बलूचिस्तान के ऐतिहासिक संदर्भ और उसके संघर्ष के मायनों को समझिए: मज़दाक दिलशाद बलूच

एक लंबे अरसे से अपनी आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे बलूचिस्तान और इसके लोगों में उस समय एक नई ऊर्जा का संचार हो गया जब इस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बलूचिस्तान की जनता को धन्यवाद दिया. एक राष्ट्र के तौर पर बलूचिस्तान पाकिस्तान से अलग होने के लिए संघर्ष कर रहा है और दुनिया के कई हिस्सों में इसके लिए एक स्वतंत्रता आंदोलन चलाया जा रहा है. इस आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता और बलूच नेता ‘मीर मज़दाक दिलशाद बलूच’ ने ‘बलूचिस्तान पर पाकिस्तान का आंतरिक उपनिवेशवाद और बलूच राष्ट्रीयता#’ विषय पर नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम में बलूचिस्तान के इतिहास की अहम घटनाओं और अहम किरदारों से रूबरू कराते हुए संघर्ष के मायने समझाने की कोशिश की. हम उनके इस भाषण को यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं…

आपको अहसास नहीं कि इस दुनिया में हम कितने अकेले हैं लेकिन यहां आप इतनी संख्या में आए तो पता चला कि हम अकेले नहीं है… इससे हमें बहुत हिम्मत मिलती है.

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अगर पिछले सत्तर सालों को छोड़ दिया जाए तो बलूचिस्तान एक आज़ाद मुल्क़ रहा है, यह कोई चार कबीलों की रियासत नहीं. सात सौ सालों में सत्तर साल की मिंयाद बहुत काम होती है. इसीलिए हमें घबराना नहीं है. हमने कई ऐसे दौर देखे जब बाहरी ताक़तों ने हम पर हमला किया और कब्ज़ा करने की कोशिश की… आख़िर में वे सब नाकाम हुए हैं. हमारा इतिहास 1410 ईसवीं से शुरू होता है जब अमीर-मीरो-बलूच की अगुआई में एक मुल्क़ के तौर पर हमारी सीमाएं निर्धारित हुई. हमारा औपनिवेशीकरण 1948 से शुरू नहीं हुआ, यह शुरू हुआ 1839 से. चूंकि आज का पाकिस्तान ब्रिटिश की पैदावार है, हमारी असली जंग ब्रिटिशर्स से हुई थी. 1839 में मेरे परदादा मीर करीम रहसाली, दीवान बसन बर के साथ उनके दो बेटे ब्रिटिश से लड़ते हुए शहीद हुए. हमारी लड़ाई तब से है. पहले हम ब्रिटिश से लड़े अब पकिस्तान से लड़ रहे हैं. हम किसी के गुलाम नहीं रहे. हम कमजोर थे, अंग्रेजों के मुक़ाबले लेकिन फिर भी हमने अपने ऊपर सौ फीसदी कब्ज़ा नहीं होने दिया. 6 अक्टूबर 1841 को मीर नसीर खान ने टी. एच. मैडोक के साथ एक संधि की जिसमें उन्होंने बलूचिस्तान को संप्रभु राष्ट्र माना. 1854 में मीर नसीर बलोच खान और अंग्रेजों के प्रतिनिधि जॉन जैकब के साथ संधि हुई जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से बलूचिस्तान को एक संप्रभु राष्ट्र माना लेकिन इसमें उन्होंने कहा कि उनकी विदेश नीति उनके साथ मिलकर चलेगी.

