केरल का लाल आतंक

भारत के सर्वाधिक साक्षर राज्य का दर्जा केरल को प्राप्त है। IMG-20160318-WA0064भारत की साक्षरता दर जहाँ 74 के आसपास है, वहीं केरल में यही 92 तक जाती है। गर्व होता है भारत को अपना ऐसे साक्षर राज्य पर। साथ ही केरल की नर्सें, जो कि विश्वविख्यात हैं और संंभवतः भारत में लगभग प्रत्येक राज्य में सेवा प्रदान करती हूई दिखाई देती हैं। इस परिप्रेक्ष्य में जितना नाम केरल की जनता भारत में कर रही है, उतना ही बदनाम केरल की कम्युनिस्ट सरकार केरल को कर रही है। केरल को “ईश्वर के घर” (Gods own country) के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त है और विभिन्न देशों के पर्यटक वहाँ आते हैं। लेकिन आज मानों केरल के हालात माओ-लेनिन या स्टालिन की नीतियों का अनुसरण करते दिख रहे हैं।

ऐसे में कम्युनिस्ट सरकार के लाल आतंक के आगे हर-कोई बेबश है। पिछले कुछ माह पूर्व सहिष्णुता की चर्चा जोरों पर थी, लेकिन आज केरल असहिष्णु है, तो इस मौके पर मानवाधिकारों की दुहाई देने बाले प्रवक्ता लुप्तप्राय हो गए हैं। केरल में लगातार भारतीय जनता पार्टी या राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अथवा ऐसे संगठनों के अन्य कार्यकर्ताओं को टारगेट किया जा रहा है और उनको अपनी जान से हाथ धोना पड़ रहा है। भारत विश्व का सबसे बडा लोकतंत्र है, जहां सभी को समान अधिकार प्राप्त हैं। ऐसे में भला क्यों भाजपा के कार्यकर्ता संतोष को उत्तरी केरल के कन्नूर में उनके आवास में हमला कर जिंदा जलाने का जघन्य अपराध किया गया? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता इंजीनियर मनोज की भी हत्या कर दी गई।

आखिर ऐसा क्यों है कि वामपंथी  स्वयं पर प्रश्नचिह्न लगाने बाले व्यक्तियों के साथ ऐसा बर्ताव करते हैं? नक्सलवाद की समस्या भारत के कई हिस्सों में व्याप्त है, जहाँ तैनात सुरक्षाबलों को यह भी नहीं पता कि वे कल की सुबह सही-सलामत ड्यूटी कर पाएंगे या नहीं। वे किसी जाति विशेष के न होकर हिंदू -मुस्लिम-दलित… सभी वर्गों से आते हैं और ये लाल आतंकी बिना किसी हमदर्दी के उनको मौत की नींद सुला देते हैं।
कहने को तो भारत में 6-14 वर्ष के मध्य के बच्चों के लिये अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान किया गया है, लेकिन ये नक्सलवादी मानसिकता से ग्रस्त लाल आतंकी उनके शिक्षा के मंदिरों को बम-ब्लास्ट में तबाह कर, उनके अधिकारों का ही हनन नहीं करते, बल्कि उनका भविष्य भी अंधकारमय कर देते हैं।

1137केरल में वामपंथ की सरकार का रवैया आपातकाल से भी अधिक कठोर है। यहाँ राजनैतिक उत्पीड़न का सिलसिला बहुत पुराना है। 1968 में भी ऐसा ही वाकया हुआ था, जब कन्नूर में ही बीड़ी और सिगार निर्माण करने बाली कम्पनी के कर्मचारियों को राजनैतिक हिंसा का शिकार होना पडा। उनको मजबूरी में वामपंथियों के आतंक के नीचे काम करने को मजबूर होना पड़ा। इसी समय बन-रक्षकों की भी हत्या का मामला देखने को मिला। 1969 में आरएसएस के मुख्य शिक्षक वी.रामाकृष्णन का बहुत ही बेरहमी से कत्ल किया गया था। यह सिलसिला 2015 तक आते-आते 200 की संख्या को पार कर चुका है। ध्यान देने बाली बात यह है कि इन सभी हत्याओं में 90% केरल के वे लोग शामिल है, जो केरल की हिंदुओं  की ‘थिया’ जनजाति से संबंध रखते हैं। निश्चय ही ये चिंतनीय है कि जहाँ भारत खुद को सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के रूप में अपनी दावेदारी कॊ मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर लाल आतंक भारत की छवि को विश्वपटल पर धूमिल करने और लोकतंत्र का गला घोंटने में व्यस्त है।

योगेंद्र भारद्वाज जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के संस्कृत अध्ययन केंद्र में शोधार्थी हैं। योगेंद्र जेएनयू छात्र संगठन (JNUSU) में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से चुने गए एकमात्र प्रतिनिधि (Councillor) हैं। यहाँ व्यक्त विचार निजी हैं,‘चौपाल’ से संबंध नहीं】

[sgmb id=”1″]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

− 1 = 3