चर्चा के चबूतरे पर देश की सबसे युवा सरपंच जबना चौहान

गरीब परिवार में जन्म, दसवीं के बाद आगे की पढ़ाई बंद करने का दबाव,लेकिन पढ़ने के लिए संघर्ष जारी रहा। मनरेगा में काम किया, रोज़-रोज़ बीसियों किलोमीटर का पैदल सफर, साथ-साथ छोटी सी नौकरी की… अपनी इसी ज़िद  के चलते वो ना सिर्फ सरपंच बनी बल्कि  उसने इतिहास रच दिया। अब ये सामान्य ज्ञान के एक प्रश्न का जवाब भी हैं… जी हाँ, अगर सवाल पूछा जाए कि, देश की सबसे युवा सरपंच कौन है… जवाब होगा, 22 वर्षीय जबना चौहान! जबना चौहान हिमाचल प्रदेश में जिला मंडी की ग्राम पंचायत थरजूण की प्रधान (सरपंच)हैं।शशांक पाठक ने चौपाल पर उनसे विस्तृत चर्चा की… 

आप एक पत्रकार के तौर पर काम कर रही थी। आपको कब ये लगा कि राजनीति में जाना है और क्या वजह रही कि आपने ग्राम प्रधान का चुनाव लड़ा?
मैंने यह कभी नहीं सोचा था कि मैं राजनीति में जाऊंगी। हमेशा यही सोचती थी कि सरकारी नौकरी या समाजसेवा का कोई काम करूंगी। यह 2015 के अंतिम दिनों की बात है। ग्राम-प्रधानी (सरपंच) के चुनाव आने वाले थे। घर पर सब इस बात की चर्चा कर रहे थे कि इस बार महिला सीट है, तो चुनाव लड़ना चाहिए। लेकिन मैंने तब भी इस पर ध्यान नहीं दिया। मेरी उम्र भी इतनी नहीं थी कि चुनाव लड़ने के बारे में सोचूं। लेकिन बचपन से ही एक बात मन में थी कि कुछ अलग करना है।

हाईस्कूल के बाद पिताजी ने आगे की पढ़ाई के लिए मना कर दिया था। लेकिन मैंने अपनी जिद के चलते इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई के लिए उनको मना लिया। इसके बाद जब कॉलेज की बारी आई तो फिर पिताजी ने साफ़ कर दिया कि अब पढ़ाई की कोई बात नहीं होगी। ‘लड़कियों वाले काम’ सीखो… सिलाई-कढ़ाई वगैरह। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी तो आगे पढ़ाई करना आसान भी नहीं था, लेकिन फ़िर मेरी ज़िद के आगे उन्हें मानना पड़ा। मैनें बारहवीं के बाद छुट्टियों के दौरान मनरेगा में काम किया, जिससे करीब दो हज़ार रुपये मेरे पास आ गए थे। उन्हीं पैसों से कॉलेज में दाखिला ले सकी। लेकिन कॉलेज गांव से दूर था तो बस से आने-जाने के भी खर्चे का सवाल था। यह मेरा अब तक का सबसे बुरा वक़्त था। मैं एक तरफ तो बस से जाती थी लेकिन कॉलेज से वापस आते समय 24-25 किलोमीटर पैदल चल कर आती थी। ऐसे ही 4-5 महीने गुजरे, लेकिन मैनें सोचा कि गरीब हूँ तो क्या हुआ पढ़ाई तो करनी ही है। कॉलेज में अधिकतर पत्रकार आते रहते थे। मैनें उनसे संपर्क किया और टाइपिंग सीख कर उनके साथ काम करने लगी। वहाँ से कुछ पैसे मिल जाते थे और फिर ऐसे ही पढ़ाई चलती रही। वहीं से मैं गांव की समस्याएं और मुद्दे भी अपनी पत्रकारिता के चलते उठाने लगी। मेरी काफी लोगों से जान-पहचान हो गई, इसीलिए मुझे सभी ने कहा कि चुनाव लड़ो लेकिन मैं तैयार नहीं थी। जब नामांकन के तीन-चार दिन पहले पिता जी ने कहा कि तुम नामांकन तो भर दो, देखते हैं आगे क्या होता है। इस तरह मैनें नामांकन दाखिल किया। मुझे यह भी लगा था कि अगर चुनाव हार गई तो बेइजत्ती हो जाएगी, सामने चार और महिला उम्मीदवार थे। लेकिन गांव के लोगों ने मुझे चुना।

