मकता खोने को मजबूर कर रहे हैं। मोदी को घुटनों पर देखने की हताशा में वे अर्थहीन शब्दों में अर्थ खोज़ते हैं। वे महत्वहीन, बेहद छोटी-छोटी जीतों पर भी ‘चरम आनंद’ महसूस करते हैं। मसलन दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) का एक सीट का कम होना। यहाँ तक कि बर्कले यूनिवर्सिटी में राहुल गाँधी के भाषण में भी ये लोग युद्ध नगाड़े सुनना चाहते हैं!


ऐसा नहीं है कि 2014 से पहले भारत की सड़कों पर सोना बिखरा था और दूध की नदियाँ बह रहीं थीं, पूर्ववर्ती सरकारों ने गरीबों और वंचितों के लिए चमत्कार कर डाले थे। निस्संदेह, इस सरकार के साथ भी समस्याएँ हैं जैसे उनमें से एक, गौरक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा। निश्चित रुप से मोदी द्वारा किए गए उन वादों पर सवाल उठने चाहिए जो खोखले साबित हुए। दूसरे शब्दों में सड़कों पर 2014 के बाद भी कोई सोना नहीं बिखर गया और न ही दूध की नदियाँ बहने लगी हैं। लेकिन इसकी रिपोर्टिंग इतनी प्रमाणिक तरीके से होनी चाहिए कि इसमें लगातार विनाश का सुर न सुनाई दे और माहौल को कुछ ऐसा भी न बनाया जाए मानो नरेंद्र मोदी व्यक्तिगत रूप से किसी आभाषी महायुद्ध को नियंत्रित कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर दलितों के साथ भेदभाव और घृणित अपराध एक ज़माने से हो रहे हैं; किसानों की आत्महत्या भी कोई नई नहीं हैं, वर्षों से हो रही हैं। न्याय और व्यवस्था भी बहुत सारे इलाकों में कभी न थी और आज भी यही स्थिति है। पाकिस्तान के साथ तो हमेशा तनाव रहा है। मोदी सहित किसी के भी पास कोई जादुई छड़ी नहीं है, कि वो इन चीजों को एक झटके में गायब कर दें। हालाँकि उन्होंने और उनसे पहले और भी, बहुत सारे नेताओं ने हमें ऐसा करने का आभास कराया है। पत्रकार, जो अपना काम कर रहे हैं, उन्हें इस सरकार की असफलताओं को उद्घाटित करना चाहिए। लेकिन ऐसा करने में यह न लगे कि जैसे हमने अपने दराजों में मोदी-वूडू की कोई गुड़िया रखी है जिसमें रोज पिन चुभो रहे हैं। कभी-कभी हमें पीछे हट कर यह भी सोचना चाहिए कि कैसे कुछ मुद्दों ने मोदी को लाभ पहुंचाया है, जबकि हममें से बहुतों को लगता था कि यह मोदी के लिए विनाशकारी होगा।

“व्यवस्था के खिलाफ होना बुरा नहीं है, पर ऐसा केवल इसलिए नहीं होना चाहिए
क्यों कि कोई व्यक्ति-विशेष इस को नियंत्रित कर रहा है। इस बारे में सही विचार यह है कि उस सरकार की गलत नितियों के बारे में लिखा जाए, न कि इसे कैसे गिराया जाए, इस बारे में गोस्ठियां की जाएं”

