वामसी जुलुरी द्वारा लिखित ‘हिंदू धर्म’ की पुस्तक समीक्षा: एक पुस्तक जो पूरी ना पढ़ी जा सकी

वामसी जुलुरी ने ‘रिआर्मिंग हिंदुइज़्म’ नाम की एक पुस्तक लिखी है। सुशांत झा ने हिंदी अनुवाद किया है, ‘हिंदू धर्म-वास्तविक स्वरूप, हिंदूफोबिया और विश्व कल्याण’ नाम से।

भ्रम न हो इसलिए पहले ही स्पष्ट कर दें कि यह पुस्तक हिंदुओं को संकट का हथियारों से मुक़ाबला करने का प्रस्ताव नहीं करती। शायद!

फिर क्या है इसमें?
जी, इसमें हिंदू धर्म के ‘आलोचक’ (मतलब कोई भी वह दृष्टि जो हिंदुइज़्म को मुग्ध भाव से न देख पाता हो) जिस नज़र से इसे देखते हैं, को लेकर क्षुब्धता है।
पुस्तक में हिंदू धर्म के बारे में प्रचलित ज्ञान मीमांसा की छानबीन (और छिन्न-भिन्न करने) की कोशिश का दावा जोर-शोर से किया है लेकिन उसके लिए जिस दृष्टि और तर्क-पद्धति की ज़रूरत पड़ती, वह जुलुरी के पास मुझे तो नहीं दिखी।
वैसे उनमें एक सात्विक किस्म की पीड़ा बीच-बीच में दिखती है, लेकिन वह पीड़ा जब फिसलती है, तो वह प्रकट होती है, ऐसे क्षोभ में व ऐसे लोगों के बौध्दिक स्तर पर जो ख़ुद ट्रोल तो नहीं करते लेकिन ट्रोलिंग का आनंद लेते हैं।
मैंने पूरी पुस्तक नहीं पढ़ी। नहीं पढ़ पाया। एक तिहाई, केवल 100 पेज पढ़ी। कुछ ऐसे अगंभीर विवरण और तर्क मिले कि पढ़ना मुश्किल लगा।
मसलन, भूमिका में आज़ादी के बाद से अब तक के समय को लेकर जुलुरी जी ने एक टिप्पणी लिखी है।
इसे पाठक ख़ुद देखें; “हमारी पीढ़ी से क़रीब तीन पीढ़ी पहले सन 1947 में भारत की नाममात्र की आज़ादी से लेकर 2014 तक के आशा के उत्फुल्ल क्षणों तक हिंदू धर्म एक ऐसा धर्म है जो मौन में जिया गया है”
क्या कहना चाहते हैं जुलुरी! आकलन है या चेतावनी? विद्वान इस भाषा में तो बात नहीं किया करते!
कुछ अन्य उदाहरण देखिए कि ज्ञान मीमांसा को कितनी कड़ी चुनौती मिल रही है;
“वास्तविकता तो यह है कि मानव की उत्पत्ति की कहानी बिल्कुल वैसी नहीं है, जैसी प्रतीत होती है। हालांकि उसके आधार को, उदाहरण के लिए, विकास के क्रम को चुनौती देने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि हिंदू संवेदनशीलता अपनी दैवीय अवधारणा की पुष्टि के लिए मनुष्य और जानवर के बीच ऐसे किसी भी अंतर की मांग नहीं करती” (पृष्ठ 82)
अब पता नहीं, चुनौती देने की ज़रूरत क्यों नहीं!
ज़रूरत नहीं कि क्षमता नहीं!
या कि असंभाव्य है मनगढ़ंत बातों से सदियों तक के सुविचारित और मान्य अध्ययन को चुनौती देना!
चुनौती नहीं देना चाहते लेकिन निर्णायक शब्दों में बोलते हैं कि मानव विकास की जो कहानी दुनिया जानती है वह सही नहीं! निर्णय पूरा सुना देते हैं कि वह ग़लत है पर वजह क्या है, अपनी टिपिकल भाववादी शैली में उसकी ज़रूरत नहीं महसूस करते।
पुनः देखिए; “हमारे लिए सबसे शुरू में एक माता की अवधारणा है। किसी जीवाश्म या किसी आत्मा की नहीं। बल्कि एक माँ के लिए एक बच्चे की श्रद्धा की संवेदनशीलता है। यही हमारे सृजन की कहानी है। इससे ज़्यादा कुछ नहीं” (पृष्ठ 95)
एक बार फिर देखिए। भाव के लिए, कविता के लिए बड़ा उदात्त है इस तरह का चिंतन पर यह ज्ञान की कोटि में किसी भी तरह से नहीं आ पायेगा।

जुलुरी कैसे ज्ञान-मीमांसा को चुनौती दे रहे हैं, मेरी समझ से बाहर है।
हालांकि ज्ञान और इस तरह का ‘चिंतन’ साथ-साथ और दूर तक चल भी नहीं सकता!
वर्तनी की अशुद्धियां तो अक्षम्य किस्म की हैं। वेस्टलैंड प्रकाशन प्रूफरीडर रखने पर विचार कर सकता है।
मेरे लिये मुश्किल है किसी को यह पुस्तक पढ़ने की सलाह देना, फिर भी वे लोग जो सिर्फ़ हिंदू होने की वजह से गर्वोन्मत्त रहना चाहते हैं, पढ़ लें इसे। कुछ चीज़ें ख़ास तरह की बहसों में काम आ सकती हैं। व्हाट्सऐप और फेसबुक के कुछ ग्राफ़िक्स में काम आ सकती है। टीवी की बहस में भी काम आ सकती है।

पुस्तक- हिंदू धर्म-वास्तविक स्वरूप, हिंदूफोबिया और विश्व कल्याण’, मूल्य- 200/- (पेपरबैक), पृष्ठ-312, अनुवाद-सुशांत झा प्रकाशक-वेस्टलैंड

(लेखक महेश मिश्रा भारतीय सूचना सेवा से संबद्ध हैं। यहाँ व्यक्त विचार निजी हैं, चौपाल से कोई संबंध नहीं है)

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