वैश्विक आतंकवाद: एक लाइलाज बीमारी

– योगेन्द्र भारद्वाज
विश्व के महापुरुषों ने अपनी अपनी संस्कृति को सर्वोत्कृष्ट रखने का प्रयत्न किया था, जिसमें भारत ने विश्वगुरू की उपाधि भी धारण की। लेकिन आज समग्र जगत एक ऐसी बीमारी का शिकार हो रहा है, जिसकी समाप्ति अत्यन्त दुष्कर है। यह बीमारी लाइलाज है और वैश्विक महामारी का रूप ले चुकी है। कहा जाता है कि जब खुद के सिर में दर्द होता है, तब अहसास होता है कि आखिर दर्द किस बला का नाम है। ऐसा ही एक वैश्विक दर्द है आतंकवाद । विश्व में सर्वाधिक शान्तिप्रिय देश भारत सदा से ही इस आतंकवाद की आग में झुलसता रहा है और अन्य देशों से यही आग्रह करता रहा है कि बस, अब आतंकी कारनामों का अन्त होना चाहिए। हालांकि कई देशों ने भरपूर साथ भी दिया, लेकिन कुछ देशों के सिर पर जूं भी नहीं रेंगी। जब अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर (9/11) पर हमला हुआ, तब अमेरिका को होश आया कि यह आतंकवाद तो किसी को नहीं छोड़ता, इसका एक मात्र मकसद भय का माहौल फैलाना होता है। आज पूरा विश्व भयावह आतंकवाद की चपेट में है। देखा जा सकता है कि अलकायदा की कमर टूटते ही आईएसआईएस, बोको हरम, इण्डियन मुजाहिद्दीन, जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठन आये दिन कट्टर आतंकी घटनाओं को अंजाम देते आये हैं।

रूस के सेंट पीटर्सबर्ग मेट्रो स्टेशन पर ताजातरीन हमला इसका उदाहरण है। यह पहली बार नहीं है कि रूस किसी आतंकी हमले का शिकार हुआ है बल्कि 2010 में मास्को के दो मेट्रो स्टेशनों पर भी हमला हुआ था, जिसमें 40 लोग मारे गये थे और 100 घायल हुए थे। वर्ष 2013 में सोचि शीतकालीन ओलंपिक खेलों में भी आत्मघाती हमला हुआ था, जिसमें 34 लोग हताहत हुए और वोल्गोग्राद के दक्षिणी शहर के रेलवे स्टेशन पर बम धमाके में भी 18 लोग मारे गये थे। इसके अतिरिक्त वैश्विक आतंकी घटनाक्रम में फ्रांस के पेरिस की शार्ली एब्दो पत्रिका के कार्यालय पर हमला, पाकिस्तान में आये दिन होते हमले (जो खुद आतंक के कारखाने के रूप में प्रसिद्ध है), पेशावर (पाकिस्तान) में स्कूली बच्चों पर हमला, जर्मनी जैसे देशों में ट्रक अथवा अन्य वाहन द्वारा लोगों का रौंदा जाना, भारत में संसद पर हमला, मुम्बई हमला, पठानकोट, उड़ी हमले जैसी खौफनाक वारदात को अंजाम देना, बोको हरम द्वारा महिलाओं को अगवा कर बलात्कार व हत्या जैसे जघन्य नृशंस घटनाक्रम, अफगानिस्तान, ईराक आदि में तालिबानी आतंक से तो पूरा विश्व ही परिचित है। इस प्रकार के आतंकी हमलों से पूरा विश्व आज त्राहि-त्राहि कर रहा है।

