मेरी आपबीती: इस्लामिक स्टेट के चंगुल से निकलीं नादिया मुराद

‘नादिया मुराद बासी ताहा’ इराक़ के उत्तरी इलाके में बसे सिंजार की मूल निवासी हैं. नादिया मुराद की कहानी अपने आप में एक उदाहरण है उन लोगों के लिए जिन्होंने सब कुछ खोने के बाद भी संघर्ष करना नहीं छोड़ा. अगस्त 2014 में इस्लामिक स्टेट द्वारा बंधक बनाई गईं नादिया अदम्य साहस दिखाते हुए आज संयुक्त राष्ट्र में बेघर हुए यज़ीदी समुदाय के लिए संघर्ष कर रही हैं. नादिया को हाल ही में संयुक्त राष्ट्र ने ह्यूमन ट्रैफिकिंग के क्षेत्र में गुडविल एंबेसडर नियुक्त किया है. इसके अतिरिक्त नादिया को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भी नामित किया गया है. नादिया का यह इंटरव्यू कुछ महीने पहले ‘रसिया टुडे’ (RT) पर प्रसारित हुआ था जिसमें बेबाकी से नादिया ने अपनी आपबीती दुनिया को सुनाई है। नादिया मुराद से अनुमति लेकर ‘चौपाल’ उनके संघर्ष की यह कहानी हिंदी में प्रकाशित कर रहा है। इसके लिए ‘चौपाल’ ‘रसिया टुडे’ का भी आभारी है। पेश हैं चर्चा के अंश…

नादिया, आप उत्तरी इराक में कुर्दिस्तान के किरकुक की रहने वाली हैं. आपके गांव को इस्लामिक स्टेट (दाएश) के आतंकवादियों द्वारा नष्ट कर दिया गया है. आप हमें बताएंगी कि आख़िर उस दिन क्या हुआ था?nadia-rt

यह 3 अगस्त 2014 की बात है. हमारे गांव सिंजार पर इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने हमला किया. आसपास की यज़ीदी बस्तियों पर दाएश पहले ही कब्ज़ा कर चुका था. बहुत से यज़ीदियों ने भागकर अपनी जान बचाई। उनमें से कइयों ने बचने की आस में, पास की पहाड़ियों में शरण ली लेकिन हमारे गांव की स्थिति ऐसी नहीं थी जो हम कहीं छिप या भाग सकते थे. इस्लामिक स्टेट ने हमारे गांव को चारों तरफ से घेर लिया और सैंकड़ों लोगों को मार डाला, हज़ारों महिलाओं को बंदी बना लिया. उन (आतंकियों) की मंशा हमारे यानि यज़ीदियों के इलाक़ों को नष्ट करने की थी, मंशा हमारी पहचान मिटाने की थी.

मतलब आपके हिसाब से उस दिन आपको भागने का कोई मौका नहीं मिला?

इस्लामिक स्टेट ने सुबह-सुबह गांव पर आक्रमण किया. किसी को भी भागने का कोई मौका ही नहीं मिला. कुछ परिवारों ने भागने की कोशिश की लेकिन पकड़े गए. फिर जो यज़ीदी गांव मुस्लिम गावों से सटे थे उनमें भी भागकर छिपने का विकल्प नहीं था क्योंकि ऐसे गांव पहले से ही इस्लामिक स्टेट को अपना चुके थे. ऐसी ही हमारे गांव की भी स्थिति थी इसलिए हमें भागने का कोई मौका नहीं मिला.

ऐसी ख़बरें आईं हैं कि जब इस्लामिक स्टेट ने ईसाई, शिया या अन्य ऐसे ही अल्पसंख्यक समुदायों पर हमले किए तो अल्पसंख्यकों को भागने के मौके दिए गए लेकिन फिर आप (यज़ीदियों) के साथ ऐसा क्यों नहीं किया?

हां, उन्होंने उन लोगों को अपने-अपने सामान के साथ जाने दिया. उन लोगों को भले ही अपनी संपत्ति से हाथ धोना पड़ा हो लेकिन उनकी जान बच गई. लेकिन इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने जब यज़ीदियों के गांव पर हमला किया तो उन्होंने यजीदियों को दो विकल्प दिए- या तो इस्लाम स्वीकार कर लो या मरने के लिए तैयार रहो.

आख़िर क्यों… यज़ीदियों के प्रति इस्लामिक स्टेट का ये व्यवहार इतना क्रूर और भयंकर क्यों था?

