भारतीय वामपंथ का पाखंड: ‘फासीवादी’ मोदी और हिंदू विरोधी

–डॉ. डेविड फ्रावली (@DavidFrawlyVed)

“एक देश के रुप में भारत के लिए, ऐसे संगठनों और इनके वाहियात तर्कों को नज़रअंदाज़ कर अपनी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं को अंगीकार करना ही ठीक है. और उसे ऐसा करना भी चाहिए”

अगर कोई व्यक्ति भारतीय प्रेस और मीडिया में फासीवाद के आरोप की पड़ताल करे तो वह पाएगा कि ये शब्द, आरएसएस और इसके सहयोगियों खासकर भाजपा और नरेंद्र मोदी को गाली देने के लिये बड़ा ही आम है. हिंदू पहचान वाले अन्य संगठनों के लिये भी समान रूप से इसका इस्तेमाल किया जाता है. इन सबके अलावा किसी और राजनैतिक दल या धर्म के लिये शायद ही कभी इसका इस्तेमाल हुआ हो या होता है. यहाँ तक कि इस्लामिक स्टेट जैसे जाने-माने आतंकवादी संगठनों के लिये भी इसका इस्तेमाल कभी नहीं होता है.

इसमें कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है क्योंकि यहाँ की पत्रकारिता और शैक्षणिक समुदाय में हिंदू-विरोधी वामपंथ की स्थिति बेहद मजबूत है जो कांग्रेस के लंबे शासन काल में खूब फला-फूला. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय वामपंथ, पश्चिमी मुख्यधारा के उदारपंथी रजनैतिक दलों से अलग है और आज भी कम्युनिस्ट युग के उन्हीं सिंद्धांतों को दोहराता है.  2014 में नरेंद्र मोदी की भारी जीत के बाद से ही वामपंथ का कद घट रहा है इस वजह से वे (वामपंथी) निराश हैं. ऐसी स्थिति में नरेंद्र मोदी द्वारा देश की भलाई में किए जाने वाली हर कोशिश का महत्व कम करने के लिए वामपंथी कोई कसर न छोड़ रहे हैं और न छोड़ेंगे.

अपने विरोधियों को नीचा दिखाने के लिये फासीवादी शब्द का प्रयोग, वामपंथी बहुत पुराने समय से कर रहे हैं. ठीक वैसे, जैसे कुछ पुराने ईसाई-चर्च गैर ईसाइयों को ‘बुतपरस्त’ (मूर्तिपूजक) और ‘विधर्मी’ कह कर बुलाते थे. यहां तक कि कट्टर वामपंथी संगठन अपने से अलग सोच रखने वाले वामपंथी विरोधियों को भी फासीवादी कह कर बुलाते हैं. यूरोप के वामपंथियों के लिए अमेरिका एक फासीवादी देश हैं. अमेरिका के घोर वामपंथी, दक्षिणपंथी रिपब्लिकन को फासीवादी कहते हैं.

ऐसे संवेदनशील शब्द हमारी सोचने की प्रक्रिया को रोक देते हैं और जिस व्यक्ति या संगठन के लिए इनका प्रयोग किया जाता है, उनकी बिना सोचे-विचारे निंदा करने के लिए प्रेरित करते हैं. इस हिसाब से देखें तो फासीवादी शब्द की सबसे अच्छी परिभाषा शायद यह है कि “फासीवादी किसी ऐसे संगठन को कहेंगे जिसे वामपंथी पसंद नहीं करते और कलंकित करना चाहते हैं”. भारतीय वामपंथियों के लिये यह संगठन हिंदुओं का है. और तो और भारत में योग को भी हिंदुओं से संबंधित होने की वजह से संदेह की नजरों से देखा जाता है और दक्षिणपंथी समझा जाता है.

इतिहास के आईने में वामपंथ का लेखा

जैसा फासीवाद के साथ है ठीक वैसे ही वामपंथ ने भी समान रूप से हिसा फैलाई, जातीय-संहार किए और लोकतंत्र का दम घोंटा है. सोवियत संघ (आज के रुस) के जोसेफ स्टालिन, हिटलर जितने ही बुरे और मुसोलिनी से भी बदतर थे. स्टालिन ने अपने ही दसियों-लाख देशवासियों को मरवा दिया.

स्टालिन ने हिटलर के साथ 1939 एक दूसरे पर आक्रमण न करने की संधि पर हस्ताक्षर किए जिसने उन दोंनों के बीच पोलेंड का बंटवारा करवाया. जिससे बाद में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ और हिटलर को सोवियत संघ के साथ बिना किसी दूसरे मोर्चे के डर के फ्रांस पर आक्रमण करने का मौका मिला. यह तो 1941 में सोवियत संघ पर किया गया हिटलर का ही हमला था जिससे स्टालिन का नाज़ियों से ये गठजोढ़  टूट गया. फिर भी देखिए, इस कहानी के बावज़ूद वामपंथियों ने स्टालिन की हिटलर से उस मित्रता को आसानी से भुला दिया जिसकी वजह से पोलैंड बर्बाद हुआ और द्वितीय विश्व युद्ध का शुरु हुआ.

अब बात चीनी कम्युनिस्ट नेता माओत्से तुंग की… माओ की तानाशाही नीतियों और राज्य चलाने का तरीका किसी भी घनघोर फासीवादी से प्रतिस्पर्धा कर सकता है.  साल 1976-77 में माओ की “सांस्कृतिक क्रांति” के दौरान  लाखों मारे गए, अनगिनत किताबें जला दी गईं, पूरे देश में विश्वविद्यालय बंद कर दिए गए. जबकि भारत के वामपंथियों ने माओ के इन अत्याचारों पर कभी चर्चा करना उचित नहीं समझा बल्कि इसे चर्चा लायक मुद्दा ही नहीं समझा. ऊपर से कुछ वामपंथी तो भारतीय माओवादियों का और उनके द्वारा की गई हिंसा का भी बचाव करते हैं.

