अमेरिकी चुनाव की अक्कड़-बक्कड़

–यशवंत देशमुख (@YRDeshmukh)

तो इस प्रकार डोनाल्ड ने अपना ‘प्राइमरी’ चुनाव जीत लिया है. क्या कहा? हिलेरी क्लिंटन भी चुनाव जीत गई हैं? ठीक है. समझ गया. दोनों चुनाव जीत गए हैं.
लेकिन कैसे? दोनों चुनाव जीत जाएं, ये कैसे संभव है? अरे भैया… चुनाव तो कोई एक ही जीत सकता है न? अगर दोनों जीत गए तो अमेरिकी राष्ट्रपति की गद्दी पर बैठेगा कौन?
खैर… बराक ओबामा आज अमेरिका के राष्ट्रपति हैं. 8 साल पहले उन्होंने ठीक इसी तरह के ‘प्राइमरी’ चुनावों में हिलेरी क्लिंटन को मात दी थी.
क्या कहा? ओबामा ने हिलेरी को हराया था? लेकिन मैंने तो सुना है कि वे दोनों एक ही पार्टी के हैं? क्या आपने भी ऐसा ही सुना था? क्या हिलेरी क्लिंटन ने पार्टी बदल दी?
अरे यार… बड़ा झमेला है! इससे पहले दिमाग चकरा जाए, आइए ये जानते हैं कि अगले राष्ट्रपति का चुनाव जीता किसने है?
उत्तर है-किसी ने नहीं. अगले राष्ट्रपति चुने जाने तक ओबामा अभी भी अमेरिका के राष्ट्रपति हैं. ट्रम्प और हिलेरी ने अभी सिर्फ ‘प्राइमरी’ चुनाव जीते हैं और अभी तक दोनों सिर्फ राष्ट्रपति पद के ‘उम्मीदवार’ हैं.
लेकिन अगर वे सिर्फ उम्मीदवार हैं तो अभी तक चुनाव-चुनाव के शोर के बीच आखिर क्या खिचड़ी पक रही थी?

हम सभी ‘चुनाव’ से वाक़िफ़ है. हो सकता है हम में से कइयों को स्कूल या कॉलेज में हुए चुनाव याद हों. नहीं? तो आपको अपने मोहल्ले के चुनाव तो याद होंगे ही जिसमें आपके दो पड़ोसी भी ताल ठोक रहे थे. नहीं? ये भी याद नहीं? तो फिर 2014 का लोकसभा तो पक्का याद होगा! जब नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने!
तो अब आप ये मुझे बताइए कि नरेंद्र मोदी का चुनाव, अमेरिका में राष्ट्रपति ओबामा के चुनाव से अलग कैसे है?
देखिए, हमारे यहाँ, यानी भारत में ‘संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली’ है. जबकि अमेरिका में ‘अध्यक्षीय लोकतांत्रिक प्रणाली’ है.
भारत में हम पहले अपने सांसद को चुनते हैं, फिर चुने हुए सांसद अपने बीच से किसी एक को प्रधानमंत्री चुनते हैं. तो इस तरह हम सीधे प्रधानमंत्री नहीं चुनते. इसे ‘अप्रत्यक्ष’ चुनाव कहते हैं. तो इस प्रकार, हालांकि मोदी भाजपा/राजग के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे लेकिन फिर भी भारत के मतदाताओं ने सीधे मोदी को वोट नहीं दिया. यही “अप्रत्यक्ष लोकतंत्र” है.
जबकि अमेरिका में ऐसा नहीं होता. वहाँ की जनता सीधे राष्ट्रपति को अपना वोट देती है. पिछली बार उसने ओबामा को दिया था, जिससे वे राष्ट्रपति बन सके. यह “प्रत्यक्ष लोकतंत्र” का उदाहरण है.
लेकिन इस सब से हटकर एक चुनाव और है जो अमेरिकी सिस्टम को और इंटरेस्टिंग बनाता है. और ये हैं ‘प्राइमरी’ चुनाव.
‘प्राइमरी’ चुनाव वे चुनाव होते हैं जो राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले अंतिम और निर्णायक चुनाव से ठीक पहले होते हैं. इन चुनावों में अलग-अलग पार्टियों के अपने उम्मीदवार चुने जाते हैं.
तो इस प्रकार अमेरिकी जनता न सिर्फ अपना राष्ट्रपति चुनती है, बल्कि वह यह भी चुनती है कि राष्ट्रपति चुनाव के लिए ‘उम्मीदवार कौन होगा’.