मैं नहीं जानती. मुझे नहीं पता वह ऐसा क्यों कर रहे थे. हां, लेकिन जितना मैं उनके साथ (बंधक) रही हूं, मैं इतना पक्का जानती हूँ कि वे हमारे साथ ऐसा इसलिए कर रहे थे क्योंकि उनकी नज़रों में हम काफ़िर यानि बुतपरस्त हैं.

जब दाएश (इस्लामिक स्टेट) ने आपके गांव पर हमला किया तो पहले उन्होंने आपके गांव को चारों तरफ से घेर लिया और दो हफ़्तों तक वे आपको यूं ही घेरे रहे रहे. इन 2 हफ्तों में आप लोग अपने घरों से नहीं निकले. ऐसे में, जीवन कैसे रहा होगा?

शुरुआती दिनों में उन्होंने पूरे गांव को घेर nadia-parkलिया. लेकिन एक-दो दिन तक उन्होंने हमारे घर पर हमले नहीं किए. चार दिन बाद उन्होंने हमारे गांव को एक चेतावनी (अल्टीमेटम) दी कि हम इस्लाम (धर्म) अपना लें या परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें. तब हमें अहसास हुआ कि हम कितनी बड़ी विपदा में घिर चुके हैं. इससे पहले टीवी पर हम देख चुके थे कि किस बर्बरता से इस्लामिक स्टेट के लड़ाके यज़ीदियों के साथ पेश आ रहे हैं. हम अपने घरों में कैद थे लेकिन यज़ीदियों पर क्या गुजरी थी, हमें इसकी अच्छी तरह ख़बर थी. हमने सुना था कि उन पर अत्याचार हो रहे हैं और इस दौरान जिन यज़ीदियों ने भागने की कोशिश की है, उन्हें गोली मार दी गई या कुछेक जैसे-तैसे भागने में सफल भी रहे तो उन भागे यज़ीदियों ने पहाड़ियों में भूख और प्यास से दम तोड़ दिया.

इस कैद के दौरान क्या आपको उम्मीद थी कि आप जिंदा बच पाएंगे या आप सभी मरने के लिए तैयार थे?

हमने लोगों की मदद मांगने की कोशिश की. हमने बाहरी दुनिया से संपर्क किया. हमने मदद की गुहार लगाई. सब कुछ तहस-नहस था, किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर करना क्या है. इस्लामिक स्टेट के लड़ाके हर घंटे आते थे और हमसे कहते थे कि इस्लाम अपनाओ. हमें समझ में नहीं आ रहा था कि करना क्या है. हमें पता नहीं था कि वह हमारे साथ क्या करेंगे. हम सब को मार देंगे या सिर्फ महिलाओं को मारेंगे या पुरुषों को मारेंगे. कितनों को बंधक बनाएंगे? फिर 15 अगस्त आया. 15 अगस्त हमारे गांव को बंधक बनाने के अंतिम दिन आतंकियों ने हमें गांव के पास ही एक स्कूल में इकठ्ठा किया. उस समय हमें कुछ पता नहीं था कि अगले ही क्षण हमारे साथ क्या होने जा रहा है.

तो फिर स्कूल पर आप लोगों के साथ क्या हुआ?

सबसे पहले उन्होंने हमें वहां पर ग्रुप में बांटा. महिलाओं को अलग किया बच्चों को और पुरुषों को अलग किया इसके बाद महिलाओं में भी ग्रुप बनाए जिसमें पतिव्रता अलग थीं, युवा लड़कियां अलग और छोटी छोटी बच्चियां अलग. इस दौरान उन्होंने हमसे फिर कहा कि हम इस्लाम में परिवर्तित हो जाएं लेकिन हमने मना कर दिया. इसके बाद उन्होंने महिलाओं और पुरुषों को अलग-अलग कर दिया और हमारे पास जो भी कीमती सामान था, सब कुछ छीन लिया. उसके बाद आतंकी गांव के सभी पुरुषों को एक जगह ले गए फिर हमने गोलियां चलने की आवाज़ सुनी. हमें नहीं पता कि वहां उनमें से कितने बचे, कितने मरे… लेकिन हम बराबर गोलियों की आवाज़ सुनते रहे. इसके बाद महिलाओं और बच्चों को (हमें) दूसरे जिले में ले जाया गया वहां पर हमारी छटनी की गई और हमें अलग-अलग ग्रुप (समूहों) में बांट दिया गया.

