निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद होगा पार्टी बनाने का फैसलाःयोगेंद्र यादव

देश की राजनीति में छाए तमाम मसलों और “स्वराज अभियान” आंदोलन को एक राजनीतिक दल में परिवर्तित करने से जुड़े प्रश्नों को लेकर हमने चर्चा की योगेंद्र यादव से… इस विस्तृत चर्चा को हम दो भागों में पेश कर रहे हैं. प्रस्तुत है चर्चा का पहला भाग

स्वराज अभियान को एक राजनीतिक दल बनाने को लेकर इतना असमंजस क्यों हैकभी आप कहते है कि हम पार्टी बनाएंगे फिर कभी कहते हैं कि हमारी बैठक होगीउसमें निर्णय लिया जाएगा.

DSC05035हमें असमंजस कतई नहीं है. मीडिया को एक नई चीज में पहचानने में कठिनाई हो रही है क्योंकि वो उनके बने बनाए खांचे में फिट नहीं बैठ रही है. हमने जिस दिन स्वराज अभियान बनाया उसी दिन फैसला किया था कि हम राजनैतिक हैं और कि हम राजनैतिक पार्टी नहीं बना रहे है. हमने दो कारण इसमें तय किए थे पहला, हम चाहते हैं कि उन मूल्यों और कसौटियों पर हम स्वयं खरे उतरे जिसके लिए हम दूसरों को दोषी ठहराते हैं… आंतरिक लोकतंत्र हो, पारदर्शिता हो… जवाबदेही हो और दूसरी शर्त कि न्यूनतम संख्या और देश भर में एक ऊर्जा का संचय हो. ये दो काम करने हैं और हमने कहा था कि ये दोनों पूरे होंगे… हम पार्टी निर्माण करेंगे… सात महीने के बाद हमने उसकी समीक्षा की और हमने उन सिंद्धान्तों को एक मूर्त लक्ष्यों (टारगेट्स) में बदल दिया है… जिसमें सौ जिलों और कम से कम छः राज्यों में हमारी ईकाई बननी चाहिए, वो इकाई चुनी होनी चाहिए, ऊपर से थोपी हुई न हो… दूसरा, राइट टू इनफॉर्मेशन के तहत हमारे ऑफिसर्स हर जगह नियुक्त हों… हमारी आय ही नहीं हमारे खर्चे भी सार्वजनिक हों… हर स्तर पर लोकायुक्त और लोकपाल हों. इन शर्तो के साथ सदस्यता अभियान खोल दिया है. और ऐसा होगा तो जो चुने हुए पदाधिकारी होंगे वो स्वतंत्र हैं कि वो आते ही सबसे पहले निर्णय लें. हमारे लिए राजनीति का मतलब है पार्टी, पार्टी का मतलब है चुनाव, पर चुनाव का मतलब येन-केन-प्रकारेण सरकार बनाना नहीं है… दिक्कत यहाँ है, इसलिए खबर छप जाती है, फिर हमें खण्डन करना पड़ता है. हम बिल्कुल नहीं बदले, कोई असमंजस नहीं है. और एक बात-हमने तय किया है कि जब भी पार्टी बनाने की घोषणा होगी स्वराज अभियान समाप्त नहीं होगा. स्वराज अभियान उसमें विलय नहीं होगा… यह अभियान अपने दूसरे काम करता रहेगा.

आप न सिर्फ राजनीतिक फ्रंट पर लड़ रहे हैं बल्कि आपका अभियान न्यायापालिका में भी सरकारों को जवाबदेह ठहराने की कोशिश कर रहा है. क्या हम एकदम नई राजनीति देख रहे हैं जो सभी मोर्चों पर संघर्षरत है?

आप यूं कह लें कि हमारी राजनीति की परिभाषा ज्यादा व्यापक है. इसका मतलब केवल पार्टी, सरकार, चुनाव, सत्ता या विपक्ष नहीं है. राजनीति का मतलब आंदोलन और संघर्ष है, सकारात्मक लड़ाई है, राजनीति का मतलब विचारों की लड़ाई से है और राजनीति का मलतब अपने भीतर खंगालना, ‘स्व’ का परिस्कार करना भी है. ये सब राजनीति के अंतर्गत ही आते हैं. ये सब करने के लिए जो कुछ औजारों का इस्तेमाल करना होगा, वे सब औजार इस्तेमाल करने चाहिए… हमें सिस्टम में बदलाव करना है इसके लिए हमें संघर्ष, मीडिया, विचार, न्यायपालिका, चुनाव… सबका प्रयोग करना चाहिए.