आपके सामने जो और उम्मीदवार थे, उनमें से आपके अलावा सबसे कम और सबसे ज्यादा उम्र की उम्मीदवार कौन थीं? और उनकी उम्र क्या थी?
सबसे कम उम्र की जो उम्मीदवार थीं वे करीब 33 साल की रही होंगी। और जो सबसे बड़ी थीं वो रिश्ते में मेरी भाभी हैं, उनकी उम्र 40 साल से ज्यादा थी। चुनाव में मेरे परिवार के ही तीन लोग मेरे सामने थे। मैंने तो पहले इस बात पर भी चुनाव लड़ने से मना कर दिया था। लेकिन उन्होंने कहा कि नहीं चुनाव तो लड़ो। चुनाव की वजह से परिवार में मनमुटाव भी हुआ जो मैं नहीं चाहती थी।

गाँव की राजनीति की एक सामान्य बात है कि यहाँ दुश्मनी बहुत जल्दी होती है और वो भी व्यक्तिगत। तो आपके परिवार के दो सदस्य आपके सामने थे, क्या उनसे अभी भी सामान्य रिश्ते हैं या उनमें कुछ बदलाव आया है?
देखिए गाँव की राजनीति में यही होता है, जो आप कह रहे हैं। सब सामने दिख जाता है कि कौन आपके साथ हैं और कौन नहीं है। हालांकि चुनाव के बाद उन लोगों से वैसे रिश्ते तो नहीं रहे पर हम कोशिश करते हैं एक दूसरे से मिलते रहें।

आपने मनरेगा में काम किया है उस वक़्त जब केंद्र में संप्रग (कांग्रेस गठबंधन) की सरकार थी। लेकिन राजग (भाजपा गठबंधन) सरकार के आने के बाद मनरेगा लगभग बंद है या कहें कि कम-से-कम सरकार इसके प्रति उदासीन है। आपको क्या लगता है क्या गरीबों के लिए मनरेगा एक अच्छी योजना थी और क्या सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए?
जब मनरेगा शुरू हुआ था, तब बहुत धांधली हुई थी, यह सबको पता है। लेकिन केंद्र या राज्य सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए, यह बहुत जरूरी है। मेरे गाँव में मनरेगा के तहत थोड़ा बहुत कम काम ही हो पाता है।
अब यह मना कर दिया गया है कि मनरेगा के तहत कच्चे रास्ते नहीं बनेंगे, पक्के ही बनेंगे। लेकिन पक्के रास्ते बनाने के लिए हमारे पास संसाधन नहीं है, सामान नहीं है, बजट नहीं है। हम डिमांड लेटर भेजते है किसी भी सामान के लिए तो बहुत समय लग जाता है, कई बार तो आता ही नहीं है।

आप जिस उम्र में चुनाव लड़ीं, वह उम्र गाँवों में ‘लड़कपन’ की उम्र कही जाती है। ऐसे में गांव वालों के साथ आपका कैसा अनुभव रहा?
गाँव का माहौल बिल्कुल अलग है। और खासकर लड़कियों के लिए। उनके लिए अलग नियम-क़ायदे होते हैं। कई लोगों ने सवाल उठाया कि यह लड़की क्या करेगी, कैसे काम करेगी। लेकिन बहुत से लोगों ने मेरा साथ दिया, खासकर गाँव के युवाओं ने।

