भारत का भविष्य: एक खोज

–पर्णिया मिश्रा ‘सुवास’ (@parniyamishra)

आज भारत को विश्वगुरु बनाने की चर्चाएं ज़ोरों पर हैं। राजनीती से लेकर व्यावसायिक क्षेत्र तक, गाँव-क़स्बे से लेकर हर जगह, बस हिंदुस्तान के भविष्य की चर्चा है। अच्छा है। लेकिन उसका रास्ता क्या होगा? इस प्रश्न में लोगों की सोच बंटी हुई है।
आज से लगभग 15 साल पहले भारत रत्न और भूतपूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने अपनी पुस्तक इंडिया 2020 में भारत की प्रगति का खाका खींच कर रख दिया था।
तो हम कह सकते हैं कि इस किताब के रुप हमारे पास एक ऐसा मैप तैयार है जो हमें उस लक्ष्य तक पहुंचने में बहुत हद तक सहायक हो सकता था। पर कहते हैं कि समय किसी के लिए नही रुकता… इसीलिए हम शायद समय से फिर बहुत पीछे रह गए और उस रास्ते से भटक गए।
फिर भी आशाएं है। शक्ति है। युवा शक्ति है। अगर आज से कई सौ वर्षों पहले की स्थिति देखें तो भारतवर्ष विश्वगुरु के पद पर इसलिए आसीन नहीं था कि वो समृद्ध था या उसके पास अकूत धन था। नहीं इसलिए नही, बल्कि उसके पास ‘ज्ञान’ था। वह ज्ञान जिसका अनुसंधान उसने अपनी तपस्या, अपने सामर्थ्य और दूरदृष्टि से अर्जित किया था।
हम पश्चिम को पुनर्जागरण काल (13 से 15वी शताब्दी ई) के बाद से ज्ञान का उदयक्षेत्र मानते हैं जिसके कारण वो सभी का मार्गदर्शक बन गया लेकिन दर्शनशास्त्र की वो धाराएं, जिनकी अवधारणाएं वे आज प्रस्तुत कर रहे हैं, वे आज से हज़ारों साल पहले से उपनिषदों में उपस्थित हैं।
जीवन जीने की कला, जीवन के बाद का सत्य और एक नितांत श्रेयस्कर जीवन की विधियां सब कुछ मौजूद हैं। यह तो हमारे इतिहास का एक अति लघु रूप है और इसी इतिहास को वर्तमान में बदलने का माद्दा सिर्फ आज की युवा पीढ़ी में है और उसका साधन ज्ञान है! हम धन और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में जितने भी आगे बढ़ जाएं, बाकी देशों की तरह कारखानों के अड्डे बन जाएं पर विश्वगुरु बनने के लिए इस राष्ट्र को फिर से उस ज्ञान से भरना होगा जो हर नागरिक के ह्रदय में उज्जवल चरित्र, विशाल ह्रदय और जीवन की स्पष्ट संकल्पना के रूप में दैदीप्यमान हो।
इतिहास तारीख़े याद करने के लिए नहीं होता बल्कि तुम इतिहास के पन्नों पर फिर से क्या लिखना चाहते हो, इसकी समझ पैदा करता है और एक अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।
आज भारत की यही चुनौती है कि ज्ञान की विभिन्न शाखाएं जो दिन-प्रतिदिन निकलती जा रही हैं और असंख्य सूचनाओं के संसार ने जो हमें घेरे हुआ है उसको एकत्रित करके फिर से स्वयं को और विश्व को राह दिखाएं  कि वास्तविकता क्या है। क्या ये आतंकवाद, वर्चस्व की लड़ाई, धार्मिक द्वंद्व, द्वेष या मानववाद, बराबरी, प्रेम और मिथ्या जगत से उठकर सेवा धर्म? किसको अपनाएंगे? भारत के भविष्य का रास्ता क्या होगा?

(लेखिका पर्णिया सागर (म.प्र.) के हरिसिंह गौर विवि. से परास्नातक कर रही हैं। पढ़ने-लिखने में रुची है। समकालीन मसलों पर अपनी बात कहने के लिए लेखन भी करती हैं। व्यक्त विचार निजी हैं, ‘चौपाल’ से संबंध नहीं)

2 Comments


  1. // Reply

    Something to admire , in one -word brilliant

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