कामेश्वर चौपाल: पहले कार सेवक

कामेश्वर चौपाल आज 61 साल के हैं, और उस पल को याद करते हैं जब उन्हें अयोध्या में संघ परिवार के दिग्गजों के साथ मंच पर बुलाया गया था और कहा गया था राम मंदिर के प्रस्तावित निर्माण स्थल की पहली ईंट उन्हीं से लगवाई जाएगी

1993 में, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश में एक साथ आने के बाद, एक ऐसा गठबंधन बना, जिसके होने पर संघ परिवार को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। इस गठबंधन ने अपने जश्न में एक नारा उछला- ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम’। यह सब एक ऐसा राज्य में हो रहा था, जिसमें कुछ ही महीने पहले लोगों ने राम के नाम पर 16वीं सदी की एक मस्जिद को धराशायी कर दिया था। यहाँ, राम मंदिर के नाम पर हिंदुओं को संगठित करने की संघ परिवार की उम्मीदों को एक बड़ा झटका पहले में ही लग चुका था, जब 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने की वक़ालत करने वाली मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू कर दी थी। हिंदुओं के जिन वोटों को भाजपा अपना मान रही थी, एक झटके में वोट मंडल और कमंडल के नाम पर बंट गए।

ये बदलाव उस आदमी के सपनों पर कुठाराघात थे, जो कुछ महीने पहले तक ये आशा कर रहा था कि इतिहास में उस को हिंदू एकता के प्रतीक या शुभंकर के तौर पर याद किया जाएगा। लेकिन मंडल कमीशन की रिपोर्ट को वी.पी. सिंह ने जिस तरह लागू किया था, उसने विराट हिंदू एकता को धराशायी कर दिया था। अब वह आसमान की तरफ देख के राम को याद करके किसी चमत्कार की गुहार लगा रहे थे। यह चमत्कार बहुत दिनों बाद हुआ। सबसे पहले 2014 के लोकसभा चुनाव में, और फिर उस से भी बड़े पैमाने पर, 2017 के विधान सभा चुनावों में, जिसे हम भाजपा और हिंदुत्व की प्रचंड जीत के रुप में भी जानते हैं।

कामेश्वर चौपाल आज 61 साल के हैं, और उस पल को याद करते हैं जब उन्हें अयोध्या में संघ परिवार के दिग्गजों के साथ मंच पर बुलाया गया था और कहा गया था राम मंदिर के प्रस्तावित निर्माण स्थल की पहली ईंट उन्हीं से लगवाई जाएगी। चौपाल कहते हैं कि “यह मेरे लिये ऐसा भावुक क्षण था कि उसे क्षण को याद करके मेरे रोंये आज भी खड़े हो जाते हैं”

चौपाल का जन्म बिहार के मिथिलांचल में सुपौल जिले के एक दूरस्थ गाँव में हुआ था। हिंदू मान्यताओं के हिसाब से, मिथिला राम की पत्नी सीता का घर है। चौपाल बताते हैं कि “जब हम बड़े हो रहे थे, तो हम ये मानते थे कि राम हमारे संबंधी थे”। उनके गाँव में शादी-ब्याह के अवसर पर गए जाने वाले गानों में दूल्हा-दुल्हन को राम और सीता का दर्जा दिया जाता है।

उनका गाँव कोसी नदी के किनारे बसा है, और बाढ़ की अनिश्चितता की वजह से चौपाल और अन्य ग्रामीण, जो नदी के किनारे बसे हैं, परेशानियाँ झेलते थे। विकास का कोई भी काम वहाँ नहीं हुआ था। वहाँ रहना कठिन था, खासकर उनके जैसे दलित परिवारों के लिए। वो अपनी जिंदगी में कुछ कर पाएं, इस आशा से चौपाल के पिता ने उनको कोसी के पश्चिमी किनारे पर एक स्कूल में भेजा, जो मधुबनी जिले के बॉर्डर पर पड़ता था। यहीं पर चौपाल संघ के संपर्क में आए। उनके शिक्षकों में से एक संघ के लिये काम करते थे। वो बताते हैं, “लेकिन उन दिनों, इन बातों को लोग छिपाते थे।” वह शिक्षक शारीरिक/व्यायाम शिक्षक थे और अपने अभ्यासों में वो संघ की शाखा की ड्रिल को भो शामिल करते थे। चौपाल ने यहीं से हाईस्कूल किया। अपने उसी शिक्षक की सहायता से चौपाल कॉलेज में दाखिला पाने में सफल हुए। चौपाल के अनुसार “संघ के लोगों के गुपचुप संपर्क होते हैं, मेरे शिक्षक ने बस एक पत्र देकर मुझे अपने एक मित्र के पास उस कॉलेज में भेज दिया, और कहा कि बाकी इंतज़ाम उनके मित्र कर देंगे।”

“अगर तुम वास्तव में मुझसे पूछो, तो अयोध्या पर पुनराधिकार की इच्छा का बीज मीनाक्षीपुरम की घटना से प्रस्फुटित हुआ, जहाँ 800 दलितों ने इस्लाम क़बूल कर लिया था”