नोटबंदी पर हमने खूब लिखा और बोला है। हमने बैंकों के बाहर लंबी कतारों की, बाज़ार में छाई उदासी की… अपने मोबाइल कैमरे से तस्वीरें भी ली हैं। हम अभी भी इस निर्णय से होने वाले दूरगामी प्रभावों के बारे में नहीं जानते हैं, पर हमें इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि इस निर्णय से हुई तमाम अस्त-व्यस्तता और परेशानियों के बावजूद मोदी के नियंत्रण में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में चमत्कारिक जीत हासिल की है। इस बात से हम लोगों को एक अल्पविराम लेना चाहिए और अपने पर आश्चर्य करना चाहिए कि हम इस देश के लोगों की सोच से कितने कटे हुए हैं! मोदी यह समझाने में सफल रहे कि नोटबंदी गरीबों की अपेक्षा अमीरों को ज्यादा परेशान करेगी। मोदी यह प्रभाव डालने में सफल रहे कि वे कोई व्यक्तिगत फायदा नही उठाना चाहते, और यह भी कि उनके परिवार में कोई रॉबर्ट वाड्रा नहीं है, जिसे महंगी बाइक, साइकिल या खर्चीली एसपीजी सुरक्षा चाहिए हो, बस एक माँ है, जो एक पुरानी साड़ी पहनती हैं और जिन से वो कभी-कभी मिलते हैं। हम में से बहुत से, एक दर्शक के रूप में मोदी से शत्रुता पाल लेते हैं, बिना ये सोचे कि मोदी आज वह न होते जो वो आज हैं, अगर लोग उनसे इतनी घृणा न करते। अब एक कहानी और देखिए। एक पत्रकार मित्र ने उत्तरप्रदेश में अपने सहकर्मी पत्रकार की कार में यात्रा करते हुए उसके ड्राइवर से पूछा कि वह नोटबंदी के बारे में क्या सोचता है? जब ड्राइवर ने इसका सकारात्मक जवाब दिया तो पत्रकार मोहतरमा ने उस ड्राइवर मूर्ख करार देकर डांट दिया।

सितंबर के शुरुआत में प्रतीक सिन्हा, जो कि फर्ज़ी ख़बरों का खुलासा करने वाली वेबसाइट ‘ऑल्टन्यूज़’ के संस्थापक हैं (इससे पहले प्रतीक ट्रुथ ऑफ़ गुजरात नामक वेबसाइट चलाते रहे हैं), ने अवकाश प्राप्त पुलिस अफसर और मोदी के जाने आमने आलोचक संजीव भट्ट की एक पोस्ट पर खुलासा छापा, भट्ट ने ये दावा किया था कि जब मोदी अहमदाबाद की सीदी सैयद मस्जिद में जापानी प्रधानमंत्री के साथ गए थे तो वहाँ श्रद्धालुओं को प्रार्थना करने से रोका गया। जबकि वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और इसके सबूत पेश करते हुए सिन्हा ने लिखा: “ऐसा करना बहुत ही गैर-जिम्मेदाराना हरकत है कि बिना तथ्यों का परीक्षण किए कोई सोशल मीडिया में इस तरह की अफवाहें उड़ाता है। इस तरह की अफवाहें सांप्रदायिक ध्रुवीकरण फैलाती हैं। वह भी ऐसे वक़्त में जहाँ विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक समुदायों में संघर्ष खतरनाक ढंग से बढ़ा हुआ है। हमें सोशल मीडिया अफवाहों के माध्यम से इस खाई को और बढ़ाने की जरुरत नहीं है”।

इसके ठीक बाद सिन्हा को सोशल मीडिया पर ट्रोल किया गया, और बहुतों ने तो ये भी समझाया कि वो और भट्ट एक ही तरफ हैं इसलिये उनको आपस में नहीं लड़ना चाहिए बल्कि अपने ‘साझा-शत्रु’ से भिड़ना चाहिए। एक मोदी आलोचक यह भी बताने पहुँच गए कि ‘अपनी औकात’ से कहीं ज्यादा बोल रहे हैं। सिन्हा को इसी तरह एक बार और आलोचना का सामना करना पड़ा जब उन्होंने वामपंथी कार्यकर्ता शेहला रशीद की इस बात को लेकर भार्त्सना की कि उन्होंने एक रिपोर्टर को दिल्ली प्रेस क्लब की पार्किंग से निकल जाने को कहा।

मोदी पर प्रहार करने वाले उन लोगों के लिए ‘गोदी मीडिया’ शब्द इस्तेमाल करते हैं, जो उनके हिसाब से इस सरकार की गोद में खेल रहे हैं, और सरकार के कामों और उपलब्धियों को उसके अनुकूल ही बखान करते हैं। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि इस चक्कर में वो खुद ‘गूप मीडिया’ (जेली जैसा, लिसलिसा पदार्थ, जिसका कोई निश्चित आकार नहीं होता) हो गए हैं। जब ये लोग भाजपा से इतर दलों की राजनैतिक असफलताओं को देखते हैं, तो अपने विमर्श में ढीले पड़ जाते हैं।