1883 में राबर्ट सैंडिमन और खुदा इदात खान अमीरे बलूच के साथ एक और समझौता हुआ जिसमें कुछ खास जगह अंग्रेजों को दी गईं. जिसमें क्वेटा कैंटोनमेंट भी है जो अब पाकिस्तान के कब्जे में हैं, जहां हमारे वालिद भी दो साल तक टॉर्चर किए गए. आज भी वहां सैंकड़ों बलूच जवान और महिलाएं कैद हैं. जहां उन्हें आज भी टार्चर किया जा रहा है उनका कत्ल किया जा रहा है उनके साथ रेप किया जा रहा है और उनकी लाशें, वहीं कैंट के आस पास ही दफना देते हैं या उनकी लाशें उठाकर हमारे पहाड़ों और घरों के आसपास फेंक देते हैं. उन लाशों में से आँखे, गुर्दे, फेफड़े जैसे अंग निकाल लिए जाते हैं. उन लाशों पर लिखा होता है पकिस्तान ज़िंदाबाद. उनके सीनों पर पाकिस्तानी झंडों को बांधकर फेंका जाता है… सिर्फ और सिर्फ ये दिखाने के लिए कि तुम अगर आज़ादी की बात भी करोगे तो तुम्हारे साथ ऐसा होगा. 1935 में अंग्रेजों ने एक साज़िश के तहत हमें एक प्रिंसली स्टेट घोषित करने की कोशिश की… लेकिन हमारे लोगों ने इसका विरोध किया.

इसके बाद पकिस्तान की बारी आई. देखिए… अंग्रेज जैसे भी थे, उनके यहां कुछ नियम-कायदे थे. दुश्मन कैसा भी हो अगर वह इज़्ज़तदार है तो उसे इज़्ज़त देनी चाहिए. पुर्तगाली आए तो उन्होंने भी हम पर ग्वादर में हमले किए, जिस ग्वादर के लिए आज हम चीन से लड़ रहे हैं उस ग्वादर के लिए हम 1505 में पुर्तगालियों से लड़ चुके हैं और ग्वादर हमने वापस जीता है. आपको शायद पता हो कि गोवा में मीर हम्मल बलूच की स्टेचू पुर्तगाली बना के गए हैं. जो आज भी खड़ी है. क्योंकि पुर्तगालियों को उनकी नेतृत्त्व क्षमता के बारे में अच्छे से पता था. ये बात अंग्रेजों को भी समझ आती थी. उनके जनरलों ने जो किताबें लिखीं हैं उसमें ये सब दर्ज है. लेकिन पाकिस्तान को ये सब समझ नहीं आता. आज जिन जिन्ना को पाकिस्तान कायदे आज़म मानता है, ये सब किया धरा इन्हीं का है. जिन्ना ने पहले मुसलमान होने के नाते हमसे पाकिस्तान में मिलने की बात की. इस पर खान साहब ने कहा कि ये बात संसद ही तय कर सकती है. क्योंकि जो फैसला संसद करती थी. हमारे यहाँ तभी से लोकतंत्र की परंपरा थी. शायद इसी की सजा आज हमें भुगतनी पड़ रही है. हमारे यहां जो हिंदू, सिख या ईसाई हैं उन्हें हम सब बलूच कहते हैं… तो बहुत पहले से ही हम एक राष्ट्र थे. अभी यहां दिल्ली में क़रीब पांच हज़ार हिंदू बलूच रहते हैं जिनके संगठन का नाम भी “बलूच हिंदू एसोसिएशन” है. ये ऐसी छोटी-छोटी मिसालें हैं जिनसे स्पष्ट है कि हम एक अलग राष्ट्र रहे हैं.