स्नातक की पढ़ाई पूरी करते-करते, चौपाल एक पूर्णकालिक स्वयंसेवक बन चुके थे। बाद में जिला प्रचारक के तौर पर मधुबनी इलाके में भेजे गए। यहीं पर चौपाल ने सुदूर दक्षिण के राज्य तमिलनाडु के “मीनाक्षीपुरम प्रकरण” के बारे में सुना। तमिलनाडु के, तिरुनेलवेली जिले के, मीनाक्षीपुरम गाँव में, 19 फरवरी 1981 को लगभग 800 दलितों ने उच्च जाति के हिंदुओं द्वारा किये जाने वाले (कथित) भेदभाव के विरोध में इस्लाम स्वीकार कर लिया। चौपाल बताते हैं “अगर तुम वास्तव में मुझसे पूछो, तो अयोध्या पर पुनराधिकार की इच्छा का बीज इसी घटना से प्रस्फुटित हुआ।” बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन के जवाब में संघ ने संस्कृति-रक्षा निधि योजना का गठन किया। 1984 में विश्व हिंदू परिषद ने दिल्ली के विज्ञान भवन में एक ‘धर्म संसद’ बुलाई, जिसमें सैकड़ों साधू-संत और हिंदू नेता पहुँचे। विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष अशोक सिंघल प्रमुख वक्ताओं में से एक थे। राम के नाम का अह्वाहन करते हुए उन्होंने कहा कि हिंदुत्व ख़तरे में है। एक अन्य वक्ता कर्ण सिंह, कश्मीर के अंतिम राजा के पुत्र, ने हिंदुत्व को जातिभेद की बुराई से मुक्त करने पर जोर दिया। अयोध्या की और इंगित करते हुए कर्ण सिंह ने कहा कि “ये हिंदुओं के लिए बड़े शर्म की बात थी कि वो राम जन्म-भूमि में दिया भी नहीं जला सकते।” इसी धार्मिक सभा में यह प्रस्ताव पारित हुआ कि अयोध्या, मथुरा और काशी की विवादित जगह पर हिंदुओं द्वारा फिर से अधिकार किया जाना चाहिए। यह भी निश्चित हुआ कि राम मंदिर के बारे में जन-जागरूकता लाने के लिए श्री राम-जानकी रथ यात्राएं निकाली जाएं।

इन में से पहली, सीतामढ़ी, जो कि सीता का जन्म स्थान माना जाता हैं, से सितंबर 1984 में निकाली गई। चौपाल ने इस यात्रा में भाग लिया। चौपाल याद करते हैं “इस यात्रा को मिली प्रतिक्रिया से मुझे आश्चर्य हुआ, “छोटे-छोटे गाँव, कस्बों से हजारों लोग हमारे साथ शामिल हुए”
दो साल से भी कम समय में, एक फरवरी 1986 में राजीव गाँधी की कांग्रेस सरकार ने अयोध्या में विवादित जगह के ताले खोल दिए। दूसरे चरण में, राम मंदिर निर्माण की योजना की भूमिका बनी। चौपाल बताते हैं कि संघ में कुछ लोग यह सोचते थे कि कुछ उद्योगपति जो हिंदुओं के प्रति सद्भावना रखते हैं, उन से इस काम के लिए चंदे की मांग की जा सकती थी, लेकिन इस विचार को अशोक सिंघल ने नकार दिया। दिल्ली में बने बिड़ला मंदिर (इसे उद्योगपति बलदेव दास बिड़ला ने बनवाया था) का उदाहरण देते हुए आशोक सिंघल ने कहा कि हर हिंदू के अंदर ऐसा विचार आना चाहिए कि ये मंदिर उसने बनवाया है, न कि किसी एक उद्योगपति ने… इसलिए ये निश्चित हुआ कि हर एक हिंदू इस काम के लिए एक रुपया पच्चीस पैसा देगा।

नवंबर 1989 में शिलान्यास हुआ, चौपाल उस समय एक तंबू में थे, जब अशोक सिंघल के एक करीबी ने उन्हें बताया की आपका नाम मंच से बुलाया जा रहा है। जब चौपाल वहां पहुँचे तो संघ के सारे बड़े नेता उनकी तरफ ही देख रहे थे। तब चौपाल को इस मौके और उस में अपनी भूमिका की महत्ता का अहसास हुआ।

आंदोलन के नेता उनके माध्यम से वह पाने की कोशिश कर रहे थे, जिसके उत्पत्ति के मूल में मीनाक्षीपुरम की घटना थी। वे दलितों का हिंदुओं के साथ जुड़ाव दिखाने की कोशिश कर रहे थे। और प्रतीकात्मकता रूप से इसे दिखाने का इससे बेहतर और क्या तरीका होगा, कि एक दलित शिलान्यास की पहली ईंट रखे। चौपाल को इस काम के लिए चुना गया।

