भारत का भविष्य: एक खोज (दूसरी किस्त)

–पर्णिया मिश्रा ‘सुवास’ (@parniyamishra)

पिछले लेख में मैने भारत के उज्जवल भविष्य के साध्य के साधन के रूप में ज्ञान के महत्व को प्रस्तुत किया था। आज प्रश्न यही खड़ा होता है कि यह विचारधारा और संकल्पना आज के भारत में कहाँ तक प्रासंगिक है?
जिस महान और विकसित ज्ञान परंपरा का निर्वाह इस भारत वर्ष में सदियों से होता रहा, जिसके पदचिह्नों को देखकर हम गर्व से फूले नहीं समाते, वे अब कहाँ हैं? क्या वे किसी चट्टान पर उकेरे गये थे, जो आज भी कायम हैं? क्या वे समुद्र के किनारे की बालू पर बने थे जो अब बह गये? या फिर खुद हमने ही उन्हें अंधविश्वास, अदूरदृष्टि और मानसिक अपंगता के चलते ऐसे अंधकार से ढक दिया है जिसके कारण उसका प्रकाश धूमिल हो चुका है?
भारत के भविष्य की इस छोटी सी खोज में हमने इतिहास के पहलू की ओर कुछ देखा, अब वर्तमान परिदृश्य में भारत वास्तव में कहाँ खड़ा है, उसको देखना भी बहुत ज़रूरी है।

एक दूसरी या तीसरी कक्षा के छात्र से पूछा जाये कि बड़े होकर तुम क्या बनना चाहते हो तो वह बड़े आत्मविश्वास के साथ ऐसे जवाब देगा जिस पर आपको भी विश्वास नही होगा। मसलन, टीचर, पुलिस, पायलेट, आइस्क्रीम वाला, डिब्बेवाला…आदि-इत्यादि! जी हाँ, यह सच है कि वो बच्चा आपके सवाल पूछने के दो मिनट के अंदर 10 जवाब बता सकता है लेकिन आप किसी ग्रेजुएशन या बारहवीं के बच्चे से यही सवाल पूछो तो वो अगर एक भी जवाब उतने ही आत्मविश्वास के साथ दे सके तो सचमुच बड़ी बात मानना चाहिए। यह बात आपने हमने कभी न कभी ज़रूर अनुभव की होगी। देखने में यह ज़रूर मामूली लगती है लेकिन गंभीरता से लिए जाने पर यह बड़ी बात है। आख़िर 8-10 सालों में ऐसा क्या बदल जाता है कि आत्मविश्वास से भरा हुआ बच्चा, जो कल्पना के पंख लगाकर उड़ सकता है, जो अपने आसपास के समाज का बड़े ध्यान से अवलोकन कर सकता है, वह समझ बढ़ने के साथ ही विश्वासहीन, कल्पना-रहित, व्यग्र और विचलित क्यों हो गया?
उसके पास यह समझने की शक्ति ही नहीं कि उसके पास क्या हुनर है, वो परिवार को समाज को क्या देने की क्षमता रखता है। वह इसी उहापोह में भविष्य की चिंताओं में घिरा हुआ किसी न किसी प्रकार अपने जीवन यापन के साधनों की तलाश करता है ताकि अपना परिवार चला सके। उसका स्वयं का व्यक्तित्व, अस्तित्व-क्षमता, सब कुछ दब जाती हैं। अब जिस देश की युवा शक्ति के पास अपने भविष्य का ढांचा नहीं है, वह हिन्दुस्तान अपने भविष्य के लिए सशंकित क्यों न हो?
इन पंक्तियों पर विचार कीजिए… मोको कहाँ ढूंढें रे बंदे, मैं तो तेरे पास में… पूर्णतः सत्य लगती हैं। पहले जो कुछ भी मैंने कहा, उसका यह तात्पर्य नहीं है कि इस भूमि पर क्षमता और कौशल नही है। बल्कि यह धरा तो जननी है… आयुर्वेद-चरक, योग-पतंजलि, व्याकरण-पाणिनि, भाषाविज्ञान-भर्तृहरि, रसायन-कणाद, सांख्य दर्शन-कपिलमुनि… अनगिनत हैं। लेकिन अब कहाँ है? सबसे बड़ा प्रश्न तो यही खड़ा होता है। जवाब शायद बहुत स्पष्ट है। अब भी ऐसे लोग हैं और यहीं हैं। लेकिन आपने या हमने, क्या ढूंढा है कभी उन्हें? कभी पहचानने की कोशिश की?आइये, आज एक छोटा सा प्रयास करें।

