जन्मदिन विशेष: जब ग़ालिब और ज़ौक़ भरी महफ़िल में लड़ पड़े

“हैं और भी दुनिया में सुखन-वर बहुत अच्छे, कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज-ए-बयाँ और” ।। 
आज मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग़ खां यानी मिर्ज़ा ग़ालिब की जयंती है। अपने ज़ुदा अंदाज-ए-बयाँ- के लिए मशहूर मिर्ज़ा ग़ालिब को भला शेरो-शायरी का कौन कद्रदान नहीं जानता होगा। और तभी तो ख़ुद ग़ालिब ने लिखा है –
“पूछते हैं वो कि ‘ग़ालिब’ कौन है,  कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या” ।। 
यूँ तो आपने ग़ालिब के शेर से लेकर उनके ख़तूतों (पत्र) के बारे में तमाम किस्से-कहानियाँ पढ़ी होंगी, लेकिन आज आपको ज़ुदा किस्सा सुनाते हैं। मिर्ज़ा ग़ालिब के समकालीन एक और नामचीन शायर हुए, जिनका नाम था मोहम्मद इब्राहिम ज़ौक़।
ज़ौक़ को आखिरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र ने अपना उस्ताद नियुक्त किया था और ज़ौक़ उन्हें शेरो-शायरी की पेचीदगियों से रूबरू कराते थे। ज़ाहिर है कि उस्ताद होने के नाते ज़ौक़ को ग़ालिब के मुकाबले ज़फ़र के दरबार में ज्यादा तवज्जो मिलती थी। बस यहीं से ग़ालिब और ज़ौक़ के बीच रस्साकसी शुरू हुई। ये रस्साकसी या यूँ कहलें कि तक़रार एक दिन लड़ाई में बदल गई।
ज़फ़र के चहेते बेटे और ज़ीनत महल की इकलौती औलाद ‘मिर्ज़ा जवांबख़्त’ की शादी में एक से बढ़कर एक अदीब इकट्ठे हुए थे, जिनमें ज़ौक़ और ग़ालिब भी थे। शेरो-शायरी का दौर चल रहा था कि इसी बीच ग़ालिब ने ज़ौक़  को उकसाने के इरादे से एक शेर पढ़ा और उसके सेहरे को पूरा करने का चैलेंज रख दिया। और चैलेंज में कहा :
“देखें इस सेहरे से कह दे कोई बढ़कर सेहरा” 
ज़फ़र को पूरी महफ़िल में ग़ालिब के चैलेंज को पूरा करने वाला सिर्फ़ एक शख़्स दिखा और वो थे ज़ौक। फिर क्या ज़फ़र ने ज़ौक़ को ललकारा। और ज़ौक़ ने जवाबी सेहरा लिखकर महफ़िल लूट ली। ग़ालिब के सेहरे के जवाब में ज़ौक़ ने जो सेहरा कहा उसका आख़री शेर यूँ था :
ख़ुद को शायर जो समझते हैं यह उनसे कह दो, देखो इस तरह से कहते हैं सुख़न-वर सेहरा।। 
शेरो-शायरी की महफ़िल उस दिन बमुश्किलन उठी थी और कहते हैं कि उस दिन ज़ौक़ ग़ालिब पर भारी पड़े थे। महफ़िल का ‘सेहरा’ ज़ौक़ के सर बंधा था। इसका ज़िक्र विख्यात इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल ने अपनी किताब ‘द लास्ट मुग़ल’ में भी किया है।
बहरहाल उस महफ़िल के बाद धीरे-धीरे ग़ालिब की रौशनाई और ऊंचाई को छूती गई और वो ग़ालिब सामने आए जिनके चर्चे दिल्ली के हर गली-कूँचे में थे। और जिस बहादुर शाह ज़फ़र ने ज़ौक़ को अपना उस्ताद बनाया था उसी बहादुर शाह ज़फ़र ने ग़ालिब को “दबीर-उल-मुल्क” और “नज़्म-उद-दौला” के ख़िताब से नवाजा। बाद में ग़ालिब को “मिर्ज़ा नोशा” का ख़िताब भी मिला।
(लेखक प्रभात उपाध्याय  दैनिक जागरण में पत्रकार हैं। यहाँ प्रस्तुत विचार निजी हैं, चौपाल  से कोई संबंध नहीं)

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