आज गांधी जिंदा होते तो तिहाड़ में होते!

‘आप ऐसा काम कर रहे हैं, जिससे किसी भी सरकार के लिए यह संभव नहीं कि वह आपको स्वतंत्र रहने दे।’ यह फैसला उस गोरे न्यायाधीश ब्रूम्सफील्ड का है, जिनके शब्दों में गांधी ‘महान नेता, ‘महान देशभक्त’, ‘उच्च स्तर के आदर्शवादी’ और ‘बेहद पवित्र’ थे।

आखिर गांधी ऐसा क्या कर रहे थे कि किसी भी सरकार के लिए उन्हें आजाद रहने देना संभव नहीं? खुद महात्मा के मुताबिक, जनता में असंतोष का प्रसार। वह आगे कहते हैं कि अगर मैं छोड़ दिया गया तो फिर यही करूंगा। अगर ऐसा न करूं तो यह खुद के प्रति अन्याय होगा।

आज गांधी की यौमे पैदाइश है। प्रोफेसर अपूर्वानंद के अनुसार, ‘चूंकि यह पैदा होने वाले के हाथ में नहीं कि वह कहां, किस जाति, परिवार या धर्म में पैदा होना चाहता है, इसलिए कम से कम पैदा होना उसकी कोई उपलब्धि नहीं। उसकी उपलब्धि है उसकी मौत; आखिर वह किस अवस्था में हुई, बीमारी से हुई, बुढ़ापे से या गोली से।’ नेहरू के शब्दों में, ‘गांधी की मौत एक महाकाव्यात्मक जीवन का महाकाव्यात्मक अंत है।’

ऐसे में हमारे लिए और खुद गांधी के लिए लिए भी 2 अक्तूबर 1869 से ज्यादा महत्वपूर्ण तिथि है 30 जनवरी 1948, यानी गांधी की हत्या का दिन। यह एक प्रकार से गांधी की विफलता है कि उन्हें यहां तक पहुंचने से 78 वर्ष लग गए, जबकि इसे हम अपनी उदारता कह सकते हैं कि उनकी ‘हरकतों’ को नजरअंदाज कर हमने उन्हें जीने का अधिक वक्त दिया।


वर्ष 1907 की बात है, स्थान साउथ अफ्रीका। पुलिस कप्तान अलेक्जेंडर ‘घोषणा’ करता है कि अगर गांधी की ‘हरकत’ ऐसे ही जारी रही तो किसी दिन इसी के लोग इसे भी जीसस की तरह सूली पर लटका देंगे ‘ पुलिस कप्तान के अनुसार, ‘उनकी (गोरों) की नजर में यह सब (उस वक्त जो गांधी कर रहे थे और जीवन की आखरी सांस तक उन्होंने जो किया) गैरकानूनी है, इंसानियत के उनके फलसफे के खिलाफ है।’

अंततः गांधी की हत्या उनके अपने ही देशवासी ने की, तर्क था महात्मा ‘राष्ट्र विच्छेदन’ कर रहे थे और ‘राष्ट्र शत्रुओं’ की सहायता।
अगर आज गांधी होते तो क्या करते? यह मानने का कोई कारण नहीं कि वे ‘राष्ट्र विच्छेदन’ यानी हर गलत करने वाले की सक्रिय निंदा और ‘राष्ट्र शत्रुओं’ यानी अल्पसंख्यकों की सहायता करना छोड़ देते। यह भी मानने का कोई कारण नहीं कि वह सरकारों (जिनमें प्रदेश सरकारें भी शामिल हैं) की हां में हां मिलते। उस मुल्क की सरकार की हां में हां तो कतई नहीं, जहां ‘सत्तर साल में कुछ हुआ ही नहीं।’

लिहाजा यहां एक दिलचस्प सवाल उठता है कि ऐसे में गांधी का पता क्या होता, कॉक्स बाजार (बांग्लादेश का वह इलाका जहां म्यामांर से विस्थापित होकर आए रोहिंग्याओं को अस्थायी शिविरों में रखा गया है) का उनका आश्रम या तिहाड़?

हुकूमत के प्रति गांधी का स्पष्ट मत था, ‘कोई भी सरकार ऐसे लोगों से खुश नहीं रहती, जो अपने सुख-दुख के मामले खुद तय करना चाहते हों।’ पूछ सकते हैं कि आखिर मौजूदा सरकारें या इनकी पूर्ववर्ती सरकारें जिनमें गांधी का एक भी शिष्य नहीं, ऐसे मत रखने वाले से; जिसका नैतिक प्रभाव भी व्यापक हो, उससे कैसे निपटतीं? क्या जितने आयोजन आज होंगे उतने तब भी होते, सरकारी पैसों से गांधी के सम्मान में उतने ही विज्ञापन तब भी छपवाए जाते?

बकौल गांधी, ‘ज्यादतियों को भूलो नहीं, माला के मनको की तरह पिरो लो और मन ही मन उन्हें दोहराते रहो।’ कहा जा सकता है कि गांधी का यह संदेश गुलाम भारत के लिए था न कि आजाद भारत के लिए। ठीक है, पर आजाद भारत के लिए उनका संदेश क्या होता, आंख मूंदकर पिसते रहो।

(लेखक प्रियांशु गुप्ता अमर उजाला में पत्रकार हैं। व्यक्त विचार निजी हैं, चौपाल से कोई संबंध नहीं)

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