अंग्रेजी हुक़ूमत द्वारा जब हमसे विभाजन के वक़्त पूछा गया कि आप कहाँ जाना चाहते हैं तो हमने पाकिस्तान को एक आवाज़ में ठुकरा दिया. हमारे दूसरे मुल्क़ों से रिश्ते रहे हैं… कूटनीति रही है. फिर आख़िर क्यों हम किसी से अपनी संप्रभुता का समझौता करें…? क्यों हम पकिस्तान में मिलें? महज़ इसलिए कि हम मुसलमान हैं…? फिर तो मुस्लिम देश और भी हैं… क्यों सब बिखरे हैं…? फरवरी 1948 में जिन्ना ने हम पर दवाब डालने की कोशिश की… उस समय खान साहब ने अपने सभी वकील दोस्तों के साथ मिलकर जिन्ना से कहा कि हमारे जो हिस्से हमने अंग्रेजों को दिए वापस किए जाएं क्योंकि हमारा कॉन्ट्रैक्ट अंग्रेजों से था… अब जब अंग्रेज जा रहे हैं तो हम स्वतंत्र हुए और हमारे हिस्से भी हमें वापस मिलने चाहिए. जिन्ना अपनी बहन के साथ हमारी बात सुनने आए. जिन्ना को सोने में तौला गया और उनकी बहन जी को चांदी में… जिन्ना ने कहा ठीक है… हम आपकी बात रखेंगे (आपका केस लड़ेंगे). जब जिन्ना ने देखा कि यहां तो इतना सोना है कि एक फीस के लिए मुझे सोने में तौल रहे हैं, बहन को चांदी में तौला! पाकिस्तान तो अभी-अभी बना है हमारे पास न समंदर है… न सोना है।. सोना तो शायद ये (पाकिस्तानी) आने वाले सौ सालों तक न देख पाते! जिन्ना केस लड़ने गए थे लेकिन जब वापस लौटे और पाकिस्तानी जनरलों से बात की तो बोले ये आप क्या कर आये…? बलूचिस्तान की स्वतंत्रता में हाँ में हाँ मिला दी? हमें तो वो समंदर चाहिए हमें वो जमीन चाहिए जो संसाधनों से भरी-पूरी है जिसमें छोटी सी आबादी रहती है इसके बाद कहानी पलटी और जिन्ना भी पलट गए. लेकिन हम आज़ादी के वक़्त (1948 में) आप (भारत) के पास आए थे अपनी आज़ादी के लिए मदद मांगने के लिए. हमारे प्राइम मिनिस्टर (प्रांतों में तत्कालीन मुख्यमंत्री) आए थे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पास लेकिन किन्हीं कारणों की वजह से मदद न मिल सकी. जब वापस गए तो पकिस्तान ने हम पर हमला कर दिया. बलूचियों का कत्लेआम हुआ. खान साहब और उनकी बेग़म (बलूचिस्तान रानी सहिब) को कैद करके ले गए… कहाँ ले गए… रावलपिंडी, जहां से आज भी पूरा पाकिस्तान चलता है. वहीं उनसे इंट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन (विलय पत्र) पर बंदूक की नोंक पर जबरन दस्तख़त करवाए जो दुनिया में कहीं भी स्वीकार नहीं हैं. फिर आगा अब्दुल करीम साहब ने लोगों के साथ मिलकर पाकिस्तान से लड़ाई शुरू की जो आज तक चल रही है.
पाकिस्तान में फौजी ऑपरेशन बड़े पैमाने पर हुए हैं. 50, 60 और 70 के दशक में की अगर बात करे तो जो आंदोलन हुए वे आंदोलन नहीं थे वे आंदोलन के उतार चढ़ाव थे. इस बीच में हमें मारा भी गया है, हम गिरे हैं लेकिन हम फिर उठे है, हम फिर खड़े हुए है. 1999 से एक बार फिर इस आंदोलन को बढ़ावा मिला है. इस समय बलूचिस्तान का ये आंदोलन दुनिया का सबसे ताकतवर आंदोलन है. इसको न कोई सरदार चला रहा है और ना ही कोई सरकार. इसे बलूचिस्तान की आवाम चला रही है. इसे बलूचिस्तान के बुद्धिजीवी, स्टूडेंट, इंजीनियर्स, लॉयर और यहाँ तक की बुलिचिस्तान की बहन-बेटियां चला रही हैं. जो इस आंदोलन मे हमारे साथ जुड़ा है, हम उसको आंखों पर बैठाते है और जो हमारे खिलाफ है उसकी तरफ देखते तक नहीं. ये आंदोलन चार कबीलो का नहीं है, किन्हीं चार-पांच हस्तियों का नहीं… ये बलूच की आवाम की मुहिम है.

यहाँ लोग देख-देख कर नहीं, बल्कि हर इलाके मे मारे जा रहे हैं. बलूचिस्तान मे ऐसा कोई खानदान नहीं होगा जिस पर पाकिस्तान ने ज़ुल्म न किया हो. लेकिन बलूचिस्तान के 99% सरदार पाकिस्तान के साथ खड़े हुए हैं. आपको शायद ये अंदाज़ा भी नहीं होगा कि ये सरदार पाकिस्तान के हाथों बिक़े हुए है.