आपके साथी प्रशांत भूषण जी का कश्मीर के बारे में कुछ कहना है, आप कहते हैं कि धारा 370 की भावना को पूरे देश में ले जाने की जरूरत हैऐसे विचारों से आप राजनीतिक दल बनाने जा रहे हैं?

मुझे समझ नहीं आता कि इसमें दिक्कत क्या है… धारा 370 कहती है कि देश के एक हिस्से को अपने शासन पर स्वायत्ता होगी… देश की संसद के कानून उस हिस्से पर तभी लागू होंगे जब उस राज्य की विधानसभा उसे लागू करे… यह संघात्मक विचार को और गहराई तक ले कर जाती है. कल यही बात छत्तीसगढ़ पर लागू हो, राजस्थान पर लागू हो तो क्या बुरी बात है? इतना बड़ा देश है… कहने को हम संघात्मक हैं लेकिन व्यवहार में केंद्र सरकार को इतनी ज्यादा शक्तियां हासिल हैं कि उनका विकेंद्रीकरण तो होना चाहिए… सत्ता का विकेंद्रीकरण गांधी जी भी चाहते थे, जयप्रकाश जी भी चाहते थे. सिंद्धांतों में इस देश की सरकार भी चाहती है… इस देश के संविधान में लिखा हुआ है. उसका विस्तार करने में क्या बुरी बात है? आज जो शक्तियां केंद्र सरकार के पास हैं उसमें से अधिकतर शक्तियां राज्य के पास होनी चाहिए… जो राज्य के पास हैं उसे जिला के पास होना चाहिए… और जो कलेक्टर के पास हैं उसे पंचायत के स्तर पर होना चाहिए… देश के विकास की दिशा वही है.

आपने जय किसान अभियान‘ चलायादेश के अलगअलग भागों में घूमे, कहीं पर भी ये लगा कि मनरेगा के कारण खेतीकिसानी के लिए मजदूर मिलने कम हो गए हैं या इसने मजदूरी बढ़ा दी है जिससे किसानों को परेशानी होने लगी है?

मैं किसान और किसान संगठनों की तक़लीफ समझता हूँ लेकिन दिक्कत ये है कि इस देश की नीतियां ऐसी हैं जिसने एक वर्ग को दूसरे वर्ग से लड़ा दिया है. किसान कहता है मनरेगा की वजह से उसे मजदूर नहीं मिलते क्योंकि किसान मनरेगा से ज्यादा मजदूरी देने को तैयार नहीं. क्योंकि किसान की आमदनी इतनी नहीं है जो उन्हें बेहतर दिहाड़ी दे सके. सरकारी नीतियों की वजह से किसान की आमदनी अच्छी नहीं क्योंकि फसलों के दामों को दबा कर रखा गया है, उसको स्वाभाविक रुप से बढ़ने नहीं दिया. ये है समस्या. समस्या की जड़ में है कि पूरे कृषि क्षेत्र में नीतियों को कृत्रिम तरीके से दबाकर रखना है. किसान की आमदनी को कृत्रिम तरीके से रोक कर रखा गया. उसे जब तक ठीक नहीं किया जाएगा… इस तरह की विकृतियां आएंगी… समस्या की जड़ में किसान और मनरेगा की लड़ाई नहीं है.

अगर ऐसा है तो क्यों न उन सुझावों पर गौर किया जाए जिनमें खेती के समय मनरेगा को सस्पेंड करने की बातें उठाई जाती हैं?