उदाहरण के लिए अगर भारत में भी यही प्रणाली हो तो कांग्रेस/संप्रग इसी तरह प्राइमरी चुनाव करवा रही होती कि राष्ट्रपति पद के लिए उसका उम्मीदवार कौन होगा? मनमोहन सिंह या राहुल गांधी!
चलिए मान लेते हैं कि इस प्रकार के चुनाव में राहुल गांधी उम्मीदवार चुन लिए जाते तो फिर वे ही राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनेंगे. लेकिन ध्यान रखिए इन ‘प्राइमरी’ चुनाव में सिर्फ कांग्रेस के समर्थक ही वोट करेंगे.
अब ठीक इसी तरह… भाजपा/राजग में भी होता. नरेंद्र मोदी, सुषमा स्वराज या राजनाथ सिंह? कौन उम्मीदवार हो, इसका फैसला इसी ‘प्राइमरी’ चुनाव से होता. जो भाजपा/राजग समर्थकों के सबसे ज्यादा वोट हासिल करता, वही उम्मीदवार बनता.
इसी तरह ‘आप’ वाले भी अरविंद केजरीवाल, योगेंद्र यादव और (मान लीजिए) आशुतोष में से अपना उम्मीदवार चुनते. अब इसी नियम को आप अन्य क्षेत्रीय दलों पर भी लागू कर लें.
तो इस प्रकार की प्रणाली में भारत में चुनाव सिर्फ नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच न सिमटकर राष्ट्रपति पद के ‘कई’ उम्मीदवारों के बीच होता. इस स्थिति में भारत के मतदातों को सीधे अपने उम्मीदवार को चुनने का मौका मिलता.