आपने कहा कि गांव के सभी पुरुषों को ले जा कर मार दिया गया. उनमें आपके 6 भाई भी थे, आपको क्या लगता है, उनके साथ क्या हुआ होगा?

is-victदाएश हमारे गांव से करीब 700 आदमियों को ले गया था उनमें से कई को मैंने अपनी आंखों के सामने मरते हुए देखा. हमें गोलियों की लगातार आवाज़ें आ रही थीं लेकिन हमें नहीं पता कि उन्होंने सब को मार दिया या सिर्फ कुछ को ही मारा होगा… कुछ लोगों का कहना है कि उनमें से कुछ भागने में भी कामयाब हो गए… पता नहीं मेरे भाइयों के साथ क्या हुआ. मेरे पास, मेरे भाइयों के संबंध में कोई सूचना नहीं है कोई जानकारी नहीं है मुझे लगता है उन्होंने मेरे भाइयों को भी मार दिया है. हमारे गांव में कई सामूहिक कब्रें ऐसी हैं जो अभी भी खुली पड़ी हैं.

मतलब आपको पता नहीं है कि आपके परिवार के साथ क्या हुआ…  आपको नहीं पता कि आपका परिवार जिंदा भी है या ख़त्म हो चुका है?

दरअसल हमें किसी भी यज़ीदी के बारे में जानकारी नहीं है. किसी भी परिवार के सदस्य के बारे में कोई जानकारी नहीं… उनके साथ क्या हुआ होगा, उन्होंने सब को बंधक बनाए रखा है या सब को मार दिया है या कुछ भागने में भी कामयाब हो गए…  हमें कुछ नहीं पता. मुझे बस उन लड़कियों के बारे में पता है जिन को ‘सेक्स स्लेव’ (यौन दासी) बना दिया गया था. मैं उनके साथ बंधक रही हूँ तो मुझे पता है कि उन्होंने किस बर्बरता का सामना किया.

दाएश ने क्या सभी महिलाओं को सेक्स स्लेव  बनाया या उन्होंने कुछ ही महिलाओं के साथ ऐसा किया?

आइसिस जितनी भी महिलाओं को बंधक बनाता था उनको एक जगह इकट्ठा करता फिर उनको उम्र के हिसाब से अलग-अलग समूहों में बांट देता था.  सबसे पहले इनमें से 9 साल से बड़ी सभी लड़कियों के साथ बलात्कार किया जाता. इस्लामी कानून शरिया के मुताबिक़ कम से कम 40 दिनों में तलाक होता है इसलिए वे (आतंकी) 40 दिन का इंतजार करते थे और फिर दूसरी लड़कियों को ले जाते थे. हमारे बीच जो भी बुजुर्ग महिलाएं थीं, उन सबको मार दिया गया. मेरी मां भी उन महिलाओं में से एक थीं जिन्हें आईएस  ने मार दिया और यह सब उनकी उम्र के कारण हुआ. बच्चों को अलग किया गया और उन्हें सीरिया में (आतंकी) ट्रेनिंग कैंपों में भेज दिया गया जिससे वह जिहादी बन सकें.

क्या कुछ बच्चे ऐसे भी थे जिनको अपनी मां के साथ रहने दिया गया या सभी बच्चों को अलग कर दिया गया?

4 साल के ऊपर सभी बच्चों को ट्रेनिंग कैंपों में भेज दिया जाता था और जो लड़कियां 9 साल से ज्यादा की थी उनको सबको सेक्स स्लेव  के रूप में भेज दिया जाता. किसी को भी अपनी मां के साथ रहने की इजाजत नहीं थी सिवाय 3 साल से छोटे बच्चों के…

आतंकियों ने आप सबको एक बस में भरा और आपको अपने गढ़ मोसुल ले जा रहे थे तो क्या आपको इस बात का अंदाजा था कि अब वह आप को कहां ले जा रहे हैं क्या आपने जानने की कोशिश की?

