‘आप’ ने राजनीति में विकल्प के नाम को बदनाम कियाःयोगेंद्र यादव

देश-दुनिया की राजनीति में छाए तमाम मसलों और  आम आदमी पार्टी की राजनीति से जु़ड़े  प्रश्नों  को लेकर हमने चर्चा की योगेंद्र यादव से… इस विस्तृत चर्चा का पहला भाग हम प्रकाशित कर चुके हैं. प्रस्तुत है चर्चा का दूसरा भाग

बदलते हुए युग में आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस‘ ‘डिलेड प्रेगनेंसी‘ जैसे टर्म्स परिवारसमाज और संबंधों को बहुत तेजी से बदल रहे हैं. तकनीक के इस अवश्यंभावी युग में बदलते  सामाजिक चरित्र को आप किस प्रकार देखते हैDSC05042

नई तकनीक से झगड़ा नहीं करना चाहिए. टेक्नोलॉजी में परिवर्तन सामान्य, सहज़ तरीके से होते हैं. नई तकनीक से खौफ़ खाने के वजाए उसे हमें अपने उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने की जरुरत है. हमें अपनी प्राथमिकताएं तय है. दुनिया में किसी देश की प्राथमिकता के आधार पर हम अपने देश का एजेंडा तय न करें. इस देश को क्या चाहिए, सोलर एनर्जी चाहिए क्योंकि धूप ज्यादा है. इस देश को छोटे पैमाने की मशीन चाहिए, जिसमें बहुत ज्यादा पूंजी का निवेश न हो. इस देश को ऐसी मशीनें नहीं चाहिए जिससे की लेबर का काम मशीन करने लगे.  हम अपने तकनीक का एजेंडा स्वयं बनाएं, इसकी जरुरत है. तो साइन्स और टेक्नोलॉजी में अपना एक देशज़ प्राथमिकता बनाएं, वो प्राथमिकता जो हमारे समाज के जरुरत से पैदा हो, और हमारे यहाँ प्रकृति ने जो संसाधन दिए हैं उनका उपयोग कर सकें. और हमारा जो परंपरागत ज्ञान है, उस ज्ञान से जुड़ पाएं. आज दुर्भाग्यवश साइंस और टेक्नोलॉजी का एजेंडा इन चीजों से जुड़ा हुआ नहीं है.

इस्लामिक एस्टेट के आतंक के बढ़ते प्रभाव से अमेरिकी चुनाव में इस बार ईसाई बनाम मुस्लिम का जोर दिख रहा हैचुनाव धार्मिक कट्टरता की तरफ बढ़ता दिख रहा है. फ्रांस में भी राजनीति धार्मिक कट्टरता की तरफ बढ़ती दिख रही है. दक्षिणपंथी विचारधारा के बढ़ते प्रभाव को आप विश्व राजनीति में किस प्रकार देखते हैं?

दुर्भाग्य यह है कि विश्व राजनीति को देखने का हमारा हिन्दुस्तानी चश्मा कहीं खो गया है. आज हम विश्व को उसी नजर से देखते हैं जिस नजर से न्यूयॉर्क टाइम्स हमें दिखाना चाहता है. आज से 60 साल पहले आज़ादी के समय हिन्दुस्तान में तमाम कमियां थींदेश गरीब थालेकिन उस पीढ़ी में विश्व को देखने की एक दृष्टि थीजो किसी से उधार ली हुई दृष्टि नहीं थी. टैगोर में पूरी दुनिया को देखने की एक अपनी दृष्टि थीजो हिन्दुस्तानी दृष्टि थी. नेहरू में वो दृष्टि थी. आज के नेताओं में मुझे वो नहीं दिखता. हमारे प्रधानमंत्री में नहीं दिखतीपिछले प्रधानमंत्री में भी नहीं दिखी. आज भारत आर्थिक रूप से मजबूत हो रहा है लेकिन दृष्टिसमझज्ञान उसमें उधार के है. इसलिए जो आप बता रहे हैं, दरअसल ये विश्व की ख़बरें हों जरुरी नहीं है. अमेरिका के अंदर बर्फ़बारी की ख़बर देश के अख़बारों में होती है लेकिन अपने देश के अंदर सूखा पड़ गया उसकी खबरें कहीं नहीं मिलती. आईएस (इस्लामिक स्टेट) का मामला एक बीमारी है, लेकिन ये विश्व की प्रमुख बीमारियों में से एक नहीं है. देश, छोटे से शहरी मध्यम वर्ग की पसंद- नापसंद के आधार पर अपनी ख़बरें बनाता है और हम इस 5-10 प्रतिशत के आधार पर अपनी पूरी दुनिया की समझ बना रहे हैं.

वो  सत्ता का इस्तेमाल करके परेशान कर रहे हैंऔर ये सत्ता का इस्तेमाल कर सड़क पर ड्रामा कर रहे हैं

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार और दिल्ली नगर निगम के बीच बढ़ते टकराव पर आपका क्या कहना हैक्या दिल्ली सरकार जानबूझकर मामले को राजनितिक रंग दे रही है?