इसे चुनाव की “राष्ट्रपति प्रणाली” कहते हैं.
चलिए एक बार फिर मान लीजिए कि 2014 का आम चुनाव “राष्ट्रपति प्रणाली” का ही चुनाव था. तो मतदान (जो आंकड़े हमारे पास हैं, उसी आधार पर) के बाद कुछ ऐसी स्थिति होती…
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तो इस तरह चुनाव की “राष्ट्रपति प्रणाली” काम करती है. लेकिन इस ‘प्राइमरी चुनाव’ के अलावा एक चीज और है जो अमेरिकी चुनाव को खास बनाती है. वह है- Winner Takes All, यानी “विजेता सब ले जाता है”. इसकी चर्चा बाद में करूंगा. फ़िलहाल अभी चुनाव के पहले भाग पर हम अपना ध्यान केंद्रित करते हैं.
अमेरिका में दो प्रमुख दल हैं. ‘डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन’. रिपब्लिकन को “ग्रैंड ओल्ड पार्टी” (जीओपी) के तौर पर भी जाना जाता है. अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति ओबामा ‘डेमोक्रेट’ हैं जबकि पिछले राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ‘रिपब्लिकन’ थे. इस बार ‘रिपब्लिकन’ की तरफ से विवादास्पद अरबपति डोनाल्ड ट्रम्प हैं. वे ‘प्राइमरी’ चुनाव जीत कर राष्ट्रपति पद के लिए रिपब्लिकन उम्मीदवार हैं. जबकि दूसरी ओर, डेमोक्रेट्स की तरफ से उम्मीदवार कौन होगा, इसके लिए अभी हिलेरी क्लिंटन और बर्नी सैंडर के बीच मुक़ाबला जारी है. अभी तक की स्थिति के अनुसार हिलेरी क्लिंटन आगे चल रही हैं.
जब ये पूरा हो जाएगा तो 8 नवंबर को अमेरिकी मतदाता दो मुख्य उम्मीदवारों के बीच से अपना राष्ट्रपति चुनेंगे.
जैसे हमारे यहाँ 29 राज्य हैं, ठीक वैसे ही अमेरिका में 50 राज्य हैं. हर राज्य को उसकी जनसंख्या के अनुपात में “इलेक्टोरल कॉलेज डेलिगेट्स” आवंटित किए गए हैं. जिनकी कुल संख्या 538 होती है. इसको समझने के लिए आप लोकसभा में 543 सीटों से समझने की कोशिश करें. कल्पना कीजिए कि ये बिल्कुल लोकसभा सीटों के समान ही है. अब जो 272 सीटें जीतता है, उसी की सरकार बनती है. इसी तरह अमेरिका में 270 “इलेक्टोरल कॉलेज” वोट पाने वाला राष्ट्रपति बनता है.
अरे भागे कहाँ जा रहे हैं! जरा रुकिए तो… यहाँ एक अंतर है. भारत में सभी 543 लोकसभा सीटों पर अलग-२ लोग चुनाव लड़ते हैं और जीत कर आते हैं लेकिन अमेरिका में 538 “इलेक्टोरल कॉलेज डेलीगेट्स” पर सिर्फ दो ही व्यक्ति चुनाव लड़ते हैं. वही दो व्यक्ति हर सीट पर जो राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे हैं. उनके पास भी हमारी लोकसभा चुनाव जैसी व्यवस्था है लेकिन उसे दूसरे नाम-“कांग्रेसी चुनाव” के नाम से जाना जाता है. फ़िलहाल हम उस पर चर्चा नहीं करेंगे क्योंकि अभी हमें राष्ट्रपति चुनाव पर ही गौर करना है.
दुनिया में जितने भी लोकतंत्र हैं, उनमें प्रायः दो प्रकार की चुनाव पद्धतियां ही देखने को मिलती हैं. एक, “फर्स्ट पास्ट द पोस्ट” सिस्टम. ये सबसे सरल सिस्टम है. दूसरा, जिसे “अनुपातिक प्रणाली” के नाम से जाना जाता है.
बस दो मिनट में इसे यूं समझिए… उत्तरप्रदेश में 80 लोकसभा सीटें जिसमें  2014 आम चुनावों में भाजपा+ को मिली 73, 5 सपा ने जीती और 2 कांग्रेस ने. बसपा को कुछ नहीं मिला तो स्थिति कुछ ऐसी रही…
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अब ‘अनुपातिक प्रणाली’ को देखिए. मान लीजिए कि राज्यों में कोई उम्मीदवार नहीं है, बस पार्टियां अपने-२ निशान पर चुनाव लड़ रहीं हैं. तो स्थिति क्या होती? चलिए फिर एक बार उत्तरप्रदेश को ही देखते हैं..image

