तैमूर – नाम में क्या रखा है?

–मनीषा दीक्षित (@MonishaDikshit)
“नाम में क्या रखा है? जिसे हम गुलाब कहते हैं उसे किसी और नाम से पुकारें तो भी वो उतना ही अच्छा महकेगा “
विलियम शेक्सपियर का यह विचार भी, सोशल मीडिया पर बॉलीवुड अभिनेता सैफ अली खान और करीना कपूर के बेटे के नाम तैमूर अली खान को लेकर मचे हुए बवाल को शांत कराने में सफल नहीं हो पाया।10613673713_b719ae7e8e_b

भारत के अधिकतर लोग अपने देश के इतिहास में तैमूर की भूमिका के बारे में अनजान है। इसका श्रेय हमारे देश के कुछ प्रख्यात इतिहासकारों को जाता है जिन्होंने सुविधापूर्वक इतिहास की किताबों से तैमूर और उसके जघन्य अत्याचारों को मिटा दिया है। कुछ लोगों का यह मानना कि यह मामला निजी है और दूसरों को दखलअंदाज़ी करने का कोई हक़ नहीं, जबकि इस नाम के आलोचक अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला दे रहे हैं।

क्या अमेरिका में कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति अपने बच्चे का नाम ओसामा-बिन-लादेन रख सकता है या कोई इस्रायली हिटलर के नाम पर अपने बच्चे का नाम रख सकता है?

हालांकि हर माता-पिता के पास यह विशेषाधिकार होता है कि वे अपने बच्चे का नाम कुछ भी रखे और सबको एकांतता का अधिकार मिलना चाहिए लेकिन इस अधिकार पर दावा तभी किया जा सकता है जब आप अपनी निजी मामले को सार्वजनिक न बनाएं। क्या अमेरिका में कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति अपने बेटे का नाम ओसामा-बिन-लादेन रख सकता है… इस उम्मीद से कि जनता आक्रोश नहीं दिखाएगी? क्या उस समय भी यही परिणाम देखने को मिलेगा जब कोई इस्रायली हिटलर के नाम पर अपने बच्चे का नाम रखे?

तैमूर द्वारा किए गए आक्रमण एक धार्मिक युद्ध थे… न कि राजनैतिक जैसा कि कुछ बुद्धिजीवियों का दावा है

वापस अपने पहले सवाल पर आते हैं- एक नाम ने क्या रखा है? बहुत कुछ! किसी का नाम उसकी पहचान होती है… और भारत इस नाम को स्वीकार नहीं कर सकता। तैमूर(अर्थात लौह) लंग एक तुर्क-मंगोल सम्राट था। भारत के लिए तैमूर, क्रूरता, बर्बरता और गैर-मुस्लिम जातीयता, खासकर हिंदुओं के प्रति घृणा का पर्याय है। कहा जाता है कि तैमूर की नज़रें सम्पन्न और समृद्ध भारत की राजधानी, दिल्ली पर थीं।अफगानिस्तान को पार करने के पश्चात उसने न सिर्फ दिल्ली को लूटा बल्कि रास्ते में जितने भी हिन्दू और पारसी मिले, उनकी हत्या कर दी। उसने अपनी क्रूरता की एक और मिसाल कायम की जब एक लाख हिंदुओं को एक दिन में ही मार डालने का आदेश दे डाला। लूट के अलावा उसने अपने सेना को बलात्कार और हत्या करने की खुली छूट दे रखी थी। दिल्ली और वहाँ के मंदिरों और मूर्तियों पर ख़ास तौर से निशाना साधा गया था। मारने के बाद कटे हुए सिरों को दुनिया के सामने प्रदर्शित किया गया। इससे साफ़ होता है कि तैमूर द्वारा किए गए आक्रमण एक धार्मिक युद्ध थे… न कि राजनैतिक जैसा कि कुछ बुद्धिजीवियों का दावा है।

जिस प्रकार एकांतता का अधिकार कुछ लोगों का हक़ है, ठीक उसी प्रकार मौखिक आक्रोश हम नागरिकों के अभिव्यक्ति की आज़ादी का प्रयोग है

हम भारतीयों के लिए, एक बर्बर जो अमानुषिकता का प्रतीक हो, कभी प्रेरणा का स्त्रोत नहीं बन सकता। उन सभी लोगों के लिए, जो इन सेलिब्रिटी जोड़े के बचाव में लगे हैं- उन्हें यह याद रखना चाहिए कि भारत में सेलिब्रिटीज को वस्तुतः पूजा जाता है, जिनकी सफलता सार्वजनिक मनुहार पर आधारित है। उनकी निजी ज़िन्दगी निजी नहीं होती। जिस प्रकार एकांतता का अधिकार कुछ लोगों का हक़ है, ठीक उसी प्रकार मौखिक आक्रोश हम नागरिकों के अभिव्यक्ति की आज़ादी का प्रयोग है।

(लेखिका मनीषा दीक्षित पेशे से इंजीनियर हैं। समकालीन राजनीति, भारतीय संस्कृति पर लिखती रहती हैं। व्यक्त विचार निजी हैं, चौपाल से संबंध नहीं)

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