अपनी मृत्यु से पहले गौरी लंकेश ने एक ट्वीट किया था, ‘ठीक है हम में से कुछ लोग फर्जी फोटो साझा करने की गलती कर देते हैं। ऐसे हाल में हमें एक दूसरे को चेता देना चाहिए, किसी की कलई नहीं खोलना चाहिए। शांति…. कॉमरेड’ [ये स्पष्ट तौर पर उन लोगों के लिए कहा गया था जिन्होंने लालू प्रसाद यादव की एक रैली की फोटोशॉप की हुई तस्वीरें साझा की थी]

मोदी के खिलाफ काम करने वाले इस घृणा-उद्योग को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है- एक, जिनके सैद्धांतिक-लंगर उन्हें इस बात के लिए बाध्य करते हैं कि उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं कि भाजपा और आरएसएस क्या कर रही है, उन्हें तो बस उनका विरोध करना है। दूसरे, वे जो यह सोचते हैं अगर मोदी के खिलाफ व्याख्यान करेंगे तो वो आधुनिक और विद्रोही दिखेंगे। वे प्रासंगिक बने रहने के लिए मोदी पर लापरवाही से प्रहार करते हैं। इनमें से कुछ ऐसे है जो ये सब लोगों का ध्यान खीचने के लिए करते हैं और तकरीबन ऐसा लगता है कि खुद की तरफ इशारा कर रहे हो और कह कह रहे हों कि देखो मैंने भी मोदी के बारे में कुछ कहा है, अब कोई आओ और मुझे धमकी दो।
एक पत्रकार ने मोदी की मृत्यु की कामना की और जिस (क्विंट) वेबसाइट के लिए उसने ये लिखा था, उस वेबसाइट ने उसे बैन कर दिया तो ठीक अगले दिन गूप मीडिया में बवाल भड़क गया। ऐसा पत्रकार उद्देश्य परक कैसे हो सकता है, ऐसे लोग अपने कर्म के प्रति उचित आचरण कैसे रखते होंगे?

एक और वरिष्ठ पत्रकार मोदी के जन्मदिन पर ट्विटर पर एक गधे की तस्वीर लगाती हैं, और जब एक दूसरा पत्रकार उनके इस काम की आलोचना करता है, तो वे महोदया उन्हें सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर ‘ब्लॉक’ कर देती हैं।
ये बहुत कठिन है कि हम लोगों को राजनीति के दक्षिण और वाम खांचों में न बांटते रहें, लेकिन यही दिन-रात हो रहा है। यह मुझे जॉर्ज डब्लू. बुश के शब्द याद दिलाता है “या तो तुम मेरे साथ हो या मेरे खिलाफ हो”। ये बहुत मेहनत का काम है कि आप कहीं किसी व्यक्ति से बात करें तो उस से पूछें कि, “अच्छा, तो तुम मोदी का समर्थन करते हो, तो मैं ये समझना चाहता हूँ कि तुम ऐसा क्यों करते हो” बल्कि ये बहुत आसान है कि किसी को संघी कह दिया जाए और उसे इस्लाम से नफ़रत करने वाला बता दिया जाए।

मेरे एक अनीश्वरवादी मित्र, जो कि मेरे घर के पास ही रहते हैं, कश्मीर से निर्वासित हैं और अपनी अब तक की जिंदगी में कभी वोट करने नहीं गये। जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी की हवाओं में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह, इंशाअल्लाह’ के नारे गूंजने के एक दिन बाद हम बाजार में मिले। वे बहुत निराश दिखाई दे रहे थे। बोले, “अल्लाह के नाम में क़त्ल होने से बचने के लिए मैं इतनी दूर भाग के आया था और अब, इतने सालों बाद, वो लोग वापस आ गये हैं, मेरे घर के पिछवाड़े में आ कर चिल्ला रहे हैं कि भारत के टुकड़े होंगे” उन्होंने (जोर) देकर कहा अगले चुनाव में वो नरेंद्र मोदी को वोट करेंगे। लेकिन ‘गूप मीडिया’ में से कोई भी इस तरह के भय को समझने की कोशिश नहीं करता, और न ही कोई ये कोशिश करेगा और ना समझेगा कि क्यों बहुत सारे दलितों ने मोदी को वोट किया। प्रधानमंत्री पर हमला करने वाले बस लगे रहते हैं, उनकी निंदा करते रहते हैं, उनके बारे में चुटकुले बनाते हैं और हर चुटकुले, हर मेमे के साथ ही वो सत्ता शक्ति पर उनकी पकड़ को और मजबूत करते जा रहे हैं।

