न्यायालयों में लंबित मामलेः न्यायपालिका को आत्मावलोकन की जरूरत

–ब्रजकिशोर शर्मा

मुख्यमंत्री और न्यायाधीशों के सम्मेलन में मुख्य न्यायमूर्ति ने जिस तरह काम के दवाब की चर्चा की और न्यायाधीशों की कम संख्या पर प्रधानमंत्री से इसके लिए भावनात्मक अपील की, उससे लगता है कि न्यायपालिका में इस समय सबसे बड़ी समस्या न्यायाधीशों की कम संख्या को लेकर ही है.CJI2

न्यायाधीशों की संख्या कम है, इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता. 1959 में बने प्रथम विधि आयोग से लेकर अभी तक जो विधि आयोग बने उन्होनें भी इस बात पर बल दिया था. इस बात को कहते तो सभी हैं लेकिन ये स्थिति क्यों आई इस पर कोई बल नहीं देता.

जब हम कोई नई विधि बनाते हैं तो यह विचार नहीं करते कि इसके विधिक आयाम क्या होंगे… अब आप देखिए कि चेक बाउंस के मामले उच्चतम न्यायालय तक पहुंच रहे हैं. अभी जो आया है रियल इस्टेट (भवन/संपत्ति निर्माण) के लिए अधिनियम आया है, उसके बाद कितने मामले बढ़ेगें, इस पर विचार कर किसी ने न्यायपालिका की क्षमताओं को बढ़ाने की नहीं सोची.

न्यायालयों में लंबित मामलों के पीछे एक समस्या है भाषा की है. निचले न्यायालयों में साधारण व्यक्ति अपनी (मातृ) भाषा बोलता है लेकिन न्यायालय अंग्रेजी में काम करते है. इसके लिए अनुवादक की जरुरत पड़ेगी… फिर ठीक-ठीक अनुवाद करना सबके बस की बात नही. जितना समय साक्ष्यों को लिखने में लगता है उसे दोगुना-तिगुना समय उसका अनुवाद करने में लग जाता है. फिर भी ये अनुवाद कैसा हुआ, ये कहना भी मुश्किल है. हालांकि कुछ राज्यों में राज्य की राजभाषा में ही पूरी प्रक्रिया चलती है लेकिन इस दिशा में अभी बहुत किया जाना शेष है.

इसके ऊपर एक विचित्र स्थिति और है. सैद्धांतिक रुप से उच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश को अधिनस्थ न्यायालयों के बारे में जानकारी होनी चाहिए. लेकिन अब राज्य  के उच्च न्यायलय का मुखिया बाहर से आता है. व्यावहारिक रुप से उसे राज्य में क्या-क्या समस्याएं हैं, किस अधिनियम के तहत मुकद्मों की संख्या अधिक है आदि के बारे में जानकारी होनी चाहिए लेकिन उसे तो राज्य की भाषा भी नहीं आती तो वह समस्याओं के बारे में कैसे समझेगा. तो इस तरह फिर मामलों के निपटान में देरी लगती है.

उच्चतम और उच्च न्यायलयों ने अपनी अधिकारिता बढ़ा ली है. संविधान में जजों की नियुक्ति के बारे में कुछ और लिखा है और ये कुछ कहते है. कोलेज़ियम तो कहीं नहीं था लेकिन ये ले आए. फिर अभी संसद ने बना कर दिया तो उसे अवैध घोषित कर दिया. इस तरह इन्होंने अपना काम बढ़ाया. एक उदाहरण से इसे समझिए… इलाहाबाद उच्च न्यायालय में करीब 170 पद हैं जिसमें से कई सालों से 80 पद रिक्त पड़े हैं. अब इनमें 75 फीसदी की नियुक्ति के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कर्नाटक से आए मुख्य न्यायाधीश को वहाँ प्रेक्टिस करने वाले हज़ारों अधिवक्ताओं (वकीलों) में से चुनकर भरना है. जिनमें से हर अधिवक्ता उनके सामने प्रतिदिन बहस करता हो, यह भी जरुरी नहीं तो फिर कैसे इतनी बड़ी संख्या से योग्य लोगों की छंटनी की जाए, जो न्यायाधीश बन सकें? परिणाम स्वरुप इस प्रक्रिया में देरी होती है और जजों के पद रिक्त के रिक्त ही बने रहते हैं.