दृश्य एक:
कच्ची-पक्की सड़कों के किनारे हरे-भरे खेत हैं। धूल उड़ाती हवाएं, गाय-भैंसों की रंभाने की आवाज़ें, चरवाहे, कुएं, हैंडपंप। सौ-डेढ़ सौ की आबादी वाला एक गांव, जहाँ लोग अपने अपने कामों में लगे हैं। कहीं दूर से विकास की भीनी-भीनी सुंगंध भी आ रही है। दूर एक सफ़ेद रंग में पुता हुआ स्वास्थ्य केंद्र है। एक आँगन-बाड़ी और हाँ, एक प्राथमिक स्कूल भी, जो गांव के एक बड़े मैदान के बीच खड़ा है। उसकी तरफ कुछ बच्चे झोला-बस्ता लिए जाते दिखाई पड़ रहे हैं।कोई नंगे पैर, कोई चप्पल में, कोई यूनिफार्म में, तो कोई नहाये या धूल में सने हुए, भागे जा रहे हैं। उनके मन में मिड-डे मील पाने की आशा है! पांचवी तक की कक्षाओं में एक ही मास्टरजी हैं, जो सभी विषय पढ़ाते हैं। लेकिन वह अभी आये नहीं है। उनके घर से चाबी लेकर, ताला खोलने का काम पांचवी कक्षा के सबसे होशियार बच्चे का है, जो कि अपने सभी छोटे सहपाठियों को पंक्तिबद्ध करवा के प्रार्थना करवाता है और फिर जब तक मास्टर जी नहीं आते तब तक शांति बनाए रखने की ज़िम्मेदारी उसकी ही है। वह गणित, हिंदी और भूगोल में बहुत अच्छा है। सारे सवाल वह झटपट हल कर लेता है। अगर कहीं कोई परेशानी होती है तो आपस में चर्चा कर उसका हल निकालने की कोशिश करता हैं क्योंकि मास्टरजी तो डांट कर भगा देते है न! उसकी अंग्रेजी कुछ ठीक-ठाक ही है। लेकिन उसे गर्व है कि उसकी अंग्रेजी, स्कूल में तो सबसे अच्छी है! मास्टरजी एक घंटे लेट आने के बाद कुछ देर पान खाते है। स्मार्टफोन पर व्हाट्सएप भी चलाते हैं और मिड-डे मील की ‘पतली’ दाल परोसकर बच्चों को रोज़ स्कूल आने के लिए प्रेरित करते है! इस स्कूल में गांव के सभी वर्गों के बच्चे पढ़ते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, आदिवासी, दलित… ये सभी मिलकर ही खाते हैं और कुछ ठीक-ठाक हालात की किताबों से पढ़ने की कोशिश करते रहते हैं। 90फीसदी बच्चे नहीं जानते कि वे पढ़-लिखकर क्या करेंगे। कुछ के घर में खाने को नहीं है इसलिए वे यहाँ आते हैं। कुछ के माता-पिता जबरजस्ती भी भेजते हैं। कुछ को दोस्तों के साथ खेलना पसंद है। स्कूल का सबसे होशियार लड़का कहता है कि “शहर जाकर किसी अच्छे स्कूल में पढ़ना चाहता है और घर का नाम रोशन करना चाहता है” उसके कई साथी उसका अनुसरण करने का प्रयास करते है। वहीं दूसरी ओर मास्टरजी को अपना सर्वस्व मानकर उनके आदेशों पर चलते हुए ये बच्चे  सोचते तो बहुत कुछ हैं लेकिन करें क्या? वैसे ये कंप्यूटर का नाम तो जानने लगे है पर उसे देखना अभी संभव नहीं हुआ है! इन बच्चो को खेत-खलिहानों की, प्रकृति की बहुत जानकारी है। ये उन बातों को जानते हैं जो शहर के बच्चों ने सुनी भी नहीं। ये समस्याओं के बड़े ही रोचक देशी हल देते हैं! मेहनतकश हैं। थकते नहीं। असीम ऊर्जा हैं इनमें। किसी चीज़ को जानने समझने की ललक भी बहुत तीव्र है लेकिन बहुत सीमित है। शिक्षा-व्यवस्था की दुश्वारियों ने इन्हें जकड़ा हुआ है।कोशिश जारी है निकलने की!

