जेएनयू में उदारता का मुखौटा लगाए है वामपंथ

 

विश्वविद्यालय के वर्तमान घटनाक्रम ने “लाल आतंक” के चेहरे को उजागर किया है

योगेंद्र भारद्वाज

आज जेएनयू  (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) का माहौल लगातार कुछ शरारती तत्त्वों के द्वारा बिगाडने की कोशिश की जा रही है और साथ ही बदनाम करने की भी कोशिश में कुछ लोग लगे हुये हैं, जो वास्तव में निन्दनीय है।
14 अक्तूबर को जेएनयू के माही छात्रावास में हुई दो छात्रों के बीच हुये सामान्य झगड़े को तूल देकर उसे साम्प्रदायिक रंग में रंगने का घिनौना कुकृत्य किया गया।

इस षड्यन्त्र में वे सभी वामपंथी संगठन शामिल हैं, जिनको इस बार के छात्रसंघ चुनाव में ‘वैचारिक’ हार का सामना करना पड़ा और सभी वामपंथी संगठनों को गठबंधन बनाने पर मजबूर होना पड़ा।। आज हमारा भाई नजीब पिछले क़रीब 8-9 दिनों से कैंपस से गायब है। हमें जरूरत है तो उसे खोजने की और सकुशल कैंपस वापस लाने की, जिसके लिए राष्ट्रवादी छात्रसंगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद पूरी शिद्दत के साथ कैंपस में संघर्ष कर रहा है। हमारे संगठन के अनुसार कैंपस एक परिवार है, जिसमें सांप्रदायिकता के रंग न घोला जाए। नजीब को जल्द से जल्द बापस लाया जाए ताकि जाँच पडताल कर एक निर्णय तक पहुँचा जा सके। आम छात्रों को सांप्रदायिक बातों से परहेज करना चाहिए ताकि कैंपस में शान्ति का माहौल बरकरार रह सके।
दो दिन पहले जेएनयू के पूर्व संयुक्त सचिव सचिव सौरभ कुमार को धमकी भरा पत्र भेजा गया। जिसमें उन्हें जान से मारने तक की धमकी दी गई। उनसे कहा गया है कि यदि तुमने मुसलमानों पर कुछ कहा तो अच्छा नहीं होगा। (“we burn abvp…we burn jnu”)

महज़ कलाई में कलावा पहनने के कारण कुछ छात्रों के साथ शारीरिक हिंसा की गई

विक्रान्त. अंकित और सुनील- वे छात्र हैं जो अपनी धर्म-संस्कृति को मानने और उसके प्रतीकों का इस्तेमाल करने के कारण उनको थप्पड़ जड़ दिया गया। उनकी गलती सिर्फ इतनी थी कि वे हॉस्टल मेस सेकेटरी के लिए वोट माँगने गए किन्तु वे भूल गये थे कि उनके हाथ का कलावा ऐसी घटना तक कर बैठेगा। हर किसी को भारतीय संविधान के अनुसार अपनी संस्कृति-सभ्यता की रक्षा करने का अधिकार है। कोई भी अपनी संस्कृति से सम्बन्धित प्रतीक चिह्नों को धारण कर सकता है। 

इस हिंसा के बावजूद उन छात्रों ने कैंपस के छात्रों को संबोधित करते‘ हुये ओपन लेटर लिखा जिसमें जन्होंने कैंपस में शान्ति की अपील की, साथ ही इस मसले को सांप्रदायिक रंग न देते हुए उनकी बात सुनने की अपील की। कैंपस में व्याप्त तनाव के माहौल से छात्रों को पढाई में दिक्कत आ रही है। बाद में माही छात्रावास के अध्यक्ष अलीमुद्दीन का भी एक पर्चा आया, जिसमें उन्होने वामपंथी छात्र संगठनों से जुड़े कुछ।कार्यकर्ताओं पर खुद को मानसिक व शारीरिक रूप से परेशान करने का आरोप लगाया।