गाँव के चुनाव या स्थानीय निकाय चुनावों में धन-बल का बहुत इस्तेमाल होता है। क्या आपके साथ भी यह चुनौती आई और आपने कैसे इसका सामना किया?
यह बात बिल्कुल सही है। इन चुनावों में गाँव वाले यह सोचते हैं कि किस उम्मीदवार से, कितना पैसा या कोई सामान लिया जाए अपने वोट के बदले। जो बाकि उम्मीदवार थे उन्होंने यह किया भी, काफी पैसा बरबाद किया उन्होंने। मेरे पास तो थे ही नहीं तो खर्च करने का सवाल ही नहीं होता। मैनें लोगों से बोला कि मैं एक भी पैसा खर्च नहीं करूंगी। हाँ, जीत के बाद में सबको ‘धाम’ ( ये एक तरह की दावत है जो जीत पर दी जाती है) जरूर दूंगी, जो हमारे यहाँ का रिवाज़ है। लेकिन उससे पहले एक भी पैसा खर्च नहीं किया।

सरपंच का चुनाव जीतने के बाद सबसे पहला काम बोलरो (जीप) गाड़ी खरीदना होता है, आपने खरीदी?
हंसते हुए… नहीं। असल में अब पहले से चीजें बदल गई हैं। मैं मानती हूँ कि भ्रष्टाचार ने ही देश को बरबाद किया है। अगर सब ये करने लगेंगे, तो कैसे काम चलेगा। हमने प्रदेश सरकार से बात की कि प्रधानों का वेतन बढ़ाया जाए। प्रधानों को तीन-हज़ार रुपये प्रति माह वेतन मिलता है। यह तो बहुत कम है, इससे कैसे काम चलेगा? अब बताइए कि तीन हजार रुपये में कैसे बोलेरो या कोई गाड़ी खरीदी जा सकती है?

मैंने कई और ग्राम प्रधानों से बात की है वे बताते हैं कि गांव में किसी भी काम के लिए कमीशन देना पड़ता है। क्या आपको भी इसका सामना करना पड़ा? पूरी ईमानदारी से, निडर, बेझिझक जवाब दीजिए।
मेरे साथ और जो प्रधान है, वे इस बात को मानते हैं कि कमीशन देना पड़ता है। लेकिन मैनें आज तक किसी काम के लिए एक रूपया तक नहीं दिया। मुझसे किसी ने मांगा भी नहीं। शायद यह इसलिए कि मैं पहले पत्रकारिता के क्षेत्र में रही और बड़े अधिकारियों का जानती हूँ। फिर मेरा नाम भी हो गया था। तो शायद शिकायत के डर से किसी ने आज तक पैसे नहीं मांगे।

अब जब आप प्रधान हैं तो आपने जो सपने देखे थे अपने गाँव के लिए तो अब अगर वे पूरे नहीं होते किसी कारण से तो क्या निराशा होती है?
जब मैं चुनाव में उतरी तो मेरा मुद्दा था कि गाँव में शराब बंद करूंगी। जीतने के बाद इस काम में मेरा गाँव के सभी लोगों खासकर महिलाओं और युवाओं ने साथ दिया। मैने गाँव की महिलाओं को वाट्सएप ग्रुप में जोड़ा, उनके साथ मीटिंग की कि कैसे शराब को गाँव में बंद कराया जाए। मैंने युवाओं को अलग ग्रुप में जोड़ा और ग्राम-सभा के लोगों को अलग ग्रुप में… सबसे बात करती रही और छह-सात महीने के बाद विशेष सभा बुलाकर यह प्रस्ताव पास करा लिया। इसमें हमने जुर्माने का प्रावधान भी रखा। लेकिन समाज के कुछ तथाकथित ठेकेदारों ने इस काम में खूब अड़चन पैदा की, जान से मारने की धमकियां भी मिलीं। मैंने एक ही बात कही कि मैं नहीं तो कोई और लड़की शराबबंदी को लागू करेगी, गांव में शराबबंदी तो लागू होकर रहेगी। तमाम अड़चनों के बाद हम सफल रहे। इसके बाद आसपास की पंचायतों ने भी इस फैसले पर अमल किया। लेकिन राज्य सरकार ने इस बारे में कोई दिलचस्पी नहीं ली।