अब इस लोक-हित याचिका (PIL) के बारे में विचार कीजिए. सड़क में कोई गड्डा है तो आप उच्चतम न्यायालय पहुंच गए, आपके मोहल्ले में स्ट्रीट लाईट नहीं, दिल्ली में ऑड-ईवन है तो आप सीधे न्यायालय चले गए. जब सब्बरवाल मुख्य न्यायमूर्ति थे तो उन्होंने लोक-हित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली में हज़ारों दुकानों को बंद करवा दिया. फिर जब अर्जित पसायत मुख्य न्यायमूर्ति बने तब भी यह सिलसिला चलता रहा. उनके बाद जब यह मामला जी. एस. सिंहवी (तत्कालीन मुख्य न्यायमूर्ति) के पास पहुंचा तो उन्होंने कहा कि “ये तो म्यूनिस्पल मजिस्ट्रेट का काम है कि कहाँ दुकान हो और कहाँ न हो”. और इस तरह सभी वादों को वापस कर दिया. ऐसे ही मामलों के कारण सुनवाई के असली मसले पीछे छूट जाते हैं.

SC1970 के मध्य तक उच्चतम न्यायलय में जमानत की अर्ज़ी नहीं होती थी लेकिन अब देखिए तीस्ता सीतलवाड़ की जमानत तीन साल से यहीं से हो रही है. इस सबके के चलते संवैधानिक महत्व के मसलों पर कोई न्यायपीठ ही नहीं बैठ पाती. करीब तीन दर्जन मामने लंबित पड़े हैं जिनमें दो जजों की पीठ ने कहा कि इस मामले पर बड़ी न्यायपीठ की जरूरत है लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो पा रही है. अमेरिका में जब से संविधान बना है तब से लेकर अब तक वहाँ के सर्वोच्च न्यायालय में जजों की संख्या में कोई बदलाव नहीं आया. उनकी संख्या तब भी 9 थी और आज भी 9 है लेकिन उनके यहाँ तो मामलों की संख्या नहीं बढ़ी. ऐसा इसीलिए संभव हो पाया कि वो मामलों की छंटनी कर देते है और सिर्फ चुने हुए मामलों को ही देखते हैं.

क्या विधायिका या कार्यपालिका की निष्क्रीयता न्यायपालिका पर बोझ बन रही है?

राम-राज्य आदर्श स्थिति है. ये कहीं नहीं पाया जाता, इसके लिए प्रयास होते हैं. अब अगर शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) का अनुपालन ठीक से नहीं हो पा रहा तो इसके लिए तत्काल कार्यपालिका को दोष देकर न्यायपालिका का दरवाजा नहीं खटखटाया जा सकता. लेकिन ऐसा हो रहा. फिर न्यायलय जवाब तल़ब करने के लिए मुख्य सचिव को बुलाते हैं. तो आप (न्यायपालिका) प्रशासनिक कार्यों को देखने लगे हैं फिर संवैधानिक मामलों को देखने का समय कहाँ से आएगा? यही विचार भारत के महान्यायवादी मुकुल रोहतगी ने अभिव्यक्त किए हैं कि न्यायाधीशों को आत्म निरीक्षण करना चाहिए. आज उच्चतम न्यायालय अपील का सामान्य न्यायालय बन गया है जिसमें चोरी जैसे मामूली मामलों पर भी विचार होता है.

इसके साथ आपको सुनवाई की प्रक्रिया निर्धारित करनी होगी. वर्तमान व्यवस्था में वकील अपनी बात रखने के लिए घण्टों बहस करते हैं फिर जवाब में दूसरे पक्ष के वकील का नंबर आता है और इस तरह बहस ही चलती रहती है. जबकि त्वरित न्याय के लिए समय निर्धारित होना चाहिए. न्यायमूर्ति चंद्रचूर्ण ने (मुख्य न्यायाधीश रहते हुए) इस दिशा में काम किया लेकिन अधिवक्ताओं के विरोध के कारण इस दिशा में कुछ सफलता न मिल सकी.

तो इस सब स्थिति को देखते हुए आपको न्यायाधीश नियुक्त करने होंगे. फिर उनके लिए आधारभूत संरचना निर्माण करना होगा. अपनी भाषा में न्याय मिले इस दिशा में बढ़ना होगा. लेकिन सबसे जरूरी बात कि न्यायालयों को आत्मानुशासन लागू करना होगा. न्यायपालिका को निर्धारित करना हो कि क्या काम करना है और क्या नहीं.

{लेखक, प्रख्यात संविधानविद ब्रजकिशोर शर्मा विधि मंत्रालय, भारत सरकार में अपर सचिव और प्रतिलिप्याधिकार (कॉपीराइट) बोर्ड के अध्यक्ष रह चुके हैं. विधि विषयों पर एक दर्जन से अधिक किताबों के लेखक हैं. यहाँ व्यक्त विचार निजी हैं}[sgmb id=”1″]

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