is-areaजब हमें बस में भरा गया तो हमें कुछ भी जानकारी नहीं थी कि हमें कहां ले जाया जाएगा उन्होंने हमारे सामने हमारे परिवार के पुरुषों को मार दिया बुजुर्ग महिलाओं को भी मार दिया. हमें पता ही नहीं था कि अब हमारे साथ क्या होगा, क्या वे हमें अपनी पत्नियां बनाएंगे…  आतंकियों ने बस में हमसे हंस कर बातें करना शुरू कर दिया… उन्होंने हमें गलत तरीके से छूना शुरु कर दिया. बस में उन्होंने हमसे खुलकर कहा कि अब तुम हमारी सेक्स स्लेव  हो. फिर हम जब मोसुल में उनके कैम्पों में पहुंचे तो वहां पर पहले से दूसरी यज़ीदी लड़कियां मौजूद थीं. कुछ शादीशुदा भी थीं, कुछ के बच्चे भी थे… हमने उनसे बात कर जानने की कोशिश की कि आतंकियों ने उनके साथ कैसा व्यवहार किया… उन महिलाओं ने हमें बताया कि आतंकी कभी भी आते हैं और किसी भी लड़की के साथ उल्टी-सीधी हरकतें करने लगते हैं, विरोध करने पर अत्याचार होता और फिर उन्हें बाहर ले जाकर तस्करों को बेच दिया जाता. उनमें से कई महिलाएं गर्भवती थी लेकिन आईएस  के आतंकियों ने उन सबका गर्भपात करवा दिया क्योंकि उनका मानना था कि यह गर्भधारण काफिरों (बुतपरस्तों) से हुआ है इसीलिए उन्होंने उन सब महिलाओं का गर्भपात करवा दिया

फिर… आपको कहां ले गए?
हमें कई दिनों तक मोसुल में रखा गया. कोई भी आतंकी आता और किसी भी लड़की को उठा ले जाता…  इसके बाद हमें अलग-अलग समूहों में बांट दिया गया. ईराक़ और सीरिया में जहां भी दाएश के कैंप थे उनके नियंत्रण में जितने भी घर थे, मोसुल, रक्का, हमदानिया, तेल-अफ़ार… लड़कियों को बांट दिया गया. हर घर में यज़ीदी लड़की थी. कोई भी लड़की ऐसी नहीं थी जिसके साथ बलात्कार न हुआ हो.

बंधक बनाते समय दाएश ने आप सभी से मज़हब बदलने के लिए बोला लेकिन आप लोगों ने मना कर दिया. क्या आपको यह एहसास था कि अगर आपने मना किया तो आपको जान से मार दिया जाएगा?

हाँ…  मैं मरने के लिए तैयार थी. मैंने व्यक्तिगत रूप से आतंकियों से कहा था कि मुझे मार डालो… मुझे जीना नहीं है. ऐसा कहने वाली मैं अकेली नहीं थी बल्कि मेरे साथ जितनी भी लड़कियां थीं उन्होंने सब ने कहा कि उन्हें मार डालो. इस घुटन में हम सोचते थे कि पता नहीं किस क्षण में मौत आएगी…  हम अपनी मौत की घड़ियां गिन रहे थे… लेकिन उन्होंने किसी भी यज़ीदी लड़की को नहीं मारा और मुझे लगता है कि वे मारना भी नहीं चाहते थे, वे तो हमें सेक्स स्लेव के रूप में रखना चाहते थे.


जब उन्होंने आपका शोषण किया तो क्या आपने उनका विरोध किया था?
हां बिलकुल, मैंने उनका विरोध किया। कोई नहीं चाहेगा कि उसका शोषण किया जाए… लेकिन हम कर भी क्या सकते थे. हमें मारा-पीटा गया… हमारी कनपटी पर बंदूक रख दी गई, लेकिन हमें पता था वे हमें मारेंगे नहीं… वे तो बस हमें बंदूक की नोक से डराना चाहते थे और उसके बाद मेरा बुरी तरह शोषण किया गया. एक-एक लड़की के साथ दर्जनों आतंकियों ने बलात्कार किया… विरोध करने से क्या होता? कोई क्या कर सकता था? इस्लाम को नकारने के बाद भी हमें मोसुल की शरिया कोर्ट में ले जाया जाता और सहदा करवाया जाता.


क्या इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने आपको सिर्फ एक सेक्स स्लेव के रूप में रखा हुआ था या आपसे कुछ और भी काम करवाते थे?
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नहीं हमसे ऐसा कुछ काम नहीं करवाया जाता था सिवाय आतंकियों को चाय और पानी देने के अलावा…  आतंकी जब भी आते थे तो हमें उनके लिए चाय-पानी कभी-कभी ले जाना पड़ता था इसके अलावा और कुछ नहीं. दरअसल, आतंकी इसी बहाने हमें देखना चाहते थे जिससे वे हमारा सौदा कर सकें… फिर वे हमें अपने साथ ले जाते थे और अत्याचार करते थे. ऐसा भी हुआ कि आतंकी एक लड़की को ले गया फिर थोड़ी देर बाद उसे अपने भाई को दे दिया. आतंकी किसी भी लड़की को अपने साथ दो हफ़्ते से ज्यादा नहीं रखते थे. एक जगह पर हम शायद ही कभी महीने भर से ज्यादा रहे हों… हम बराबर बिकते रहे.