गुजरात और बिहार में शराबबंदी है लेकिन बहुत लोग इसकी आलोचना करते हैं। आपको क्या लगता है कि वाकई में शराब एक बुराई है?
मेरा तो साफ मानना है कि शराब बहुत बुरी चीज है। अधिकतर दुर्घटनाएं इसी वजह से ही होती है। मैं तो मोदी जी से कहना चाहती हूँ कि अगर आपको वाकई मैं देश को स्वच्छ बनाना है तो सबसे पहले देश से नशे को बाहर करिए। बाहरी कचरा तो हम आसानी से ख़त्म कर सकते हैं, लेकिन जो दिमागी कचरा है, पहले इसे ख़त्म करिए।

आपके गाँव में ग्रामसभा की बैठक में क्या महिलाएं भी आती हैं या फिर वे इन सबसे दूर रहती हैं?
मैंने सबसे पहले महिलाओं को सशक्त करने और गांव में उनकी हिस्सेदारी बढ़ाने पर ही काम किया था। फिर चाहे वो व्हाट्सएप पर उनसे बात करना हो या फिर गांव में महिला मंडल के गठन का काम। हालांकि पहले वे कम संख्या में आती थीं लेकिन अब वे ग्राम पंचायत के हर काम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती हैं। पुरुषों से ज्यादा।

आपने इतने कम समय में इतना कुछ किया है लेकिन क्या कभी ऐसा लगा कि कोई विशेष काम आप सिर्फ इस वजह से नहीं कर पाई कि आप एक लड़की हैं?
ऐसा कभी नहीं हुआ। कठिनाइयां तो होती हैं पुरुष प्रधान समाज में, लेकिन मैं सोचती हूँ कि अगर कोई काम करना है, तो करना है। महिला होने पर कभी ऐसा नहीं लगा कि मैं कमजोर हूँ।

सरपंच के बाद अब आगे क्या सोचती हैं?
यह तो अभी नहीं कह सकती। पांच साल अच्छे से काम करना चाहती हूँ। लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरूं। आगे जो भी हो, मैं नशे के ख़िलाफ़, महिलाओं और ग़रीबों के लिए काम करती रहूंगी। फिर चाहे वो किसी भी तरह से करूं।

आप गुजरात जा चुकी हैं। वहाँ लोगों से मिली भी होंगी। आपको गुजरात और अपने यहाँ कोई अंतर समझ में आया? ‘गुजरात मॉडल’ जैसा कुछ दिखा…?
देखिए, हमारा प्रदेश पहाड़ी इलाका है। हमारी समस्याएं अलग हैं। यहाँ भी विकास हुआ है। गुजरात में अच्छा लगा वहाँ सड़क, बिजली की व्यवस्था बहुत अच्छी है, हमारा प्रदेश उस मामले में पीछे है। हम दो दिन वहाँ रहे, देर रात भी घूमे लेकिन सुरक्षा का कोई ख़तरा महसूस नहीं हुआ।

देश के कई बड़े नेताओं ने ग्राम पंचायत से शुरुआत कर बड़ा राजनीतिक सफ़र तय किया जैसे भैरो सिंह शेखावत जी, जो देश के उपराष्ट्रपति बने और राष्ट्रपति तक का चुनाव लड़ा, क्या आपका भी ऐसा सपना है?
आज की राजनीति पहले से बहुत बदल चुकी है। अब चुनावों में धनबल का बहुत प्रयोग होने लगा है। फिलहाल मैनें इस बारे में कुछ सोचा ही नहीं अभी तक।

