लघु कहानी: ‘स्वीटी’

मंसूर पटेल मुंबई के रहने वाले हैं। मुंबई विश्वविद्यालय से ही हिंदी में एम.ए. करने के बाद पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। आकाशवाणी के लिए कई कार्यक्रम और कहानियां लिख चुके हैं। इन्होंने चौपाल’ को अपनी एक लघु कहानी  ‘स्वीटी’ लिख भेजी है। आप भी पढ़िए…

 

डब्बू स्कूल से घर लौटा। लौटते हुए मछली वाली से उसने एक मांदेली ले ली। आज वो पहली बार स्वीटी को मछली खिलाएगा। भूरे रंग की भूरी आँखों वाली ‘स्वीटी’। डब्बू की प्यारी सी नन्ही बिल्ली।

‘स्वीटी…’,  स्कूल बैग पलंग पर पटकते हुए डब्बू ने आवाज लगाई। स्वीटी का कोई जवाब नहीं आया। अक्सर ऐसा नहीं होता। डब्बू की एक आवाज पर स्वीटी कहीं से भी दौड़ी चली आती। “मम्मी, स्वीटी कहाँ है?” डब्बू ने आटा गूंथती हुई मां से सवाल किया। “यहीं पर थी, बाहर होगी। तू चल कपड़े बदल ले। मैं रोटी बना देती हूँ, खाना खा ले।”

”अरे… कहाँ चला, कपड़े तो बदल ले।” माँ का वाक्य पूरा होता इससे पहले डब्बू घर से बाहर था। पड़ोस में नजर दौड़ाई, एक गली से दूसरी गली घूमकर भी आया। पर स्वीटी कहीं नहीं दिखी। उसने कुछ सोचा और मैदान की ओर दौड़ पड़ा। पिछली बार यूंही निकल गयी थी। आगे-आगे स्वीटी पीछे-पीछे डब्बू। और सामने आ गया कालू कुत्ता। कहाँ छोटी-सी महीने भर की स्वीटी और कहाँ काला सांड सा कालू। डर से दोनों कांप उठे थे, स्वीटी भी और डब्बू भी। डब्बू ने हिम्मत की और नीचे से पत्थर उठाकर दे मारा कालू के सिर पर। कालू भाग गया।  सवाल स्वीटी की जान का था। वरना एक साल पहले की तो बात है, जब डब्बू तीसरी कक्षा में पढ़ता था। जब भी कालू से उसका सामना हो जाता, उसकी चड्डी गीली हो जाती। पर स्वीटी के लिए पता नहीं उसमें हिम्मत कहाँ से आ गई थी।

कहीं आज कालू ने तो स्वीटी को! डब्बू घबरा गया। अब वो कालू को ढूंढने लगा। मन में बहुत कुछ चल रहा था। डर बढ़ता जा रहा था। चाल तेज होती जा रही थी। बेचैनी और घबराहट आखों के रास्ते टपकने को तैयार थे। अब टपके कि तब टपके। वो रहा कालू। मैदान के किनारे गटर के पास ऐसे सो रहा था, जैसे गटर का मालिक हो। डब्बू का गुस्सा उसके दिमाग पर चढ़ गया। “कहाँ है मेरी स्वीटी?” डब्बू ने प्रश्न के साथ एक पत्थर भी कालू को दे मारा। कालू चिल्लाता हुआ भाग खड़ा हुआ।

स्वीटी का कहीं पता न था। डब्बू पूरे मैदान में इधर से उधर दौड़ता रहा। बच्चे खेलने में मग्न थे। “ऐ डब्बू, मेरी टीम से खेलेगा क्या ?” किसी बच्चे ने आवाज दी। डब्बू न पलटा, न रुका और न ही जवाब दिया। उसकी नजर तो स्वीटी को खोजने में व्यस्त थी। पूरे मैदान में स्वीटी कहीं नहीं थी। थका-परेशान डब्बू, रुआंसा होकर घर की तरफ चल दिया।

स्वीटी का जन्म डब्बू के घर ही हुआ था। उसकी तीन बहनें और थीं। एक-एक करके उसकी माँ सबको ले गयी। जाने कैसे स्वीटी वहीं छूट गयी। तब से स्वीटी डब्बू के साथ ही खेलती, सोती और उसके ही हाथों से खाती। कहीं उसकी माँ तो उसे नहीं ले गयी।

”अब स्वीटी को कहाँ खोजूं?” मन में उठे सवाल और बुरे ख़यालों से डरा सहमा डब्बू घर की ओर चला जा रहा था। घर जैसे-जैसे पास आ रहा था। क़दमों की रफ्तार धीमी हो रही थी। और आंसुओं की धारा तेज होती जा रही थी।

घर की दहलीज पर कदम रखते ही वह रोते हुए चिल्ला पड़ा, “मम्मी”। माँ रोटी बनाना छोड़ कर डब्बू की और दौड़ पड़ी, “डब्बू, क्या हुआ, मेरे बच्चे”? “मम्मी!” “स्वीटी?” और तभी डब्बू के पैरों को मखमली बालों ने छुआ। डब्बू ने इस गुदगुदी को पहचान लिया। आंसू पोंछते हुए वह नन्ही सी जान को उठा कर चूमने लगा, “स्वीटी! मेरी प्यारी स्वीटी!”

 

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