जिन आतंकियों ने आपको बंधक बनाया, उनके परिवार भी थे? क्या उनके बीवी-बच्चे उनके साथ रहते थे?
हाँ, उनमें कुछ के अपने परिवार थे… उनकी बीवियां थी, उनके छोटे-छोटे बच्चे भी थे. वैसे आतंकी हमें कभी अपने परिवारों के पास नहीं ले जाते थे लेकिन कभी-कभी कोई आतंकी किसी लड़की को अपने परिवार के पास ले जाता था. लेकिन उनके परिवार से कोई मदद नहीं मिलती. मैं भी एक दिन के लिए गई थी लेकिन वहां रुकता कोई नहीं था. उनकी महिलाओं ने हम गरीब लड़कियों की कोई मदद नहीं की. वे हमेशा हमसे नफरत करते थे, उनकी बीवियां भी वैसे ही व्यवहार करती थी जैसे आतंकी करते थे. उनमें और दाएश आतंकियों में कोई फर्क नहीं था. आतंकी अपने घर में लड़कियों को बहुत ही कम ले जाते थे क्योंकि अपने मुख्यालय में रखकर वह जो चाहते उनके साथ कर सकते थे उन पर अत्याचार कर सकते थे उन्हें बेच सकते थे लेकिन घर पर ये सब करने में शायद परेशानी होती.

एक आतंकी अगर शादीशुदा है तो क्या यह मज़हबी रूप से सही है कि वह एक लड़की को बंधक बनाए और उसके साथ यह सब करे? क्या इस्लाम में ऐसी हिंसा को जायज ठहराया गया है?

मुझे पता नहीं लेकिन उनकी बीवियों को पता था कि आतंकी लड़ाके सेक्स स्लेव के रूप में लड़कियों को रखे हैं. उन्हें इस बात की अच्छी तरह खबर थी लेकिन फिर भी कुछ नहीं कहतीं क्योंकि आतंकियों का कहना था कि वह सब कुछ मज़हब के अनुरूप ही कर रहे हैं और फिर यज़ीदियों के साथ ऐसा अत्याचार इसलिए हो रहा था क्योंकि उनकी नज़र में हम वह बुतपरस्त हैं. आखिर उन्हें तो मजा आ रहा था… वे भलीभांति जानती थी इन लड़कियों को उनके घर में तो नहीं रखा जाएगा और ना ही आतंकी इनसे शादी करेंगे इसलिए उनकी बीवी हो कोई परेशानी नहीं थी.ज्यादा से ज्यादा घंटे-दो-घंटे या दो-तीन दिन में हमें रफ-दफ़ा  जाता… अब किसको दिक्कत होती थी? 

दाएश आतंकी अपने इन वहशी कृत्यों का कैसे बचाव करते थे, वह कैसे जस्टिफाई करते थे कि यह कि वे जो कुछ कर रहे हैं वह इस्लाम के अनुरूप है?

शायद हां… यह सब वे इस्लाम की व्याख्या के अंदर ही कर रहे थे. वह हमसे नमाज़ पढ़ने के लिए कहते… हमसे क़ुरान पढ़ने, उसे याद करने के लिए दवाब डालते. ये सब इस्लाम के नाम पर ही हो रहा था. हालांकि बहुत से मुस्लिम इन सब से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते फिर भी देखिए दुनिया भर में लोग इस्लामिक स्टेट से जुड़ते जा रहे हैं. उन लोगों में भी कई देशों के लोग थे… मुझे उनकी भाषा समझ में नहीं आती थी. 

एक बार आपने वहां से भागने की कोशिश की थी. लेकिन आप पकड़ी गईं… आपको जरा भी डर नहीं लगा कि पकड़े जाने पर आपको मार दिया जाएगा… जब पकड़ी गईं, उसके बाद आपके साथ क्या सुलूक किया गया?