राजनीति बहुत गंदी चीज है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं। आपको तो बुरी नहीं लगती होगी क्योंकि आप इसमें हैं लेकिन आपके हिसाब से राजनीति में गंदगी क्या है?
सबसे बड़ी चीज भ्रष्टाचार है। युवा पीढ़ी इसी वजह से राजनीति से दूर रहती है। हालांकि सभी नेता ऐसे नहीं होते, कई ईमानदार हैं। मैं युवाओं से यही कहना चाहूंगी कि आप राजनीति को समय दीजिए, राजनीति में आइए, देश को अच्छे लोगों की ज़रुरत है।

मान लीजिए कि आप प्रधानमंत्री जी से मिलें और आपको तीन ऐसी चीजें लागू करवाने का मौका मिले जो आपके कहते ही देश में लागू कर दी जाएंगी तो क्या कहना चाहेंगी?
अगर कभी ऐसा मौका मिला तो मैं उनसे कहूंगी कि एक, अगर देश को सच में स्वच्छ बनाना है तो सबसे पहले हर तरह का नशा बंद करिए।
दूसरी, दहेज प्रथा को बंद किया जाए और तीसरा, भ्रष्टाचार को ख़त्म किया जाए। सख़्त से सख़्त (लोकपाल जैसा कुछ) क़ानून बनाया जाए।

अभी आपके पास तीन साल का समय बचा है, क्या क्या लक्ष्य तय किए हैं आपने?
मैं गांव में एक डिग्री कॉलेज खोलना चाहती हूँ। इसके बारे में राज्य सरकार को कई बार लिखा भी है। हमारी पंचायत में बहुत गरीबी है। लोग अपनी बेटियों को पढ़ाना चाहते हैं। इसलिए डिग्री कॉलेज ताकि लड़कियां भी पढ़ लिख सकें। हमारी पंचायत बहुत ऊंचाई पर है तो पानी की समस्या है, उस पर भी काम करना है।

किसानों के लिए आपका क्या कहना है?
हमारे यहाँ आवारा पशुओं, ओलावृष्टि से बहुत नुकसान होता है और सिंचाई की समस्या तो है ही। सरकार भी कई वादे कर देती है लेकिन पूरा नहीं कर पाती। ओलाव़ृष्टि से जब फसल बरबाद हो जाती है तो सरकार की तरफ जो मदद मिलती है वो कौड़ियों के बराबर होती है। सरकार को समझना चाहिए कि ये देश किसानों की वजह से ही चल रहा है।
केंद्र सरकार (का दावा है कि वह) गरीबों के लिए कई योजनाएं चला रही हैं। आपको ऐसी कौन सी एक योजना लगती है, जिससे गरीबों को सीधा फायदा पहुंचा है?
मोदी सरकार ने कई योजनाएं लॉन्च की हैं, मैं उसके लिए तारीफ़ करती हूँ। उज्ज्वला योजना उनमें सबसे अच्छी योजना है। लेकिन इससे पहले सरकार को रोजगार के लिए सोचना चाहिए। क्योंकि गैस-चूल्हा तो दे दिया, लेकिन जब तक पकाने के लिए कुछ होगा नहीं तो पकेगा क्या…

अब कुछ हल्के-फुल्के सवाल… आपके ऊपर एक ज़िम्मेदारी है, एक पद है। लेकिन आप जिस उम्र में हैं, वहाँ शरारतें करने का भी मन करता होगा। कैसी शरारतें करती हैं आप?
मेरा कहीं घूमने-फिरने का शौक नहीं है। बहन के साथ लड़ लेती हूँ। मम्मी-पापा से मज़ाक कर लेती हूँ। दोस्तों के साथ भी लड़ लेती हूँ… बस! ये काफी होता है मेंरे लिए।