चीन के कम्युनिस्ट दलाई लामा को फासीवादी कहते हैं और भारतीय मार्क्सवादी इस बात का समर्थन करते हैं. रूस और चीन के कम्युनिस्टों ने बतौर नास्तिक अनगिनत चर्च, मंदिर और मस्जिदें ढहाईं. वामपंथी हिंदुओं की धार्मिक असहिष्णुता की आलोचना करने में बड़ा आनंद पाते हैं. ये तब है जबकि हिंदुओं ने  न तो कभी किसी देश पर आक्रमण किया और न ही कभी धर्म परिवर्तन की कोशिश की. उन्हें (वामपंथियों को) पाकिस्तानी हिंदुओं की भी कोई चिंता नहीं है जिनके लिए वहाँ (पाकिस्तान में) कोई राजनैतिक या मानवीय अधिकार नहीं हैं और उनका एक-साथ सफाया किया जा रहा है.

यहूदियों का जनसंहार नाज़ी बर्बरता का पर्याय माना जाता है. इसके बावजूद भी वामपंथी इज़राइल विरोधी हैं या सीधे शब्दों में यहूदी विरोधी हैं. जिनकी संवेदनाएं किसी भी तरह से इज़राइल के साथ हैं, वे वामपंथियों की नज़र में फासीवादी हैं और यूरोप में भी यहूदियों पर बढ़ते हुए हमलों की तादात वामपंथियों के लिए कोई चिंता का विषय नहीं है.

वामपंथी झुकाव वाली इंदिरा गाँधी और उनकी कांग्रेस पार्टी ने 1975-77 तक देश पर इमरजेंसी थोपी, प्रेस की स्वतन्त्रता और लोकतंत्र को निष्प्रभावी कर दिया . क्या हमें उनकी नीतियाँ ठीक वैसी ही नहीं लगती जैसी कि जिनके लिए हिंदू नेताओं को फांसीवादी कहा जाता है? तो क्या हमें (इंदिरा गांधी की) उनकी नीतियों को फासीवादी नहीं कहना चाहिए? और फिर उस समप्रदायिक हिंसा और सिखों पर हुए हमलों का क्या जो इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए… मत भूलिए, ये आज़ादी के बाद देश का सबसे बड़ा नरसंहार था.

भारतीय वामपंथियों के एक और हीरो हैं. लालू प्रसाद यादव. जिन्होंने अपने लंबे शासन काल के दौरान बिहार को पिछड़ा और कानून-व्यवस्था विहीन रखा. हालांकि लालू दोषी ठहराए गए और जेल भी भेजे गए फिर भी विडंबना देखिए. जो फासीवाद, संप्रदायवाद और भ्रष्टाचार से लड़ने की बात करते हैं वो लालू के साथ बिहार में राजनैतिक गठजोड़ किए हुए हैं.

वामपंथ के आडंबर के उस पार

शायद ही ऐसा कोई काम होगा जिसे तनिक भी फासीवादी कहा जाए और जिसे वामपंथियों ने न किया हो! फिर भी वामपंथी, भारत में अपने तानाशाही रवैये की निंदा नहीं करते.

अब वामपंथी हिंदुओं की निंदा तथाकथित आतंकी गतिविधियों के लिए नहीं बल्कि गौहत्या की वजह से हुई छिट-पुट/एकाध घटनाओं के लिए कर रहे हैं, जो सालों से हो रही हैं. हमें बताया जा रहा है कि गौहत्या पर प्रतिबंध चाहने वाले हिंदू संगठन सांप्रदायिक सद्भाव के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं. यह बेतुका है. विशेष रूप तब, जब हम पश्चिमी एशिया की वर्तमान स्थितियों की तरफ देखते हैं, जहाँ देशों में गृहयुद्ध जारी हैं और विध्वंसकारी आतंकी हमले हो रहे हैं. वहां तो कोई हिंदू नहीं है.

निस्संदेह, कोई भी आलोचना या परीक्षण से परे नहीं होता. वामपंथियों की अपनी खुद की असफलताएं हैं और ऐसे में वो अपने आप को सच्चाई की आवाज़, मानवता की आवाज़ या लिए न्याय की आवाज होने का दावा नहीं कर सकते हैं.

यह भारतीय वामपंथ का चयनात्मक (सिलेक्टिव) विरोध है जो केवल हिंदुओं को ही निशाना बनाता है और अपने संगठनों (वामपंथियों) द्वारा अक्सर की जाने वाली हिंसा पर पर्दा डाल लेता है.

भारत में वामपंथी अपने प्रभुत्व वाले दशकों में भी अपने को ऊपर उठा पाने में कभी सफल नहीं हो पाए. इसलिए अब भारतीयों को चाहिए कि वामपंथियों के इन वाहियात भेदभाव पूर्ण तर्कों और उनकी भाषा पर ध्यान न दे कर गर्व से अपनी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं को अंगीकार, स्वीकार करें.

(लेखक डॉ. डेविड फ्रावली  भारत के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान “पद्म-भूषण” से सम्मानित अमेरिकी वेदाचार्य और योग शिक्षक हैं. यहाँ व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. मूल रुप से DailyO पर अंग्रेजी में प्रकाशित इस लेख का ‘चौपाल’ के लिए अनुवाद दीपक मिश्र  ने किया है.) ट्विटर पर ‘चौपाल’को फॉलो करने के लिए आएं @ChaupalBharat पर.[sgmb id=”1″]

1 Comment


  1. // Reply

    बहुत खूब में

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

− 5 = 4