कुछ वामपंथी संगठनों ने कैंपस में अध्ययन-अध्यापन का माहौल बिगाडा हुआ है। कैंपस में लगातार ऐसी गतिविधियों का आयोजन पूर्व में भी किया गया है, जिससे आन्तरिक सौहार्द का माहौल विषमय बना था। हम देख सकते हैं कि पूर्व में जब दंतेवाड़ा मे बी.एस.एफ.के जवान शहीद होते हैं, तो यही वामपन्थी संगठन जश्न मनाते है, सियाचिन में जवान शहीद होते हैं तो इन्हें ख़ुशी होती है। महिषासुर का गुणगान करते हैं और देवी दुर्गा को वैश्या तक बुलाते हैं और दूसरी तरफ जब आतंकवादी अफज़ल को फांसी दी जाती है तो यही लोग उसे शहीद तक घोषित करने में नहीं हिचकिचाते हैं। साथ ही नारा भी देते हैं- “अफजल हम शर्मिन्दा हैं….तेरे कातिल जिन्दा हैं।” याकूब मेनन की फाँसी की निन्दा करते हैं।उसे भी शहीद बताते हैं। एक तरफ ये वामपंथी भारतीय संविधान की रक्षक न्यायपालिका में (कथित तौर पर) भरोसा जाताना नहीं भूलते तो दूसरे तरफ यही संगठन न्यायपालिका पर प्रश्न खडा करने में भी नहीं संकोच करते हैं।

वर्तमान घटना को ही यदि हम देखें तो वामपंथ के इस “लाल आतंक” ने माननीय कुलपति कॊ ही कैद कर लिया। वह भी करवाचौथ के पर्व पर, जबकि उनकी पत्नी और वह स्वयं व्रत में थे। उन्हे भोजन-पानी तक नहीं दिया गया। जैसा कि उन्होने खुद बताया। ये वामपंथियों की उदारता है। इनसे पूछा जाना चाहिए कि अब कहाँ गए मानवाधिकार पर ढपली पीटने बाले? आज उन्हें याद नहीं है क्या कि कुलपति भी मानव हैं और उनके भी कुछ अधिकार हैं। घर पर उनकी पत्नी भी भूखी है और उसके भी अधिकारों का हनन हो रहा है। दरअसल “खाने के दाँत और तथा दिखाने के और” वाली कहावत वामपंथियों पर ही चरितार्थ होती है।

अब भी नजीब गायब है और पूरा जेएनयू उसकी प्रतीक्षा में है लेकिन इनको अभी भी राजनीति की लालसा सता रही है। वैसे तो खुद को सबसे बडा समाजवादी-उदारवादी मानते हैं लेकिन जब सच सामने आता है तो अवसरवादिता दिखाने में यह वामपंथी नहीं चूकते। लेकिन जाति-पन्थ के नाम पर आपस में लडाने बाले अच्छी तरह से ये जान लें कि सत्य पराजित नहीं होता है। आज नहीं तो कल नजीब बापस जरूर सकुशल कैंपस वापस लौटेगा और इन दोमुंही राजनीति करने वाले वामपंथी संगठनों का असली चेहरा सभी के सामने रखेगा।


योगेंद्र भारद्वाज जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के संस्कृत अध्ययन केंद्र में शोधार्थी हैं। योगेंद्र जेएनयू छात्र संगठन (JNUSU) में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से चुने गए एकमात्र प्रतिनिधि (Councillor) हैं। यहाँ व्यक्त विचार निजी हैं। जिनका ‘चौपाल’ से कोई संबंध नहीं है।】

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1 Comment


  1. // Reply

    जे न यु के हर एक इस प्रकार की घटना के लिए वामपंथी संगठन है। मुझे शक है की नजीब के गायब होने के पीछे इनहीलोगों का हाथ हो, क्योकिं इस तरह के षड्यंत्र में ये माहिर हैं।

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