कई लोगों का कहना है कि कटाई और बुवाई के समय मनरेगा का काम न दिया जाए… वास्तविकता (व्यवहार) में होता भी नहीं है. मनरेगा के सिद्धांत (थियरी) अलग है और व्यवहार में अलग है. सिद्धांत में सौ दिन का प्रावधान है, किसे मिल रहे हैं सौ दिन. व्यवहार में सब काम कागजों में हो रहा है. तो ये कहना की मनरेगा की वजह से सब काम बहुत बड़ा डिस्टॉर्सन आया है, सही नहीं है. ये जरुर है कि कहीं-कहीं (जहाँ मनरेगा का काम जमीन पर पहुंचा है) मनरेगा की वजह से मजदूरों में स्वाभिमान बढ़ा है. अब उनके पास एक विकल्प है, पहले वो बंधुआ था. दरअसल किसान और किसान संगठन विरोध करने पर मजबूर होते हैं क्योंकि उनकी अपनी आमदनी को नवा दिया गया है. सरकार ने दो पीड़ितों को आपस में भिड़ा दिया है.

जद(यू) के केसी त्यागी जी ने किसानो के लिए एक आयोग बनाने की बात उठाई है जो फसलों के मूल्यबीमा, सिचांई आदि से जुड़े कृषि कार्यों के संबंध में सिफारिशों को देखे. कितना इत्तेफ़ाक़ रखते हैं इससे?

एक विशेष किस्म के आयोग की जरूरत है जिसकी मांग DSC05042हम और कई किसान संगठन लंबे समय से कर रहे हैं. केवल किसान आयोग नहीं बल्कि विशेष तौर पर किसान आय-आयोग बने. जैसे सरकारी कर्मचारियों के लिए वेतन आयोग होता है उसी तरह किसानों की न्यूनतम आय सुनिश्चित करने का एक आयोग होना चाहिए. यह उन तमाम सवालों को जोड़कर देखे जो फसलों के दाम का सवाल, किसानों सामान्य खर्चों खाद-बीज का सवाल, ऋण का सवाल, फसलों के बीमे का सवाल और फसलों के नष्ट होने पर मुआवजे का सवाल. आज ये सवाल अलग-अलग टुकड़ों में देखे जाते हैं. इस कारण कृषि पर कोई सुसंगत नीति नहीं बन पाती. इसके लिए हमारा सुझाव ये है कि, सरकार के कर्मचारियों को जो न्यूनतम तनख्वाह मिलती है (सातवें वेतन आयोग के अनुसार करीब 18,000 रुपए) उतनी न्यूनतम आय एक किसान को भी मिलनी चाहिए जो सरकार के हिसाब से सीमांत किसान नहीं है. वहां एक व्यक्ति काम कर रहा है और यहां किसान का पूरा परिवार काम कर रहा है. बस उसके लिए इतनी आय सुनिश्चित की जाए… उसके लिए अगर फसलों के दाम बढ़ाने की जरुरत है तो बढ़ाइए, लागत कम करने की जरुरत है तो वो कीजिए… फसल के नुकसान पर मुआवजा दीजिए. सबको मिलाकर एक सुसंगत नीति देने की जरुरत है. इसलिए केवल कृषि की समस्याएं या हमारे सुझाव नहीं… किसान की न्यूनतम और गारंटी आय सुनिश्चित करने वाली व्यवस्था बनाने वाले आयोग की जरुरत है.

पिछले कुछ महीनों से देश में ऐसी बहसें चल रही हैं, जिनके बारे में कुछ लोगों का कहना है कि ये जबर्दस्ती पैदा गई (मैन्युफैक्चर्ड) बहसे हैं. ऐसी बहसों में मीडिया सिर्फ उन्हीं को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाता हैं जहां नकारात्मकता होती है. क्या इस मामले में मीडिया गैर-जिम्मेदार भूमिका निभा रहा है?

मीडिया की गैर-जिम्मेदाराना भूमिका की फेहरिस्त बहुत लंबी है और उस फेहरिस्त में सहिष्णुता-असहिष्णुता का विचार बहुत नीचे आएगा. सबसे पहले सवाल आएगा कि देश में इतना बड़ा सूखा है, कहीं-कहीं तो अस्तित्व के संकट का है. वो टीवी पर ख़बर क्यों नहीं बनती. जिस देश में टी गार्डन (चाय बगान) में लोग मर रहे हैं वो आपके फ्रंट पेज की खबर क्यों नहीं बनती. ग्रामीण भारत में क्या स्थिति बन रही है. ये सवाल क्यों नहीं बनते. तो मेरी लिस्ट में पहले पचास आइटम तो इन चीजों से जुड़े होंगे… फिर सहिष्णुता-असहिष्णुता में मीडिया का सवाल आएगा.