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अब अमेरिकी चुनाव के “विजेता सब ले जाता है” (Winner takes all) को यहाँ लागू कीजिए तो या तो सभी सीटें भाजपा को मिल जाती या बहुमत मिलने की स्थिति में सपा, बसपा या कांग्रेस को. सिर्फ एक को पूरी की पूरी 80 सीटें…
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तो अब देखिए कि तीन अलग-अलग तरह से होने वाले चुनाव में किसको क्या मिलेगा…
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अब “विजेता सब ले जाता है” का नियम भारत के सभी राज्यों में लागू करके देखते हैं. तस्वीर कुछ यूं बनती है…
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लेकिन आपने यहाँ गौर किया होगा कि जहाँ अमेरिका में मुक़ाबला सिर्फ दो पार्टियों के बीच होता है, वहीँ भारत में ये 14-15 के बीच होता, ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारे यहाँ क्षेत्रीय क्षत्रप बहुत मजबूत हैं…
क्या कहा? ऊपर की सूची आपको चकरा दे रही है? कोई बात नहीं, एक बार फिर से 15 उम्मीदवारों का “विजेता सब ले जाता है” (WTA) गणित ये रहा…
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इस प्रकार, भारत में अगर अमेरिका जैसी राष्ट्रपति प्रणाली होती तो नरेंद्र मोदी और भी बड़े जनमत से राष्ट्रपति चुन लिए गए होते. उनको 414 “इलेक्टोरल कॉलेज” मिले होते जबकि बहुमत के लिए सिर्फ 272 की ही दरकार होती है. मैं समझता हूँ कि अब आप जान गए होंगे कि अमेरिका राष्ट्रपति चुनाव के अंतिम चरण में क्या होता है. जो भी उम्मीदवार किसी राज्य में बहुमत हासिल करता है उसे उस राज्य के पूरे “इलेक्टोरल कॉलेज” का विजेता मान लिया जाता है. दूसरे शब्दों में इसे ही “विजेता सब ले जाता है” (Winner takes all) कहते हैं. जैसे फ्लोरिडा में 25 इलेक्टोरल कॉलेज है, इसमें जो बहुमत पाएगा उसे सभी 25 मत दे दिए जाएंगे.
इसी तरह सभी 50 राज्यों में यही तरीका अपनाया जाता है और हर राज्य के अंतिम परिणाम के आधार पर कुल इलेक्टोरल कॉलेज की संख्या तय होती जाती है. ये सभी 50 राज्य 6 नवंबर को चुनाव करेंगे.
आपको याद होगा कि भाजपा गठबंधन ने 2014 लोकसभा चुनावों में 38.6 मतों के साथ 336 सीटें जीती हैं. यही चुनाव अगर राष्ट्रपति प्रणाली पर होता तो भाजपा गठबंधन को 414 सीटें मिलती. इस प्रकार हम मान सकते हैं कि राष्ट्रपति प्रणाली में बहुमत का फैसला बड़े स्पष्ट तरीके से हो जाता है. अब ये बात अलग है कि वहाँ अधिकार चुनावों में जीत का अंतर बहुत ज्यादा नहीं होता.
अमेरिका के 50 राज्यों में से 22 को ‘लाल’ राज्यों की संज्ञा दी जाती है. ऐसा इसलिए है क्योंकि पिछले 4 चुनावों में इन राज्यों में रिपब्लिकन की कभी हार नहीं हुई. इसी तरह 18 राज्यों को ‘नीले’ राज्यों की संज्ञा दी जाती है क्योंकि पिछले 4 चुनावों में इन राज्यों में ‘डेमोक्रेट्स’ की हार नहीं हुई. शेष 10 राज्य ऐसे हैं जो असली ‘युद्धक्षेत्र’ हैं. इन्हें ‘पर्पल’ राज्यों के नाम से जाना जाता है. कहने का आशय है कि यही 10 राज्य निर्णय करते हैं कि अमेरिका का राष्ट्रपति कौन होगा. इनको सम्मिलित रूप से आप “अमेरिका का उत्तरप्रदेश” मान सकते हैं! इन दस राज्यों में ओहियो, कोलोराडो, लोवा, नेवाडा, न्यू हैम्पशायर, वर्जिनिया, पेनसिलवेनिया, विस्कॉन्सिन, मिशिगन और फ्लोरिडा शामिल हैं.
इन 10 राज्यों में मुक़ाबला कितना रोचक होता है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कभी-कभी अंतिम राज्य के नतीजे पर राष्ट्रपति का फैसला टिक जाता है. साल 2000 में जॉर्ज बुश को 271 (बहुमत के लिए जरुरी 270 से सिर्फ एक ज्यादा) इलेक्टोरल कॉलेज मत मिले थे, जबकि उनके प्रतिद्वंदी डेमोक्रेटिक अल-गोर को 266. और ये काटें की टक्कर हुई फ्लोरिडा में, जहाँ बुश को 48.85% वोट मिले वहीँ अल-गोर को 48.84%. तो इस तरह 0.01% वोट ज्यादा मिलने से जॉर्ज बुश अमेरिका के राष्ट्रपति बन सके थे. लेकिन जैसी कहावत है कि जीत, जीत होती है, अंतर भले ही कुछ हो. जीतने वाला सब ले जाता है. जो जीता, वही सिकंदर! तो अपनी नज़रें गड़ाए रहिए इस चुनाव पर और इंतज़ार कीजिए कि कौन इस ग्रह पर सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बनकर उभरेगा!

(लेखक यशवंत देशमुख पत्रकार हैं और सर्वेक्षण कराने वाली संस्था सी-वोटर के प्रमुख हैं)[sgmb id=”1″]

1 Comment


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    बहुत अच्छा और बहुत बहुत शुक्रिया इस तमाम जानकारी के लिए

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