हम ये आंदोलन लड़ने मे सक्षम है और जागरूक भी है. प्रजातांत्रिक बलूचिस्तान के भीतर हमें किसी सरदारी निज़ाम या बदमाश सरदार की जरूरत नहीं है. जब हमने किसी ब्रिटिश को नहीं माना, पाकिस्तान आर्मी को नहीं माना, तो हम ऐसे सरदारों को भी नहीं मानेंगे. हम डेमोक्रेटिक निज़ाम मे यकीन रखते है और इसी को लेकर आगे बढ़ना चाहते है. हम ब्रिटिशर्स के नक़्शे कदमो पर नहीं चलना चाहते. हम गरीब आवाम के लोग है और हमे किसी सरदार की जरूरत नहीं है.

baloachistanमैं बलूचिस्तान की आवाम का हिस्सा हूँ. मैं ना सरदार का बेटा हूँ, ना किसी खान का और ना ही किसी रईस जागीरदार का बेटा हूँ. मेरी माँ प्रोफेसर हैं और पिता फिल्म जगत से… लेकिन आज अगर मैं आपके सामने जिस हैसियत से खड़ा हूँ, जहाँ आप मुझे इतनी इज़्ज़त दे रहे हैं तो उसकी वज़ह है कि मैं हक के साथ खड़ा हूँ.

पाकिस्तान की फ़ौज का ज़ुल्म बलूचों पर इस तरह हावी है कि खुद बलूच को बलूचिस्तान का नाम लेने की इज़ाज़त नहीं है. लेकिन फिर भी आज स्कूलों मे हमारे बच्चे पाकिस्तान के बनाये हुए स्कूलों मे पढ़ रहे है जहां पढ़ाया जाता है जिन्ना तुम्हारा बाबा-ए-कौम है… मीर मीरो बलूच कुछ नहीं. उनके स्कूलों में  मीर अब्दुल करीम, आगा अब्दुल करीम खान की आजादी की लड़ाई के बारे में कहीं नहीं बताया जाता. जहां बताया जाता है सर सैयद अहमद खान और अलामा इकबाल, कायदे-आज़म तुम्हारा इतिहास हैं वे तुम्हारें बड़ें हैं, बलूच का कोई ताल्लुक नहीं. न हमारा ताल्लुक शरशाह सूरी से है, न हमारा ताल्लुक अहमद शाह अब्दाली से है. लेकिन वे पाकिस्तान की तारीख का हिस्सा हैं. इस तरह वे हमारी तारीख का सामूहिक हिस्सा हो सकते हैं लेकिन वे बलूचिस्तान की तारीख का हिस्सा नहीं हैं. उन्हीं पाकिस्तानी स्कूलों में बलूच बच्चे पाकिस्तान का कौमी तराना नहीं गाते, अपना तराना गाते हैं. अपने झंडे लहराते है. स्कूलों मे पाकिस्तानी फौज आती है और उन बलूच बच्चों को बाकायदा मारती है, उनके साथ हिंसा की जाती है और जबर्दस्ती पाकिस्तान के तराने पढ़ने पर मजबूर किया जाता है. इन स्कूलों में पंजाब से आए शिक्षक हैं, वे इन बच्चों की शिकायत पाकिस्तानी फौज से करते हैं. दुनिया मानती है कि पाकिस्तान की फौजी हुक़ूमत और पाकिस्तान की आवाम में अंतर है… लेकिन मैं बताता हूँ कि ये गलफहमी है. हम पाकिस्तान के अंदर रहे, हम इसके कब्जे में रहे हैं… हमें उनकी सोच पता है कि वो हमें (बलूचिस्तान को) किस नज़र से देखते हैं. वो दुनिया के हर मसले पर बोल सकते है, लेकिन वो इतना नहीं कह सकते कि इन बलूचों को क्यों मार रहे हो… चलिए मान लिया कि फौज झूठ कहती है लेकिन आवाम के तौर पर क्या आपने कभी ये जानने-समझने की कोशिश की कि वहाँ (बलूचिस्तान) में क्या चल रहा है?