असहिष्णुता का प्रश्न एक गंभीर प्रश्न है और बेशक शीर्ष पर असहिष्णुता बढ़ी है पर समाज में, व्यक्तिगत संबंधों में सहिष्णुता बढ़ी हो…ऐसा नहीं लगता. लेकिन सत्ता के शीर्ष से ऐसे कई काम हुए हैं जो सहिष्णुता के घटने का संकेत देते हैं. ऐसे में उनका विरोध हुआ है तो उसे तवज्जो मिलनी चाहिए. कई बार ऐसा होता है कि किसी चीज के महत्व को आप उसकी संख्या से नहीं माप सकते. इमरजेंसी के दौरान फणीश्वर नाथ रेणु ने अपना पद्मश्री लौटा दिया था. वो एक व्यक्ति ने किया था लेकिन वो मेरे लिए बहुत बड़ी ख़बर है. मेरे लिए वो फ्रंट पेज की हेडलाइन थी. और जो मुझे अटपटा लगा वो ये इस देश में असहिष्णुता नहीं है, ऐसा बोलने वाले बहुत असहिष्णु स्वर में बोल रहे थे. अगर आप साबित करना चाहते है कि आपके घर में बहुत शांति या सौहार्द है तो आप उसे डंडा लेकर साबित नहीं करते बल्कि शांति से ही साबित करते हैं.

प्रधानमंत्री का कहना है कि जाति के नाम पर देश को बांटने की कोशिश हो रही है. अगर थोड़ा हम पीछे देखें तो जिस तरह से गुजरात में हार्दिक पटेल को मीडिया ने रातों-रात उठायाबिहार में जातिगत गोलबंदी हुई और अब दलित बनाम… क्या ये बांटों और राज न करने दो” की तरह हैएक समाजशात्री के तौर पर इसके परिणामों को कैसे आंकेंगे आप?

जातिवाद (या नस्लवाद) के दो स्वरुप होते हैं प्रत्यक्ष और परोक्ष. प्रत्यक्ष होता कि जब कोई सड़क पर आता है, आंदोलन करता है. ये वही लोग होते हैं जो जातिवाद या नस्लवाद के शिकार होते हैं. लेकिन शुरुआत में उनको भी जातिवादी (नस्लवादी) मान लिया जाता है क्योंकि वो कई बार उसी चीज का सहारा लेते हैं जिसका वो विरोध कर रहे हैं. जातिवाद का विरोध करने वाले भी जाति के आधार पर लोगों को संगठित करते हैं.

दूसरे किस्म का जातिवाद परोक्ष किस्म का है. वो ये है कि मैं पांच हजार साल से अपनी सुख-सुविधाओं को लिए चुपचाप बैठा हूँ… मीडिया में 80 फीसदी अगड़े बैठे हों और वे देश के 80 फीसदी दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के लिए खबरें न बनाए तो ये जातिवाद है. ये समाज इस परोक्ष या प्रछन्न जातिवाद का बहुत गहरा शिकार है. जब तक जातिवाद के दोनों स्वरुपों को नहीं देखेंगे, समस्या जस की तस बनी रहेगी. बीजेपी और आरएसएस इस प्रत्यक्ष जातिवाद की आलोचना करते हैं जो मुझे बहुत बड़ा ढोंग लगता है. आप ईमानदार हैं तो उस जातिवाद की आलोचना कीजिए जिसका लाभ आप उठा रहे हैं. अब बात हार्दिक पटेल की, अगर कोई व्यक्ति पांच लाख लोगों को सड़क पर ला सकता है तो उसकी ख़बर लगानी पड़ेगी. मुझे लगता है हार्दिक पटेल की ख़बर लगाते वक्त मीडिया ने बहुत संतुलन का कार्य किया. हार्दिक पटेल ने जो ऊल-जलूल हरकतें की उसको कहीं से भी समर्थन नहीं मिला. फिर बात बिहार की… दरअसल बिहार में दोनों तरफ प्रछन्न जातिवाद था. बीजेपी सीधे-सीधे अगड़ों का राज लाने की कोशिश कर रही थी. एक तरफ अगड़ों का गठबंधन था दूसरी तरफ पिछड़ों का गठबंधन था. जिस तरह से बिहार या उत्तरप्रदेश में राजद (राष्ट्रीय जनता दल) या सपा (समाजवादी पार्टी) ने जातिवाद फैलाया है, उ.प्र. में जिस तरह एक जाति का राज चलाया जा रहा है उसकी आलोचना होनी चाहिए.