दृश्य दो:
इनके कुछ भाई-बहनों से भी मिलिए, जो लगभग 100 किलोमीटर दूर एक पॉश कॉलोनी  के बस स्टॉप के पास खड़े होकर सुबह-सुबह स्कूल बस का इंतज़ार कर रहे हैं। भारी-सा बैग उठाये, झुके कन्धों और अधखुली आँखों से सड़क की ओर देख रहे हैं। चमचमाती यूनिफार्म और जूते, हाथ में है लंच बॉक्स, बोतल। ये बच्चे एक बहुत बड़े पब्लिक स्कूल में पढ़ते हैं, जहाँ टाइम पर पहुंचना बहुत ज़रूरी है। वहाँ पहुंचकर स्कूल के 1500 बच्चे एक साथ प्रार्थना करते हैं और कई एकड़ में फैले स्कूल कैंपस की बड़ी सी बिल्डिंग के तीसरे माले (फ्लोर) पर पांचवी कक्षा लगती है। स्मार्ट क्लास, इंटरैक्टिव बोर्ड्स, एक्टिविटी रूम, जिम्नेजियम, लाइब्रेरी, प्लेग्राउंड, अनगिनत प्रयोगशालाएं इस स्कूल की शोभा बढाती हैं। जिनके सामने इन बच्चो के सपनों और चेहरे की चमक बहुत फीकी पड़ जाती है! पांचवी की सबसे होशियार लड़की है, जो कक्षा में हर विषय में आगे है। हर विषय के टीचर उसे प्रोत्साहित करते है। उसके मम्मी-पापा चाहते है कि वो डॉक्टर बने और शायद वह भी यही चाहती है? क्लास के सभी बच्चों को उसका ही अनुसरण करने की हिदायत दी जाती है। वैसे भी, क्लास के अन्य बच्चे भी प्रतिभाशाली हैं।सभी म्यूजिक क्लास, ड्राइंग-क्लास, जूडो ट्रेनिंग के लिए भी जाते हैं। ये बच्चे बहुत व्यस्त हैं।शायद किसी कंपनी के सीईओ से भी अधिक! वास्तव में तो ये बच्चे कम्पटीशन की चक्की में पिसने वाले गेहूं हैं, जिन्हें अपनी मर्ज़ी का कोई अधिकार नहीं। इनके पास, वैसे तो हर वो सुविधा है, जिसके बल पर ये बड़े से बड़ा काम करने का माद्दा रखते हैं लेकिन माता-पिता की अपेक्षाओं की बेड़ियों में जकड़े हुए हैं। छटपटाहट है छूटने की।
असलियत तो यही है कि यहाँ मज़दूरों को बनाने की फैक्टरियां खुली हैं। इनमें भविष्य के पल्लेदारों का निर्माण हो रहा है। जो अपना, अपने परिवार, अपनी कंपनियों की महत्वाकांक्षाओं का बोझ उठाने की ट्रेनिंग ले रहे हैं और जो जीवन भर उसी बोझ को लेकर जीते रहेंगे। आज हम अविष्कारों के लिए दूसरों का मुँह तकते हैं। दर्शनशास्त्र की नयी विचारधारा के प्रतिपादन के लिए हमें दूसरों की अनुमति चाहिए। रमन, भाभा, विवेकानंद, टैगोर, अरबिंदों, मैथिलीशरण गुप्त… लोग कभी बंध के नहीं रहे। उन्हें जकड़ा नहीं गया। उन्होंने स्वछंदता को स्वीकार किया, विचार-प्रवाह को महत्व दिया, न की विचार-दासता को… आज विसंगतियों से जूझती हमारी शिक्षा व्यवस्था में न तो हमारे स्वर्णिम इतिहास को संभालने की ताकत है, न ही वर्तमान को समझ पाने का आत्मविश्वास और न ही भविष्य को गढ़ने का संकल्प। बड़े-बड़े प्राइवेट संस्थानों के बेतहाशा पैसे कमाने की भूख ने शिक्षा को व्यापार का गढ़ बनाया हुआ है और सरकारी संस्थानों में कोई मौलिकता बची ही नहीं है जो भारत के ‘विज़न’ और ‘सपनों’ को बाकि दुनिया से अलग कर सके। अनुसरण करने की आदत को हमने अपनी पद्धति बना लिया है। सच्चाई तो यही नज़र आती है क्योंकि अगर पेड़ की जड़ों को ही काट दिया जाये तो वो ठूठ होलिका दहन के ही काम आता है!

(लेखिका पर्णिया सागर (म.प्र.) के हरिसिंह गौर विवि. से परास्नातक कर रही हैं। पढ़ने-लिखने में रुची है। समकालीन मसलों पर अपनी बात कहने के लिए लेखन भी करती हैं। व्यक्त विचार निजी हैं, ‘चौपाल’ से संबंध नहीं)

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