गीता में कहा गया है “परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे” मतलब जब-जब धर्म की हानि और अधर्म (आतंकी घटनाक्रम) बढ़ता है, तब-तब भगवान अवतार लेते हैं। लेकिन भगवान तो द्वापरयुग अथवा त्रेतायुग में अवतार लेकर शत्रुनाश करते थे, किन्तु आज मानव में भगवान का स्वयं वास है, इसलिए इस आतंक रूपी शत्रु का नाश करने के लिए सम्पूर्ण विश्व को साथ आना होगा। आतंकवाद की न तो कोई विचारधारा होती और न ही कोई धर्म होता है, बस उसका एकमात्र उद्देश्य है “सर्वत्र भय फैलाना”। कुछ लोग वाद-विवाद के बीच आतंक को किसी धर्म विशेष से जोड़ते हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि आतंक का यदि धर्म होता तो वह मस्जिद-मंदिर-चर्च-गुरद्वारे में भेद करता। वह किसी धर्म विशेष के मानव को ही अपना निशाना बनाता न कि सम्पूर्ण मानव प्रजाति को। रामायण, गीता, कुरान, बाईबिल या गुरुग्रन्थ साहिब जितने भी धार्मिक ग्रन्थ हुए हैं, सभी ने आतंक को नकारा है। कुछ लोग खुद को जिहाद के नाम पर बहका लेते हैं और नृशंष घटनाओं को अंजाम दे बैठते हैं, वे तो मात्र इस भयावह आतंकी मायाजाल का मोहरा मात्र हैं। उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर का सैफुल्लाह इसका ताजातरीन उदाहरण है। भारत तो इस महामारी का पूर्ण शिकार है और शायद ही कोई माह खाली जाता है, जिसमें कोई आतंकी हमला न होता हो। अक्सर सरहदों पर तो तनातनी इसी कारण बनी रहती है।

16 नवम्बर 2016 को “इन्स्टीट्यूट फॉर इकानोमिक्स एण्ड पीस” ने वैश्विक आतंकवाद सूचकांक-2016 प्रकाशित किया था, जिसमें कुल 165 हताहतों की संख्या, संपत्ति का नुकसान तथा आतंकवाद के मनोवैज्ञानिक प्रभाव का विश्लेषण किया गया था, जिसमें शीर्ष पाँच देशों में क्रमशः ईराक (स्कोर 9.96) प्रथम (लगातार पिछले चार वर्षों से), अफगानिस्तान (स्कोर 9.44) द्वितीय, नाईजीरिया (स्कोर 9.31) तृतीय, पाकिस्तान (स्कोर 8.61) चतुर्थ तथा सीरिया (स्कोर8.58) पांचवे स्थान पर है। सूचकांक में भारत आठवें स्थान पर है और विश्व के अन्य विकसित देशों में ब्रिटेन को 34वां, फ्रांस को 29वां, रूस को 30वां, अमेरिका को 36वां तथा जर्मनी को 41वां स्थान प्राप्त हुआ था।

वैश्विक शांति सूचकांक-2016 की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक पटल पर आतंकी घटनायें अपने उच्चतम स्तर पर हैं। इन घटनाओं से मात्र जन-हानि ही नहीं अपितु प्राकृतिक संसाधनों को भी तीव्र नुकसान पहुंचाया जा रहा है। धन की भी अपार क्षति हो रही है, रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष  2015 में वैश्विक आतंकवाद, संघर्ष और राजनैतिक अस्थिरता में 13.6 खरब अमेरिकी डालर की क्षति हुई है।

जहाँ एक तरफ पूरा विश्व इस आतंकी भय से त्रस्त है, वहीं दूसरा पहलू आतंक को पनाह देने का भी है। भारतीय “राष्ट्रीय जांच एजेंसी” (एनआईए) ने अलकायदा, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, बब्बर खालसा समेत 35 से अधिक आतंकवादी संगठनों की सूची तैयार की है, जो प्रतिबन्धित श्रेणी में है। आतंक की फैक्ट्री घोषित पाकिस्तान को अब तो यह बात समझ आनी चाहिए कि वह विश्व का साथ दे और हाफिज सईद जैसे आतंकी सरगना के खात्मे पर जोर दे। वैश्विक महाशक्ति कहे जाने वाले चीन को आज वैश्विक आतंकवाद के विरोध में कदम से कदम मिलाना चाहिए क्योंकि अब वह दिन दूर नहीं जब चीन भी इस भयावहता की चपेट में होगा। आईएसआईएस संगठन ने तो चीन को भी आतंकी हमले की चेतावनी जारी कर दी है। पूरे विश्व को एक छतरी के नीचे आकर आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई लड़नी होगी, क्योंकि आतंकवाद किसी देश विशेष की समस्या नहीं बल्कि वैश्विक समस्या है।

योगेंद्र भारद्वाज जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के संस्कृत अध्ययन केंद्र में शोधार्थी हैं। योगेंद्र जेएनयू छात्र संगठन (JNUSU) में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से चुने गए एकमात्र प्रतिनिधि (Councillor) हैं। यहाँ व्यक्त विचार निजी हैं,‘चौपाल’ से संबंध नहीं】

 

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    तथ्यों का सुन्दर संयोजन कर जागरूक करने वाला लेख लिखने हेतु हार्दिक बधाई एवं आभार…

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