यहाँ तारिक़ फ़तेह साहब बैठे हैं, ये बलूच नहीं लेकिन फिर भी हमारे साथ हैं और हम सभी जानते हैं कि वो कैसे पाकिस्तान का सामना कर रहे हैं. पाकिस्तान को हम एक कौम कहते हैं. लेकिन ये कौम नहीं है. ये एक ऐसा समूह है जो लोगो को धोखे से गुमराह करता है. जिसने हमारे लोगो को गिरफ्त में ले रखा है. पाकितानी इस्लाम के नाम पर कुछ महाजनों को झांसा देकर पाकिस्तान ले गए. फिर जब वो लोग आज तक पाकिस्तानी नहीं बने तो हम कैसे बन सकते हैं?

पाकिस्तानी पंजाब की टेक्स्ट बुक में बलूच का मतलब ‘असभ्य’ (uncivilised) और आपस में लड़ने वाले बताया गया है… (तो ऐसी सोच में हम कैसे शामिल हो जाएं?)

हमारे लोगों को सब समझ आता है… उन्हें पेरिस अटैक समझ आता है, उन्हें 9/11 समझ आता है कि ये आतंकवादी हमले गलत हैं लेकिन दूसरी तरफ हमारे लाखों मरते हैं तो किसी को समझ नहीं आता. अब जब शिक्षा ही गलत दी जा रही है तो हम आने वाली पीढ़ी से क्या उम्मीद रख सकते है?

हाल ही में उड़ी हमला हुआ. यह उन्हीं लोगों की करतूत थी. इनकी फितरत कभी नहीं सुधर सकती. उनके ऊपर सर्जिकल स्ट्राइक हो जाती है लेकिन वे मानने को तैयार ही नहीं हैं, ये उनकी फितरत है.

पाकिस्तान के ऊपर अगर किताब लिखी जाए तो मुझे नहीं लगता कि दुनिया में इतने दरफ्त होंगे कि उसके पन्नों को पूरा कर पाएं. बलूचिस्तान की आज हालत ये है कि हमारे 20,000 ज्यादा लोग गायब हैं जिनमें से 2,500 से 3,000 के आस पास औरतें हैं.

कत्ल करना, किसी को ले जाकर टॉर्चर करना, उन्हें मारना एक अलग बात है लेकिन मारते वक्त उस पर फख्र करना अलग बात है. बलूचियों को मारते वक्त, हमारा कत्लेआम करते वक्त, पाकिस्तानियों को आनंद आता है. हमारे बुजुर्ग, बच्चे, औरते और जवान सभी चाहते हैं कि बलूचिस्तान आज़ाद हो और बलूचिस्तान एक आज़ाद मुल्क़ बने. कोई पाकिस्तान के साथ नहीं रहना चाहता. यही बात सिंध भी चाहता है, ये बात पाक अधिकृत कश्मीर भी चाहता है. सब चाहते हैं. हम 70 साल से लड़ रहे हैं. हम लड़ते रहे हैं वे हमें चाहे जितना मारें चाहे जितने जुल्म करें. लेकिन आज हमें इस बात की ख़ुशी है, कि ऐसे राष्ट्र ने, जो दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी है, जिसका आप सब हिस्सा हैं, हमारे साथ खड़ा है. आज पहली बार बलूच ने भारत से मदद मांगी, नरेंद्र मोदी जी से मदद मांगी… आपने हमारा दर्द समझा है. आज तक 70 सालो से कोई बलूच भारत नही आया मदद मांगने, लेकिन आज हम आए हैं. जैसा सहयोग आप सभी से हमें मिला है, उसकी हमें तहेदिल से ख़ुशी है और आपको भी होनी चाहिए. साथ ही मैं सुषमा (स्वराज) जी का भी शुक्रिया करना चाहूंगा… जिस तरह उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में इस मुद्दे पर बात की वो काबिले तारीफ है.

आख़िर में, मै आप सभी को धन्यवाद देना चाहूंगा जिस तरह आप हमारा साथ दे रहे हैं. ये दिखता है कि आप हमारा दर्द समझते है. आपने भी आज़ादी की लड़ाई लड़ी है.

(मज़दाक दिलशाद के इन विचारों को रोशनी मिश्रा ने लिपिबद्ध किया है)

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