देश का आम आदमी मीडिया से परेशान है। लोग मीडिया के प्रोपेगैंडा से दुखी हो गए हैं और जब कभी बगोटा (कोलंबिया) की आलीशान सड़क को गुजरात की सड़क दिखाया जाता होते हैं, तो लोग परेशान होते हैं। वे सोशल मीडिया में लगातार फैलाने वाली नफ़रत से ऊब चुके हैं। एक विद्वान मित्र जो कि महात्मा गाँधी के प्रशंसक हैं, ने कहा कि अगर आज बापू जिंदा होते तो वे एक मीडिया-व्रत का अहवाह्न करते और सबको एक दिन के मौन के लिए कहते। अंरविंद केजरीवाल यह बड़ी मुश्किल से सीख पाए हैं। पिछले कुछ महीनों में, वे मोदी की निंदा करने वाले किसी मामले में नहीं उलझे! इसके बजाय अरविंद केजरीवाल अब शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में बदलाव लाने की तरफ ध्यान दे रहे हैं और ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि वो अपनी इस मेहनत का फायदा उठा पाएंगे। जरूरत इस बात की है ये है कि जनता के मिज़ाज को भांपा जाए, उसके गुस्से से बचा जाए, सही-गलत के बीच एक नैतिक स्पष्टता हो, कोई फर्क नहीं पड़ता कौन किस तरफ है।

द वायर के लिए लिखे गये एक अच्छे लेख में मोनोबिना गुप्ता ने पत्रकारों के एक्टिविस्टों में तब्दील होने का विषय उठाया है: ‘अगर एक्टिविज़्म (सक्रियता) से समाज में हिंसा का प्रतिकार होता है, अधिकारों की रक्षा होती है, फिर चाहे वो मीडिया से सरोकार रखते हों या फिर व्यक्तियों और समाज से, तो पत्रकारों को एक्टीविस्ट कहलाने में शर्म नहीं करनी चाहिए’ मेरा भी इस बारे में लंबे समय से यही तर्क रहा है, कि यदि आप बस्तर जैसी जगहों पर जाते हो, तो पत्रकारों को तटस्थता के भाव को अस्वीकार कर देना चाहिए और स्पष्ट तौर पर उन लोगों के साथ खड़े होना चाहिए जो अन्याय झेल रहे हैं। ये एक पत्रकार का धर्म है कि वो अपने न्यूज़रूम से बाहर निकले और दलितों के साथ हो रही हिंसा, किसानों की दशा, भ्रष्टाचार, माफिया बिल्डरों, पुलिस-राजनेता गठजोड़, पर्यावरणीय-क्षरण और इन सब की वजह से लाखों जिंदगियो पर क्या असर पड़ रहा है, इसकी कहानियाँ प्रकाश में लाएं। लेकिन इस आंदोलन और राजनैतिक आंदोलन के बीच भ्रम नहीं होना चाहिए। व्यवस्था के खिलाफ होना बुरा नहीं है, पर ऐसा केवल इसलिए नहीं होना चाहिए क्यों कि कोई व्यक्ति-विशेष इस को नियंत्रित कर रहा है। इस बारे में सही विचार यह है कि उस सरकार की गलत नीतियों के बारे में लिखा जाए, न कि इसे कैसे गिराया जाए इस बारे में गोष्ठियां की जाएं।

अल्बर्ट कामू ने सोशलिज़्म ऑफ़ द गैलोस में लिखा है कि “वामपंथी सिजोफ्रेनिक हैं, और इनके इलाज के लिए क्रूर आत्मनिंदा, आत्मचिंतन, आपसी तर्क वितर्क, और थोड़ी विनम्रता की जरूरत है”। ये सभी पत्रकारों के अच्छे भविष्य के लिए चेतावनी है कि वो इस सलाह को सुनें। पर इसके पहले शायद उन्हें कामू के इसी लेख में लिखी एक और सलाह पर गौर करना चाहिए: “बुद्धिजीवियों का हर समय बोलते रहना अच्छा नहीं है। ऐसा करना उन्हें चिंतन से दूर ले जाएगा”

शायद यही समय है जब बातें कम की जाएं और सोचा समझा जाए।

((साभार: राहुल पंडिता, ओपन पत्रिका))
(मूल अंग्रेजी से अनुवाद दीपक मिश्र)

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