क्या केंद्र की एनडीए सरकार सत्ता में आने के बाद प्रछन्न जातिवाद को आरएसएस के जरिए धीरे-धीरे सामने लाने का काम कर रही है.

प्रत्यक्ष रूप से सरकार नहीं लाएगी क्योंकि उन्हें भी वोट का गणित पता है. अगड़ों का प्रत्यक्ष जातिवाद करके कोई पार्टी चुनाव नहीं जीत सकती. इस देश में अगड़ों का जातिवाद हमेशा पर्दे के पीछे से खेला जाएगा और पिछड़ों का जातिवाद सीधे. ऐसी ही इस देश की नियती है. क्योंकि सब कुछ जनगणना से निर्धारित है. और ये प्रधानमंत्री कभी ऐसा नहीं करेंगे. संयोग से और तकनीकि रुप से तो वह भी पिछड़ी जाति से हैं.

बिहार और .प्रदो ऐसे राज्य हैं जहाँ की राजनीति से देश की राजनीति निर्धारित करने वाली कहा जाता हैऔर इन राज्यों में पिछले ढाईतीन दशक में  जो जातीय पहचान वाली राजनीति, जिसे कुछ लोग सामाजिक न्याय कहते तो विरोधी बांटने वाली राजनीति, हुई है. क्या इससे कहीं न कहीं ये राज्य विकास के क्रम में अन्य राज्यों से पिछड़ गए हैं?

सामाजिक न्याय के लिए मंडल के बाद जो राजनीति हुई उसमें कई बीमारियां हैं, कई दोष हैं. जाति उन्मूलन के लक्ष्य को लेकर चली राजनीति स्वयं जातीय राजनीति का शिकार हो गई. वो भी उसी तरह के सामंती और व्यक्ति पूजा के संस्कार में शामिल हो गई है जिसका वो विरोध करते थी. लालू प्रसाद यादव जी के राज के समय में शासन-प्रशासन के न्यूनतम काम को भी तिलांजलि दे दी गई थी. ये उनके अक्षम्य अपराधों में हैं. लेकिन ये निष्कर्ष निकाल लेना कि इसकी वजह से यूपी और बिहार पिछड़े हैं, इतिहास को बिल्कुल भी न जानना होगा. याद रखिए कि सामाजिक न्याय की ये लहर पहले यूपी या बिहार में नहीं आई बल्कि ये इससे पहले अन्य राज्यों में आ चुकी थी. और वो प्रदेश इस समय देश में अग्रणी माने जाते हैं. सबसे पहले तमिलनाडु में आई. वहाँ विकास की गति इससे कम नहीं हुई बल्कि बढ़ी है. वहां कल्याणकारी चीजें आज किसी भी राज्य से कहीं आगे हैं. ये कर्नाटक में आई जिसे आज अगला राज्य माना जाता है. ये कुछ हद तक आंध्र-तेलंगाना में आई… ये केरल में आई. फिर यदि आप उ.प्र.-बिहार की ही बात करें तो ये मानने का कोई आधार नहीं है कि मंडल के आने के बाद इन राज्यों में विकास की गति कमजोर हुई है. बिहार की दुर्गत 1980 में शुरु हो गई थी… उस वक्त जगन्नाथ मिश्र वहां के नेता थे. जगन्नाथ मिश्र जी के कार्यकाल में जिस तरह बिहार की दुर्गति हुई… लालू प्रसाद यादव ने तो बस दुर्गति की उस परंपरा को जारी रखा है. और उ.प्र. में भी बीच-बीच में जब भी बीजेपी का राज आया तो क्या विकास की गति अच्छी हुई थी. ध्यान से आंकड़ों को देखें तो ये मानने का कोई आधार नहीं है. दरअसल मंडल के आने के बाद, पिछड़ों के जागरण के बाद, ज्यादा लोग विकास की दौड़ में शामिल हुए हैं. दक्षिण भारत में तो स्पष्ट है कि जब से पिछड़ों की पार्टियां सत्ता में आनी शुरु हुईं हैं तब से उस इलाके का विकास बेहतर हुआ है. हमारी एक समस्या है कि हम उत्तर भारत को ही पूरा देश समझते हैं, दक्षिण भारत के बारे में हमारा ज्ञान शून्य होता है. फिर कहते हैं कि उत्तर भारत तो देश की राजनीति का केंद्र है.