पसंदीदा हीरो…
अक्षय कुमार के साथ मेरा अनुभव बहुत अच्छा रहा बहुत कुछ सीखा। हालांकि मैंने उनकी वो फिल्म नहीं देखी जिसके प्लेरमोशन के दौरान उन्होंने मुझे बुलाया था। मुझे अमिताभ बच्चन और अक्षय कुमार पसंद हैं।

किताबें… पढ़ती हैं?
लोगों के जीवन से जुड़ी सच्ची घटनाओं पर जो कहानियां होती हैं, वे पढ़ना पसंद हैं।

युवाओं के लिए संदेश…
युवाओं को यही कहना चाहती हूँ कि वे भी बहुत कुछ कर सकते हैं। उन्हें सोचना चाहिए कि वो किसी भी क्षेत्र में हों अपने देश-प्रदेश और माता-पिता का नाम रोशन करें। नशे से दूर रहें और देश को महान बनाने में आपना योगदान करें। अपने माँ-बाप-गुरुओं का सम्मान करें। सफलता पाने पर माँ-बाप को कभी ना भूलें।

इतिहास रचा है आपने, अब आगे क्या इतिहास रचना है…
बहुत कुछ सोचा है करने के लिए देखते हैं क्या-क्या कर पाते हैं…

(आपको यह चर्चा कैसी लगी? हमें आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार है। नीचे कमेंट बॉक्स में उपयोग करें, आपके शब्द हमें आगे बढ़ने के लिए, अच्छा करने के लिए प्रेरित करेंगे)
(तस्वीरें:साभार इंटरनेट)

इस चर्चा को एक समाचार पत्र अपने यहाँ स्थान दे रहा है। जिसके बदले वह चौपाल को भुगतान करेगा। लेकिन चौपाल अपनी नीति के मुताबिक इस पूरी राशि का प्रयोग जबना के गांव के बच्चों की शिक्षा पर करेगा। अगर आप भी ऐसी कोई सहायता करना चाहते हैं, तो हमसे संपर्क करें।

4 Comments


  1. // Reply

    सराहनीय शशांक और अमित,
    जबाना चौहान आज उन युवाओं के लिये मार्ग दर्शक है जो राजनीति को केवल व केवल बाहुबल और धनबल के लिए चुनते है । आज सच मे राजनीति को जबाना चौहान जैसे युवाओ की जरूरत है ।
    अमित जी चौपाल पर कभी जालौन के नेताओ को भी ले आइये ।
    यहां के विधायक यहां के सांसद ।
    जालौन में स्वच्छ भारत अभियान दम तोड़ रहा है ,इस अभियान पर सरकार पैसा पानी की तरह बहा रही है पर जमीनी स्तर पर कोई बदलाव अभी तक नही दिखा है ।सांसद के गोद लिए गांव हरदोई में अभी तक खुले में शौच नही बंद हो पाया है ।


    1. // Reply

      शुक्रिया रवि! आपके शब्द हमें और जबना को और बेहतर करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। आपके सुझाव पर भी हम विचार करेंगे, वैसे हम एक बार पहले जालौन के सांसद भानू प्रताप वर्मा से चर्चा कर चुके हैं। कोशिश करेंगे कि मौजूदा हालात पर उनसे फिर बात की जाए। एक बार फिर आपका शुक्रिया हमसे जुड़े रहिए।


  2. // Reply

    बहुत ही अच्छी चर्चा। चौपाल और शशांक को बहुत बधाई। ऐसे ही लोगों से और उनके जीवन से रूबरू करते रहिए। जबना वाकई में एक रोल मॉडल हैं।


    1. // Reply

      शुक्रिया गुरप्रीत कौर। आप चौपाल से जुड़ी रहिए हम पूरी कोशिश करेंगे जबना जैसे और लोगों को चौपाल के माध्यम से आप सबके सामने लाते रहें।

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