चौपाल बताते हैं, 1989 की इस घटना से हिंदू एकता आकर लेने लगी। इसी समय भाजपा नेता लालकृष्ण अडवाणी ने 1990 में अपनी रथयात्रा भी शुरू कर दी। इस कार्रवाई के असर स्पष्ट दिख रहे थे। चौपाल, अडवाणी के रथ के पटना पहुँचने को याद करते हैं, तब तक भारतीय जनता पार्टी को नेता (आडवाणी) की होने वाली गिरफ्तारी की सूचना मिल गयी थी। चौपाल याद करते हैं कि “गाँधी मैदान में (स्वर्गीय) प्रमोद महाजन ने माइक पर कहा कि अडवाणी जी को गिरफ्तार कर लिया जाएगा,” और यह हुआ भी। समस्तीपुर में यात्रा को रोक दिया गया और बिहार की लालू यादव सरकार ने आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया।

“राम हमारी परंपरा हैं “अगर परंपरा मर जाएगी, तो देश भी मर जाएगा”

यह एकता 1990 में टूट गयी जब वी.पी. सिंह ने पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए आरक्षण दे दिया। अचानक ही हिंदू अब भाजपा के साथ संगठित हो कर रैली नहीं कर रहे थे। चौपाल कहते हैं इस सबके बाद बहुत से दलित “राम की लड़ाई” को अब “ऊंची जातियों की लड़ाई” के तौर पर देखने लगे थे। फिर भी इन बाधाओं के बावजूद संघ परिवार बाबरी मस्जिद के ढ़ांचे को 1992 में गिराने में सफल रहा। उस समय चौपाल वहां मौजूद थे, चौपाल बताते हैं कि “उस ज्वार को कोई रोक नहीं सकता था, मुझे नहीं पता कि क्या हुआ, कैसे हुआ, पर वहाँ की दीवारों को कारसेवकों ने केवल कंधे के जोर से गिरा दिया। हम चिल्ला रहे थे ‘भागो, वरना ये दीवार तुम्हारे ऊपर ही गिर जाएगी…’ पर कौन सुन रहा था वहाँ! वहाँ तो जैसे एक उन्माद छाया था।
चौपाल इस घटना की तुलना एक युद्ध से करते हैं, “युद्ध में केवल ईश्वर का अहवाह्न होता है। हम ये नहीं कहते कि, ‘गाँधी जी की जय, नेहरु की जय’। हम चिल्ला रहे थे, ‘जय भवानी, हर-हर महादेव”
पार्टी के कहने पर चौपाल ने 1991 में राम विलास पासवान के खिलाफ चुनाव लड़ा, पर राजीव गाँधी की हत्या की वजह से उच्च जातियों का वोट कांग्रेस को चला गया। 2002 में वो बिहार विधान परिषद के सदस्य बने। 2014 में वो सुपौल से राजद के पप्पू यादव की पत्नी रंजीता रंजन के खिलाफ चुनाव लड़े और हार गए।

“स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान, जिस तरह बंगाल के सन्यासी विद्रोह से उठे दो शब्दों (वंदे मातरम) ने पूरे देश को एक कर दिया था, उसी तरह से वर्त्तमान राजनीति में राम नाम करेगा”

चौपाल को लगता है कि भाजपा बिहार में वह कारनामा नहीं कर सकती, जो उसने उत्तरप्रदेश में किया है। क्योंकि बिहार में चुनाव अगड़े बनाम पिछड़े की लड़ाई हो गयी है। वह कहते हैं कि बिहार में, जातियों पर बहुत सारा काम किया जाना जरुरी है, लेकिन यह आसान नहीं होगा। अपने बचपन के दिनों से तुलना करके वह कहते हैं कि समाज में बहुत परिवर्तन हुआ है लेकिन ये राजनीति में प्रकट रूप से नहीं दिख रहा है। गांवों में अब शादी और श्राद्ध समारोहों मे ऊंची जाति या नीचली जातियों जैसा कोई भेदभाव नहीं है। एक बच्चे के तौर पर चौपाल को एक बार मंदिर में प्रार्थना करने के लिए दंड भुगतना पड़ा था जिसमें उनके प्रवेश पर रोक थी। वे मुस्कुरा कर कहते हैं “मैं वहां अभी भी नहीं जा सकता” लेकिन परिवर्तन तो हुआ है व्यक्तिगत तौर पर मुझे लगता है कि मैं तीन बार जन्म ले चुका हूँ।

चौपाल सोचते हैं कि राम का नाम भारत में एक बड़ी ताकत रहेगा। खासकर, चुनावी राजनीति में… “स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान, जिस तरह बंगाल के सन्यासी विद्रोह से उठे दो शब्दों (वंदे मातरम) ने पूरे देश को एक कर दिया था, उसी तरह से वर्त्तमान राजनीति में राम नाम करेगा”। वो कहते हैं राम हमारी परंपरा हैं “अगर परंपरा मर जाएगी, तो देश भी मर जाएगा”

((साभार: राहुल पंडिता, ओपन पत्रिका))
(मूल अंग्रेजी से अनुवाद दीपक मिश्र)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

27 + = 31