छात्र राजनीति… जिस स्तर की शिक्षा हमारे अधिकतर विश्वविद्यालयों में दी जा रही हैवैसे माहौल में कितना जायज हैजेएनयू को छोड़कर शायद ही ऐसा कोई विविहोगा जहाँ इतने सभ्य तरीके सेबिना पैसा बहाए चुनाव हो जाएं..फिर क्यों न छात्रसंघों पर थोड़ा विराम दिया जाए?

इस तरह तो हमें पंचायत, विधानसभा या लोकसभा चुनावों को भी विराम देने की जरुरत है. आप मुझे ऐसा राज्य या चुनाव बताइए जहाँ पैसे का प्रयोग न होता हो… जहाँ खींचतान या अन्य ऐसी (अप्रिय) चीजें न होती हों. यह हमारी सोच का पाखंड है. वास्तव में इस देश में छात्र राजनीति पर विराम लगा हुआ है. इस देश के ज्यादातर राज्यों में चुनाव नहीं हो रहे हैं. (एकाध को छोड़ दें तो) उ.प्र. और हरियाणा में पिछली बार चुनाव कब हुए थे… सच ये हैं कि तमाम राजनैतिक दलों ने, सत्ताधारी दलों ने छात्र राजनीति खत्म कर दी है. यूजीसी के दौरान मुझे पता लगा कि 15-20 से ज्यादा यूनिवर्सटीज़ में तो चुनाव होते ही नहीं हैं और इस देश में 500 से ज्यादा यूनिवर्सटीज़ हैं. इसका असर है कि राजनीति में लोग सामान्य घर से नहीं आ रहे हैं… बल्कि नेताओं, ठेकादार और धन्नासेठ के बेटे राजनीति में आ रहे हैं. राजनीति में लैटरल एंट्री हो रही है. जो बहुत खतरनाक है. हम मुख्य दरवाजा बंद कर रहे हैं फिर ये रोना भी रो रहे है कि पिछले दरवाजे से लोग क्यों घुसे जा रहे हैं. छात्र राजनीति में दोष हैं उन्हें सुधार करना चाहिए. लिंगदोह समिति की सिफारिशें दरअसल बहुत नासमझी की सिफारिशें हैं. उनके हिसाब से तो छात्रसंघ चुनाव कभी हो ही नहीं सकता था. नए नियम कायदों से पूरे देश में छात्रसंघों के चुनाव होने चाहिए. क्योंकि राजनीति इस देश के लोकतंत्र का प्राण है और अगर छात्र राजनीति नहीं करेंगे तो फिर स्मगलर और माफिया करेगा.

हरियाणा में पंचायत चुनावों के लिए हुए परिवर्तनों का आपने विरोध किया है. हम जनता से जागरूक होने की अपेक्षा करते हैं और जागरूकता आती है शिक्षा से. यह मानव विकास के तीन मानकों में भी शामिल है.  फिर इन परिवर्तनों का क्यों विरोध कर रहे हैं?