जैसा मैंने पहले कहा वह कभी भी लड़कियों को जान से मारते नहीं थे… बस पीटते थे. ऐसा ही मेरे साथ हुआ जब मैं पकड़ी गई तो मुझे बुरी तरह पीटा गया. मुझे दाएश के मुख्यालय में लाया गया इसके बाद वहां आतंकियों ने मेरे साथ बारी-बारी से बलात्कार किया। ऐसा उन्होंने हर उस लड़की के साथ किया जिसने भागने की कोशिश की उनमें से कुछ लड़कियां एकदम युवा थीं. इस दौरान कई लड़कियों ने आत्महत्या करने की भी कोशिश की.

 उसके बाद क्या हुआ? आपको कहां ले जाया गया?

General Assembly Seventy-first session Opening of High-level plenary meeting on addressing large movements of refugees and migrants Remarks by the Secretary-General

मुझे मोसुल में रखा गया… मारपीट और बलात्कार का सिलसिला जारी रहा… फिर मुझे बेच दिया गया.  ऐसा करने वाली मैं अकेली नहीं थी तमाम लड़कियां ऐसी थी. लेकिन मैंने एक बार फिर (दोबारा) भागने की कोशिश की और मैं इसबार सफल हो गई. मैं भागी और एक घर में छिप गई लेकिन दुर्भाग्यवश कई लड़कियों ने ऐसा किया लेकिन वे मेरी तरह भाग्यशाली नहीं थीं.

कुछ दिन पहले मैं एक यज़ीदी लड़की से मिली हूं. वह भी आपके जैसी आतंकियों के चंगुल से छूटी लड़कियों की मदद कर रही हैं. उनके अनुसार कई लड़कियों ने आतंकियों मारने की भी कोशिश की…  क्या आपने भी ऐसी कोई कोशिश की ?
मुझे नहीं लगता कि मैं किसी को मार सकती हूं. हो सकता है कुछ अन्य लड़कियां ऐसी हों लेकिन मैं नहीं… अपने गांव में जिस घर में रहती थी उस घर से मैं कभी अकेली नहीं निकली तो आपको क्या लगता है कि ऐसी लड़की किसी को कोई मार सकती है…  जहां मुझे रखा गया था वहां सैकड़ों की संख्या में आतंकी थे. अगर एकाध को मैं मार भी देती तो जो बचे थे वह मेरे साथ क्या सुलूक करते हैं…  इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है.

आपको कई बार बेचा गया. कई अलग-अलग जगह रखा गया. क्या आप हमें बताएंगी कि यह स्लेव बाजार कैसे होते थे? खरीद-फरोख्त कैसे होती थी?

शरिया अदालतें ही बाज़ारों के रूप में काम करती थीं. वहां ऐसे कई बाजार थे. आतंकी आते थे अपने साथ लड़कियों की तस्वीरें लाते, एक दूसरे को दिखाते थे कभी कभी उनके साथ कुछ लड़कियां भी होती थीं. लड़कियों का चेहरा देखते थे और जिसे जो भी पसंद आती, उसे चुन लेते थे. कभी-कभी सीधे मुख्यालय से ही खरीद लिया जाता. ऐसी ही एक जगह मुझे रखा गया था. इस्लामिक स्टेट के सभी आतंकी एक दूसरे को जानते थे वे लड़कियों के बारे में एक दूसरे को सूचना  देते थे कि कौन लड़की कहां है… वह कैसी दिखती है… उसे कहां जाना चाहिए. मुझे याद है, हम क़रीब 60 थे… जिन्हें दो अलग-अलग समूहों में बांटा गया. फिर वे आए और हमें चुनने लगे जैसे हम बाज़ार में बिकने वाली कोई चीज हों… 

आप की खरीद-फरोख्त के लिए कितना धन दिया गया? आतंकियों की नज़र में इंसान की क्या कीमत थी?

दरअसल, इस्लामी स्टेट के आतंकी यज़ीदियों को कभी इंसान समझते ही नहीं है. हम उनके लिए जानवरों से भी बदतर थे. अधिकतर हमें उपहार-स्वरुप एक-दूसरे को दिया जाता था. कभी-कभी लड़कियों की अदला-बदली के लिए. बेचने की बात हो तो महज़ सौ डॉलर से भी कम में लड़कियां बिक जातीं थीं. इंसानो की कोई कीमत ही नहीं थी.

इस्लामिक स्टेट में सभी आतंकी क्या अरब से थे या उनमें से कुछ इराक़ और सीरिया से भी थे? यूनाइटेड किंगडम या संयुक्त राज्य अमेरिका से भी थे?