संघीय व्यवस्था में अलग-अलग सरकारों के बीच टकराव कोई बहुत नई चीज नहीं है.  हाँ, वो टकराव इतना स्थूल और बचकाना शक्ल नहीं लेते हैजितना की इस वक़्त दिल्ली में हो रहा है. मैं समझता हूँभारतीय जनता पार्टी ने अपना मन बना रखा है कि नगर निगम और केंद्र सरकार का इस्तेमाल करते हुए इस आम आदमी पार्टी सरकार के लिए जितनी परेशानियां खड़ी हो सकें उतनी करो और आम आदमी पार्टी की सरकार ने तय कर लिया है कि इससे बढ़िया मसाला उनके लिए कोई हो नहीं सकता. तो दोनों तरफ से मुझे कोई राजनितिक इच्छा शक्ति दिखाई नहीं देती कि आम लोगों के गंभीर सवालों पर कोई फोकस कर सके. वो (भाजपा) सत्ता का इस्तेमाल करके परेशान कर रहे हैंऔर ये (‘आप’) सत्ता का इस्तेमाल कर सड़क पर ड्रामा कर रहे हैं. ये अशोभनीय और दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि गंभीर काम इसकी वजह से रुका पड़े हैं. मैं इसके लिए दोनों को दोषी मानता हूँ.

“आम आदमी पार्टी अब एक सामान्य आम पार्टी बन गई है”

अरविंद केजरीवाल का नितीश कुमारलालू यादवममता बनर्जी के साथ मंच साझा करना भविष्य में एक नए राजनितिक गठजोड़ की तरफ इशारा करता है. क्या आप‘ ने भ्रष्टाचार के ख़ात्मे और राजनीति के विकेंद्रीकरण  के अपने लक्ष्य से भटक कर सत्ता की राजनीति को लक्ष्य बना लिया है?

सत्ता की राजनीति करना हर राजनीतिक दल का एक धर्म होता है. लेकिन केवल सत्ता की राजनीति करना और किसी भी कीमत पर सत्ता में बने रहने के लिए राजनीति करना ही राजनीति की विकृति है. जब अरविंद केजरीवाल ने स्टेज पर लालू प्रसाद यादव को गले लगाया, तो वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की विरासत का अपमान था. यह उन लाखों कार्यकर्ताओं का अपमान था, जिन्होंने भ्रष्टाचार के विरोध के लिए अपना जीवन समर्पित किया, अपना सब कुछ दिया. इससे नया गठबंधन पैदा होगा, कहना बहुत जल्दबाजी होगी लेकिन इतना तय है आम आदमी पार्टी अब एक सामान्य आम पार्टी बन गई है. अन्य क्षेत्रीय पार्टियों की तरह इसका उद्देश्य भी येन-केन-प्रकारेण सत्ता पाना हो गया है, किसी भी तरह सच-झूठ के सहारे चलाते जाना है. इसमें हैरानी की बात नहीं, दुःख की बात है. लोगों ने एक नई राजनीति की उम्मीद की थी लेकिन वह नहीं हुआ. जिसे लोग मंदिर समझ कर आए थे, वो मूर्तियों की दुकान निकली.

“राजनीतिक स्तर पर ‘आप’ ने विकल्प के नाम को बदनाम कर दिया है. आज कोई अगर लोगों के बीच स्वच्छ राजनीति की बात लेकर जाता है तो लोग हंसना शुरु कर देते हैं और कहते हैं तुम भी वही करोगे… (जो ‘आप’ ने किया)”

आने वाली 14 तारीख को दिल्ली सरकार अपना एक साल पूरा कर रही है. पहली साल के काम को कैसे आंकेगे? हम चाहते हैं इसका जवाब 2013 के योगेंद्र यादव दें.

2013 हो या 2015-16… मैं नही बदला हूँ… मेरी दृष्टि वही है. सच नहीं बदलता. पिछले एक साल में आम आदमी पार्टी का मूल्यांकन करना हो तो तीन कसौटियां इस्तेमाल की जा सकती हैं… पहली, वाकी राज्यों में जो सरकारें हैं या दिल्ली में इससे पहले जो सरकारें रहीं उसकी तुलना में ये सरकार कैसी रही. अगर आप पूछें कि क्या शीला दीक्षित या मदन लाल खुराना की सरकार से अच्छी रही तो मैं इंकार नहीं कर सकता. कुछ अच्छे काम हुए हैं. बिजली के बिल कम हुए, शिक्षा का बजट बढ़ा, ऑड-ईवन का प्रयोग बुरा नहीं था.

दूसरी, इस पार्टी ने अपने घोषणापत्र में जो 70 वादे किए थे उन पर क्या प्रगति हुई. हालांकि सरकारों का कार्यकाल पांच सालों का होता है अपने वादे पूरे करने के लिए. लेकिन उन पर सवाल किए जाने चाहिए जो वादे एक साल में कह कर किए गए थे… मसलन दिल्ली की हर अनऑर्थराइज़्ड कॉलोनियों का रेगुलराइज़ कर वहाँ के लोगों को प्रमाणपत्र देने  का वादा, एक लाख लोगों को रोजगार के लिए प्रशिक्षित करने का वादा, पांच साल में आठ लाख नौकरियों का वादा… पहले साल में कितना हुआ? शौचालय, स्कूल और कॉलेज बनवाने का वादा… फिर भी मैं मानता हूँ कि फैसला करने में जल्दीबाजी नहीं होनी चाहिए.