शिक्षित होना, साफ कपड़े पहनना, माता-पिता की सेवा करना बुरा नहीं है. ऐसे अच्छे गुणों की लंबी फेहरिस्त बनाई जाती है. लेकिन सवाल तब पैदा होता है जब इनको चुनाव की अनिवार्यता में बदल दिया जाता है. लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों का पढ़ा-लिखा होना, समझदार होना बहुत जरूरी है. लेकिन इन सब को चुनाव लड़ने की अनिवार्यता बना देना न सिर्फ नासमझी है बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी भावना के खिलाफ है. कुछ चीजें ऐसी होती हैं जो एक देश को लोकतंत्र बनाती हैं. हर व्यक्ति को वोट का अधिकार, उसे चुनाव लड़ने का अधिकार होता है. लेकिन जैसे ही इनमें से किसी एक को दबाया जाता है, तो वो लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक होता है. जैसे हर वोटर को समझदार होना चाहिए. इसके लिए उसे रोज अख़बार पढ़ना चाहिए लेकिन अगर ये अनिवार्यता बना दी जाए तो समस्या हो जाएगी. अतः ये सब लोकतंत्र को कमजोर करने वाली ही हैं. फिर ऐसी शर्तें लगा देना जो सीधे-सीधे पैसे से संबंध रखती हों तो ये तो खतरनाक है. ऐसा करके आप पिछले दरवाजे से चुनाव लड़ने को प्रोत्साहन दे रहे होते हैं. आज से चालीस साल पहले किसने मैट्रिक की होगी? क्या ये व्यक्तिगत च्वॉइस (पसंद) का प्रश्न था? जिस चीज का सीधे-सीधे अमीरी-गरीबी से संबंध है उसे आप अनिवार्यता बना रहे हैं. टॉयलेट की अनिवार्यता लगाई जा रही है. पहले सरकार टॉयलेट बनवाए फिर अगर कोई मुफ्त का टॉयलेट बनवाने से मना करे तो उसे चुनाव लड़ने से रोक दिया जाना चाहिए. कल के दिन आप कपड़े साफ होने की अनिवार्यता लगा सकते हैं! एक लोकतंत्र में जरूरी होता है कि आप इसका फैसला जनता को करने दें. हमारे सत्ताधारी वर्ग/पढ़े-लिखे वर्ग का जो अहंकार है कि लोग-अच्छे बुरे का फैसला करने में असमर्थ हैं, मैं उनकी मदद करूं, मैं बताऊं कि उनका सरपंच कौन हो… ये उनकी (पढ़े-लिखे/सत्ताधारी वर्ग की) नासमझी है. ये उनकी अशिक्षा का प्रमाण है. ये मान लेना कि डिग्री ही शिक्षा का प्रमाण है, बहुत बड़ी भूल है.

 

(योगेंद्र यादव से हुई चर्चा का अगला (दूसरा और अंतिम) भाग  पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)[sgmb id=”1″]

7 Comments


  1. // Reply

    बहुत बधाई जी इस शानदार प्रयास व पहल की जिसके शुरूआत में दमदार साक्षात्कार छापा आपने ।


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    बेहद संतुलित साक्षात्कार। अच्छे उत्तर. योगेन्द्र जी बहुत सौम्य हैं, कनविंसिंग है यह साक्षात्कार भी. उनके किस्म की राजनीति का सफल होना भले ही संदिग्ध लगे लेकिन यह प्रयास अपने आपमें बेहद सराहनीय है.

    एक वेबसाइट के रूप में चौपाल की अच्छी शुरुआत.


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    बेहतरीन ..सधा हुआ इंटरव्यू। चौपाल को ढेर सारी शुभकामनाएं


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    विद्वत्ता , बुद्धिमत्ता के हिसाब से सही बात है पर व्यवहार और समाधान दे पाना योगेन्द्र भाई के बस की बात नहीं है। जहाँ तक नयी पार्टी बनाने की बात है तो उनके पास तो पहले से ही “समाजवादी जन परिषद” नाम से पार्टी थी जिसका उल्लेख करने से वे बचते हैं। उनकी नयी पार्टी किशन पटनायक जी द्वारा बनाई गयी उस पुरानी पार्टी की समाधी पर ही बनेगी। जो स्व॰ किशन पटनायक और स्व॰ सुनिल के साथ एक धोखा ही कहा जाएगा।


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    Positive way of thought by yogendra Yadav would lead to politics required presently.


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    Yogendra yadav is need to make Indian democracy in its real sence. It is true but hard. Chaupal is good start of constractive journal.

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