नहीं, सिर्फ अरबी ही नहीं थे. उनमें से कई इराक़ और सीरिया से थे. कई दूसरे देशों से भी थे. मैं उनकी भाषा नहीं समझती थी और मुझे उनके देशों का भी ठीक से पता नहीं था लेकिन मैं इतना कह सकती हूं कि वे दुनिया के कई हिस्सों से आए हुए थे. इस्लामिक स्टेट के बारे में यह कहना कि यह सिर्फ इराकियों से लड़ रहे हैं या सिर्फ सीरिया से लड़ रहे हैं. ये एकदम गलत है. यह पूरी दुनिया के लिए खतरा हैं पूरी मानवता के लिए खतरा हैं. इसीलिए मुझे लगता है कि इस्लामिक स्टेट से पूरी दुनिया को मिलकर लड़ना होगा यह सिर्फ यज़ीदियों के लिए खतरा नहीं पूरी दुनिया के लिए खतरा हैं.

संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके सहयोगी देश पिछले एक साल से इस्लामिक स्टेट के ठिकानों पर हवाई हमले कर रहे हैं. क्या आपने कभी ऐसी बमबारी देखी?

नहीं. मैंने कोई कभी हवाई हमले नहीं देखे. हालांकि मुझे न्यूज़ से पता चला है कि यह पश्चिमी देशों की गठबंधन सेना दाएश पर हमला कर रही है.

आपने आइसिस के चंगुल से भागने के लिए दो प्रयास किए. दूसरी बार में आप भागने में सफल रहीं. क्या किसी ने आपकी मदद की?
जब मैंने पहली बार भागने की कोशिश की तो मैं पकड़ी गई लेकिन जब दूसरी बार में भागी तो सफल हो गई. इस दौरान मोसुल के एक मुस्लिम परिवार ने छिपने में और इस्लामिक स्टेट के कब्जे वाले इलाके से मुझे बाहर निकालने में मेरी मदद. कुछ और लड़कियों ने भी भागने की कोशिश की, कुछ सफल हुईं. उनमें से कुछ ने अपने दम पर तो कुछ ने दूसरों की सहायता भी ली.

क्या मदद करने वाले लोग पैसे भी लेते हैं?
हाँ, यह सही है. कुछ परिवार पैसे लेते हैं. लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ. जिस परिवार ने मेरी मदद की उसने मुझसे बदले में कुछ नहीं लिया वहां से कुछ दूर एक रिफ्यूजी कैंप में मेरा भाई रह रहा था, उसने मुझे रुपए भेजे. लेकिन मेरी मदद के बदले में किसी ने मुझसे कुछ नहीं लिया. हालांकि कई बार परिवार या रिश्तेदारों को बड़ी मोटी रक़म अदा करनी पड़ती है. 

रिहाई के बदले ऐसे लोगों को कितना भुगतना पड़ता है?

करीब बीस हज़ार डॉलर… कभी इससे भी ज्यादा. वर्तमान स्थिति में लड़कियों के लिए भागना बहुत मुश्किल हो गया है.

जो परिवार ऐसी लड़कियों की मदद करना चाहते हैं उनके साथ आतंकी क्या करते हैं? (अगर उन्हें पता लग जाए)

नहीं. इस्लामी स्टेट को इस बारे में पता ही नहीं लगता. जिन परिवारों ने मेरी मदद की मैं उनका नाम कभी नहीं बताऊंगी.

जब आपने भागने की कोशिश की तो क्या आतंकियों ने आपको पहचाना नहीं?

इस्लामिक स्टेट के अनुसार सभी महिलाएं ऊपर से नीचे तक पूरी तरह बुर्के में रहती थीं. उनकी सिर्फ आंखें खुली रहतीं. कुछ की तो आंखें भी नहीं खुली होती थीं. ऐसे में किसी भी महिला को पहचानने का कोई सवाल ही नहीं था. मैं भी जब भागी तो ऊपर से नीचे तक ऐसे ही एक बुर्के में थी. अतः पहचानने का कोई सवाल ही नहीं होता था.

नके चंगुल से छूटने के बाद आप कहां गईं? यूरोप पहुंचना कैसे हुआ?