लेकिन जो तीसरी कसौटी है वह मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण है कि आम जनता ने  इस(पार्टी) से जो उम्मीद लगाई थी कि यहाँ एक नए तरह की राजनीति होगी, बंद कमरों में नहीं बल्कि जनता से पूछ कर फैसले किए जाएंगे… इस पर सरकार न सिर्फ असफल रही बल्कि विपरीत दिशा में चली है. ऐसा लोकपाल लाए जो अपने ही जनलोकपाल से ठीक उल्टा था, सार्वजनिक जीवन में झूठ बोला, जहाँ तक संभव हुआ, भ्रष्ट मंत्रियों का बचाव (डिफेंDSC05035ड) किया. इस सब के बाद लोगों के मन में वह जो भावना थी… जो सबसे बड़ा नुकसान हुआ है कि राजनीति अलग हो सकती है, राजनीति में एक नए तरह का प्रयोग किया जा सकता है, वो ख़त्म हो गया है. बाबा-भारती और खड़क सिंह की कहानी यहाँ दोहराई गई है.
उस कारण आज कोई अगर लोगों के बीच स्वच्छ राजनीति की बात लेकर जाता है तो लोग हंसना शुरु कर देते हैं. लोग कहते हैं तुम भी वही करोगे… ये सबसे बड़ा नुकसान किया है. राजनीतिक स्तर पर इसने विकल्प के नाम को बदनाम कर दिया है. ऐसे में कल कोई ईमानदार व्यक्ति लोगों के बीच ईमानदार राजनीति करने जाएगा तो उसका काम पहले से दोगुना ज्यादा कठिन कर दिया है.

“भारत का वामपंथ आयातित है, जो इस देश की मिट्टी, देश की आबोहवा और मिजाज़ को कभी समझ नहीं पाया”

ऐसा लगता है कि वामपंथ बंगाल में भी दिन-ब-दिन कमजोर होता जा रहा है और एक बार ये फिर कांग्रेस से गठबंधन के लिए प्रयासरत है. क्या कारण है जो भारत में वामपंथ की ये दशा हो गई?

भारत का वामपंथ इस देश की मिट्टी, इस देश की आबोहवा और मिजाज को कभी समझ नहीं पाया. जैसे आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ) इस देश की मिट्टी और आबोहवा को कभी नहीं समझ पाया, जैसे आरएसएस इस देश में जर्मनी से आयातित विचारधारा है वैसे ही वामपंथ ने इस देश में रुस और चीन की विचारधारा को आयात किया है. इस देश में आयातित विचारधाराएं नहीं चलेंगी… हमें इस देश की मिट्टी के अनुरुप एक विचार गढ़ना होगा. जो देशज़ विचार हो… ऐसा देशज़ विचार जो अपनी सांकृतिक विरासत और परंपराओं, सिर्फ एक पंरपरा नहीं बल्कि जो विविध सांस्कृतिक परंपराएं हैं, उनमें से मिलकर जो आज देश की जरुरत है और भविष्य की एक वैश्विक दृष्टि… वह बनाने की जरुरत है. ये लेफ्ट के बस में नहीं था. कुछ समय उनका राज चला क्योंकि उन्होंने गरीबों के लिए वाकई बहुत कुछ किया था. लेकिन एक हद के बाद वो गरीबों को मदद करने की वजाय, खासतौर पर बंगाल में, शोषकों के साथ खड़े होने के स्थान पर शोषित के साथ खड़े हो गए… इसलिए उनका बंगाल में ह्रास हुआ. आज भी इस देश में गरीब के पक्ष को उठाने के लिए एक शक्ति की अनिवार्यता है. आज भी अंतिम पंक्ति में खड़े मजदूर की आवाज़ बुलंद करने की जरुरत है. खासतौर पर ऐसे संदर्भ में जहाँ आज की केंद्र सरकार जितनी किसान और मजदूर विरोधी है… ऐसी तो केंद्र सरकार कभी हुई ही नहीं… और यह काम पुराना लेफ्ट नहीं कर सकता. हमें एक नई जनपक्षीय राजनीति, जनता की राजनीति खड़ी करनी होगी. उसके लिए विचारधारा अलग होगी, यह आयातित नहीं होगी. 21वीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती यही है.

(योगेंद्र यादव से हुई इस चर्चा का पहला भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)[sgmb id=”1″]

1 Comment


  1. // Reply

    बहुत सुन्दर साक्षात्कार… बेहद तार्किक…दिल और आत्मा का संयोजन…योगेन्द्र यादव जी जैसी शख्सियतें राजनीती के अग्रजा व मार्गदर्शक बनने चाहिये…सच कहूँ तो गोविंदाचार्य जी के बाद शुद्द भारतीय समझ का अक्ष योगेन्द्र जी में दिखता है…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

+ 64 = 66