जिस परिवार ने भागने में मेरी मदद की थी, उस परिवार ने मुझे किरकुक के पास कुर्दिस्तान की सीमा पर पहुंचा दिया. किरकुक में इस्लामिक स्टेट नहीं है. कई दिनों तक मैं कुर्दिस्तान के उन राहत शिविरों में रुकी रही. इसके बाद जर्मन सरकार ने करीब हजार यज़ीदी लड़कियों को अपने यहां इलाज के लिए बुलाया। उनमें से एक मैं भी थी. इस तरह मैं जर्मनी पहुंच गई. अन्य देशों की तुलना में जर्मनी यज़ीदी लड़कियों को अच्छी तरह रख रहा है. जर्मनी में हमें स्वास्थ्य सुविधाएं मिलीं, हमें कानूनी सहायता दी गई, हमें रुकने के लिए जगह दी गई. जर्मनी आज भी हमारी मदद कर रहा है. हमें खुशी है कि हमें जर्मनी पहुंचने का मौका मिला।

आप अपने आप में एक अनोखी इंसान हैं. आपने दाएश के ज़ुल्मों को सहा, वहां से भागीं… और सबसे महत्वपूर्ण  है कि आप पर अपनी उस दर्द भरी कहानी को हम सब के साथ बिना किसी झिझक के शेयर कर पा रही हैं. फिर भी क्या आपको अभी कहीं से भी इस्लामिक स्टेट का डर लगता है?

मुझे नहीं पता क्या होगा. बस मैं इतना जानती हूं कि मेरा एक परिवार था, वह मेरे साथ नहीं है. मेरे पास खोने को कुछ नहीं है. मेरे 6 भाई थे वह कहां हैं. आइसिस में उन्हें छोड़ा भी है या नहीं, कुछ नहीं पता. जब मैं गांव में थी और जब आइसिस ने हमला किया तो उन्होंने महिलाओं और पुरुषों को अलग-अलग किया और फिर पुरुषों को एक जगह ले जाकर गोली चलाने की आवाज आई मुझे नहीं पता कि उन्होंने सभी पुरुषों को मार दिया लेकिन मैं गोलियों की आवाज़ स्पष्ट रुप से सुन सकती थी. पता नहीं मेरे भाई जिंदा भी हैं या नहीं…  अगर हैं भी तो वह कहां है मुझे कुछ नहीं पता. मैं जिस समाज, जिस गांव में पली-बढ़ी, वो सब तहस-नहस हो चुका है. हज़ारों यज़ीदी बेघर हुए घूम रहे हैं. अभी भी 3400 से ऊपर यज़ीदी महिलाएं गायब हैं. पता नहीं उनके साथ क्या हो रहा है… उनमें से कितनी जिंदा हैं, कितनी मर चुकी हैं…  यज़ीदियों की मदद कोई नहीं कर रहा है. मुझे नहीं पता अब और क्या होगा… मैं सब कुछ खो चुकी हूं इसलिए अब और कुछ खोने का डर नहींं इससे ज्यादा और क्या होगा… मेरा सम्मान, मेरी डिग्निटी, मेरा परिवार… यज़ीदियों का भविष्य अंधकार में हैं.

आपको नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया गया है? क्या मायने हैं आपके लिए इसके?
हां, मुझे पता है कि मुझे नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया गया लेकिन मुझे लगता है मेरा कार्य किसी भी पुरस्कार से बड़ा है. लगभग 5 लाख यज़ीदी बेघर हो चुके हैं. हजारों मारे जा चुके हैं, हजारों लापता हैं. महिलाओं का कोई पता नहीं, किस हालत में रह रही हैं. मुझे उनकी आवाज़ उठानी है. सिंजार में 20 से ऊपर सामूहिक कब्रें मिली हैं. जब हमारे गांव को बंधक बनाया गया तो किसी ने मदद नहीं की…  दुनिया की कोई भी संस्था सिंजार की उन कब्रों को देखने नहीं गई. सिंजार हमारे अपनों की लाशों से पटा पड़ा है. दुनिया का कोई देश हमारी पुकार सुन कर नहीं आया इसीलिए मुझे लगता है कि इस पुरस्कार का मतलब हर अल्पसंख्यकों की रक्षा, हर उस औरत और बच्ची की रक्षा होनी चाहिए, जिस पर अत्याचार हो रहा है, जिस पर जुल्म ढहाया जा रहा है. इस पुरस्कार का मतलब होना चाहिए यज़ीदियों की रक्षा जो अपने घर से बेघर कर दिए गए. इसीलिए मुझे पुरस्कार से कुछ ज्यादा हासिल करना है. मेरे अपने लोग सामूहिक नरसंहार का सामना कर रहे हैं. उन्हें बचाना है. मेरे लिए पुरस्कार का मतलब सिर्फ यही है.

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